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राजकाजः बेबाक बोल – आदम सोच

दो साध्वियों और एक बच्ची की अथक जंग के बाद राम-रहीम और आसाराम बलात्कार के जुर्म में सलाखों के पीछे होते हैं। सत्ता और समाज से लंबी जंग लड़ रही भंवरी देवी ने कामकाजी महिलाओं को विशाखा जैसा कानून दिया। जब इन वीरांगनाओं को देश की महिलाओं का उदाहरण बनाने का वक्त था तो भाजपा नेता व अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा बोल पड़ते हैं कि न तो सरोज खान गलत हैं और न रेणुका चौधरी, राजनीति और सिनेमा में दैहिक शोषण आम बात है। सिन्हा कहते हैं, ‘यह तो मानव जीवन की शुरुआत से होता रहा है इसमें इतना दुखी होने की क्या बात है’। जनप्रतिनिधियों के ये बोल उन करोड़ों महिलाओं के संघर्ष को धूमिल करते हैं जो घर की चारदीवारी से निकल अपनी पहचान बना रही हैं। ऐसे गैरजिम्मेदाराना बयान कार्यस्थलों में यौन उत्पीड़न जैसे अपराधों को वैधानिक जामा पहनाने की कोशिश करते हैं। समाज और सत्ता के शीर्ष चेहरों द्वारा अपराध का सामान्यीकरण करना इस तरह के अपराधों के साथ हो जाना है। कार्यस्थलों और सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं की गरिमा खंडित करती इस मानसिकता के खिलाफ बेबाक बोल।

बलात्कार जैसी बर्बर हिंसा पर बोलने से लेकर बड़े फैसले लेने तक में जल्दबाजी कर हम नई समस्या पैदा कर देंगे।

कठुआ से लेकर उन्नाव तक हम स्तब्ध हैं। बलात्कार की एक खबर छपने के बाद, छापाखाना रुकने से पहले तीन वीभत्स और खबरें आ रही हैं। सत्ता से लेकर समाज तक अपने-अपने तरीकों से इससे जूझने में जुटा है। तभी हिंदी फिल्मों की नृत्य निर्देशक सरोज खान कह देती हैं कि यह तो बाबा आदम के जमाने से होता रहा है। हैरतअंगेज तरीके से अपनी बात रखते हुए उन्होंने बलात्कार को महिलाओं के रोजगार के साथ जोड़ दिया। उन्होंने कहा, ‘बॉलीवुड रेप के बदले रोटी तो देता है’। उनके सुर में सुर मिलाते हुए कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी ने कह दिया कि ऐसा संसद में भी होता है, राजनीति में भी होता है, सब जगह होता है।

जब हम स्त्री पर हिंसा का हल निकालने में जुटे हैं तो ऐसे बयान हर उस स्त्री के खिलाफ हो जाते हैं जो घर की चारदीवारी से निकल अपनी पहचान बना रही है। ये बयान स्त्री के पूरे सामाजिक दायरे को बाजारू ठहराने की एक बेजा कोशिश दिखने लगती है। लोकलुभावन तरीके से जब बलात्कार का इस तरह से सामान्यीकरण करने की कोशिश हो रही थी तभी कभी धर्मगुरु की पदवी रखने वाले आसाराम को उम्रकैद की सजा सुनाई जाती है एक बच्ची से बलात्कार के आरोप में। और यह फैसला ही जवाब है उन गैरजिम्मेदाराना बयानों का जो ‘मी टू’ जैसी सशक्त मुहिम को भी भेड़चाल का हिस्सा बना देता है।

एक पिता धर्म और धर्मदूत पर आस्था रख अपनी बच्ची को उसके हवाले करता है। लेकिन उसे पता चलता है कि धर्मगुरु ने ही उसकी बच्ची के साथ बलात्कार किया। यह बच्ची के साथ बलात्कार तो था ही, साथ ही पिता की आस्था की हत्या का भी मामला था। यह उस धर्म की छवि की भी हत्या का मामला था जिसने भारत के समाज में कई सकारात्मक भूमिकाएं निभाई हैं। पिता ने अपनी आस्था की हत्या और बेटी के साथ अन्याय की लड़ाई लड़ी।

