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बेबाक बोल-राजकाज: किसानिस्तान

आज के समय में सबसे बड़ा निजी क्षेत्र कृषि ही है। नब्बे के दशक में जो निजीकरण का दौर चला उसने इस सबसे बड़े निजी क्षेत्र पर कब्जा जमाने की पूरी कोशिश की। यह मुनाफे का भी क्षेत्र है। खासकर कोरोना जैसे दौर में जब सारे क्षेत्र रसातल में चले गए हैं तो एकमात्र खेती-किसानी ही अपने पैरों पर खड़ा होकर मुनाफा पैदा कर रही है। भारत के खेत कारोबारी संभावनाओं से भरे पड़े हैं तो ‘आत्मनिर्भरता’ का भी आभास यहीं से होता है।

bebak bolकृषि कानूनों को लेकर हुए आंदोलन में शामिल किसान। (फोटो: अरुष चोपड़ा)

किसान का बेटा किसान क्यों नहीं बनना चाहता है? नब्बे के दशक के आर्थिक सुधारों के बाद भी देश के आम किसानों तक शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा क्यों नहीं पहुंची और वे खुदकुशी की राह पर क्यों मजबूर हैं? ये वो सवाल हैं जो किसान प्रदर्शनकारी दिल्ली की सीमा को घेर कर पूछ रहे हैं। आज कृषि भारत का सबसे बड़ा निजी क्षेत्र है जहां वैश्विक पूंजी की उम्मीदें टिकी हैं। यही वह क्षेत्र है जहां किसान भी अपनी आत्मनिर्भरता तलाश रहा है। बचे-खुचे संपन्न किसानों को बिहार और उत्तर प्रदेश की विपन्नता डरा रही है कि कहीं उनका भी वैसा ही हाल न हो जाए। सरकार की अर्थव्यवस्था में सुधार की चाहत और किसानों की आशंका के बीच सार्थक संवाद जितनी जल्दी बहाल हो जाए उतना अच्छा। कोरोना काल में कृषि ही एकमात्र क्षेत्र रहा जिसने अर्थव्यवस्था को मजबूत सहारा दिया। सरकार और किसानों के बीच गतिरोध के बिंदुओं पर बात करता बेबाक बोल।

अगर हम किसान नहीं हैं तो वे नेता नहीं हैं..! पत्रकारों के सामने एक बुजुर्ग प्रदर्शनकारी किसान तब आगबबूला हो रहे थे जब उनसे हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के इस आरोप पर सवाल किया गया कि प्रदर्शन में किसान नहीं बल्कि ‘अवांछित तत्व’ हैं और उनके संबंध खालिस्तान से हो सकते हैं। वे आतंकवादियों की भाषा बोल रहे हैं। पिछले कई प्रदर्शनों पर सत्ता पक्ष का यही रवैया रहा कि उसे देशद्रोह का रंग दे दिया गया। हरियाणा के मुख्यमंत्री ने खलिहान बचाने की मांग करने वालों पर बिना सोचे-समझे खालिस्तानी समर्थक होने का आरोप तो लगा दिया लेकिन इस बार यह दांव उल्टा पड़ गया।

दो दशक से ज्यादा हुए पंजाब को खालिस्तानी प्रभाव से मुक्त हुए। अस्सी का दशक खत्म होते-होते पंजाब में संगठित आतंकवाद का खात्मा किया जा चुका था। किसानों की सामूहिक आवाज को खारिज कर किसी आडियो और वीडियो के जरिए किसान आंदोलन को यह अप्रासंगिक रंग देना फिलहाल तो खट्टर सरकार के लिए ही आत्मघाती साबित हो रहा है। सरकार ने उन किसानों की भाषा समझने में भूल की जो घर से यह कह कर चले कि हम कफन बांध कर जा रहे, लौट आए तो अच्छा नहीं तो अपने खेतों की मिट्टी बन जाएंगे।

हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सीमा पर किसानों की भाषा किसी फिल्म का संवाद नहीं बल्कि एक ऐसी जिंदा कौम की आवाज है जिसका सामाजिक आंदोलन का मजबूत इतिहास और संस्कृति रही है। वे अपने आंदोलन में गुरु नानक की तस्वीर लेकर चल रहे हैं। किसानों के जवान बेटे और पंजाब विश्वविद्यालय के छात्र दिल्ली की सिंघु सीमा पर अपनी किताबें साथ लेकर आए हैं। वे पत्रकारों को पंजाब और सिख समुदाय के इतिहास के बारे में बता रहे हैं। यह बात दूसरी है कि किसान नेताओं को यह ध्यान रखना होगा कि उनके आंदोलन को धूमिल करने वाले लोग उनसे न जुड़ें। किसी भी आंदोलन के लिए जनसमर्थन बहुत मायने रखता है। वाट्सऐप कारखाने को अफवाह का कच्चा माल देने से बचने की पूरी कोशिश करनी चाहिए ताकि उन पर जनता का भरोसा बना रहे।

सरकार के पक्षकार हिंदुस्तान की हकीकत को भूल पूछते हैं कि सिर्फ पंजाब और हरियाणा के ही किसान क्यों प्रदर्शन कर रहे हैं? हम दिल्ली में घिरने नहीं, दिल्ली को घेरने आए हैं कहने वाला किसान इसका जवाब भदेस तरीके से देता है कि नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या? यह गंवार उदाहरण उस पूरे आभिजात्यीय अर्थशास्त्र को नंगा कर देता है जिसके कारण आज बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश की पहचान प्रवासी मजदूरों की बनी हुई है। पंजाब और हरियाणा ऐसे राज्य है जो अपनी जरूरत से ज्यादा पैदावार करते हैं, जहां के किसानों को केंद्रीय खरीद की जरूरत होती है। जहां के किसानों को दूसरे राज्यों में भी फसल बेचने के लिए मंडी की दरकार होती है।

