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बेबाक बोलः गम रोजगार के

दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने न्यूनतम मजदूरी दर में इजाफा किया तो उसका असर राष्टÑीय राजधानी क्षेत्र के कुछ कारखानों में तालाबंदी के रूप में देखा गया। कारखानों को दिल्ली से हटाकर उन राज्यों में ले जाने की कोशिश हुई जहां न्यूनतम मजदूरी कम हो। पूंजीवादी व्यवस्था में मुनाफे की कमी को मंदी नाम दिया जाता है। अचानक ही कहीं से लाखों तो कहीं से हजारों नौकरियों की छंटनी की खबरें आने लगी हैं। औद्योगिक घराने मंदी को वजह बताकर छंटनी की बात कर रहे। नीति आयोग के उपाध्यक्ष कह रहे हैं कि निजी क्षेत्र में कोई भी दूसरे पर भरोसा नहीं कर रहा है, कोई किसी को कर्ज देने को तैयार नहीं है। उनका कहना है कि पिछले 70 सालों में ऐसे हालात नहीं देखे। कड़े राजनीतिक फैसले लेने के बाद अर्थव्यवस्था में सुधार की ओर बढ़ रही सरकार की परीक्षा की इस घड़ी पर बेबाक बोल।

Author Updated: August 24, 2019 6:28 AM
बढ़ी हुई न्यनूतम मजदूरी का परिणाम है कारखाना बंदी। बंदी-मंदी, मालिक-मजदूर, मुनाफा-घाटे के बीच से किसी भी सरकार के लिए रास्ता निकालना चुनौतीपूर्ण रहा है। निजी आयकर, विभिन्न तरह के कर, जीएसटी और राज्य के करों से कारोबारी परेशान थे। सरकार कारोबारियों के हाथ मजबूत करती है तो वे अपने मुनाफे से कामागारों की हिस्सेदारी बढ़ाने को तैयार नहीं होते हैं।

‘दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-गम गुजार के
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझसे भी दिलफरेब हैं गम रोजगार के’

फैज अहमद फैज के अशआर की खासियत यह है कि वे महबूब की बातें करते हुए आपका रिश्ता वतन के तल्ख हालात से जोड़ देते हैं। ठीक वैसे ही जैसे मंदिर और कश्मीर का जाप करते हुए किसी को लग सकता है कि भूखे भजन न होय गोपाला। अभी जब देश राष्ट्रवाद पर भावनात्मक रूप से परिपूर्ण है, सरकार कश्मीर पर मजबूत फैसला करने की बात कह कर अब पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को वापस लाने का दावा कर रही है, परमाणु हथियारों के पहले इस्तेमाल नहीं पर नीति बदलने का विचार पेश कर रही है तभी मंदिर और पाकिस्तान के बीच बेरोजगारी और मंदी का भी शोर उठ गया है। मंदी की बात करने से पहले फैज का सहारा इसलिए कि बाजार रुमानियत के भाव से निकल कर अचानक बेरोजगारी से सना खूनी पैरहन दिखा रहा है। बेरोजगारी के इस हल्ले में आवाज किनकी ऊंची हो रही है? क्या इन आवाजों के अलगाव की कोई जरूरत महसूस की जा रही है? अर्थव्यवस्था की चिंता का जो एकाश्मक पहाड़ बन रहा है उसे अलग-अलग क्षेत्रों में बिखरा कर देखा जा रहा है या नहीं?

अंतराष्ट्रीय मंदी का रुख जिसे भारत में पहुंचना ही था, उसे हमारा घरेलू बाजार कैसे ले रहा है, इस पर बात करनी ही होगी। मंदी के बहुत से कारक राष्ट्रीय भी होते हैं और उसका मुकाबला भी घरेलू तरीकों से ही किया जाता है। सरकार और बाजार को जनता के पैसे से ही चलना होता है। तो अभी नौकरी और मंदी के हंगामे में किसकी चिंता बाजी मार रही है? नौकरी खोने वालों की या नौकरी देने वालों की? जरूरत से कम वेतन पाने वालों की या कर्मचारियों के ज्यादा वेतन को अपना घाटा मानने वालों की? दोनों के हित एक क्यों नहीं हैं?

मंदी का दौर नब्बे के दशक में भी आया था, उसके बाद भी आया और आज भी हमारे सामने है। वैश्विक बाजार का मंदी से एक खास नाता जुड़ चुका है। धूम से लेकर धूल चाटने तक के बाजार के चक्र को कई अर्थशास्त्री बहुत अच्छे से समझा चुके हैं। फिलहाल, यहां बात राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की। कुछ दिन पहले राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ओखला के औद्योगिक इलाके से एक कारखाने का सामान रातों-रात उठा कर उसे बंद करने की तैयारी हो रही थी। मजदूर संगठनों के कार्यकर्ताओं को पता चला तो वहां पहुंचे और कारखाना बंद करने की प्रक्रिया का विरोध शुरू हुआ। उस वक्त तो कारखाना बंदी का काम रोक दिया गया। लेकिन पता चला कि कारखाने को वहां फिर से बंद किया जा रहा है। अहम बात यह है कि कारखाने को स्थानांतरित कर गुरुग्राम ले जाने की तैयारी की जा रही थी।

