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बेबाक बोलः बिसरि गयो हरि नाम

धर्म और उसका संदेश समाज के पक्ष में सकारात्मक तरीके से लिया जाए तो उसके अनुयायी बड़ी ताकत को झुका सकते हैं। विश्नोई समुदाय को गुरु जंभेश्वर ने वृक्षों और वन्य जीवों के लिए दया रखने का संदेश दिया था, और इस समाज के जज्बे की बदौलत काला हिरण मामले में सलमान खान को पांच साल की सजा हुई। लेकिन जब धर्म को धता बता धर्मदूत सत्ता का मेवा खाते हैं तो नर्मदा नदी की सफाई में घोटाले का पर्दाफाश करने जा रहे बाबा की ‘मेमोरी’ पर लाभ के पद का ‘वायरस’ ऐसा फैलता है कि वे सत्ता विरोधी सुर को ‘स्पैम’ में डाल देते हैं। पिछले काफी समय से संतों के कुछ समुदाय मन का आपा खो कर ऐसी कठोर वाणी बोलने में जुटे हैं कि मंदिर नहीं बनने पर भारत को सीरिया जैसे जलने की बात भी कह डालता है। भारतीय राजनीति की प्रयोगशाला में धर्म और धर्मदूतों के तुष्टीकरण और सांप्रदायिकता की राजनीति के बढ़ते प्रयोग पर इस बार का बेबाक बोल।

‘संतन को कहा सीकरी सो काम,
आवत जात पनहियां टूटी,
बिसरि गयो हरि नाम,
जिनको मुख देखे दु:ख उपजत,
तिनको करिबे परी सलाम!’
(संतों को राजदरबार-राजधानी से क्या काम है, कुछ नहीं, राजधानी आते-जाते पांव के जूते टूट जाएंगे और भगवान का नाम भूल जाएंगे, जीवन के मूल उद्देश्य-ईश्वर की भक्ति से विमुख हो जाएंगे और जिनका मुंह देखने से दु:ख उपजता है, उन्हें प्रणाम करना पड़ेगा)। पंक्तियां हैं संत कवि कुंभनदास की। एक अभावग्रस्त फकीर कवि। मुगल बादशाह अकबर ने उन्हें राजधानी फतेहपुर-सीकरी आने का आमंत्रण भेजा। उस शक्तिशाली शासक को एक संत का यह जवाब था कि उसे राजदरबार और राजधानी से क्या काम। जिसका मुख्य काम प्रभु भजन है वो उस राह पर कैसे चल सकता है जिससे प्रभु को ही भूलने का खतरा पैदा हो जाएगा।

आम आदमी पार्टी और उसके 20 विधायकों को लाभ के पद पर जो हानि का संकट उठाना पड़ा, उसके मूल में नैतिकता ही थी। सांवैधानिक रूप से गलत होता तो आज दिल्ली में उपचुनाव हो गए होते। जब आम आदमी पार्टी पर नैतिकता का हल्ला बोल पूरा हो गया तभी मध्य प्रदेश से खबर आती है कि शिवराज सिंह चौहान सरकार ने पांच संतों को राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया है। ताजा-ताजा भाजपा के हुए एक नेता ने इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि संतों को यह दर्जा तोहफे के तौर पर दिया गया है क्योंकि इन संतों ने नर्मदा किनारे स्वच्छता अभियान में जनजागरूकता फैलाने के लिए अहम योगदान दिया था।

कुंभनदास की ‘सीकरी’ को खारिज करने की परंपरा का अंत यहां संतों के तोहफे कबूलने के रूप में देखते हैं। इसके पहले योग के नए तौर-तरीके सिखा कर सत्ता के गलियारों में चमकता चेहरा बने एक गुरु मांग कर चुके हैं कि पुराने समय में राजपुरोहित रखने की परंपरा इस लोकतांत्रिक ढांचे में भी बहाल की जाए। धर्मसत्ता बनाम राजसत्ता की बात करें तो संतों का सीकरी से गहरा नाता रहा है। लेकिन भारतीय परंपरा में संतों का काम सत्ता को राह दिखाना, आंखें खोलने वाला रहा था। वे नैतिकता के बल पर ही सत्ता से श्रेष्ठ होकर बात करते थे। समाज की व्यवस्था में संत एक आशीर्वाद की तरह थे, जो हर गलत के खिलाफ होते थे। दंतकथाओं से लेकर साहित्यिक और ऐतिहासिक दस्तावेजों को देखें तो इसी संत समाज ने सत्ता से लेकर धर्म को खरी-खरी सुनाई है। संतों का गमन तो अभिजन से लेकर सामान्य जन तक था। अभिजन के गलियारों में संत जन के दूत बनकर जाते थे।

भारतीय राजनीति और समाज में महात्मा गांधी को संत का दर्जा दिया गया। इसके अपने खास राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मायने थे। गांधी पहले एक समाजसुधारक और फिर राजनेता हुए। लेकिन भारत को आजादी मिलने के बाद उन्होंने खास तरह की राजनीतिक पहचान से मुक्त हो जाना चाहा। खुद को संत कहे जाने का विरोध करते हुए भी कुंभनदास वाली संत परंपरा का निर्वाह करना चाहते थे। वे सिर्फ वे कांग्रेस का राजनीतिक चेहरा नहीं बनना चाहते थे और सत्ताधारी दल की अगुआई नहीं करना चाहते थे। उन्होंने अपनी छवि पूरे देश के अभिभावक की तरह बनाई जो सबके भले का आशीर्वाद दे रहा था। गांधी ने भारतीय राजनीति में धर्म का उपयोग किया सबको साथ लाने के लिए। वर्ग, जाति, मजहब की चौड़ी खाई वाले भारत में यही वो धागा था जिससे वे अहिंसक तरीके से सबको जोड़ सकते थे।

