ताज़ा खबर
 

कांग्रेस कथा: बिहार से बहिष्कार

केंद्र की सत्ता का ताला आज भी उत्तर प्रदेश और बिहार की चाबी से खुलता है। इन दोनों राज्यों की सीटें उस जादुई आंकड़े का काम करती हैं जिसे बहुमत कहते हैं।

बेबाक बोलभारत रत्न नानाजी देशमुख, जिन्होंने भारतीय राजनीति में सेवाभाव और चारित्रिक दृढ़ता का नया संस्कार पैदा किया।

बिहार वह विलक्षण राज्य है जिसने भारतीय राजनीति में कांग्रेस के एकाधिकार के खिलाफ विपक्ष का हल्ला बोल किया था। गणतंत्र में विपक्ष और विकल्प की अहमियत के नारों और नतीजों की जमीन तैयार करने वाला यह राज्य भारतीय राजनीति में अपनी अलग पहचान रखता है। समाजवादी नेता चाहे जिस भी प्रदेश के हों लेकिन उनके संघर्ष और पहचान का चेहरा बनता है बिहार में। इस बार बिहार चुनाव के वक्त याद दिलाया गया कि किस तरह जयप्रकाश नारायण पर पड़ने वाली लाठी को नानाजी देशमुख ने रोका था। जिस कांग्रेस का बिहार से बहिष्कार शुरू हुआ था वह आज भी इस हिंदी पट्टी में अपने पांव नहीं जमा पाई है। बिहार विधानसभा चुनाव की चल रही प्रक्रिया में एक भी नारा या जुमला ऐसा नहीं है जो देश की इस सबसे पुरानी पार्टी की ओर से दिया गया हो। केंद्र की सत्ता के अंकशास्त्र में अहम भूमिका निभाने वाली जमीन से बहिष्कृत सी दिखती कांग्रेस पर बेबाक बोल

खल्क खुदा का/ मुलुक बाश्शा का/ हुकुम शहर कोतवाल का…/ हर खासो-आम को आगाह किया जाता है कि खबरदार रहें/ और अपने-अपने किवाड़ों को अंदर से/ कुंडी चढ़ाकर बंद कर लें/ गिरा लें खिड़कियों के परदे/ और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें/ क्योंकि/ एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी कांपती कमजोर आवाज में/ सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है…!’

धर्मवीर भारती की कविता की ये पंक्तियां आज पटना के जिस आयकर गोलंबर पर जेपी की मूर्ति के साथ खुदी हुई हैं उस जगह ने विरोध की एक ऐसी सड़क तैयार की थी जहां से कांग्रेस के खिलाफ विकल्प की राजनीति का कारवां गुजरा था। जेपी पर पड़ी लाठी को रोकने के लिए आगे बढ़े थे नानाजी देशमुख। जेपी और देशमुख की जयंती हमेशा एक ही दिन पड़ती आई है। इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों को साथ याद करते हुए संघर्ष की यह साझीदारी याद दिलाई थी बिहार के संदर्भ में।

प्रधानमंत्री ने कहा, ‘महान नानाजी देशमुख लोकनायक जेपी के परम शिष्यों में से एक थे। उन्होंने जेपी के विचारों और आदर्शों को लोकप्रिय बनाने के लिए अथक परिश्रम किया। ग्रामीण विकास के प्रति उनका काम हमें प्रेरित करता है। जेपी ने हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में अहम योगदान दिया। भारत रत्न नानाजी देशमुख जेपी के करीबी साथी थे। पटना में उन पर (जेपी) प्राणघातक हमला किया गया था। नानाजी ने वार अपने ऊपर ले लिया। इस हमले में नानाजी को काफी चोटें आईं लेकिन वह जेपी को बचाने में कामयाब रहे’।

बिहार वह धरती है जिसने आजादी के बाद पहली बार गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया था। क्या आज उस राजनीतिक दृश्य को हम एक बार फिर से याद कर सकते हैं जब पटना की सड़क पर जेपी पर लाठी बरस रही थी और नानाजी देशमुख उन्हें बचा रहे थे। इस पुराने दृश्य को एक बार याद करेंगे तो आज बिहार में कांग्रेस का ताजा हाल समझने में मदद मिलेगी।

