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बेबाक बोल- राजकाज- कांग्रेस कथाः एक समय की बात है

अब तक इंदिरा गांधी को निज के परिवार से मिली लोक की सत्ता पर अहंकार होने लगा था। उनका यह अहंकार टूटा 1972 में शिमला में हुए कांग्रेस कार्यसमित के चुनाव में।

Bebak Bolपूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और उनके राजनीतिक सलाहकार हरिहर नाथ शर्मा। (फाइल फोटो)

देश की आजादी के बाद यह शुरुआती दौर की बात है जब कांग्रेस को पार्टी के अंदर लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सबक सीखने का मौका मिला था। लेकिन सत्तर के दशक में युवा तुर्क से मिले सबक को पार्टी ने उलटा पढ़ा। जो सबक सकारात्मक रूप से पार्टी के अंदर लोकतंत्र की बहाली के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता था, वहीं पर मंजिल बन कर दफन हो गया। लिहाजा तब से लेकर आज तक लोकतंत्र के कंकाल को अपने कंधों पर रख कर पार्टी उसके नाम पर अपना काम चलाती है। परिवार यानी निजता के बल पर मिली सत्ता की ऐसी आत्ममुग्धता हुई कि वह आपातकाल तक चली गई। कांग्रेस अध्यक्षों के इतिहास पर नजर डालेंगे तो यही दिखता है कि नेहरू परिवार ने सत्ता की डोर अपने पास रखने के लिए इस पद को ‘अपनों’ तक ही सीमित रखना चाहा। इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया गांधी तक ने किस तरह पार्टी पर परिवार की प्रधानी चाही, इसकी व्याख्या करता बेबाक बोल

‘खुद अपने हाथ से शहज़ाद उसको काट दिया
कि जिस दरख़्त की टहनी पे आशियाना था’

‘सन 1959 और 1960 के दौरान इंदिरा चुनाव लड़ीं और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गईं। उनका कार्यकाल घटनाविहीन था। वो अपने पिता के कर्मचारियों के प्रमुख की भूमिका निभा रहीं थीं।’

इंदिरा गांधी के बारे में विकीपीडिया पर यह सूचना दर्ज है। हम इन पंक्तियों के लिखने वाले के बारे में नहीं जानते। कांग्रेस-अध्यक्ष के बारे में यह लिखित इतिहास है। लेकिन कुछ कथाएं ऐसी होती हैं जो सिर्फ सियासत के पुराने नेताओं की जुबानी ही सुनी जा सकती हैं, जिसे किसी भी आधिकारिक इतिहास की किताब में या गूगल पर नहीं खोजा जा सकता है। कांग्रेस के बारे में ऐसी ही एक कथा सुनाते हैं पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के राजनीतिक सलाहकार रहे हरिहर नाथ शर्मा।

बकौल एचएन शर्मा यह उस समय की बात है जब कांग्रेस पार्टी पर नेहरू परिवार और उनसे जुड़े अभिजनों का दबदबा बढ़ चुका था। जवाहरलाल नेहरू की पुत्री इंदिरा ही ‘इंडिया’ होने को उन्मुख थीं, फिर कांग्रेस पार्टी का क्या कहना। पिता का पद पुत्री के नाम हो चुका था तो पार्टी का पारिवारिक भविष्य भी दिखने लगा था। लेकिन पार्टी में कुछ युवा तुर्क भी थे जो परिवारवाद और आभिजात्य गोलबंदी के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे थे। उनकी मांग थी कि पार्टी परिवार के निजतंत्र नहीं बल्कि लोकतंत्र की राह पर चले।

