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बेबाक बोल-राजकाज-कांग्रेस कथा: शक और मात

दिल्ली की सीमाओं पर एक से दो डिग्री की कड़कड़ाती ठंड में जवान से लेकर बुजुर्ग किसान हौसले का अलाव तेज कर रहे थे तो कांग्रेस के खेमे की तरफ ‘राहुल कहां हैं’ का आलाप शुरू हो गया।

Bebaak Bolकांग्रेस नेता राहुल गांधी। (इंडियन एक्सप्रेस फोटो: अरुष चोपड़ा)

विलियम शेक्सपीयर को पढ़ने वाले उनकी कलम से लिखी इन पंक्तियों की अहमियत आज भी मानते हैं कि सीजर की पत्नी को हर संदेह से ऊपर होना चाहिए। राजनीति में किसी भी ऐसे राजनेता जिसके ऊपर उसकी पार्टी का दारोमदार हो का किरदार ‘सीजर की पत्नी’ जैसा हो जाता है जिसे हर शक-ओ-शुबह से ऊपर होना होता है। आज राहुल गांधी कितने भी वाजिब कारण से थोड़े समय के लिए परिदृश्य से बाहर हुए हों लेकिन इस वजह से उनके विरोधियों को उन पर हमला करने का मौका मिल जाता है। छवि प्रबंधन के इस युग में सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्तियों को लोक-दायरे में दिखाना होता है कि वे हमेशा उपलब्ध हैं। जब देश में एक ऐसी पार्टी राज कर रही है जो साल के 365 दिन के चौबीसों घंटे अपने राजनीतिक कर्म को कोई अवकाश देते हुए नहीं दिखना चाहती है तब यह और भी मायने रखता है। राजनीति में निरंतर सक्रियता और उपलब्धता की अहमियत पर बेबाक बोल

‘यूपीए की सरकार में मनमोहन सिंहजी और शरद पवारजी भी इन कानूनों को लागू करना चाहते थे। लेकिन वे उस समय बने दबाव और प्रभाव के कारण इसके साथ खड़े नहीं हो सके। इसलिए वे इन कानूनों को प्रभावी नहीं बना पाए…।’ केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर खेती पर बने नए कानूनों को लेकर किसी भी तरह के दबाव और प्रभाव में आने की बात को खारिज कर रहे थे। इस वक्त तक सत्ता पक्ष विपक्ष के मैदान को ‘राहुल-मुक्त’ घोषित कर चुका था। कांग्रेस के स्थापना-दिवस जैसे अहम समारोह का झंडा एके एंटनी फहरा रहे थे।

राहुल गांधी इन दिनों किसानों से जुड़ी हिंदी कविता को ट्वीट कर रहे हैं। लेकिन उन्हें किसानी पट्टी के संघर्ष से जुड़े इन शब्दों के साथ लगातार खड़ा होना होगा। अभी बिहार चुनाव में महागठबंधन को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस को दोषी मानने का ताना पुराना नहीं हुआ है। बिहार चुनाव में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की मेहनत ज्यादा दिखी नहीं थी। कांग्रेस के नेता तो अपनी पूरी ऊर्जा भाजपा पर यह व्यंग्य करने में खर्च कर रहे थे कि देखो यहां-वहां छोटे चुनाव के लिए वह इतने बड़े नेता से मेहनत करवा रही है। अब आपके अवकाश की वजह कितनी भी वाजिब क्यों न हो आपके विरोधी तो इसे हथियार बनाएंगे ही।

बिहार में विपक्ष की जमीन हासिल करने वाले वाम दल जब सूबे में किसानों के लिए सड़कों पर उतरे और उनके कार्यकर्ता पुलिस की लाठियां खा रहे थे तो कांग्रेस के नेता पर ‘नानी घर’ के चुटकुले बन रहे थे। किसानों को लेकर उनकी आभासी चिंता को हास्यास्पद बताया जा रहा था। कांग्रेस का वजूद कायम रहने की कामना करने वाले पैरोकार भी इस हालात में असमंजस की स्थिति में आ जाते हैं।

दिल्ली की सीमाओं पर एक से दो डिग्री की कड़कड़ाती ठंड में जवान से लेकर बुजुर्ग किसान हौसले का अलाव तेज कर रहे थे तो कांग्रेस के खेमे की तरफ ‘राहुल कहां हैं’ का आलाप शुरू हो गया। जब किसानों ने गुरुपर्व पर भी घर जाने से इनकार कर सड़क पर लंगर के साथ मनाया हो और नए साल का सूर्योदय भी सड़क पर ठिठुरते हुए देखा हो तो राहुल की छुट्टी की अर्जी को लेकर जनआंदोलन पर उनके सरोकारों को फर्जी साबित किया जाने लगा।

राहुल गांधी की तात्कालिक अदृश्यता के समय ही फैसला होता है कि पश्चिम बंगाल का चुनाव कांग्रेस और वाम दल साथ मिल कर लड़ेंगे। किसान आंदोलन के समय में इस गठबंधन को किस तरह देखा जाए?

