बेबाक बोल कांग्रेस कथा: मौका-ए-मात

कांग्रेस के साथ दो बड़ी दिक्कत दिख रही है। सवर्णों का वोट बैंक पूरी तरह से भाजपा में हस्तांतरित हो चुका है। ऐसे में जब वह कोई गठबंधन बनाती है तो उसकी गांठ किस हितधारक से जुड़ेगी यही साफ नहीं है तो उसके साथ विश्वसनीयता का संकट पैदा हो जाता है। दूसरी दिक्कत कि संगठन न होने के कारण सरकार के खिलाफ असंतोष को वह अपने पक्ष में नहीं ले जा पाती है। हालात ऐसे बने कि जहां राजद है उस गठबंधन का तो वोट मिल गया। लेकिन कांग्रेस की जो अपनी बुनियाद थी वहां मामला सिफर रहा।

बिहार की एक चुनावी सभा में लोगों का अभिवादन करते राहुल गांधी और तेजस्वी यादव। (फाइल फोटो)

नौकरी और रोजगार में फर्क होता है…फैसला हमारे पक्ष में और नतीजा उनके पक्ष में…। बिहार में चुनाव के पहले और चुनाव के बाद राजद नेता तेजस्वी यादव के ये संवाद बताते हैं कि 2014 के बाद भी विपक्ष खत्म नहीं हुआ है। विपक्ष चुनाव के पहले एजंडा भी तय कर सकता है और चुनाव के बाद अपनी मौजूदगी का माहौल भी बना सकता है। फैसले बनाम नतीजे के समीकरण जो भी हों लेकिन बिहार में कांग्रेस को राजद से सीखने की जरूरत है कि लोकतंत्र में विपक्ष की क्या अहमियत होती है। संगठनात्मक ढांचे के कारण राजद और वाम दल मौजूदा सत्ता से अवाम की मुखालफत को मतदान केंद्र तक पहुंचा सके लेकिन कांग्रेस ऐसा नहीं कर सकी। बिहार में जमीनी संगठन से दूर दिल्ली से आए हवाई नेताओं के भरोसे हिंदी पट्टी में खड़ा होने का कांग्रेस का सपना जमींदोज हो चुका है। कांग्रेस के उत्तर प्रदेश के बाद बिहार में भी खारिज होने के कारणों की पड़ताल करता बेबाक बोल

एक आदमी जा रहा था। रास्ते में उसने देखा कि सड़क पर केले का छिलका पड़ा है। अब केले के छिलके को देख कर उसने क्या सोचा? यही कि ओह आज फिर फिसलना पड़ेगा। यह चुटकुला कांग्रेस के संदर्भ में सच साबित हो जाता है। केले के छिलके को देखने के बाद भी उसे उठा कर कचरे के डिब्बे में फेंकने के बजाए फिसलने को नियति मान लिया। बिहार के संदर्भ में शुरू हुई ‘कांग्रेस कथा’ हताशा भरी हार पर खत्म हुई। भारतीय राजनीति में जीती बाजी को भी हारने वाले का नाम कांग्रेस होता जा रहा है।

बिहार में कांग्रेस को उन चेहरों के खिलाफ संदेश देना था जो पंद्रह साल से सत्ता में थे। उन चेहरों के खिलाफ सिर्फ जनता में ही नहीं, उनके अपने गठबंधन के दायरे में भी असंतोष था। इसके बावजूद कांग्रेस का प्रदर्शन सबसे खराब रहा। पंद्रह साल की खामियों को ढो रही जद (एकी) से भी खराब प्रदर्शन। वहीं सत्ताधारी गठबंधन के खिलाफ बना गठजोड़ जो एकदम से सूपड़ा साफ करने वाले हिसाब में दिख रहा था कांग्रेस का हाथ पकड़ने के कारण यूपी को ये साथ ‘नापसंद’ है वाले अंजाम तक पहुंच गया।

