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बेबाक बोल- कांग्रेस कथा : कांग्रेस कहां बा

भिखारी ठाकुर को अपनी जीविका के लिए कलकत्ता जाना पड़ा था। कलकत्ता यानी तब का विदेश। एक बिहारी को ‘बिदेशिया’ और ‘बिरहा’ बनाने वाली शक्तियों पर ही नेहा भोजपुरी गीतों से हमला करती हैं।

कांग्रेस पार्टी में लोकसंस्कृति से जुड़े चेहरे नहीं रहे। बिहार में लंबे समय तक कांग्रेस का शासन रहा, लेकिन बिहारी अंदाज वाला नेता नहीं बचा।

जो कांग्रेस आजादी के पहले गांव-गांव तक पहुंची थी वह बीसवीं सदी के अंत तक संस्कृति और लोक मानस से पूरी तरह दूर हो गई। आज एक भी चेहरा ऐसा नहीं है जो लोक संस्कृति से जुड़ा हो और कांग्रेस का भी बड़ा नेता हो। नब्बे के दशक के पहले तक बिहार जैसे हिंदी पट्टी की कमान कांग्रेस के हाथ में थी और तब तक इसे आर्थिक रूप से पिछड़ा की संज्ञा मिल चुकी थी। बिहार में जब भोजपुरी और मैथिली के लोक स्वर को राजनीतिक अखाड़े में आमने-सामने कर दिया गया है तो कांग्रेस इस पूरे खेल से बाहर है। कभी जिस मिथिलांचल के कांग्रेसी चेहरों ने बिहार पर राज किया था आज वहां उसकी कोई जमीन ही नहीं है। हिंदी पट्टी को राष्ट्रीय छवि का दंभ देने वाली कांग्रेस अब वहां की क्षेत्रीय राजनीति में गुमशुदा आवाज है। भोजपुरी से लेकर मैथिली तक के वोट बैंक से बाहर कांग्रेस का भिखारी ठाकुर की कर्मभूमि से जायजा लेता बेबाक बोल।

‘सबसे कठिन जाति अपमाना’
तुलसीदास के रामचरितमानस के तर्ज पर लिखी ये पंक्ति बिहार के संस्कृतिकर्मी भिखारी ठाकुर की है। आज जब नेहा सिंह राठौर के व्यंग्य गीत ‘बिहार में का बा’ को लेकर सत्ता का पक्षकार उन पर हमलावर हो गया है तो एक बार हम बिहार के लोकवादी विरासत भिखारी ठाकुर को याद कर लें। इसके लिए हम चलते हैं नब्बे के दशक के पहले के बिहार में। लालू युग के पूर्व कांग्रेस काल के बिहार में। भागवत झा आजाद और जगन्नाथ मिश्र की अगुआई वाले कांग्रेसी विरासत वाले बिहार में।

लालू यादव के चरवाहा विद्यालय के संदर्भ को जब हिंदुस्तान से लेकर वैश्विक मीडिया ने मजाक का विषय बना दिया था तो भिखारी ठाकुर की जीवनी यह है कि वे स्कूली शिक्षा नहीं पा सके थे। कारण था कि वे स्कूल में ‘राम गति, देहूं सुमति’ तक लिखना नहीं सीख पाए थे। स्कूल की चाहरदीवारी के अंदर भी एक बच्चा सिर्फ अपनी जाति की दीवार में कैद कर दिया गया। भिखारी ठाकुर को समाज से जो मिला, उसे ही उन्होंने रचनात्मक प्रतिरोध के स्वर के रूप में वापस लौटाया।

भोजपुरी संस्कृति को उन्होंने वही दिया जो एक संस्कृतिकर्मी को देना चाहिए था। अगर कोई रचना हाशिए पर रखे गए हर तबके को अपनी आवाज लगे। उससे सत्ताधारक असहज हो जाएं, उसमें अपना चेहरा देखने से नजरें चुराएं और उसे अपने खिलाफ साजिश मानने लगें तो इसका मतलब है कि उस रचना ने समाज को जगा दिया है।

