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बेबाक बोलः संक्रमण काल

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में कोरोना विषाणु ने दुनिया के नियम बदल दिए। हमारे यहां दंतकथा की तरह सुनाया जाता था कि विदेशों में इधर-उधर थूकने पर जुर्माना लगता है। कोरोना का खौफ है कि विदेश का यह मिथक भारत में सच साबित हो गया है और अब इधर-उधर थूकना अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया है। घर से बाहर निकलने के लिए मुंह को ढकना अनिवार्य शर्त है। कोरोना के बाद का पाठ है कि जो जितना सीमित है वो उतना स्वस्थ है। मजबूत तबका अपना दायरा सीमित कर लेगा। वर्गीय भेद की नई परिभाषा यह होगी कि कौन घर से निकले बिना आराम से अपनी जरूरतें पूरी कर ले रहा है। बाहर निकलना गरीबों की मजबूरी होगी। कोरोना ने घर और बाहर के शक्ति समीकरण को जिस तरह बदला है, उस सिकुड़ी और सहमी हुई दुनिया पर बेबाक बोल।

कोरोना बाद की दुनिया में कुदरत के कसीदे पढ़ता मानव भी तो कुदरत का ही एक रूप है।

घर के दरवाजे के बाहर दूध का बर्तन रख दिया गया है। दूधवाला दूध रख कर चला गया है। तीन से चार घंटे बाद दूध का बर्तन घर के अंदर लाया जाता है। जिस दूधवाले से दूध की गुणवत्ता पर शिकायतें होती थीं, जिसके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की दरियाफ्त होती थी, अब मोटे गमछे के पीछे से निकले उसके नमस्ते की भी जरूरत नहीं है। अपने दूध का डिब्बा ले निकलते हुए वह मास्क के पीछे के चेहरे को पहचानने की कोशिश करते हुए कहता है-कोरोना ने दुनिया कितनी बदल दी न। क्या अब हमें ऐसी ही दूरियों में रहने की आदत डाल लेनी होगी।

जो बात दुनिया भर के विद्वान बोल रहे, हर जगह उद्धरित किए जा रहे वो बात एक दूधवाला अपने स्तर पर समझ चुका है। कोरोना के बाद की इस बदली हुई दुनिया का नागरिक बनने की तैयारी हर कोई अपने हिसाब से कर रहा है। तीन मई तक की पूर्णबंदी में जिन-जिन क्षेत्रों को खोलने की तैयार की गई है उनमें शहरी से ज्यादा ग्रामीण इलाके हैं। देश की बुनियादी जरूरत ग्रामीण इलाकों से ही पूरी होनी है। शहर का पहिया चलने के लिए गांव की जंजीरों को पहले खोला गया है। पूर्णबंदी के चंद दिनों में ही शहर ने अपनी असमर्थता जता दी तो कामगार बिना शिकायत उस राजमार्ग से वापस लौट गए जिसे बनाने के लिए गांव से शहर आए थे। अब उस राजमार्ग को पहले उन्हीं के लिए खोला गया जो बेदखल हुए थे। पंजाब के एक गांव में व्यापार प्रबंधन का छात्र वापस लौट आया है और वो देख रहा है कि सरकार ने कृषि क्षेत्र को सबसे पहले खोला है। शहर में उसके प्रबंधन स्कूल के दरवाजे पर ताला लगा है और गांव में लोग काम पर जुटने की तैयारी में हैं। व्यापार प्रबंधन का छात्र देख रहा है कि रबी फसल को समय से खलिहान से निकाल अनाज के गोदाम तक पहुंचाना प्राथमिकता है। लोग गांव की ओर लौट रहे हैं, संक्रमण से बचने के लिए पेड़ पर घर बना रहे हैं। बैसाखी आते ही घर से जो सबसे पहले निकले वे किसान थे और उम्मीद का सबसे बड़ा कोना खलिहान।

केंद्र सरकार ने कोरोना के बाद के जीवन के लिए दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं। घर से बाहर बिना मुंह ढके निकलना अपराध है। भारत के लिए सबसे अहम है कि अब इधर-उधर थूकना अपराध है, ऐसा करने पर सजा हो सकती है। सरकार ने थूकने को अपराध बनाया है तो जनता उसके पहले ही खांसने और छींकने को लेकर डरी हुई है। अखबार में पहले पन्ने पर खबर है कि लूडो खेलते समय खांसने के कारण तमंचे से गोली चला दी गई। एक के सामने दूसरे का खांसना कितना बड़ा डर बन गया है। मरीजों का ताल्लुक पहले पुलिस थाने से होता है बाद में अस्पताल से। घर के बाहर निकले हर आदमी पर विषाणु के वाहक होने का डर चस्पा है।

