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बेबाक बोलः राजकाज- दुराग्रहों का द्वंद्व

दिल्ली के शासन में आम आदमी पार्टी शानदार जीत के बाद ऐसी मजबूत विधायिका बन कर आई जहां विपक्ष नाम की चीज नहीं थी। आरोप लगे कि इसी वजह से उसमें सत्ता का अहंकार भी आया और वह नौकरशाही को ही विपक्ष की तरह देखने लगी और अपनी तरफ से समन्वय बना कर जनता को राहत पहुंचाने की कोशिश नहीं की। वहीं ‘आप’ सरकार के खिलाफ कामबंदी पर उतरे आइएएस एसोसिएशन को जिस तरह से पूरे देश से समर्थन मिल रहा है उससे यह सवाल भी उठता है कि ये नौकरशाह सिर्फ ‘आप’ के ही खिलाफ क्यों खड़े होते हैं। बिहार में एक जिलाधिकारी को पीट-पीटकर मार दिया गया था, उत्तर प्रदेश में अमिताभ ठाकुर, दुर्गा शक्ति नागपाल का मामला हो या हरियाणा में अशोक खेमका का। चंडीगढ़ में एक नौकरशाह की बेटी के साथ सरेराह छेड़खानी होती है। इन पीड़ित अफसरों के समर्थन में नौकरशाही का संगठित प्रतिरोध कभी क्यों नहीं हुआ। केजरीवाल सरकार और नौकरशाही के बीच दुराग्रहों के इस दंगल पर बेबाक बोल।

आम आदमी पार्टी केंद्र सरकार पर लगातार आरोप लगाती रही है कि उसे काम करने नहीं दिया जा रहा। लेकिन इस बार का घटनाक्रम बता रहा है कि सरकार चलाने और लोगों से काम लेने की कला यानी प्रशासनिक कला सीखने में उनकी तरफ से भी कमियां रह गई हैं।

कनाडा के प्रधानमंत्री अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ दिल्ली में नमस्ते की मुद्रा में तस्वीरें खिंचवा रहे थे। विश्वस्तरीय सुविधा का दावा करने वाली मेट्रो रुक-रुक कर चल रही थी। दिल्ली के कई इलाकों में पीने के पानी की भयानक किल्लत है। त्रिलोकपुरी के दंगे की चपेट में आने की आशंका है। उसी वक्त देश की राजधानी दिल्ली की सरकार और केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के बीच मारपीट की तस्वीर सामने आती है। मुख्य सचिव आरोप लगाते हैं कि आधी रात को उन्हें बुलाया जाता है और आम आदमी पार्टी के विधायक उनके साथ मारपीट करते हैं।

इस घटना में दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं। लेकिन एक तथ्य सामने है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री के सरकारी आवास पर आधी रात को मुख्य सचिव को बुलाया जाता है। अब वह विज्ञापनों पर खर्च पर बातचीत के लिए बुलावा हो या फिर सार्वजनिक वितरण प्रणाली को लेकर, लेकिन उन्हें आधी रात में बुलाया गया। यह भी तथ्य है कि वहां आम आदमी पार्टी के कई विधायक पहले से मौजूद थे। खाद्य विभाग के मंत्री इमरान हुसैन उस वक्त वहां क्यों नहीं थे इसका जवाब नहीं दिया गया है, इस तर्क के बावजूद कि बैठक सार्वजनिक वितरण प्रणाली को लेकर बुलाई गई थी। न तो किसी फैक्टरी में बड़ी आग लगी थी और न ही किसी अस्पताल से डेंगू या चिकनगुनिया के बड़ी संख्या में मरीजों के मरने की खबर आई (शायद इन मुद्दों पर मीडिया और अदालत की दखल के बाद ही बैठक होती है) थी।

आरोप है कि मुख्य सचिव को आधी रात में मुख्यमंत्री के घर तलब किया जाता है और कुछ ऐसा होता है कि वे दस मिनट के अंदर बाहर निकलते हैं। उनकी मेडिकल रिपोर्ट में उनके साथ मारपीट की बात कही गई है और आम आदमी पार्टी के दो विधायकों को हिरासत में लिया गया है। मुख्यमंत्री के मुख्य सलाहकार से भी पूछताछ हुई है, जिन्होंने मुख्य सचिव को बैठक में आने के लिए फोन किया था। आम आदमी पार्टी केंद्र सरकार पर लगातार आरोप लगाती रही है कि उसे काम करने नहीं दिया जा रहा। लेकिन इस बार का घटनाक्रम बता रहा है कि सरकार चलाने और लोगों से काम लेने की कला यानी प्रशासनिक कला सीखने में उनकी तरफ से भी कमियां रह गई हैं। मुख्यमंत्री आवास में जिस तरह सड़कछाप लड़ाई के आरोप लगे हैं उससे आम जनता के बीच क्या संदेश गया है?

इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ एक घटना के तौर पर अलग करके नहीं देखा जा सकता है। दिल्ली देश की राजधानी है और यह कोई स्वतंत्र राज्य नहीं है। लगभग नब्बे फीसद प्रशासनिक फैसलों की स्वीकृति केंद्र से लेनी होती है। पिछले कई दशकों से केंद्र बनाम दिल्ली सरकार की यह टकराहट चलती आई है। केंद्र और राज्य सरकार के विरोधाभासों के कारण लंबे समय तक कई बिल लटके रहे हैं, और इस टकराहट को उसी रूप में देखा जा सकता है। कभी राज्यपाल बनाम मुख्यमंत्री तो कभी नौकरशाही बनाम दिल्ली सरकार। इसके पहले भी दिल्ली के प्रशासक इससे जूझते हुए समन्वय बनाते रहे हैं।

भारत जैसे लोकतंत्र में सरकार का मतलब है विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। अभी यह विधायिका और कार्यपालिका की टकराहट है। इसमें हमें जो एक अहम चीज देखनी है, वह है विधायिका की शक्ति। आम आदमी पार्टी की विधायिका में बहुत बड़ी जीत हुई थी। इतनी बड़ी जीत से बाकियों के लिए कोई जगह ही नहीं बची। लोकतंत्र में विपक्ष का अपना महत्त्व होता है और दिल्ली की विधायिका में विपक्ष की जगह ही नहीं थी। विधायिका में विपक्ष की जगह नहीं होने से फैसलों पर बहस या विरोध नहीं हो पाता है। जो आपने तय किया वही सही है। ऐसी विपक्षहीन विधायिका में कार्यपालिका का दखल लाजिम हो जाता है जो अपने रवैए में विपक्ष सरीखा दिखने लगता है। और, विधायिका को बहस करती या किसी मुद्दे पर विरोध करती पूरी कार्यपालिका ही विपक्ष लगने लगती है।

आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की जनता से जो लोकलुभावन वादे किए थे, उन्हें पूरा करने में कोसों दूर है। बिना कार्यपालिका के समर्थन के वह जनता से जुड़े काम कर भी नहीं सकती है। अब ‘आप’ को अपनी सभा-रैलियों में जनता का पहले जैसा समर्थन मिलता भी नहीं दिखता है। जनता की उम्मीदें पूरी नहीं होने की बदहवासी भी आम आदमी पार्टी के नेताओं में दिख रही है। आलम यह है कि न्यायपालिका तक को दखल देना पड़ा और उसके बाद भी हालात काबू में नहीं आए।

आम आदमी पार्टी अपनी नाकामी का ठीकरा केंद्र और कार्यपालिका पर फोड़ना चाहती है। पर यह सच है कि उसने कार्यपालिका से तालमेल बिठाने की ईमानदार कोशिश की ही नहीं है। वह सचेत रूप से टकराव पैदा करती है और उस टकराव को जनता के सामने लाने की कोशिश करती है। कार्यपालिका को विश्वास में लेने के बजाए ‘आप’ की पूरी कोशिश उसे खलनायिका बनाने की रही है। इसका असर यह हुआ है कि पूरी कार्यपालिका ‘आप’ के खिलाफ सड़कों पर उतर आई है।

आम जनता के प्रति आम आदमी पार्टी की नीयत जितनी भी ज्यादा साफ हो लेकिन उसे यह भी सीखना होगा कि जनता को अपनी नीतियों का फायदा कैसे पहुंचाया जाए। संघर्ष और टकराव का अंतिम खमियाजा आम जनता को ही भुगतना होता है। विपक्षहीन सत्ता का वह अहंकार ‘आप’ में भी दिख रहा है जिसका वह केंद्र पर आरोप लगाती है। यह भी सही है कि केंद्र और दिल्ली की सरकार एक-दूसरे की विरोधी है। ऐसी हालत में तो उसे खुद ही टकराव के रास्ते से बचना चाहिए और उस जनता के बारे में सोचना चाहिए जिसने उसे वोट दिया था। सड़क पर आंदोलन चलाना और केंद्रशासित प्रदेश की सरकार चलाना दोनों अलग-अलग चीजें हैं।

नौकरशाही को लेकर ‘आप’ के अतिरेक और बदहवासी के साथ उन नौकरशाहों पर भी सवाल उठ रहे हैं जो अपने स्वाभिमान की लड़ाई सिर्फ आम आदमी पार्टी के नेताओं से लड़ते हैं। चंडीगढ़ की सड़क पर एक आइएएस की बेटी के साथ सरेआम छेड़खानी होती है लेकिन उस अफसर बाप के समर्थन में इस तरह का कोई संगठन खड़ा नहीं होता है। अशोक खेमका जैसे ईमानदार अफसर का तबादला किसी दिन गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रेकार्ड में जगह पा सकता है लेकिन उनके लिए कभी मोमबत्ती जुलूस नहीं निकला और न ही किन्हीं दुर्गा शक्ति नागपाल की गरिमा की रक्षा के लिए कामबंदी का एलान किया गया। बिहार में एक जिलाधिकारी की जब पीट-पीट कर हत्या कर दी गई थी तो समाज और राजनीति का हर तबका उबला था लेकिन नौकरशाहों का कोई संगठित प्रतिरोध सामने नहीं आया था। वहीं दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के साथ ही नौकरशाह जिस तरह विपक्ष की भूमिका में आ गए हैं वह भी उनके दुराग्रही होने का संकेत दे रहा है। आम आदमी पार्टी से जुड़े मामलों में दिल्ली पुलिस जितनी सक्रियता और पुख्ता तरीके से काम करती है वह अन्य मामलों में भी हो तो यह दुनिया की सबसे भरोसेमंद पुलिस होगी। फिलहाल तो ‘आप’ और नौकरशाही के बीच दुराग्रहों का यह दौर जितनी जल्दी खत्म हो उतना अच्छा है।

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