नेहा सिंह राठौर अपने गाने में उस स्त्री का दर्द उठाती हैं जिसके पति को कमाने के लिए परदेस जाना पड़ता है और वह आह भरती है कि उसके गांव में पेट भरने का संसाधन क्यों नहीं है। उसके सपनों का साथी दिल्ली-मुंबई में जिस नारकीय स्थिति में रह रहा है इसका वर्णन सुनना उसके लिए कितना कठिन है।

भिखारी ठाकुर को अपनी जीविका के लिए कलकत्ता जाना पड़ा था। कलकत्ता यानी तब का विदेश। एक बिहारी को ‘बिदेशिया’ और ‘बिरहा’ बनाने वाली शक्तियों पर ही नेहा भोजपुरी गीतों से हमला करती हैं।

लेकिन गाने के बहाने नेहा के तल्ख सवालों से भटकाने के लिए सत्ता पक्ष मैथिली ठाकुर के जरिए मिथिला को शंघाई साबित करने में जुट जाता है। वहां भोजपुरी बनाम मैथिली का अस्मितावादी संघर्ष भी शुरू हो जाता है। चुनाव के समय बिहार के इस अंदरूनी संघर्ष को वाया कांग्रेस कथा ही समझने की कोशिश करेंगे।

नेहा सिंह राठौर के संदर्भ को देखेंगे तो उन्होंने भोजपुरी गाने की लोकप्रियता का इस्तेमाल महिला, दलित और अन्य शोषित जनता की आवाज उठाने के लिए किया। अपनी सोच और समझ के हिसाब से वह व्यंग्य के लहजे में बिहार की बदहाली का जिक्र करती थीं। बिहार चुनाव के जोर पकड़ने के बाद धीरे-धीरे वह राजनीतिक होता गया।

इसका राजनीतिक होना स्वाभाविक है क्योंकि हाशिए के लोग राजनीति का ही हश्र होते हैं। विरोध की यह राजनीति वंचितों की पीड़ा को सार्वजनिक मंच पर लाने का काम कर रही थी, लोक भाषा में लोक की जमीनी गाथा कह रही थी। लेकिन चुनावी माहौल बनते ही इस पूरी बहस को क्षेत्रीय बनाम केंद्र की लड़ाई की पहचान दे दी गई।

देखा जाए तो बिहार में आज केंद्रीय ताकत के रूप में भाजपा की जो भूमिका है कभी वह कांग्रेस की हुआ करती थी। क्षेत्रीय ताकत के तौर पर इसी रूप में लालू यादव के उभार को बिहार की पहचान खराब करने के साथ जोड़ दिया गया था।

यह भी रोचक तथ्य है कि लालू प्रसाद के पहले का नेतृत्व मिथिलांचल के ही हाथ में था। भागवत झा आजाद और आगे चल कर जगन्नाथ मिश्र के समय कमजोर तबके की जातियों पर सवर्णों का वर्चस्व था और उससे जुड़े सारे संस्थान उस लड़ाई को बदनाम कर रहे थे, जिसकी मांग सामाजिक न्याय की थी। बिहार मतलब लालू यादव, उनकी भाषा, उनका तौर-तरीका, उनका पिछड़ापन, गरीबी, जहालत के रूप में दिखाया जाने लगा।

लालू यादव के चरवाहा विद्यालय को इस तरह कुप्रचारित किया गया कि चरवाहा विद्यालय का मतलब पूरी शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करना है। यह पूरा कथ्य केंद्र बनाम क्षेत्र की तर्ज पर ही रचा गया था। केंद्रीय पहचान आरोप लगा रही थी कि क्षेत्रीयता के नाम पर जो ताकतें उभर रही हैं वे बिहार को बदनाम कर रही हैं। बिहार को कमतर बता कर उसे हीन भावना से घेरा जा रहा है।

इसके पहले हम हिंदी नवजागरण के दौर का विश्लेषण करें तो बहुत सारे राज्यों का जन्म भाषा के आधार पर ही हुआ था। लेकिन हिंदी प्रदेश को शुरू से ही अपनी राष्ट्रीय छवि का दंभ था। हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान की पहचान को ही राष्ट्रीय माना गया। जब पूरे देश को प्रतिनिधित्व देने का समय था तो उसमें कांग्रेस भी संघ और हिंदुत्व की ताकतों की तरह ही व्यवहार कर रही थी। कांग्रेस के अंदर हिंदुत्व की ताकत की मिसाल रहे हैं जवाहरलाल नेहरू मंत्रिमंडल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी। उनके बाद भी सरदार पटेल और तमाम ताकतों ने राष्ट्रीयता की पहचान को ही बढ़ावा दिया।

हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान के संदर्भ में बिहार कभी क्षेत्रीय पहचान में तब्दील नहीं हो सका। ठीक इसके उलट अगर देखें तो जो तमाम राज्य भाषाई स्तर पर बने उनमें बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक, सबने अपने स्तर पर तरक्की की। इनकी अपनी क्षेत्रीय पहचान का विस्तार हुआ। बंगाली और मराठी अस्मिता की बात हुई।

दूसरी ओर हिंदी पट्टी पर कांग्रेस का ही राज था। यानी इनके विकास की पूरी जिम्मेदारी कांग्रेस के ही हाथ में थी। भावना के स्तर पर राष्ट्रीयता का पूरा गुब्बारा हिंदी प्रदेश में भरा गया। लेकिन विकास विभिन्न अलग-अलग क्षेत्रीय, भाषाई राज्यों में हुआ। आगे हालात बदलने के बाद उसी हिंदी प्रदेश की पहचान बीमारू प्रदेश के रूप में बन गई, खासकर बिहार की।

सवाल यह है कि बिहार की इस बीमारू पहचान का जिम्मेदार कौन है? बीमारू प्रदेश का तमगा हासिल करने यानी नब्बे के दशक तक कांग्रेस का ही नेतृत्व रहा। बिहार के इस पिछड़ेपन पर सवाल उठे। लेकिन इस पिछड़ेपन को रेखांकित कर बिहार की पहचान को लेकर जो क्षेत्रीय ताकतें बनीं उसे नकारात्मक रूप में धकेलने की कोशिश की गई। यहीं से क्षेत्रीयता की पहचान बनी, चाहे वह लालू यादव के समय बनी हो या उसके बाद।

आज सशक्तिकरण के संदर्भ में भोजपुरी बनाम मैथिली के संघर्ष को किस तरह से देखा जाए? क्षेत्रीयता के अंदर भी क्षेत्रीयता और नेहा सिंह राठौर जैसे प्रतिरोधी सुर को धूमिल करने की कोशिश को कैसे देखा जाए? बिहार में जोड़ते-तोड़ते करीब डेढ़ दशक से नीतीश कुमार की सरकार भाजपा के साथ है। बिहार ने कांग्रेस की केंद्रीय ताकत और लालू यादव का भी दौर देखा और अब यह दौर भी देख रहा है। बिहार आज भी पिछड़ा का पिछड़ा है।

ऐसे में जो पहचान का संकट है वह असल में बिहार की पहचान का संकट है। उस पहचान को अगर नहीं पहचाना जाएगा, सिर्फ यह कहा जाएगा कि अलाना बदनाम कर रहा है या फलाना बदनाम कर रहा है तो यह वैसे ही है जैसे शुतुरमुर्ग सच से दूर होने के लिए रेत में सिर छुपा लेता है। वैसे भोजपुरी और मैथिली गीतों को गुनगुनाते हुए एक मुखड़ा यह भी बन सकता है कि बिहार के विकास को पीछे ले जाने के जिम्मेदारों में ‘कांग्रेस कहां बा’?

भिखारी ठाकुर की पहचान
संस्कृति में लोक राग का सुरीला नाम हैं भिखारी ठाकुर। उनके अभिनव प्रयोगों के कारण भोजपुरी संस्कृति को नई दिशा मिली। उनकी रचनाओं में स्त्री और अन्य हाशिए के तबकों की पीड़ा मुख्य स्वर हैं। उनकी रचना ‘बेटी बेचवा’ सामंती समाज पर ऐसा रचनात्मक प्रहार है जो लोक साहित्य की निर्भीकता और मुखरता को सामने लाता है। जीवित रहते ही किवदंती बन जाने वाले भिखारी ठाकुर का काम और पहचान समय के साथ और पुख्ता होते जा रहे हैं। (क्रमश:)

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