अब तक इंदिरा गांधी को निज के परिवार से मिली लोक की सत्ता पर अहंकार होने लगा था। उनका यह अहंकार टूटा 1972 में शिमला में हुए कांग्रेस कार्यसमित के चुनाव में। इंदिरा गांधी ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री को अपना उम्मीदवार घोषित कर उनके पक्ष में माहौल बनाना शुरू कर दिया। लेकिन इस चुनाव में जीत हुई मुखालफत की आवाज की। चंद्रशेखर ने इंदिरा के उम्मीदवार को मात दी। चुनाव नतीजे का एलान होते ही इंदिरा गांधी ने कहा, ‘मैं तो चाहती थी कि चंद्रशेखर ही चुनाव जीतें’। लेकिन चुनाव जीतने के बाद भी चंद्रशेखर अपनी प्रतिरोधी आवाज नहीं हारे थे। उन्होंने तुरंत कहा, ‘अब इन्होंने ये कह ही दिया है तो मैं भी एक छोटी सी बात कहना चाहता हूं कि बेहतर हो कांग्रेस में ये चुनाव न करवाएं’।

सत्ता पर मुखालफत की जीत की यह कथा हमें कांग्रेस के आधिकारिक इतिहास के पन्ने पर नहीं मिलेगी। इस कथा को घटते हुए देखा था एचएन शर्मा ने। ये वैसा ही है जैसा हमें बहुत सारी लोक-कथाएं सुनने को मिलती हैं। ऐसे जुबानी इतिहास की अपनी एक अहमियत होती है क्योंकि इतिहास की किताब तो उसे लिखने वाले की होती है जो अपने खिलाफ उठी हर आवाज को सामूहिक स्मृति से मिटा देना चाहता है। इस कथा से हम समझ सकते हैं कि कांग्रेस में कार्यसमिति के चुनावों से क्यों परहेज किया जाने लगा।

चंद्रशेखर की जीत का सबक क्या रहा? प्रतिरोध के उनके स्वर का दूर तक नतीजा यह निकला कि कांग्रेस अध्यक्ष पद से हर उस प्रभावशाली चेहरे को दूर रखा गया जो पार्टी पर नेहरू-इंदिरा घराने के प्रभुत्व को कमजोर कर सकता था। इस परिवार से बाहर के सारे अध्यक्षों का रबड़ की मुहर वाला हाल रहा। सीताराम केसरी की अपनी जुबां में बोल पड़ते ही उनके साथ जो दुर्व्यवहार हुआ वह इस स्तंभ में दर्ज है। सोनिया गांधी यह बेहतर तरीके से समझ चुकी थीं कि अध्यक्ष पद उनके द्वारा संचालित नहीं होगा तो पार्टी पर नियंत्रण मुश्किल होगा। राजीव गांधी के समय में पार्टी के लोकतांत्रिक स्वरूप ने जो भी थोड़ी बहुत सांस पाई थी सोनिया गांधी के समय में उसका भी दम घोट दिया गया।

इंदिरा से सोनिया गांधी तक के कांग्रेस अध्यक्ष के सफर में कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं के नेहरू परिवार के कर्मचारी के रूप में तब्दील होने को कैसे देखा जाए? कोई भी संगठन जनतंत्र की विचारधारा पर ही अडिग हो सकता है। किसी भी संगठन के सांगठनिक ढांचे में अगर विचारधारा है तब या तो उसके वैचारिक आधार पर जनतांत्रिक प्रक्रिया कायम होती है या फिर यह प्रवृत्ति होती है कि जिसके पास सत्ता है सबका रुख उधर ही हो जाता है।

सत्ता के साथ जुड़ने का अहसास ही आपको सुरक्षा कवच का अहसास दिला देता है। ध्यान से देखें तो इंदिरा गांधी के समय से ही सत्ता की शक्ति के जरिए संगठन पर कब्जा करने की प्रवृत्ति शुरू हुई जो अंतत: आपातकाल तक ले गई।

इंदिरा के बाद नरसिंह राव और मनमोहन सिंह का वह दौर शुरू होता है जब कांग्रेस उदारवादी नीति अपनाती है। विचारधारा के उदारवाद को पूंजी के उदारीकरण की तरफ मोड़ दिया गया। वैचारिक उदारता की प्रतीक कांग्रेस अब उदार बाजार का प्रतिनिधित्व कर रही थी। जब पार्टी नया वैचारिक रास्ता चुनती है तो प्रधानमंत्री और अध्यक्ष बनने के बाद नरसिंह राव के दौर में उसका परिणाम सीधे-सीधे दिखाई देने लगता है।