बिहार में कांग्रेस की इस हार की पहली वजह वही है जिस पर हम ‘कांग्रेस कथा’ में सबसे ज्यादा जोर दे रहे हैं, सांगठनिक ढांचे का ध्वस्त होना। बिना संगठन के सितारे नेता जमींदोज ही हो सकते हैं। बिहार में वाम संगठनों को नब्बे के दशक के बाद सबसे बड़ी सफलता मिली है। वाम उम्मीदवारों की जीत का फीसद अधिक होने का कारण उनका संगठनात्मक ढांचा है। वाम जहां भी है, जैसे भी और जितना भी है अपने संगठन के साथ है। सांगठनिक ढांचे की बदौलत ही उसने अवाम की मुखालफत को मतदान केंद्र तक पहुंचाया।

सबसे बड़ा सच यह है कि बिहार में किसी के पक्ष में कोई बयार नहीं थी। न तो नीतीश कुमार और न ही राजद व वाम के पक्ष में कोई एकतरफा माहौल था। लोक जुमले में इस पूरे चुनाव को यथास्थिति के खिलाफ बताया जा रहा था। पंद्रह साल की सत्ता के खिलाफ जनता का एक स्वाभाविक असंतोष भी बिखरा हुआ सा था। सवाल है कि यह असंतोष किस दिशा में ले जाया गया? इन सबके बीच भी जातिगत समीकरण ही हावी रहे। ऐसे में कांग्रेस किसकी अगुआई कर रही थी वो यह भी नहीं बता पाई। भाजपा विरोधी खेमा भी जाति के गणित में उलझा हुआ था। राजद और वाम के साफ चेहरों के बीच कांग्रेस का चेहरा धुंधला ही होता गया।

कांग्रेस के साथ दो बड़ी दिक्कत दिख रही है। सवर्णों का वोट बैंक पूरी तरह से भाजपा में हस्तांतरित हो चुका है। ऐसे में जब वह कोई गठबंधन बनाती है तो उसकी गांठ किस हितधारक से जुड़ेगी यही साफ नहीं है तो उसके साथ विश्वसनीयता का संकट पैदा हो जाता है। दूसरी दिक्कत कि संगठन न होने के कारण सरकार के खिलाफ असंतोष को वह अपने पक्ष में नहीं ले जा पाती है। हालात ऐसे बने कि जहां राजद है उस गठबंधन का तो वोट मिल गया। लेकिन कांग्रेस की जो अपनी बुनियाद थी वहां मामला सिफर रहा।

न तो जातिवादी समीकरण और न सांगठनिक ढांचा तो फिर उसके हाथ को खाली ही रहना था। इसके ठीक उलट देखें तो राजद और वाम दोनों को इसका फायदा मिला। क्योंकि इनके विरोध में वो अंतर्विरोध नहीं है जो कांग्रेस के अंदर है। कांग्रेस का अपना अंतर्विरोध ही उसके विकास का अवरोधक बन रहा है। इस अवरोध से वो आगे निकल सकती है अगर संगठन बनाने से लेकर नीतिगत आधार पर भाजपा से अलग विकल्प दे।

जातिगत समीकरण, सांगठनिक ढांचा और नीतिगत विकल्प, तीनों से निकले संकट के कारण ही कांग्रेस का आधार खिसक कर भाजपा की इमारत मजबूत कर चुका है। इस आधार को भाजपा से वापस लेने की उसके पास कोई योजना भी नहीं दिख रही है। यह योजना तेजस्वी यादव के पास दिखी। लोकतंत्र में सपने दिखाने का अपना महत्व होता है। जो सपना दिखाने की अगुआई करता है वही जनता का अगुआ बनता है। ‘नौकरी और रोजगार में फर्क होता है’ इस एक वाक्य ने तेजस्वी को वह तेज दिया कि वो चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के नेता के रूप में उभरे।

