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बेबाक बोलः संकल्प सिद्धि

न कहीं गोली चली न कहीं विस्फोट हुआ और अनुच्छेद 370 को इतिहास बना दिया गया। यह काम वहीं से हुआ जहां से होना चाहिए था, और वह है संसद। जनता के प्रतिनिधियों ने मिलकर पूरे देश को जश्न के माहौल में डुबो दिया। किसी के लिए होली थी, किसी के लिए दिवाली, किसी के लिए गुरुपर्व तो किसी के लिए ईद।

Author Published on: August 10, 2019 2:08 AM
अमित शाह (फोटो सोर्स: लोकसभा टीवी)

‘न मारा न खून किया, बीसों का सिर काट दिया, बोलो क्या’

दिल्ली के जंतर मंतर पर क्यूबा क्रांति और रूसी क्रांति पर प्रदर्शन करनेवाले ने पटाखे फोड़ रहे और जश्न मना रहे से पूछा कि कश्मीर के भारत का अभिन्न अंग बन जाने से तुम्हें वहां प्लॉट मिलेगा क्या? उस व्यक्ति का जवाब था कि फिलस्तीन के झंडे को लेकर तुम क्यों प्रदर्शन करते हो वहां से तुम्हारा प्लॉट छिन गया था क्या। यह कोई सोशल मीडिया की नोकझोंक नहीं बल्कि राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों की सच्चाई है कि एक अस्मिता दूसरे को वर्जना के तौर पर देखती है। कश्मीर पर आए फैसले ने जिस तरह से कन्याकुमारी तक के लोगों को एक सूत्र में बांधा वह बताता है कि प्रतीकों और अधिकारों का अपना महत्त्व है। लाल किले की राष्ट्रीय अस्मिता लाल चौक तक पहुंचा कर कश्मीर को लोकतंत्र के पथ पर आगे बढ़ाया गया है। कभी शेख अब्दुल्ला की लोकतांत्रिक सरकार को कुचल कर जिस पूरे क्षेत्र को सांप्रदायिकता की आग में झोंक दिया गया था, आज वहां से अलगाववादियों और आतंकवादियों के खारिज होने का वक्त आ गया है। अनुच्छेद 370 को राजनीतिक गलतियों के कूड़ेदान में फेंके जाने के ऐतिहासिक फैसले पर बेबाक बोल।
इस देसी पहेली को सुनते ही लोग जवाब में कहते हैं-नाखून। पांच अगस्त 2019 का दिन भारतीय इतिहास में मील का पत्थर बन गया। न कहीं गोली चली न कहीं विस्फोट हुआ और अनुच्छेद 370 को इतिहास बना दिया गया। यह काम वहीं से हुआ जहां से होना चाहिए था, और वह है संसद। जनता के प्रतिनिधियों ने मिलकर पूरे देश को जश्न के माहौल में डुबो दिया। किसी के लिए होली थी, किसी के लिए दिवाली, किसी के लिए गुरुपर्व तो किसी के लिए ईद। भारतीय बच्चे अपनी-अपनी भाषाओं में पढ़ते आए हैं कि कश्मीर देश का मुकुट है। भारत का नक्शा तमिल बच्चों के पाठ्यक्रम में भी है तो महाराष्टÑ के बच्चों के भी। भारतीय संसद से रचे इतिहास के बाद इस मुकुट को हर वह आम नागरिक अपने सिर पर महसूस कर रहा था जो कश्मीर से हजारों मील दूर था।
अगर नेता देश की जनता के दिलों पर हुकूमत कर लेता है तो वह मजबूत से मजबूत फैसला कर सकता है। जब पंजाब आतंकवाद की आग में झुलस रहा था तो ऐसा ही मजबूत फैसला इंदिरा गांधी ने किया था। अगर केंद्र और पंजाब सरकार ने मिल कर आतंकवाद को खत्म करने की न ठानी होती तो आज पंजाब की तस्वीर न बदली होती। खैर, पंजाब और कश्मीर के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक हालात की तुलना नहीं हो सकती, यहां तुलना हो रही है तो बस राजनीतिक इच्छाशक्ति की।

