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बेबाक बोलः राजकाज- भूल सुधार

2014 में 2-जी पर एजी, ओजी हो रहा था। घोटालेबाजों पर अण्णा और केजरीवाल जिस तरह दहाड़े उससे निकले वोट नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली भाजपा की झोली में गिरे। अब वे कहते हैं कि मैं देश का पहरेदार तो लोकपाल की क्या जरूरत? बड़े-बड़े दावों के बावजूद रॉबर्ट वाड्रा तो जेल गए नहीं और 2-जी के सारे आरोपी बरी हो गए। यानी अभी तक के अदालती नतीजों के मुताबिक जो घोटाला साबित नहीं हो सका वह चुनावी मुद्दा बना। लेकिन 2017 में नोटबंदी जो जमीन पर नौकरियां कम कर रही थी उसे चुनावी मैदान से दूर रखा गया। 2-जी पर जज ने कहा कि मैं सात सालों से स्वीकार्य सबूतों का इंतजार करता रहा। लेकिन मामले में सभी लोग आम धारणा से चल रहे थे जो अफवाहों, गपबाजी और अटकलबाजियों से बनी थी। अब 2-जी की उलटबांसी गुजरात में ले जाएं तो जादूगरों की महिमा से जो होता है वो दिखता नहीं और जो दिखता है वो होता नहीं। नोटबंदी और जीएसटी को लेकर गुजरात में चली जादूगरी पर इस बार का बेबाक बोल।

Illustration by C R Sasikumar

नोटबंदी के बाद इस स्तंभ में हमने आपको ‘जादूगर’ कहा था। उत्तर प्रदेश से लेकर गुजरात तक आपने दिखा दिया कि जो है वह जादू ही है। इसके लिए तो सलाम बनता ही है। राजनीतिक जुमलेबाजी जो 2014 से चली आ रही कि यह भाजपा की जीत नहीं कांग्रेस की हार है और खेल पत्रकारों वाली टिप्पणी कि गुजरात में भाजपा ने मैच जीता और कांग्रेस ने दिल, यह सब तो हम टिप्पणीकारों के लिए दिल बहलाने के लिए खयाल अच्छा वाली बात ही है। अंतिम सच यह है कि आप हिमाचल से लेकर गुजरात तक जीते हैं और इसके लिए जो जीता वही शाह वाला सलाम तो बनता है।

8 नवंबर 2016 के बाद ‘जादूगर’ शीर्षक के बाद अनर्थ व्यवस्था, गड़बड़ गाथा, चौराहा, धंसा पहिया, अहम् ब्रह्मास्मि, महाजनो येन गत:, रोजी बनाम राम, स्याह-सफेद, विकल्प बिना संकल्प जैसे शीर्षकों पर भी ध्यान जा रहा है। उत्तर प्रदेश से लेकर गुजरात तक की जनता क्या यह कह रही है कि कुछ अनर्थ नहीं था और कुछ भी गड़बड़ नहीं थी। हम जिस गोबर गाथा पर आंसू बहा रहे थे वह क्या पद्मावती की तरह मलिक मोहम्मद जायसी का खयाल भर था। नोएडा के लेबर चौक के चौराहे पर खड़े मजदूर की कहानी का सूरत के कामगार से कोई तालमेल नहीं था। हमने बार-बार सवाल उठाए और आज जब हमारे सामने भी सवाल है तो हमारा भागने का कोई इरादा नहीं है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदार दास मोदी गुजरात का चुनाव जीत गए हैं और बजरिए गुजरात ही कांग्रेस ने विपक्ष की वापसी करा दी है। आप सचिन तेंदुलकर की तरह 99 पर रुके, लेकिन मैच जितवा दिया। कांग्रेस के पास 12 ज्यादा और आपके 16 कम। लेकिन इस अंकशास्त्र से आपकी जीत के बाद क्या नोटबंदी और जीएसटी का अध्याय हमें बंद कर देना चाहिए जैसा कि सत्ता पक्ष का खेमा हम राजनीतिक जुमलेबाजों को सलाह दे रहा है।

तो यहीं से हमारा जवाब शुरू होता है कि अभी तो इस अध्याय का ककहरा ही शुरू हुआ है। उत्तर प्रदेश से लेकर गुजरात तक का चुनाव अलग-अलग मुद्दों पर लड़ा गया। दोनों अलग-अलग क्षेत्र हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश से लेकर गुजरात तक में इसे मुद्दा बनने ही नहीं दिया गया। उत्तर प्रदेश का समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र बिलकुल अलग है जहां नोटबंदी के असर को चिह्नित करना मुश्किल बना दिया गया था। जब अस्पताल के बजाए श्मशान और कब्रिस्तान प्राथमिकता बना दिए गए थे और सत्ताधारी पार्टी सपा, कांग्रेस के साथ कायदे का विरोध भी नहीं कर पाई थी तो जनता किसके पास विरोध दर्ज करवाने जाती। बसपा, सपा से लेकर कांग्रेस के प्रवक्ता जिस तरह महज पत्रकार सम्मेलन कर नोटबंदी का औपचारिक विरोध कर पार्टी मुख्यालय वापसी कर जाते उसी तरह जनता अपना गुस्सा उतारने कहां जाती? जाति और धर्म के ध्रुवीकरण के हवनकुंड में रोजगार और रोटी का सवाल जौहर कर रहा था। गोरक्षा के नाम पर मिल रहे रोजगार ने इन आंकड़ों को मुख्यधारा में आने ही नहीं दिया कि लखनऊ स्थित सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों में से कितनों की छंटनी हुई। गाजियाबाद और दिल्ली-एनसीआर स्थित कारखानों में कितने दिन ताले लटके रहे। अस्पताल और रोजगार के बरक्स गाय खड़ी थी और यह जादू ही कहा जा सकता है कि गाय चुन ली गई थी।