लड़की के पिता की यह लड़ाई कोई आम लड़ाई नहीं थी। यह अदालत से ज्यादा बाहर लड़ी गई। लड़की के परिवार का पूरी तरह सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया था और वे अपने जज्बे और उम्मीदों की चारदीवारी में कैद हो गए थे। लेकिन पिता को यह साबित करना था कि महज कुछ खास तरह की सुविधाओं के लिए उसने अपनी बेटी धर्मगुरु को नहीं सौंपी थी। उसने धर्म पर विश्वास किया। लेकिन धर्म के ठेकेदार ने उसके विश्वास को मार डाला। जितना भरोसा उसने गुरु पर किया था, उससे ज्यादा भरोसे के साथ गुरु नामक संस्था की हत्या के खिलाफ लड़ा।

इस नाजुक वक्त पर गैरजिम्मेदाराना बयान देने वाले लोग इस बच्ची और उसके परिवार के संघर्ष को देखें। भंवरी देवी का अभी तक चल रहा संघर्ष याद करें जिनकी वजह से कार्यस्थलों पर महिला की सुरक्षा के लिए विशाखा कानून बना। यह आम स्त्री की खास जंग है जो समाज की दशा और दिशा दोनों बदल देती है। एक सामान्य महिला की वैसी असामान्य लड़ाई जो घर से निकली हर स्त्री को सुरक्षा का कवच मुहैया कराती है। यहां एक छोटी बच्ची अपने बाप के साथ जंग लड़ी कि हमारी आस्था का, हमारे शरीर का बलात्कार न करो।

इससे पहले राम-रहीम के मामले में भी दो साध्वियों ने लंबी जंग लड़ी और हमने देखा कि महिलाएं सिर्फ शोषण के आगे समर्पण का ही नाम नहीं हैं अन्याय के खिलाफ संघर्ष की पहचान हैं। दोनों साध्वियों ने राम-रहीम के खिलाफ इंसाफ पाने के लिए जितनी लंबी लड़ाई लड़ी, सत्ता और समाज के आगे नहीं झुकीं वह एक मिसाल है। खुद को मिटा देने की हद तक जाने वाली इस जंग के बरक्स मजबूत तबके की कुछ महिलाएं आती हैं और मैं भी, मैं भी, सब कुछ चलता है जैसे बयान देकर सारी जंग को ही खारिज कर देती हैं। वहीं राजनेता व अभिनेता कह बैठते हैं, ‘यह तो मानव जीवन की शुरुआत से हो रहा है। इसमें इतना दुखी होने की क्या बात है’।

सरोज खान, रेणुका चौधरी और शत्रुघ्न सिन्हा इस हालत में हैं कि अगर उनके पास ऐसे उदाहरण हैं तो उसे समाज के सामने लाएं और समस्या को सुलझाने में मदद करें। हॉलीवुड से उठी ‘मी टू’ मुहिम ने पूरी दुनिया की महिलाओं को एक नैतिक बल दिया। बहुत सी महिलाओं ने बड़ी बहादुरी से उन चेहरों से मुखौटा हटाया जो स्त्री को सिर्फ देह तक रोक रहे थे। वे खास नाम और पहचान के साथ सामने आ रही हैं और समस्या को सुलझाने की मांग कर रही हैं। लेकिन भारत में आपके बयान कार्यक्षेत्र में दैहिक शोषण को न्यायोचित ठहराने लग जाते हैं। पीड़िताओं को नैतिक बल देने के बजाय आप दूसरा रास्ता चुन लेते हैं सामान्यीकरण का। हम खराब, तुम खराब, सब खराब वाला सामान्यीकरण वाला गान। इन बयानों से यही आभास जाता है जैसे कास्टिंग काउच एतराज से परे हो चुका है, पेशे का अहम हिस्सा है और इसके न्यायोचित होने का आभास पैदा होने लगता है।

