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बेबाक बोल: राजकाज – शर्मसार

निर्भया के पहले भी हिंसा के ऐसे क्रूरतम मामले हुए थे और बाद भी। 2012 में दिल्ली की सड़क पर हुई बर्बरता ने पूरे देश को साझा दुख दिया था और हम सब साथ खड़े हुए थे। उस वक्त भी सबसे मुखर मांग फांसी ही थी। आज छह साल बाद जब वैसे मामलों की बाढ़ आ गई है तो फिर चारों ओर से फांसी-फांसी की मांग सुनाई देने लगी है। क्या इस समस्या का यही हल है, और क्या कोई पुरुष किसी खास क्षण में अचानक से बलात्कारी बन बैठता है। निर्भया कांड के बाद इस मामले में बेहतर समाज बनाने के लिए हमने क्या किया? पौरुष के कुपाठ को स्त्री-पुरुष की बराबरी के पाठ में बदलने के लिए घर से बाहर तक शिक्षण और प्रशिक्षण का कोई पुल तैयार नहीं किया। निर्भया के कुछ गुनहगार जेल में हैं और हम करोड़ों गुनहगार घर से लेकर सड़क तक निष्क्रिय पड़े हैं। अपनी बच्चियों से इसी निष्क्रियता के गुनाह की माफी मांगते हुए इस बार का बेबाक बोल।

कोई व्यक्ति मिनटों में स्त्री के प्रति हिंसक नहीं होता है। हम बचपन से ही उसे स्त्रियों के प्रति गैरबराबरी का भाव रखने की जमीन मुहैया कराते हैं।

प्यारी बच्चियो,

इस बार अपने स्तंभ में तुम्हें खत लिख रहा। तुम सब पूछ सकती हो कि हम तो आपके पाठक नहीं फिर आप हमें क्यों लिख रहे। अभी तो हम परियों की कहानियां सुन रहीं, एलिस की अनोखी दुनिया में टहल रहीं, नोबिता और छोटा भीम, मोटू-पतलू, बार्बी, बंदर-भालू के खिलौनों से खेल रहीं तो हमें क्यों घसीट रहे हैं इन सब में।

इन सब में तुम्हें लाने की जरूरत आन पड़ी। आज अखबारों में और टीवी में रोज ऐसी खबरें आ रही हैं जिन्हें देख कर तुम पूछ रही हो कि इस दीदी को क्या हुआ, इनका चेहरा क्यों धुंधला कर रखा है। तुम सोच रही हो कि अचानक से मम्मी-पापा तुम्हें लेकर इतने चिंतित क्यों हो रहे हैं। तुम सोच रही हो कि अचानक से ताकीद क्यों मिलने लगी कि मोहल्ले के बड़े भैया के साथ खेलने मत जाओ, तुम्हें खेलने के मैदान में जाने से रोका जा रहा। तुम्हारी मां पहले से ज्यादा डरी हुई हैं, वे तुम्हें वह समझा रही हैं जो समझाना नहीं चाहती थीं।

बच्चियो, तुम्हारे बहाने मैं खुद से और तुम्हारे अभिभावकों से भी बात करना चाहता हूं। आज छह साल बाद निर्भया को याद किया जा रहा है और फिर से सड़कों पर आवाज गूंज रही है फांसी-फांसी की। हमारे पास रोज खबरें आ रही हैं कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक की, हर जाति की, हम धर्म की, हर वर्ग की। छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार और हत्या के मामले बढ़ रहे। और, इन सबसे डर कर सड़कों पर वही छह साल पहले वाली मांग।

निर्भया मामले के छह सालों के बारे में आज हम सोच रहे हैं तो दिमाग सवाल कर रहा है कि क्या निर्भया के लिए जो समूह निकला था उसमें सामूहिकता की भावना थी? या हम सब निर्भया को लेकर सिर्फ अपने-अपने लिए डरे थे। अपने घर की शुचिता और अपनी इज्जत के लिए। स्कूल-कॉलेज जाती अपनी बच्चियों, दफ्तर जाती पत्नी और बहनों के लिए। हम अपने-अपने डर के साथ सड़क पर थे। एक मध्यमवर्गीय मानसिकता के साथ कि अगला नंबर हमारे घर का आने वाला है तभी जगेंगे। उससे पहले और बाद में शिक्षण-प्रशिक्षण का कोई पुल नहीं बनाया गया, और जब फिर दूसरा हादसा हुआ तो फांसी-फांसी की मांग के साथ सड़कों पर आ गए।

बच्चियों तुम सब पूछ सकती हो कि निर्भया के मामले में पूरे देश के एक साथ आवाज देने के बाद, गुस्से का ज्वार आने के बाद भाटा क्यों आया। आत्मसुधार करना तो छोड़ो हमारा समाज इसकी गुंजाइश भी करता क्यों नहीं दिखा। बलात्कार की वजह वही जींस, छोटे कपड़े, रात को बाहर जाना क्यों बताया जाता रहा। मामला दर्ज करवाने के लिए पीड़िता को आत्मदाह की कोशिश करनी पड़ी और हिरासत में पीड़िता के पिता की मौत हुई। मांएं पूछ रही हैं कि पांच से दस साल तक की लड़कियों को कपड़ों से कितना ढकें। आज भी देश के कोने-कोने से बलात्कार की हर घटना के बाद लड़कियों को ही क्यों जिम्मेदार ठहराया जा रहा।

