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राजकाजः बेबाक बोल – बनते देखा है..

इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके-जुर्म हैं/आदमी या तो जमानत पर रिहा है या फरार...। जब बात अतिक्रमण की आती है तो ऊपर से नीचे तक के जिम्मेदारों का हाल दुष्यंत कुमार की इन पंक्तियों जैसा ही है। कसौली में नगर नियोजन अधिकारी शैल बाला शर्मा की हत्या के बाबत अदालत ने पूछा कि जब उन्हें गोली मारी जा रही थी तो पुलिस क्या कर रही थी। इस भयावह मामले में अदालत ने स्वत: संज्ञान लिया और हिमाचल सरकार को जमकर फटकार लगाई। यहां, हालात जब बेकाबू हुए तो अदालत ने स्वत: संज्ञान लिया। लेकिन यह सिर्फ हिमाचल की समस्या नहीं है। आज हिंदुस्तान के ज्यादातर इलाके अतिक्रमण की मार से बेहाल हैं। लेकिन उन अधिकारियों और जिम्मेदारों पर स्वत: संज्ञान कब लिया जाएगा जिन्होंने कानून के उल्लंघन की बुनियाद डलते देखी और उसके गगनचुंबी होने तक चुप रहे। अतिक्रमण सबसे बड़ा उदाहरण है संगठित अपराध का। नीचे से लेकर ऊपर तक चल रही अपराध की इस कड़ी को कौन तोड़ेगा, कौन इस पर संज्ञान लेगा यही सवाल पूछता बेबाक बोल।

हिमाचल प्रदेश में कसौली का नारायणी गेस्ट हाउस। सहायक नगर नियोजन अधिकारी शैल बाला शर्मा अतिक्रमण रोधी दस्ते के साथ वहां पहुंचती हैं। खासी संख्या में पुलिस बल है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत किया जा रहा सामान्य सरकारी काम। लेकिन यह सामान्य काम इस भ्रष्टतंत्र में कितना असामान्य बना दिया गया है कि होटल मालिक महिला अधिकारी पर गोली चला देता है। महिला अधिकारी की मौत हो जाती है। किसी महिला अधिकारी का अपने सरकारी काम को अंजाम देने के दौरान जान गंवाने का यह अलहदा मामला है।

इस मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट के पीठ ने कहा, ‘अगर आप लोगों की जान लेंगे तो शायद हम कोई भी आदेश पारित करना बंद कर दें।’ शीर्ष अदालत ने यह भी पूछा कि जब होटल मालिक ने महिला अधिकारी पर गोली चलाई तो वहां पर मौजूद पुलिस बल क्या कर रहा था? हिमाचल प्रदेश के पर्यटक स्थलों पर अतिक्रमण की बढ़ती संख्या को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को सोलन के कसौली और धर्मपुर के 13 होटलों को गिराने का आदेश देकर इसके लिए टीमें गठित की थीं। स्थानीय निकाय को 15 दिन का समय दिया गया था। हिमाचल के कसौली जैसी जगहों पर पर्यावरणवादी संस्था की याचिका पर राष्ट्रीय हरित पंचाट (एनजीटी) ने बहुत से होटलों पर लाखों का जुर्माना ठोका है।

सुप्रीम कोर्ट का दखल, महिला अधिकारी की हत्या और वजह अतिक्रमण। हिमाचल में अचानक से अतिक्रमण ऐसा मुद्दा कैसे बना कि पानी सिर के ऊपर से गुजर गया। क्या यह कुछ महीने या कुछ साल का मसला है? क्या इसमें सरकारी अधिकारी से लेकर पुलिस तक का एक स्याह या सफेद पक्ष है? न्यायाधीशों ने हिमाचल प्रदेश की अगुआई कर रहे वकील से पूछा, ‘वे पुलिसकर्मी क्या कर रहे थे, महिला अधिकारी को मरते हुए देख रहे थे।’

सुप्रीम कोर्ट का गुस्सा समझ में आता है। लेकिन सवाल यह है कि मुंबई से लेकर दिल्ली, केदारनाथ से लेकर कसौली और गाजियाबाद से लेकर फरीदाबाद तक यह अतिक्रमण क्यों होता है। जिसे बुनियादी स्तर पर ही रोक देना था, उसके लिए सुप्रीम दखल की जरूरत क्यों होती है, हत्या जैसी नौबत क्यों आन पड़ती है।

सुप्रीम कोर्ट का सवाल है कि पुलिसवालों ने महिला अधिकारी को मरते कैसे देखा? कुछ किया क्यों नहीं? पुलिसवालों ने महिला अधिकारी को मरते इसलिए देखा क्योंकि उन्होंने अवैध इमारतों को बनते देखा है। होटल, गेस्ट हाउस, रेस्तरां जैसी कोई भी इमारत रातों-रात खड़ी नहीं हो जाती है। महीनों इसका काम चलता है। स्थानीय पुलिस, नगर नियोजन अधिकारी की नजर पड़ती है और आंखें फेर ली जाती हैं। इस आंख फेरने के जितने कारण हैं उन सबका समुच्चय एक भ्रष्टतंत्र की गाथा कहता है। हम हिमाचल वाली घटना को भी एक होटल मालिक के अपराध के तौर पर देखना चाहें तो हमारी मर्जी। लेकिन शैल बाला शर्मा की शहादत के बाद जरूरत इस बात की है कि अतिक्रमण जैसे संगठित भ्रष्टाचार पर बात कर ली जाए।