केंद्र की सत्ता का ताला आज भी उत्तर प्रदेश और बिहार की चाबी से खुलता है। इन दोनों राज्यों की सीटें उस जादुई आंकड़े का काम करती हैं जिसे बहुमत कहते हैं। अभी हम इस स्तंभ में बिहार के संदर्भ में बात कर रहे हैं। वही बिहार जो कांग्रेस की तानाशाही के खिलाफ विकल्प की उम्मीद बना था। समाजवादी नेताओं की जड़ कहीं की भी हो लेकिन गैर कांग्रेसवाद की पहचान बिहार में ही आकर मजबूत होती थी। आज जब बिहार में देश की बड़ी राजनीतिक हलचल है ऐसे में वहां कांग्रेस कहीं भी नहीं दिख रही है। बिहार के चुनाव में एक भी विमर्श, नारा या जुमला ऐसा नहीं है जो कांग्रेस के कुनबे से संबंध रखता है।

वह राजनीतिक जमीन तो 2014 में ही बदल गई थी जब राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा कांग्रेस का मुकाबला करती थी। आज हर जगह पर कांग्रेस को भाजपा के साथ मुकाबला करना पड़ता है। सियासी खेल के नियम भाजपा तय करती है और कांग्रेस को उसके अनुसार ही खेलना होता है। लेकिन वर्तमान संदर्भ में बिहार वह जगह है जहां खेल के नियमों पर भाजपा का एकाधिकार सा नहीं दिख रहा है। उसे कांटे की टक्कर मिल रही है। लेकिन इस टक्कर को देने में कहीं भी कांग्रेस का दम-खम नहीं दिख रहा है। बिहार में गठबंधन बने हैं। भाजपा ने जद (एकी) को एक सीट ज्यादा दी है मगर उसकी छवि पिछलग्गू पार्टी की नहीं है। उधर, राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस क्षेत्रीय छत्रप के छाते के नीचे अपनी पहचान गुम होने के लिए मजबूर सी दिख रही है। बिहार में कांग्रेस की यह हालत राजीव गांधी के समय ही हो चुकी थी।

पंद्रह साल बाद बिहार में इस तरह का चुनाव हो रहा है जिसमें सत्ता पक्ष के अगुआ बदहवास होकर अपने सौम्य और ‘सुशील’ व्यक्ति की छवि खो चुके हैं। कभी जिन सुशासन बाबू को ‘सबाल्टर्न नेहरू’ कहा जाता था आज वे अपने ही पंद्रह सालों के बोझ तले दब के अपनी बौद्धिक सूरत बिगाड़ रहे हैं। लेकिन नीतीश से आमने-सामने होने में कोई कांग्रेसी चेहरा नहीं है। वैसे इसके पंद्रह साल पहले भी बिहार में सत्ता बदली थी तो कांग्रेस ने उससे क्या सबक हासिल किया यह कहीं पर भी दर्ज होता नहीं दिखता है।

बिहार में कांग्रेस अपने हिसाब से सीटों का मोल-भाव भी नहीं कर सकी है। पूरे चुनावी माहौल में चिराग से लेकर मुकेश सहनी, पुष्पम प्रिया और पप्पू यादव हैं लेकिन कांग्रेस नहीं है। कांग्रेस कौन सा कथ्य लेकर जनता के बीच उतरी है, उसकी प्राथमिकताएं क्या हैं यह बात आम जनता तक नहीं पहुंच पाई है। उसके घोषणापत्र में ऐसी कोई बात नहीं है कि आम लोग उसकी चर्चा करे। कांग्रेस उस भेड़चाल में फंसी हुई है जो या तो बिहार के क्षेत्रीय दलों ने रची है या भाजपा ने।