स्तंभ की शुरुआत एक देसी पहेली से इसलिए कि कश्मीर के मसले का हल देश की आम जनता के पास ही था। अगर आप महानगरों की अकादमिक और इंटरनेट की दुनिया से बाहर निकल कर खेत-खलिहान, कारखानों और मंदिर-मस्जिद की गलियों से गुजरेंगे तो पता चलेगा, कश्मीरियत और जम्हूरियत क्या है। एक आम नागरिक देश के लिए जुड़ाव कैसे महसूस करता है। उसके लिए जम्मू कश्मीर सिर्फ डल झील, शिकारा या वैष्णो देवी का मंदिर और अमरनाथ यात्रा ही नहीं है। एक आम आदमी को उद्वेलित करने के लिए किसी दीवार पर अगर लिख डाला जाता है कि ‘दूध मांगोगे खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे चीर देंगे’ तो इसका मतलब है। अगर आप इस नारे को नहीं समझ सकते हैं तो आप देश राग नहीं समझ सकते हैं। अलगाववादियों की हुकूमत, ‘इंडिया’ को चुनौती और संयुक्त राष्टÑ में इंतिफादा (फिलस्तीनी शहीद) घोषित किया जा रहा भारतीय सैनिकों का हत्यारा आतंकवादी बुरहान वानी। इन हालात से हर वो शख्स आहत होता था जो इस देश की मिट्टी को नागरिक की भावना के साथ प्यार करता है। रोजी-रोटी के साथ उसे गर्व से जीने का संबल भी चाहिए। इस भाव के अभाव पर जिस राजनीतिक और सांस्कृतिक संगठन ने बरसों से अपनी जमीन तैयार की, जनता ने उन्हें वह जमीन दी जिस पर मजबूती से खड़े होकर वे ऐसा मजबूत फैसला कर सके।

सैकड़ों बार फसल के नुकसान पहुंचने के बाद भी एक किसान का खेत में काम करते रहना हमें रूमानी अनुभव देता है। कारखाने में कामगार काम कर रहा है तो उसके पास सिर्फ यह भाव न हो कि वह पेट पाल रहा है बल्कि यह गर्व हो कि वह देश का चक्का चला रहा है। दूर-दराज के गांवों में काम कर रहे एक छोटे पत्रकार को भी अपने काम पर गर्व हो कि वह देश का चौथा खंभा है। लोकतंत्र के लिए वह ‘छोटा सा’ पत्रकार भी उतना ही अहम है जितना देश की संसद और सुप्रीम कोर्ट। किसान से लेकर कामगार और पत्रकार में हमें यह ईमानदारी और गर्व का भाव देखना है तो एक नागरिक के तौर पर राष्ट्रीय प्रतीकों पर गर्व के भाव को नकारा कैसे जा सकता है। एक नागरिक के लिए प्रतीकों का बहुत महत्त्व है। ये प्रतीक तो नागरिकशास्त्र की बुनियाद हैं, तिरंगे का तीन रंग और अशोक चक्र हो या भारतीय राष्ट्रगान। एक व्यक्ति सिर्फ खेत का हल और कारखाने की मशीन या कंप्यूटर की स्क्रीन नहीं हो सकता है। उसके अंदर धड़कते एक नागरिक के दिल को यह कह कर आहत नहीं किया जा सकता कि तुम्हें सिर्फ रोजगार और सड़क की ही बात करनी है। वह काम की भी बात करेगा और कश्मीर की भी। वह निर्भया और उन्नाव के लिए एकजुट होगा और आतंकवादियों व अलगाववादियों के खिलाफ भी साझा सोच रखेगा।