अब यही डर आगे हमारा सामाजिक दायरा कितना छोटा कर देगा। वर्गीय ढांचा अपने नए रूप में सामने आएगा कि कौन घर से कितना कम निकले बिना काम चला सकता है। जो जितना साधन संपन्न होगा वह घर के अंदर उतना ही महफूज रहेगा। सरकार ने घर से दफ्तर के नए दिशानिर्देश में कहा है कि 65 साल से ज्यादा उम्र वाले और जिनके बच्चे पांच साल से छोटे हैं उन्हें घर से काम करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। घर स्त्री और बाहर पुरुष के लिए इस मर्दवादी नजरिए पर भी कोरोना की नई नजर का चश्मा चढ़ चुका है। अब इसका वर्गीय संदर्भ है कि घर ही सत्ता और पूंजीवाद के नए गढ़ बनेंगे। बीसवीं सदी में सबसे बड़ा जलवा बड़ी कंपनियों के बोर्ड रूम का रहा है। दिल्ली में नाश्ता तो न्यूयॉर्क में रात का खाना खा मीटिंग, मीटिंग और मीटिंग करने वाले कंपनी निदेशक जूम ऐप्लीकेशन की एक खिड़की में सिमट गए और अब इसे लेकर नया खतरा कि आपका सारा डाटा इसकी छन्नी से छान लिया जा रहा है। मतलब वर्गीय भेद में एक नया बिंदु कि किसका डाटा कितना सुरक्षित है, क्योंकि नई दुनिया में डाटा ही बाजार के खेल का नया औजार है। अब आम घरों में जूम बच्चों के खेलने की चीज बन चुका है तो साधारण लोगों को यही निश्चिंतता कि ये जूम हमारा क्या बिगाड़ेगा, हमारे पास है क्या और हमारा डाटा किसी के किस काम का?

कोरोना के बाद गढ़े गए नए कथ्य के इस परिप्रेक्ष्य में भारत जैसे देश को दोहरी समस्या का सामना भी करना पड़ रहा है। भारतीय संस्कृति जिस तरह खाने तक में भेदभाव करती है वहां सामाजिक अलगाव (सोशल डिस्टेंसिंग) का नारा नया शुद्धतावादी कथ्य गढ़ लेता है। कोरोना के साथ ही मांसाहारियों को लानत भेजने का सिलसिला शुरू हो गया, जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था। यहां वैज्ञानिक चीजों का भी पुनरुत्थानवादी पाठ तैयार हो जाता है। बीमारी से लड़ने की इस तरह की सांस्कृतिक दिक्कत पहले भी वैश्विक स्तर पर रही है। नब्बे के दशक में एचआइवी पॉजिटिव यानी एड्स की समस्या को भी वैज्ञानिक नहीं नैतिकतावादी नजरिए से देखा जा रहा था। उस समय भी यही घोषणा की गई थी कि अब वही रहेगा जो शास्त्रीय नजरिए से नैतिक होगा। लेकिन बाजार को यह कहां मंजूर था और उसने इसका हल निकाला। अब आज के समय में एड्स महज एक बीमारी है जिसकी रोकथाम के कई उपाय कर लिए गए हैं। बाजार एड्स की वजह से नहीं रुका, हां एड्स को रोकने का उपाय बाजार ने खोज लिया।

कोरोना ने पूरे नव-उदारवादी पूंजीवादी ढांचे को गहन चिकित्सा कक्ष में डाल दिया है। अब हम इसी उम्मीद पर हैं कि जिसने मर्ज दिया दवा भी वही खोजेगा। उच्च वर्ग तो अपनी आवाजाही सीमित कर लेगा और अपनी सुरक्षित दुनिया के दायरे में सब जुटा लेगा। लेकिन यह पूरी दुनिया का नियम नहीं बन सकता है। राष्ट्राध्यक्षों और कंपनी निदेशकों के अलावा यह दुनिया है किसानों की, मजदूरों की। मुद्रा सिर्फ छापेखाने में मशीन से नहीं छापी जा सकती है।
तुला के एक पलड़े पर मजदूर और किसान होंगे तो दूसरे पर मुद्रा। मुद्रा की कीमत तो मेहनत ही तय करती है और मेहनतकशों को बाहर निकलने का रास्ता बनाना ही होगा। अमीर देशों की प्रयोगशाला में वैज्ञानिक दिन-रात काम कर रहे हैं ताकि कारखानों के काले धुएं में काम करने के लिए मेहनती तबका जल्द से जल्द बाहर निकल सके।

कोरोना बाद की दुनिया में कुदरत के कसीदे पढ़ता मानव भी तो कुदरत का ही एक रूप है। मानव किसी कारखाने से निकला कृत्रिम उत्पाद नहीं है। यह कुदरत का सबसे शक्तिशाली अंग रहा है जो अभी निराश होकर नए कथ्य गढ़ रहा है। अभी कोरोना पूर्व के नियम खारिज होते रहेंगे, उस पर सवाल उठते रहेंगे। सकल घरेलू उत्पाद और साख एजंसियां बेसाख होकर सवालों के घेरे में हैं। अब तक कहा जाता था कि दुनिया में जो भी पर्यावरण बचा है वो वंचितों की बदौलत है। कोरोना की जांच ने अमीर देशों की सेहत पर सवाल उठा दिए हैं। कोरोना के बाद का पाठ है कि जो जितना सीमित है वो उतना स्वस्थ है। तो क्या अब आगे की दुनिया में सीमित होना समृद्ध संसार का नया अध्याय होगा? अभी तो इस पर बहस जारी रहेगी।

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