ऐतिहासिक रूप से अगर इस बात को चिह्वित करना चाहेंगे कि गैर कांग्रेसवाद क्या है तो बिहार इसके लिए विलक्षण राज्य है। 1974 के आंदोलन को ‘बिहार आंदोलन’ ही कहा गया था जो कांग्रेस के विरोध में था। आज जो लोग ऐतिहासिक नजरिए से नई तारीखी मिसालों से भाजपा का विश्लेषण करना चाह रहे हैं वे इस बात को रेखांकित करते हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा की जमीन बिहार से ही बनती है। इसी के उलट कांग्रेस का राष्ट्रीय एकाधिकार बिहार से ही उखड़ा था।

पिछली हारों के बाद हुए मंथन शिविरों से कांग्रेस ने कुछ भी मथ के निकाला होगा ऐसा लगता नहीं है। जो राज्य 2024 की झलक दिखाने वाला है वहां की पूरी चुनाव प्रक्रिया में कांग्रेस का कोई चेहरा ऐसा नहीं है जिसे पार्टी के ब्रांड के रूप में दिखाया जाए। विपक्ष के गठबंधन में एक राष्ट्रीय पार्टी कोई कारक नहीं है, उसका कोई एजंडा नहीं है। उसकी अंतरिम राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर आगामी अदृश्य अध्यक्ष तक कोई ऐसी बात नहीं कह पाए हैं जो किसने, कहां कब और कमाल का बोला के खांचे में आए।

नरसिंह राव के समय नेहरू-गांधी परिवार खुद को हाशिए पर महसूस करने लगा था। उसे लग रहा था कि वह नेतृत्व के नियंत्रण से कट रहा है। सीताराम केसरी इसी बिहार के थे और कांग्रेस ने अपने डिजिटल इतिहास में उनके पन्ने को जिस तरह से फाड़ दिया, वह एक अलग से विमर्श का विषय है। सीताराम केसरी के लिए जुमला उछाला गया था, ‘ओल्ड मैन इन हरी’। सीताराम केसरी अच्छे या खराब नेता हो सकते हैं। लेकिन उनसे जिस तरह से पार्टी अध्यक्ष का पद छीना गया वह नेहरू-गांधी परिवार के चेहरे पर कलंक ही है। जब कांग्रेस का दिल्ली दरबार सीताराम केसरी के पैर के नीचे से जमीन खींच रहा था उसी वक्त बिहार में लालू यादव की जमीन पुख्ता हुई थी।

कांग्रेस को लगा था कि उस दौरान लालू यादव के बहाने वह राष्ट्रीय स्तर पर एक क्षेत्रीय पार्टी का अधिग्रहण कर सकती है। लेकिन उसकी खुशफहमी के उलट बिहार में राजद ही उसे अधिगृहीत करता चला गया। तब से लेकर तीस साल हो गए। आज स्थिति यह है कि कभी पूरी पार्टी हारती है, कभी उसका अध्यक्ष हारता है। क्षेत्रीय दलों की मेहरबानी से ही कोई कांग्रेसी नेता विधानपरिषद तो राज्यसभा में पहुंचता है। मंडल का पूरा कारवां गुजर गया और कांग्रेस खड़ी-खड़ी गुबार देखती रही। सामाजिक न्याय के लिए हुंकार भरने वाले बिहार में कांग्रेस उस गैर के धब्बे को अभी तक धो नहीं पाई है। (क्रमश:)

एकनिष्ठ स्वयंसेवक नानाजी देशमुख
समाजसेवा की तपस्या में तप कर राजनीतिक फायदों से दूर रहने वाले चेहरों में एक रहे हैं नानाजी देशमुख। वे लोक वृत्त का ऐसा दायरा बनाते हैं कि जयप्रकाश नारायण को भी लगा कि इन चेहरों के साथ ही क्रांति संपूर्ण हो सकती है। खुद को एकनिष्ठ स्वयंसेवक मानने वाले देशमुख की वो तस्वीरें भारतीय राजनीति की धरोहर हैं जिसमें वे लोकनायक को लाठियों के वार से बचाने की कोशिश करते हुए दिखते हैं।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 बेबाक बोल- कांग्रेस कथा : कांग्रेस कहां बा
2 विशेष: पासबां कोई न हो
3 कांग्रेस कथा: विपक्षाघात
ये पढ़ा क्या?
X