फौरी तीन तलाक और अनुच्छेद 370 के खिलाफ वोट देने वाली जनता को महसूस हुआ कि चुनावी घोषणापत्र और लाल किले से किया वादा लाल चौक पर जाकर पूरा होता है। मोदी सरकार ने तीन तलाक के तुरंत बाद जिस तरह से अनुच्छेद 370 को राजनीतिक गलतियों के कूड़ेदान में डाल कर स्वच्छता अभियान चलाया वह अभूतपूर्व है। अगर लाल किला राष्टÑीय अस्मिता का प्रतीक है तो फिर इसकी परिधि से लाल चौक क्यों बाहर हो। फिलस्तीन और क्यूबा से लेकर वेनेजुएला तक के मामलों पर दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने वाले कश्मीर के जरिए जनता को मिले नए अधिकारों का मजाक उड़ाते हुए एक आम नागरिक से पूछते हैं कि कश्मीर का अभिन्न अंग बन जाने से तुम क्यों खुश हो, तुम्हें वहां प्लॉट मिलेगा क्या, तो उस आम नागरिक का पलटवार होता है कि जैसे फिलस्तीन की समस्या से तुम दुखी हो तो तुम्हारा कोई प्लॉट छिन गया क्या। पिछले ही हफ्ते तीन तलाक पर हमने लिखा था, यातना और वर्जना को किसी तुला पर तुलनात्मक तौला नहीं जा सकता तो उस वक्त हमें इसका जरा भी इल्म नहीं था कि एक हफ्ते से कम समय के अंदर देश का राजनीतिक नेतृत्व इतनी बड़ी इच्छाशक्ति दिखाएगा। आज फिर वही निवेदन, नागरिकों को तुला पर मत तौलिए कि इसमें तुम्हार क्या और उसका क्या?
अंग्रेजों से आजादी के बाद भारत का ऐसा संवेदनशील भूगोल जो एक तरफ चीन और दूसरी तरफ पाकिस्तान से घिरा था, उसके साथ दिल्ली की सरकारों ने ऐसी अवसरवादी राजनीति की जिससे कश्मीर लोकतंत्र से दूर होता गया। कश्मीर और हैदराबाद के हालात एकदम अलग थे जिसे बिलकुल भी नहीं समझा गया। कश्मीर के राजा के साथ यही करार था कि भारत में इसका विलय जनता ही तय करेगी। लेकिन केंद्र सरकार ने कश्मीर को लोकतंत्र की राह पर ले जा रही शेख अब्दुल्ला सरकार का अलोकतांत्रिक तरीके से दमन किया। राजशाही के खिलाफ और किसान आंदोलन चला रहे शेख अब्दुल्ला को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया। अभी तक अनुच्छेद-370 का सबसे ज्यादा दुरुपयोग दिल्ली दरबार से ही किया गया।

एक राष्ट्र, एक संविधान की आम भावना को बढ़ाने के बजाए अलगाववादियों का तुष्टीकरण होने दिया। जो कश्मीर, इतिहास लेखन से लेकर विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक आंदोलनों के तारीखी कदम उठा चुका था वहां हर मुद्दे को सांप्रदायिकता की आग में झोंक दिया गया, जिसका एक नतीजा था वहां से बड़े समुदाय का पलायन। पांच अगस्त के बाद कश्मीर उस संकल्प सिद्धि की ओर बढ़ने को है जिसका सपना शेख अब्दुल्ला और अन्य प्रगतिशीलों ने देखा था।
कश्मीर महज कुछ जिलों में सिमटा भूगोल नहीं बल्कि पूरे भारत में फैला सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आख्यान है। अनुच्छेद 370 को प्रतीक बनाना चाहिए था भारत की बहुलता और विविधता को दिखाने का। लेकिन उसका इस्तेमाल देश को बांटने के लिए और जनता के बीच दूरियां बढ़ाने के लिए किया जा रहा था।

इसके खात्मे के बाद आज कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत एक साथ है। यह मजबूत फैसला भारत के लोकतंत्र को और मजबूत करे इसकी कोशिश हम सब करें। ‘किसका कश्मीर’ के उठते नारों पर जितेंद्र सिंह ने संसद में जो कहा उसे एक बार दोहराना चाहिए, ‘कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है इसलिए देश के 130 करोड़ लोग कश्मीर के भागीदार हैं। उन 130 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि भारत की संसद के सदस्य हैं। भारत की संसद है कश्मीर की भागीदार’। भारत के 130 करोड़ लोगों को एक सकारात्मक अध्याय मुबारक।

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