सांगठनिक ढांचे में बुरी तरह बिखराव आना शुरू हो जाता है। इसी बिखराव का परिणाम है पार्टी में परिवारकाल। क्योंकि नेहरू परिवार ही पार्टी को जोड़ने का एकमात्र आधार बच गया था। उसी के बाद विदेशी मूल पर विपक्ष के हमले और ‘त्याग’ के साथ यह जिम्मेदारी निभाई सोनिया गांधी ने। वे कभी प्रधानमंत्री नहीं बनीं लेकिन मनमोहन सिंह के जरिए एक तरह से परिवार की ही प्रधानी रही।

यही वह समय है जब पार्टी से शरद पवार जैसे लोग अलग हो जाते हैं क्योंकि उन्हें लग गया था, यहां सिर्फ कांग्रेस का कर्मचारी बना जा सकता है सत्ता के शीर्ष पर नहीं चमका जा सकता। अब कांग्रेस में सिर्फ वही चेहरे बचे हैं जिन्हें पता है कि वे जनता के बीच अपनी स्वतंत्र पहचान नहीं बना पाएंगे। जिन्हें सत्ता में हिस्सेदारी भी परिवार परिक्रमा के कारण मिली है वे भी इसके आगे कहीं और नहीं देख पा रहे हैं। जब पार्टी जमीन पर वैचारिक रूप से खोखली होगी तो वह कंगूरे पर चमकते परिवार के चेहरे का ही इश्तिहार करेगी।

कांग्रेस की स्थापना के इतिहास में जाएंगे तो यह अभिजनों का समूह हुआ करता था। इसके संस्थापकों में ब्रितानी हुकूमत के प्रशासक एओ ह्यूम का नाम जुड़ा हुआ है। सुविधा-संपन्न वर्ग के इस संस्थान की पहचान बदलती है मोहनदास करमचंद गांधी के आगमन के बाद। गांधी ने पहली बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को जनता से जोड़ा।
कांग्रेस की स्थापना में साम्राज्यवादी शक्ति का चेहरा जरूर रहा लेकिन गांधी के इसे साम्राज्यवाद के खिलाफ जोड़ते ही इसका आम जनता से नाता जुड़ गया। साम्राज्यवाद के खिलाफ जाने का मतलब था जनता की एकजुटता यानी जन वैचारिकता के साथ होना। इसी के साथ यह पार्टी देश की उम्मीद बन जाती है। अब वह अभिजन नहीं देश के जन-जन की पार्टी हो जाती है।

इक्कीसवीं सदी के इक्कीसवें साल में नीतिगत बदलावों की चौतरफा बयार है। इन बदलावों के खिलाफ जब जनता गोलबंद हो रही है तब कांग्रेस अपने चुनाव की तैयारी कर रही है। कांग्रेस बस पार्टी के अध्यक्ष पद का इतिहास अपने मुख्यालय के पाठ्यपुस्तक से बाहर निकल कर पढ़ेगी तो उसे परिवारकाल से लेकर आपातकाल तक का संदर्भ समझ आएगा। सवाल यह है कि जन से कटी कांग्रेस की लोक-कथा पर क्या पार्टी के अभिजनों की नजर जाएगी? (क्रमश:)

चंद्रशेखर के राजनीतिक सलाहकार रहे हरिहर नाथ शर्मा बताते हैं कि 1972 के शिमला में हुए कांग्रेस कार्यसमिति के चुनाव में चंद्रशेखर से सब यही पूछते थे कि इंदिरा जी के उम्मीदवार के सामने कैसे टिकेंगे आप? शर्मा यह भी बताते हैं कि उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी ने कहा कि मैं उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री और बनारस का रहने वाला हूं। अब इस बच्चे (चंद्रशेखर) को वोट नहीं दूंगा तो मेरा समाज क्या कहेगा।

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