सत्ता और धर्म के संबंध में राम मंदिर आंदोलन भी अहम रहा। इसमें भावनात्मक रूप से संतों ने ही अगुआई की थी। लेकिन उस प्रक्रिया में भी संतों की भूमिका अभिभावक के तौर पर ही थी। उस समय संत सीधा-सीधा राजसत्ता का चेहरा नहीं बने थे। लेकिन यही वह अहम मोड़ था, जहां से भारतीय राजनीति ने धर्म का अपने पक्ष में इस्तेमाल करना सीख लिया था। इसके बाद से सीकरी और संत एक मंच पर कदमताल करने लगे। मध्य प्रदेश ही वह राज्य है जहां एक मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह पूरी तरह से संतों का आयोजन बना दिया गया था, जिसका जनभावना से कोई सरोकार नहीं दिखा था। संतों की मौजूदगी में मंत्रोच्चार के बीच साध्वी के रूप में मुख्यमंत्री के शपथ लेने के उस दृश्य के बाद भारतीय राजनीति में यह सफल समीकरण बन गया। गुरु-गुरु, प्रभु-प्रभु भजने के बजाए संत अपने वोट बैंक गिनने लगे। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री का चेहरा चुनने में देरी का कारण भी तो आदित्यनाथ योगी का सत्ता के पास अपने अनुगामियों का ‘अंकस्त्र’ भेजना था। डेरे से लेकर मठ तक संतों की गद्दियों से खास पार्टी के लोगों को वोट देने के लिए आशीर्वाद दिए जाने लगे।

अध्यात्म और संत की प्रयोगशाला बने मध्य प्रदेश में जब नर्मदा नदी की रक्षा के नाम पर संतों का जमावड़ा बढ़ने लगा तो पूर्व कांग्रेसी दिग्विजय सिंह ने भी अपना धर्मनिरपेक्ष चोला फेंक कर धर्म की पताका उठाने में देर नहीं लगाई। नर्मदा का संबंध पर्यावरण और जीवन व्यवस्था से है। लेकिन इस सामाजिक और सांस्कृतिक सवाल को महज धार्मिक सवाल बना कर नर्मदा को हुए फायदे और नुकसान के सारे सवाल बंद कर दिए जाते हैं। खुद को कंप्यूटर की याददाश्त से महान बनाने वाले बाबा की ‘मेमोरी’ राज्यमंत्री का दर्जा मिलते ही सुविधाओं के वायरस का शिकार हो गई और उनकी याददाश्त ने घोटाला शब्द को ही ‘स्पैम’ में डाल दिया।

इसके पहले भी हमने देखा था कि पूरे विश्व को जीवन जीने की कला सिखाने वाले गुरु के लिए यमुना की रक्षा से ज्यादा अहम अपनी भव्यता का प्रदर्शन करना था। सत्ता के साथ जुड़ते ही धर्म और संत का सांप्रदायिक रूप भी सामने आ जाता है। राष्टÑीय हरित पंचाट में उनकी तरफ की दलीलें सुनने योग्य हैं जो उनकी संस्था खुद पर लगे जुर्माने के खिलाफ देती है। और, आपका संत भाव ऐसा कि आप मंदिर नहीं बनने पर भारत को सीरिया बना दिए जाने की बात तक कह जाते हैं। पिछले कुछ सालों से हम भगवाधारी संत बने सांसदों की मन का आपा खोय वाली कड़वी वाणी सुनने के आदी हो ही गए हैं। जो खुद और समाज को शीतल करने के बजाए सिर्फ आग और जलाने की बात करते हैं।

गायत्री समाज के अगुआ प्रणव पांड्या ने जब राज्यसभा की मनोनीत सदस्यता के प्रस्ताव को ‘संतन को कहा सीकरी सो काम’ वाले भाव से ठुकराया था तो बहुत लोग चौंके थे। अब ऐसे उदाहरण नहीं दिखते कि संत सत्ता का विनम्र भाव से स्वागत तो करे लेकिन अपना काम समाज तक ही रखना चाहे। आज हर दल सांस्कृतिक जीवन को धार्मिक रूप देकर उसका दुरुपयोग करने में लगा है। प्रभु के जरिए जन की सेवा को छोड़ जैसे ही आप सत्ता का मेवा लेते हैं उसी समय आप सत्ता के भ्रष्ट चरित्र के भागीदार भी बन जाते हैं। संतों को पद मिला नहीं कि कथित घोटालों के खिलाफ यात्रा रद्द कर दी गई। नर्मदा से ज्यादा अहम सत्ता के सरोकार हो गए। जो संत परंपरा समाज में सृजन, शिक्षा से लेकर सेवा का माध्यम थी, आज वह सत्ता के पक्ष में जन को आंखें मूंदने के लिए प्रेरित कर रही है।

संतों का राज्यमंत्री का पद हासिल करना कुंभनदास से लेकर गांधी तक की परंपरा का खत्म हो जाना है। आधुनिक युग के साहित्य में हम इसकी तुलना फणीश्वरनाथ रेणु के ‘मैला आंचल’ में वामनदास की मौत से कर सकते हैं। ‘मैला आंचल’ में वामनदास का मरना प्रतीक है पूरी संतवादी और गांधीवादी राजनीति के मरने का। तब से अब तक संत परंपरा बहुत ही धूमिल हुई है और साफ-साफ दिख रहा कि सत्ता के गलियारों में अभी इसका और दुरुपयोग होना है। सत्ता से आशीर्वाद लिए ये संत देश और समाज को आशीर्वाद देने के लिए हाथ कैसे उठाएंगे।

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