अतिक्रमण के भ्रष्टाचार पर बात करने के पहले हम उन भयावह घटनाक्रमों की भी बात करें जिन पर रो-धो कर हम भूल गए। मुंबई में मूसलाधार बारिश होती है, लेकिन यह बारिश बाढ़ में बदल जाती है। इस बाढ़ की बड़ी वजह है नालों तक पर अतिक्रमण। संकरी गलियों में छत की जुगाड़ में, दुकान लगाने की आड़ में लोगों ने नालों तक पर पक्का ढांचा तैयार कर लिया, जिससे उनकी सफाई नहीं हो पाई। नाले जाम होंगे तो बारिश का पानी कहां जाएगा। देश की औद्योगिक राजधानी बाढ़ के पानी की बंधक हो गर्इं, लोगों की जानें गर्इं, इस आपदा पर फिल्म भी बनी और हम सब भूल गए। उत्तराखंड की कुदरती आपदा में अतिक्रमण जैसी मानवीय करतूतों का कितना हाथ था हम इसे भी याद नहीं रख पाए। दिल्ली की तंग गलियों में जब आग लगती है तो दमकल कर्मचारियों की भी जान पर बन आती है। अतिक्रमण की वजह से न तो दमकल और न एंबुलेंस समय पर पहुंच पाती हैं।

कसौली से लेकर दिल्ली तक आम जनता से लेकर ठेकेदार, बिल्डर और स्थानीय नगर नियोजन अधिकारियों की मिलीभगत से ही अतिक्रमण का रास्ता साफ होता है। अतिक्रमण की जमीन पर खाद-पानी देते हैं राजनीतिक दल। इन दिनों दिल्ली में अतिक्रमण को लेकर हमने सभी दलों से मुखौटा उतरते देखा और सारा भार सुप्रीम कोर्ट पर दे दिया गया। जिस कांग्रेस और भाजपा ने दिल्ली पर शासन किया वह नई-नवेली आम आदमी पार्टी पर सीलिंग के लिए सवाल उठा रही थी। आम आदमी पार्टी भी कोई सख्त कदम उठाने से परहेज कर रही थी और तू-तू-मैं मैं के बाद गेंद अदालत के परिसर में गोल कर दी गई।

दिल्ली, मुंबई, कोलकाता की गलियां अतिक्रमण से तंग हैं। नोएडा, गुरुग्राम जैसे अपेक्षाकृत नए बसे शहर भी इसमें पीछे नहीं छूटना चाहते हैं। आज उत्तराखंड से लेकर पूरे हिमाचल प्रदेश के पर्यटक स्थल सीमेंट और पत्थर के जंगल बन गए हैं। शिमला, मनाली, धर्मशाला, कसौली, हरिद्वार, ऋषिकेश में सरकारी नियमों को ताक पर रख अवैध निर्माण किए जा रहे हैं। मैदानी लोगों की सैरगाह बनाने के लिए पहाड़ी इलाकों को धड़ल्ले से काटा जा रहा है। हिमाचल से लेकर उत्तराखंड और दिल्ली तक की सरकार इस अहम मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है।

एक अधिकारी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अतिक्रमण हटाने के लिए पुलिस बल लेकर जाना पड़ता है। लेकिन अतिक्रमण हटाओ दस्ते पर हमला हो जाता है। आखिर अतिक्रमणकारियों को इस दस्ते पर हमले की हिम्मत कैसे आती है। यह हिम्मत इसलिए आती है क्योंकि सुप्रीम आदेश के पहले वह अधिकारी उस अतिक्रमण को चुपचाप बनते देखता है, किसी लालच में या किसी डर में। इसके पहले पुलिस द्वारा अतिक्रमणकारियों से हफ्ता वसूली की ही शिकायत आती है। सिर से पानी गुजरने के बाद मामला अदालत में जाता है। अब वही लोग अतिक्रमण हटाने के लिए आते हैं जो पहले उसे बनवाने में सहयोग दिलाते हैं। सारे राजनीतिक दल इसे वैधानिक जामा पहना ही चुके होते हैं।

जब अतिक्रमण को बनते देख चुप्पी बरती जाती है, रिश्वत ली जाती है तो बाद में अतिक्रमणकारी की सामंती चेतना जाग उठती है। इनकी हिम्मत कैसे हो रही है हमारी इमारत को ढहाने की। कल तक जो पुलिस और अधिकारी मूक थे आज बोल कैसे रहे हैं। कल जो हमसे पैसे ले रहे थे वे हथौड़ा कैसे चला रहे हैं। जब निचले स्तर से व्यवस्था ढहा दी जाती है तो ऊपरी स्तर से व्यवस्था का मलबा ही गिरेगा।

अतिक्रमण आईना है संगठित अपराध का। इसमें नौकरशाह से लेकर पुलिस प्रशासन और राजनीतिक दल भी शामिल होते हैं। इनके गठजोड़ के बिना इमारतें खड़ी हो ही नहीं सकती हैं। दिल्ली से लेकर गाजियाबाद तक अतिक्रमण दस्ते पर हमले की खबरें आती हैं। अब हत्या भी हो गई। शैल बाला शर्मा पर चली गोलियों की गूंज को याद रखिए। अतिक्रमण दस्ते पर हमले इसलिए होते हैं क्योंकि सबने अतिक्रमण को बनते देखा है। अदालत ने शैल बाला की हत्या पर तो स्वत: संज्ञान लिया। लेकिन इन अवैध इमारतों को बनते देखने वालों और बनने देने वालों पर कौन सी संस्था स्वत: संज्ञान लेगी?