जीएसटी के बाद सूरत में कारोबारियों के प्रदर्शन का विहंगम दृश्य सामने था। राजनीतिक पंडित उनके झंडों और नारों पर ध्यान दिए बगैर अंदाजा लगा रहे थे कि जीएसटी के खिलाफ सड़कों पर निकले ये कारोबारी मतदान के वक्त मोदी के खिलाफ जाएंगे। लेकिन आज उन नारों और झंडों पर दोबारा निगाह जाती है। वह प्रतिरोध नहीं अनुरोध की आवाज थी। मोदी जी के खिलाफ इंकलाब नहीं अपील थी। अनुरोध और अपील का अपना एक भाव होता है। मान गए तो ठीक नहीं तो आप ही ठीक।

बिहार चुनाव में गुजरात की कपड़ा मिलों से पहुंच रही थैलियों पर अबकी बार मोदी सरकार लिखा होने की बात सामने आई तो गुजरात चुनाव से पहले कारोबारियों की रसीदों पर ‘कमल का फूल, हमारी भूल’ इंटरनेट पर वायरल होने लगा। लेकिन फूल और भूल की इस नाराजगी को समझने में उस संगठन ने जरा भी देर नहीं की जिसके पास पांव उखड़ने की रपटें पहले ही पहुंच चुकी थीं। जब साठ तक सिमटने की चिंता हुई तो सेनापति सामने आए और 182 में 150 का दावा ठोका। भूल को भ्रम बताने के लिए ‘सी प्लेन’ तक से उतरना पड़ा। संघ कार्यकर्ताओं की जमीनी मेहनत का नतीजा था कि कमल के फूल को भूल बताने वालों ने कहा कि हम नाराज हैं गद्दार नहीं। अब देश के सामने गुजरात था और गुजराती अस्मिता के सामने मोदी। और, उनको वोट नहीं देने का मतलब गद्दारी है।

गुजरात में सत्ता पक्ष अपने प्रचार में एक बार भी नोटबंदी और जीएसटी को लेकर नहीं आया। अगर यह क्रांति थी और ऐतिहासिक कदम था तो सेनापति ने युद्धक्षेत्र में जाने से पहले इसका बैज लगाने से परहेज क्यों किया? गुजरात में दो चरणों में चुनाव होता है और दोनों चरणों के नतीजों में साफ अंतर दिखता है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के नतीजों में अंतर है। किसानों और कारोबारियों के वोट में अंतर है। मध्य प्रदेश से लेकर महाराष्टÑ और गुजरात तक आप किसानों को संबोधित करने से बचते रहे। उत्तर प्रदेश के चुनावों से ही सिर्फ जय जवान है किसान को गायब कर दिया गया है। किसानों का गुस्सा दिखा है और आप इन्हीं के गुस्से के कारण दहाई अंकों में सिमटे।

गुजरात चुनावों के ग्रामीण और खेती के इलाकों से मिले संदेश को आप भी साफ-साफ देख रहे हैं। कारोबारियों के रसीदी नारों के बाद उनके साथ तोलमोल कर लिया गया था। अभी भारतीय राजनीति धु्रवीकरण की जिस राह पर है, वहां हम यह कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वह सिर्फ दो और दो को चार मानने वाला कारोबारी है। वह एक हिंदू भी है, वह पाकिस्तान से नफरत करने वाला भी है, उसके साथ गुजरात की अस्मिता भी जुड़ गई जो एक और एक को ग्यारह मानने लगता है। वहीं गुजरात में संगठनात्मक रूप से बेहद कमजोर कांग्रेस नाराज कारोबारियों को यह भरोसा भी नहीं दिला सकी कि वह उनकी भूल सुधार बनने के काबिल है। चुनावों के लिए प्रधानमंत्री के गृह प्रदेश में प्रवेश के पहले जीएसटी के नियमों में इतने बदलाव किए गए कि अर्थशास्त्री भी चौंक बैठे। और, वह कांग्रेस जीएसटी के खिलाफ क्या नीति देती जिसके निर्माण में उसका ‘हाथ’ था।

हम पहले ही कह चुके हैं कि नोटबंदी और जीएसटी बैंकिंग और अर्थव्यवस्था में सुधार के बड़े एजंडे का हिस्सा है जिसकी बुनियाद कांग्रेस ने रखी थी। नोटबंदी बैंकों के एनपीए संकट को दूर करने के लिए ही लाई गई थी। कांग्रेस के पास नोटबंदी और जीएसटी की सिर्फ आलोचना थी विकल्प नहीं। जब तक वैकल्पिक नीति नहीं रहेगी तो भूल सुधार के लिए कांग्रेस पर भरोसा क्यों किया जाएगा। कांग्रेस के विकल्प नहीं देने के कारण अंत तो गुजराती अस्मिता, मंदिर-मस्जिद और पाकिस्तान से ही होना था। किसानों ने तो कांग्रेस से उम्मीद जताई लेकिन कारोबारियों के लिए उसके पास क्या विकल्प था। और, हम पिछली ही बार कह चुके थे कि विकल्प के अभाव में संकल्प होता है यानी कि अबकी बार भी मोदी सरकार। लेकिन हम आपको विनम्र याद दिलाना चाहेंगे कि गुजरात में आपको पाकिस्तान तो याद आया लेकिन जीएसटी और नोटबंदी नहीं। और 99 सीटों के साथ विकास तो नहीं जीत सकता। यह आप जीते हैं, आपका जादू जीता है।

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