कार्यस्थलों पर लैंगिक भेदभाव एक मामला है और बलात्कार दूसरा। हमारे समाज में भेदभाव की कई परतें हैं जिसमें लैंगिक भी है। इसके खिलाफ लंबी जंग छिड़ी हुई है। लेकिन हर मामले को दैहिक समर्पण या बलात्कार जैसी बर्बर हिंसा से जोड़ देना भी एक अति है। बलात्कार जैसे गंभीर मुद्दे पर ‘बाबा आदम, हमेशा से होता आया है’ जैसी संवाद अदायगी बस मामले में लोकप्रियता पाने की कोशिश भर ही है। लोकप्रिय संवाद बोलने की होड़ में बलात्कार जैसा शब्द महिमामंडित हो रहा है। आज कठुआ राष्टÑ से निकल कर अंतरराष्टÑीय मुद्दा बन गया। संयुक्त राष्ट्रसंघ भारत में लगे बलात्कार के आरोपों पर बयान दे रहा है। ऐसे भयावह समय में एक महिला और नेता होने के नाते आपसे ऐसे अगंभीर कथनों की उम्मीद नहीं थी। ऐसे गैरजिम्मेदाराना बयानों के बाद लोकमंचों पर बहस की दिशा बदल जाती है। लोकलुभावन सुर में जाकर आप समस्या को बढ़ा देते हैं।

हम एक बार फिर से बात करें इस समस्या पर। कठुआ, उन्नाव और आसाराम। आखिर हम बलात्कार को किस तरह देखें? समस्या की पहचान किस तरह करें और उसका हल कैसे खोजें। बलात्कार की हिंसा ही वर्चस्व पर टिकी है। यह सिर्फ दैहिक सुख के लिए नहीं यौनिकता में वर्चस्व के लिए है। वर्चस्व का विचार भी तो एक तरह की कुंठा है चाहे वह व्यक्तिगत हो या सामूहिक। हम इसके निजी उदाहरण भी देते हैं कि शिक्षा और संसाधनों से दूर गांव-कस्बे का व्यक्ति अपने परिवार से दूर शहर में रहता है तो अपनी यौन तृप्ति के लिए ऐसा करता है। या वर्चस्ववादी रिश्तों में जहां ऊपर का मजबूत किसी नीचे के कमजोर को कुछ देने की हैसियत रखता है। भारत विभाजन से लेकर दंगों तक में हम देखते हैं कि वर्चस्व स्थापित करने के लिए स्त्री देह के साथ हिंसा होती है। सामुदायिक कुंठा में उन्हीं बहू-बेटियों की ‘इज्जत’ लूटी जाती है जिन्हें इज्जत का पर्याय बनाया जाता है। लेकिन यह सब जगह चलता है कह कर इसे एक तरह से वैधानिकता का जामा पहनाने की कोशिश न करें। संसद से फिल्म तक चलता है कह कर महिलाओं के पूरे सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र को ही खारिज न करें।

बलात्कार जैसी बर्बर हिंसा पर बोलने से लेकर बड़े फैसले लेने तक में जल्दबाजी कर हम नई समस्या पैदा कर देंगे। सब जगह यह होता है या बलात्कारियों को फांसी दे देना इसका हल नहीं है। जरूरत है मानवीकरण की, चेतना में बदलाव की। कुंठाओं से मुक्ति की तरफ नहीं ले जाएंगे तो फिर फांसी की सजा जैसे भावनात्मक फैसले लिए जाएंगे या हर कोई बलात्कारी है जैसे नारे लगेंगे। बलात्कार एक भयावह शब्द है। लोकलुभावन नारों में न तो इसकी बर्बरता को हल्का करें और न महिलाओं के संघर्ष को खारिज।

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