दिल्ली की सीमाओं पर गोलबंद किसानों के आंदोलन को कांग्रेस और वाम साझे तौर पर बंगाल में शायद ही भुना पाएं यह तो कृषि मंत्री के ‘मनमोहनजी’ और ‘पवारजी’ वाले बयान से जाहिर हो जाता है। तो सवाल यह है कि बंगाल में कांग्रेस और वाम साथ क्यों आए? पिछले लोकसभा चुनाव में बंगाल में कांग्रेस और वाम के लिए वोटों का जैसा अकाल पड़ा उसे देखते हुए इन्हें साझा संघर्ष में ही बचे रहने की उम्मीद दिख रही है। लेकिन बंगाल की लड़ाई में खेल के नियम आसान नहीं हैं। कांग्रेस और वाम खुद को खोकर एक-दूसरे को कितने वोट दिला पाएंगे यह देखने की बात है।

बंगाल में सबसे पहली लड़ाई चुनावी जंग की जमीन तैयार करने की है। सभी दलों का जोर भी इसी पर है। ममता बनर्जी के पाले में यथास्थिति के खिलाफ वाली बयार डालने के साथ उन्हें गुंडा राज के खिताब का कंटीला ताज पहना दिया गया है। बंगाल में सत्ता के खिलाफ विकल्प बन सकने वाले हर मौके और माहौल को भाजपा बड़ी आसानी से अपनी ओर लपक ले रही है। वहां कांग्रेस विकल्प देने की हालत में नहीं है और कांग्रेस के खाली हाथ से वाम को कुछ बड़ा फायदा होना नहीं है, हां उसके संभावित नुकसान का आकलन अभी से किया जा सकता है।

पूरे किसान आंदोलन में कांग्रेस का संकट यही है कि उसके ही उठाए आर्थिक सुधारों के लड़खड़ाते कदम को भाजपा मजबूती से लागू करने का एलान करती जा रही है। राजग सरकार आर्थिक सुधार के हर काम को कांग्रेस के नाम कर रही है तो फिर यह संकट वाम का भी हो जाता है। इन सुधारों के लिए कांग्रेस के साथ नत्थी होने के बाद वाम का नाम खराब होने का काम भी आसान हो जाता है। ये सब तो कांग्रेस करती है…वाम की साख को राख करने के लिए यह जुमला ही काफी है। स्वाभाविक है कि कांग्रेस का हाथ थाम न तो खेतों में हंसिया की धार तेज होगी और न ही कारखानों में हथौड़े का वार मजबूत होगा।

कुल मिला कर बंगाल में कांग्रेस-वाम गठबंधन का हासिल-ए-महफिल यही है कि दोनों अपने-अपने अस्तित्व को बचाने के लिए ही मिलन से आई वैचारिक मलिनता को लेकर आंखें मूंद लेते हैं। जाहिर है कि जब आपकी वैचारिकता में मिलावट आएगी तो उसमें आक्रामकता नहीं रहेगी। सियासी मैदान पर टिके रहने के लिए वैचारिक आक्रामकता से लेकर निरंतरता भी रहनी चाहिए। बंगाल में ममता बनर्जी के खिलाफ भाजपा अपनी आक्रामकता को किसी भी तरह का अवकाश देने के लिए तैयार नहीं है। वहीं जनता के मैदान में कांग्रेस अपनी निरंतरता को लंबी छुट्टी पर भेजती रही है तो फिर ऐन चुनाव के समय उसमें तुरंत आक्रामकता तो आ नहीं सकती।

कांग्रेस शासित प्रदेश के किसानों ने इतना बड़ा अवसर दिया तो राहुल गांधी ने उसे भी अपनी अदृश्यता में गंवा दिया। वहीं केरल में डूबती हुई वाम सरकार को किसान आंदोलन का सहारा मिला और उसने स्थानीय चुनावों में खुद को उबार लिया।

किसान आंदोलन के मंच पर थोड़ी देर बैठने के बाद कृषि और कामगारों से जुड़े सुधारों को लेकर सबसे पहले कांग्रेस पर ही सवाल उठते हैं। बिहार के हालिया विधानसभा चुनाव से लेकर देश के कई हिस्सों में इन्हीं सवालों को उठा कर वाम ने अपने संघर्ष की पहचान वापस पाई है। लेकिन अपने पुराने गढ़ में वह कांग्रेस का हाथ पकड़ कर कितना और कैसा संघर्ष कर पाएगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। कांग्रेस उसी नीति पर चल चुकी है जिस पर आज भाजपा आक्रामक होकर चल रही है। फिर भाजपा पर सवाल उठाने वाले तल्ख सवालों के घेरे में रहेंगे यह तो तय है।

2014 के बाद से भाजपा साल के 365 दिन, चौबीसों घंटे अपनी राजनीति और उससे जुड़े चुनाव प्रचार पर काम कर रही है। छवि प्रबंधन के इस युग में उसके अगुआ की छवि लगातार काम करने वाले की है। वहीं कांग्रेस के अघोषित अगुआ का बार-बार परिदृश्य से बाहर हो जाना और ऐन चुनाव के समय बनावटी आक्रामक तरीके से सामने आना उन्हें जनता के मन से उतार रहा है। जब बंगाल में ममता और भाजपा अपना सर्वश्रेष्ठ देने में लगे हैं तो कांग्रेस के नेता की छुट्टी और उसकी उदारवादी नीति की घुट्टी वाम की वैचारिकता को भी अवकाश पर ही भेजेगी। (क्रमश:)

इस बार कांग्रेस का 136वां स्थापना दिवस राहुल गांधी की अनुपस्थिति के कारण सुर्खियों में रहा। कांग्रेस के मुख्यालय पर पार्टी का झंडा एके एंटनी ने फहराया। यह दिन केरल के पूर्व मुख्यमंत्री एंटनी के लिए इसलिए भी अहम था क्योंकि उन्होंने पार्टी के स्थापना दिवस के साथ अपनी 80वीं सालगिरह भी मनाई। उनके इस दिन को खास बनाने के लिए केरल के वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने अखबारों में एंटनी की उपलब्धियों पर लेख लिखे।

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