कारखाने को दिल्ली से गुरुग्राम ले जाने की वजह बना था दिल्ली सरकार का न्यूनतम मजदूरी को ज्यादा करने का फैसला। न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने के फैसले को कारखाना मालिक अपने मुनाफे के खिलाफ मानते हैं। मजदूरी बढ़ाने का मतलब है कारखाना मालिकों का मुनाफा घटना। इसलिए वे कारखाने को ऐसे राज्य में ले जाना चाहते हैं जहां न्यूनतम मजदूरी दिल्ली से कम हो। आज के दौर में इस खबर को ऐसे ही देखा जाएगा कि कारखाना बंद हो रहा है और नौकरी जा रही है। लेकिन हकीकत यह है कि कारखाने को इसलिए दूसरी जगह ले जाया जा रहा है क्योंकि कम तनख्वाह में नौकरी करने वाले मिल जाएं। पूंजीवाद के दौर में मुनाफा कम होने को घाटे के तौर पर देखा जाता है, और इसे मंदी का नाम दिया जाता है। दिल्ली सरकार ने मजदूरों को राहत देने का जो फैसला किया वह मालिकों के मुनाफे के खिलाफ चला गया। दिल्ली में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने के साथ ही यहां मजदूरों के लिए कारखाने के दरवाजे बंद होने शुरू हो गए तो हम लोक-कल्याणकारी राज्य की ओर कदम बढ़ाने की दिक्कतें समझ सकते हैं।

मीडिया के पाठ्यक्रम में इस तथ्य को अहम पाठ के रूप में पढ़ाया जा सकता है कि पूंजीपति संगठन अपने क्षेत्र की मंदी के बारे में पूरे पृष्ठ का विज्ञापन दे रहे हैं। जो टीवी चैनल पूरे कारोबारी भावना से चलते हैं, शेयर बाजार की उठा-पठक से जिनके हित प्रभावित होते हैं वे अचानक से बेरोजगारी और मंदी की बात करने लगे हैं। हर क्षेत्र के पूंजीपति संगठन कह रहे हैं कि हम बर्बाद हो रहे हैं। ये वही लोग हैं जिन्हें कुछ समय पहले अलग-अलग तरह का बेल आउट पैकेज मिला था और जिन्होंने सरकार को पूरा समर्थन दिया था।

अचानक से मंदी और बेरोजगारी की खबरों की भरमार को कैसे देखा जाए? मंदी के विज्ञापन से लेकर खबरों तक का परिदृश्य क्या है? महंगाई बढ़ने के साथ कर्मचारियों की तरफ से बेहतर तनख्वाह की मांग उठ रही थी और पक्ष से लेकर विपक्ष तक के श्रम संगठन इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते थे। सरकारी पक्षकार इस बात का भरोसा दिला रहे थे कि दूसरी बार मजबूती से आने और कड़े राजनीतिक फैसलों पर जीत हासिल कर लेने के बाद केंद्र सरकार का पूरा ध्यान अर्थव्यवस्था की तरफ ही होगा।

अर्थव्यवस्था की तरफ सरकार के कदम उठाते ही बाजार में अफरातफरी का दौर शुरू हो गया है। बात थी कमजोर तबकों, किसानों, कामगारों को राहत देने की। दो बार पूर्ण बहुमत से आई सरकार इतने बड़े तबके की उम्मीदों को खारिज भी नहीं कर सकती है। अब सरकार पर दोनों तरफ से दबाव बन रहा है। नौकरियां कम और वेतन कम होने के ऊपर मुनाफा कम होना भारी पड़ता जा रहा है। बेल आउट से लेकर श्रम कानूनों तक के जरिए पूंजीपति वर्ग अपना मुनाफा बढ़ाना चाह रहा है। यह तो दिख ही रहा था कि जनता की खरीद क्षमता पर असर पड़ रहा है और माहौल मंदी की ओर जा रहा है। लेकिन सरकार पर जिस तरह से दबाव पड़ रहा है वह उसके लिए एक परीक्षा की घड़ी है। पूंजीपतियों के मुनाफे और कामगारों के हित के बीच लोक-कल्याणकारी फैसले करना आसान नहीं होता है। मंदी के कारण मुनाफे में जो कमी आई है, उसे अगर यहां या वहां से पूरा किया जाए तो वह अर्थव्यवस्था को सतत विकास का रास्ता दे पाएगा या नहीं यह भी देखने की बात है।

बढ़ी हुई न्यनूतम मजदूरी का परिणाम है कारखाना बंदी। बंदी-मंदी, मालिक-मजदूर, मुनाफा-घाटे के बीच से किसी भी सरकार के लिए रास्ता निकालना चुनौतीपूर्ण रहा है। निजी आयकर, विभिन्न तरह के कर, जीएसटी और राज्य के करों से कारोबारी परेशान थे। सरकार कारोबारियों के हाथ मजबूत करती है तो वे अपने मुनाफे से कामागारों की हिस्सेदारी बढ़ाने को तैयार नहीं होते हैं। मौजूदा अर्थव्यवस्था का हाल यह है कि राज्य यानी सरकार के पास अपना पैसा नहीं होता। उसे इसकी जेब से लेकर उसकी जेब में देना या इसकी टोपी उसके सिर पर पहनानी होती है। सरकार को इन्हीं के बीच एक मध्यमार्ग भी निकालना है। देखना यह है कि रास्ता निकालने से पहले औद्योगिक मालिकान के दबाव का जो गति अवरोधक सामने रख दिया गया है उससे सरकार कैसे निपटेगी जिसे पांच साल बाद फिर जनता के पास जाना है।

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