निर्भया मामले में जनसंचार का ज्वार आया था। हम सबने उससे सीखा क्या था? क्या कोई सबक लिया था? क्या हमारी मानसिकता में किसी तरह का बदलाव आया? आज हम स्वीकारते हैं कि निर्भया के साथ आया हमारे गुस्से का ज्वार हमें जरा सा भी बेहतर नहीं बना पाया। स्त्री के साथ रिश्ते में हम किसी भी तरह की सुधारात्मक प्रक्रिया में शामिल नहीं हुए। हम बस लड़कियों को घर की इज्जत ही बनाने में जुटे रह गए। हम इस इज्जत की वही पारंपरिक परिभाषाएं गढ़ते गए। जो इज्जत बनाएंगे वही इज्जत लूटेंगे भी। दो विश्वयुद्धों से लेकर हमारे देश की त्रासदी भारत विभाजन तक देख लो। किसी भी तरह के युद्ध में स्त्री देह को सबसे ज्यादा कुचला गया है। जब किसी समाज पर दूसरा समाज हमलावर होता है तो सबसे पहला हमला कमजोर समाज की स्त्रियों की यौनिकता पर ही होता है। बदले की भावना की जद में सबसे पहले स्त्री शरीर ही आता है। बदले की भावना और स्त्री शरीर का दमन हर सभ्यता और संस्कृति का हिस्सा सा बन गया। और, आज भी हम इस हालात को बदलने के लिए तैयार नहीं हैं।

सड़कों पर बलात्कारियों को तुरंत फांसी देने की मांग हो रही है। यह आंख के बदले आंख, और हाथ के बदले हाथ वाला मध्यकालीन इंसाफ ही तो है। स्त्री देह को लेकर जो हमारा रवैया है उससे डर तो यह है कि फांसी जैसे प्रावधानों के बाद बलात्कार के सबूत मिटाने के लिए हत्याओं के मामले और बढ़ न जाएं। हमारे घर और बाहर स्त्री देह को नोचने वाले भेड़ियों के खिलाफ इंसाफ के लिए हम कंगारू अदालतों की मांग कर रहे हैं। यहां समस्या कमजोर कानून नहीं कमजोर समाज और संस्कृति है जहां बलात्कार का मामला ही जनांदोलनों के बाद दर्ज होता है। और, इतना तो तय है कि इस बर्बर समस्या का हल फांसी नहीं है। समस्या है स्त्री के साथ हमारा वर्चस्ववादी रिश्ता। वही आदिम सोच कि मर्द औरत से बड़ा है और खुद को बड़ा साबित करने के लिए वह स्त्री देह को कुचल डालता है।

बलात्कार स्त्री शरीर के प्रति क्रूरतम हिंसा है। समाज जितना हिंसक होगा स्त्री के प्रति अत्याचार उतना ही बढ़ेगा। हिंसक समाज सबसे पहले स्त्री देह का ही दमन करता है। बलात्कार के खिलाफ वही फांसी-फांसी का हल्ला मचाकर हम फिर अपने गुस्से के ज्वार को शांत कर बैठ जाएंगे। इस समस्या का हल गुस्सा नहीं विवेक से निकलना है। मानवीय होने की पहल कर स्त्री और पुरुष की बराबरी की पाठशाला शुरू कर ही हिंसा के इस कुपाठ को बंद किया जा सकता है।

आज बलात्कारियों को फांसी देने के तर्क में कई देशों की सूचियां जारी कर दी जाती हैं। लेकिन हम यह भी तो देखें कि बलात्कार के खिलाफ कठोरतम कानूनों की मांग करनेवाले इन देशों में मानवाधिकारों की क्या हालत है। उन देशों में फांसी की मांग स्त्री को बराबरी का अधिकार देने की मंशा से नहीं बल्कि उसकी यौनिकता की शुचिता की रक्षा से है। वहां स्त्रियों को और किसी मामले में बराबरी का अधिकार नहीं दिया गया है।

स्त्री के प्रति हिंसा शुरू होती है उसके प्रति गैरबराबरी के पाठ के साथ। बच्चियो, अब वक्त आ गया है कि हम पैदा होते ही गैरबराबरी के सारे संकेतों को मिटा दें। लड़कियों का कमरा गुलाबी और लड़कों का कमरा नीले रंगों से रंगवाना बंद करें। बेटियों के हाथ में बार्बी और बेटों के हाथ में क्रिकेट का बल्ला पकड़ाना बंद करें। लड़के और लड़कियों के लिए अलग स्कूल अब वक्त की जरूरत के साथ खत्म कर दिए जाएं। लड़के और लड़कियों को साथ पढ़ने दें, खेलने दें और साथ बढ़ने दें। उन्हें एक-दूसरे के लिए रहस्य नहीं बनाएं।

कोई व्यक्ति मिनटों में स्त्री के प्रति हिंसक नहीं होता है। हम बचपन से ही उसे स्त्रियों के प्रति गैरबराबरी का भाव रखने की जमीन मुहैया कराते हैं। यही गैरबराबरी का भाव वैसी भयानक हिंसा में तब्दील होता है जिसके बारे में देख-सुन कर हम फांसी-फांसी चिल्लाते हैं। लोकगाथाओं की बात करें तो हम खीरा चोर से हीरा चोर बनाते हैं। बचपन में खीरा चुराने को गलत बताएंगे तो आगे जाकर वे हीरा चुराने को भी गलत मानेंगे। बच्चियो, इस खत का मकसद तुम्हारे लिए बराबरी की जमीन बनाने की कोशिश का वादा करना है। देखो, कितने कामयाब होते हैं। लेकिन हमारे बचने के लिए, तुम्हारे बचने के लिए यह कोशिश बहुत जरूरी है और अब तो इसे कल पर नहीं टाला जा सकता है। शुरू करते हैं आज से, अभी से।

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