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बेबाक बोलः अभि हूं मैं

आज के समय में महाभारत के किरदारों से संवाद करते हुए जब हम अभिमन्यु से टकराते हैं तो उसकी हत्या हमें उद्वेलित करती है। अभिमन्यु के छोटे किरदार के पास इतिहास का बड़ा सबक है। सत्यवती ने उस संतति के उत्तराधिकार की मांग की जो इस दुनिया में आई ही नहीं थी। इस एक मांग से पूरा भरत वंश राष्ट्र के बजाय संतति और उत्तरदायित्व के बजाय उत्तराधिकार के युद्ध में उलझा रहा। शांतनु और सत्यवती के वर्तमान को सुखद बनाने के लिए ली गई भीष्म प्रतिज्ञा ने इतिहास को ऐसे कुरूप मोड़ पर ले जाकर खड़ा किया कि अभिमन्यु जैसा ओजस्वी युवा भरत वंश के श्रेष्ठों और कुलगुरुओं की कुनीति के चक्रव्यूह में मारा गया। समय के चक्र में आज भी अभिमन्यु की आवाज गूंज रही है कि मां के गर्भ में विद्या सीखी जा सकती है कुनीति और छल नहीं। बेबाक बोल में अभिमन्यु।

अभिमन्यु के भविष्य की भ्रूण हत्या सामंती समाज के इतिहास को परखने का पैमाना देती है।

किसी भी सभ्यता-संस्कृति के पौराणिक आख्यान उसके जीवन मूल्यों की व्याख्या करते हैं, मर्यादा और मनुष्यता को रेखांकित करते हैं। भारतीय सभ्यता-संस्कृति में महाभारत रची-बसी तो है परंतु इससे प्रेषित मूल्यों की अपनी जटिलताएं हैं। समाज के लिए साहित्य उसकी संस्कृति की सीढ़ी है, और महाभारत के किरदारों की सीढ़ी पर चढ़ते हुए जब हम अभिमन्यु से टकराते हैं तो ज्यादा देर खड़े नहीं रह पाते हैं। समझ नहीं आता कि इस सीढ़ी से ऊपर बढ़ें या नीचे उतरें। लेकिन अभिमन्यु तो कह रहा है, जरा यहीं पर ठहर कर मुझसे टकराओ, मैं इतिहास का वो बिंदु हूं जो तुम्हारे गीता के ज्ञान पर भी सवाल उठा देगा। पूछो, उस कृष्ण से कि मेरी उम्र इतनी छोटी क्यों? यह कहानी तो देवत्व की साख के लिए जरूरी है कि मैं चंद्र देव का अंश हूं और पिता ने इसलिए कम उम्र के लिए धरती पर भेजा कि मेरा वियोग ज्यादा दिन तक नहीं सह सकें। लेकिन जब मैं मनुष्य योनि में आया तो मनुष्यता को अपने हिस्से का क्या देकर गया? महाभारत की धरती पर मेरा क्या मूल्यांकन है? उत्तराधिकार की इस लड़ाई में मेरी बर्बर हत्या का जिम्मेदार कौन है?

अभिमन्यु के छोटे किरदार को जितना स्नेह मिला उसके बलिदान पर ज्यादा बहस नहीं हुई। एक यशस्वी युवा अपने चाचा और उनके महारथियों द्वारा घेर कर मार दिया जाता है। महाभारत में अभिमन्यु जैसे अभिनव किरदार की हत्या उद्वेलित करती है और उत्तराधिकार के नाम पर आज भी सामंती मानसिकता से जूझ रहे उस भारत से सवाल करती है जो अपने बेटे के सशक्तीकरण के लिए दूसरे के बेटे के अधिकारों की हत्या को जायज मानता है। सत्यवती ने उस संतति के उत्तराधिकार की मांग की जो इस दुनिया में आई ही नहीं थी। इस एक मांग से पूरा भरत वंश राष्ट्र के बजाय संतति और उत्तरदायित्व के बजाय उत्तराधिकार के युद्ध में उलझा रहा।

महाभारत की लड़ाई के मूल में है कि मेरी संतति को क्या, कितना और कैसे मिलेगा। इसलिए इतिहास में जब अभिमन्यु पर बात की जाए, तो उसके चचेरे भाई लक्ष्मण को भी रखा जाए। दुर्योधन के बेटे लक्ष्मण और अर्जुन के बेटे अभिमन्यु की मौत को एक साथ देखने की वकालत हम क्यों कर रहे हैं?

अभिमन्यु पांडवों के वंश की वो संतान है जिसे सब कुछ विशिष्ट मिला। वह कृष्ण की बहन सुभद्रा का बेटा है। सुभद्रा बलराम और कृष्ण की बहन है। बलराम चाहते थे कि उनकी बहन सुभद्रा की शादी दुर्योधन से हो जाए। लेकिन बलराम की इस इच्छा के खिलाफ कृष्ण ने अर्जुन को कहा कि वह सुभद्रा का अपहरण कर उससे विवाह रचाएं। अर्जुन के मन में सुभद्रा के प्रति प्रेम भी कृष्ण ही जगाते हैं। यहां दुर्योधन के मन में कटुता आनी स्वाभाविक है। वक्त का पहिया आगे बढ़ता है लेकिन कृष्ण का पक्षपात नहीं थमता है। अब बलराम की बेटी की शादी दुर्योधन के बेटे लक्ष्मण से करने की बात हुई तो कृष्ण ने उसमें भी बाधा पहुंचाई। इस तरह का पक्षपात रक्तपात की ओर जानेवाला शत्रुता पैदा करता है। कायदे से कृष्ण दुर्योधन के भी भाई और लक्ष्मण के भी मामा हुए। बलराम ने समझौते और शांति की जो स्थिति बनानी चाही कृष्ण उसमें दखल देते रहे और शत्रुता की स्थिति बहाल होती रही।