आपकी दलील है कि ये किसान अनपढ़ हैं, इन्हें समझ नहीं है। लेकिन देश की राजधानी की सीमा पर खड़े ये किसान आपके बनाए कानून की पूरी धारा पढ़ कर और समझ कर उसका प्रतिरोध कर रहे हैं। फिलहाल दिल्ली की सीमा पर विरोध करने वालों में विशुद्ध किसान ही दिख रहे हैं न कोई बिचौलिया है और न आढ़ती। किसानों ने पहली बैठक में सरकार से यही सवाल पूछा था कि क्या किसी ‘किसान’ ने इस कानून की मांग की थी? इस कानून को बनाते वक्त किसान संगठनों से राय ली गई थी?

आज के समय में सबसे बड़ा निजी क्षेत्र कृषि ही है। नब्बे के दशक में जो निजीकरण का दौर चला उसने इस सबसे बड़े निजी क्षेत्र पर कब्जा जमाने की पूरी कोशिश की। यह मुनाफे का भी क्षेत्र है। खासकर कोरोना जैसे दौर में जब सारे क्षेत्र रसातल में चले गए हैं तो एकमात्र खेती-किसानी ही अपने पैरों पर खड़ा होकर मुनाफा पैदा कर रही है। भारत के खेत कारोबारी संभावनाओं से भरे पड़े हैं तो ‘आत्मनिर्भरता’ का भी आभास यहीं से होता है।

आज के दौर में पूरी अर्थव्यवस्था नवउदारवाद का रास्ता अपना कर सुधार के तीसरे और चौथे चरण में पहुंच चुकी है। ऐसे में खेती का पूरा क्षेत्र कब तक इन आर्थिक सुधारों से बचा रहता? अगर वह अछूता रहेगा तो भी दिक्कत है कि बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों जैसा हाल ही हो जाना है। जहां न कोई मंडी व्यवस्था बची है, न कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य बचा है। छोटे व्यापारियों के जरिए पूरे कृषि क्षेत्र में लूट मची हुई है। अब पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्य बचे हुए हैं जहां पर मंडी व्यवस्था है, सरकारी खरीद है और न्यूनतम समर्थन मूल्य के कारण उनकी संपन्नता बनी हुई है। एक तरह से पूंजीवादी ढांचे में ये लोग पैदावार करके पूरे देश का पेट भर रहे हैं। खासकर हरित क्रांति के बाद के दौर में इन इलाकों ने खुद को संपन्न बनाया है।

अब सवाल यह है कि ये जो दो विरोधाभासी दुनिया है उसके साथ एक तरह का व्यवहार कैसे किया जाए? कैसे उनको उठाया जाए या इनको गिराया जाए? किसानों को अंदेशा है कि उनको भी गिरा कर वहीं न पहुंचा दिया जाए, जहां का उदाहरण दिया जा रहा कि वहां के किसान क्यों चुप हैं। यह अंदेशा कितना वास्तविक है, कितना भ्रम फैलाने वाला कि इसे आज गंभीरता से सोचने की जरूरत है। पंजाब के संपन्न किसानों को डर है कि इन कानूनों से वे बिहार वाली हालत में न पहुंच जाएं। वहां तो मंडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था पहले से ही लगभग चौपट है। सरकार का तर्क है कि कारपोरेट जगत बड़ी पूंजी लगा कर सुधार के जरिए खेती में निवेश करेगा तो वैश्विक पूंजी का फायदा कृषि क्षेत्र को भी होगा। यह पूरा संघर्ष सरकार की चाहत और किसान की आशंकाओं के बीच का है।

पंजाब जैसी जगहों पर सरकार की मंशा और बिहार में किसानों की विपन्नता की हकीकत के बीच किसान कह रहे हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी दायरे में लाओ। हमें न्यूनतम देकर कारपोरेट के अधिकतम की बात करो। राजनीति और कारपोरेट के घातक मिश्रण को सीधे अपने ऊपर आता देख किसान विरोध कर रहे हैं। उनकी चिंता है कि किसान का बेटा किसान बनना क्यों नहीं चाह रहा?

यह किसान आंदोलन कल क्या रूप लेगा अभी यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। लेकिन किसी भी विरोध को कलंकित करना आसान है और उसका समाधान देना मुश्किल। मुश्किल काम कोई करना नहीं चाहता खासकर सरकारें तो बिल्कुल नहीं। लेकिन इस बार किसानों ने सरकार को मेहनत करने के लिए मजबूर कर दिया। ‘विज्ञान भवन’ तक पहुंची बातचीत ने गतिरोध कम होने की उम्मीद की किरण दिखाई है। सरकार ने कानूनों में सुधार की बात कही है और आगे बातचीत का कोई सार्थक नतीजा निकल सकता है। बाजार और सरकार के बीच ‘किसानिस्तान’ को बचाने की मांग कैसे पूरी हो पाएगी यह देखने की बात होगी।

पिछले सालों में फसलों के उचित मूल्य, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद, कर्जमाफी जैसे मुद्दों पर किसान सरकार के खिलाफ एकजुट होते रहे। नवंबर 2017 में देश भर के 400 से ज्यादा किसान संगठनों ने किसान संघर्ष समन्वय समिति के बैनर तले बड़ा आंदोलन खड़ा किया। दिल्ली के जंतर मंतर पर किसानों ने संसद भी लगाई थी। इसी तरह 2018 में किसानों ने दिल्ली की ओर कूच कर अपनी मांगें दोहराई।

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