तेजस्वी ने पकौड़े तलने का विकल्प दिखाया तो जनता ने उनका साथ निभाया। दस लाख नौकरी के सपने के साथ वो ‘यूथ को बूथ तक’ लाने में कामयाब रहे। नौकरी के वादे पर युवाओं का एक वर्ग जाति की चारदीवारी को तोड़ता भी दिखा। हर विधानसभा सीट में ऐसे लोगों की पर्याप्त संख्या थी जो शिक्षित होने के बाद भी रोजगार हासिल नहीं कर पा रहे हैं। अपने भविष्य को लेकर नाउम्मीद थे और जाति व धर्म की दीवार पर प्रहार कर रहे थे। तेजस्वी के नौकरी वाले विकल्प पर ही उनके साथ युवाओं का संकल्प आया और उनको सम्मानजनक हाल में पहुंचाया।

बिहार में ऐसी बहुत सी सीटें रहीं जहां जीत और हार के बीच लगभग हजार मतों का अंतर रहा। इसमें जाति समीकरण तो काम कर ही रहा था लेकिन अहम यह भी था कि जनता को वोट दिलवाने कौन और कैसे ला रहा है। संगठन के अभाव में कांग्रेस लोगों को अपने पक्ष में नहीं ला सकी। लेकिन वामपंथी दल और राजद के उम्मीदवार अपने सांगठनिक ढांचे के कारण जनता के असंतोष को ईवीएम तक ला सके। हिंदी प्रदेश में कांग्रेस का आधार भाजपा निगल चुकी है। बिहार में वो पूरी तरह खत्म है। विडंबना यह है कि जो दूसरी ताकतें कांग्रेस के साथ चलती हैं उनकी भी साख खराब हो जाती है। राजग के खिलाफ वैकल्पिक समूह का प्रदर्शन कांग्रेस के कारण पिछड़ गया। सरकार बनते-बनते रह गई।

बिहार ने संदेश दे दिया है कि अब सिर्फ राष्ट्रीय दल की पहचान के नाम पर कांग्रेस ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकती है। जब तक क्षेत्रीय स्तर पर सांगठनिक ढांचे में नीतिगत आधार पर समाज से, जमीन से जोड़ कर अपना भविष्य नहीं देखेगी तो सिर्फ राहुल गांधी के नाम पर असंतोष को अपने निशान पर मतदान में तब्दील नहीं करवा पाएगी। बिहार में एक बार फिर वही तस्वीर दिखी जो उत्तर प्रदेश में पहले भी दिख चुकी थी। सिर्फ धर्मनिरपेक्षता का राग अलाप कर भाजपा का विकल्प नहीं बना जा सकता है। वैकल्पिक राजनीति के अलावा वापसी का कोई दूसरा रास्ता नहीं है।

वैकल्पिक राजनीति नहीं होगी तो फिर कोई संगठन से क्यों जुड़ेगा। वह सिर्फ सत्ता से जुड़ेगा। भाजपा सत्ता में है तो फिर कोई कांग्रेस से क्यों जुड़ेगा? इस बात को कांग्रेस नहीं समझेगी तो और भी नेस्तोनाबूत होगी। उसके साथ जो जाएगा वो भी अपना चेहरा बिगाड़ेगा। बंगाल में कांग्रेस को ढोने के चक्कर में वाम ने पहले भी अपना वजूद गंवाया था और यही हाल रहा तो आगे भी गंवाएगा।

बिहार की कथा का सार तेजस्वी दे चुके हैं। अगर आप सांगठनिक रूप से मजबूत हैं और आपके पास वैकल्पिक राजनीति है तो चिराग तले अंधेरा भी करवा सकते हैं। संगठन के भरोसेमंद साथियों के साथ चलकर जद (एकी) का प्रदर्शन खराब होने के बावजूद उसका अस्तित्व कायम रहा। आगे बंगाल की खाड़ी में उतरने से पहले कांग्रेस या तो इनसे सबक लेगी नहीं तो पूरी तरह डूबेगी।(क्रमश:)

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