कुरुक्षेत्र में लक्ष्मण के मारे जाने के बाद दुर्योधन का निशाना अभिमन्यु हो गया यानी पुत्र के बदले पुत्र का प्रतिशोध। दुर्योधन के कहने पर द्रोणाचार्य ने अचानक चक्रव्यूह की रचना की जिसे भेद सकने की क्षमता सिर्फ अर्जुन में थी और जिसे युद्धभूमि से दूर ले जाया गया। अभिमन्यु को घेर कर जयद्रथ ने अंदर ले लिया और बाकी सबको बाहर रहने दिया। यह हत्या लक्ष्मण की हत्या का बदला लेने के लिए हुई जिसमें नीति-कुनीति सबका इस्तेमाल हुआ। उत्तराधिकार को लेकर हुई इस लड़ाई में दोनों ओर के उत्तराधिकारी मारे गए।

महाभारत में कृष्ण का चरित्र पात्र की भूमिका में न होकर सूत्रधार की भूमिका में है। अन्य चरित्रों का अस्तित्व इस बात पर निर्भर करता है कि कृष्ण उनके साथ खड़े हैं या खिलाफ और वे ही यह धारणा भी स्थापित करते हैं कि वे जिधर खड़े हैं धर्म भी उधर खड़ा है। जो उनके खिलाफ है उन्हें कृष्ण से भी पार पाना है। कौरवों और पांडवों के बीच जहां भी एकता की संभावना बनती दिखाई देती है कृष्ण उसे आगे नहीं बढ़ने देते हैं। वे एक तरफ तो भाईचारे की बात करते हैं वहीं दूसरी तरफ हर उस पल को पलट देते हैं जो मनभेद को कम करने की ओर जाता दिखता है।

अभिमन्यु पांडव कुल की वो संतान है जिसे हर कुछ विशिष्ट मिला है। इतना योग्य कि मां के पेट में विद्या मिली, पैदा हुआ तो कृष्ण ने प्रशिक्षित किया, कृष्ण के बेटे ने भी अपने हिस्से का ज्ञान दिया। अर्जुन और भीम ने सिखाया। दूसरी तरफ दुर्योधन का बेटा है, वो भी योग्य और कौशलपूर्ण है। लेकिन उसकी मृत्यु होती है तो वो परिधि में चला जाता है। उस पात्र को कोई तवज्जो नहीं दी जाती है जिसके साथ पहले से ही कुठाराघात हो चुका है।

एक ही परिवार के अंदर जो युद्ध की स्थिति पैदा होती है उसमें कृष्ण की भूमिका तटस्थ नहीं है। वो किसी भी तरह से इस युद्ध को खत्म करने की संभावनाओं को टटोलने नहीं देते हैं। युद्ध के सूत्रधार वो हैं और अभिमन्यु उनका सबसे प्रिय योद्धा। कृष्ण का लक्ष्य है कि अर्जुन कौरव पक्ष के उन योद्धाओं का निर्मोही होकर वध करते रहें जो और किसी के वश में नहीं है। अर्जुन को दूसरों का छल दिखा कर अपने सारे छल को न्यायोचित ठहरा देते हैं। अभिमन्यु की हत्या को वो अर्जुन के ओज को और उग्र करने के अवसर के रूप में देखते हैं। युवा अभिमन्यु ने अभी सिर्फ वीरता और नीति सीखी थी छल और कुनीति के व्यावहारिक ज्ञान की प्रयोगशाला में पारंगत होने के लिए उसे वक्त नहीं दिया गया। कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में सारे नियम तोड़े जा चुके थे। घर के बड़े कुनीति और पक्षपात के रास्ते पर चले तो लक्ष्मण और अभिमन्यु जैसे बच्चों का रक्तपात हुआ।

अभिमन्यु के भविष्य की भ्रूण हत्या सामंती समाज के इतिहास को परखने का पैमाना देती है। वो आज भी कह रहा है कि मां के पेट से विद्या सीखी जाती है छल और कुनीति नहीं। वह तो अभी बालमन में था कि विद्या और नीति की राह पर ही चलना है। अबोध मन किसी का विनाश नहीं चाहता है। जिन महारथियों, कुलगुरुओं और आचार्य का सिर्फ गुणगान सुना था अभिमन्यु के सामने या तो वे नियम तोड़ते नजर आते हैं या नियमों के खिलाफ छल से मारे जाते हुए। भरत वंश के सुनहरे अतीत का मलबा इस वर्तमान पर ऐसा गिरता है कि वह भारत के भविष्य का हिस्सा नहीं बन पाता है।

आज के समय में अभिमन्यु इतिहास का संदेश दे रहा है कि युद्ध का सूत्रधार जिधर रहेगा जीत भी उधर के मोहरों को ही मिलेगी। अगर दोनों पक्ष की तरफ से छल के बदले छल को जायज नहीं ठहाराया जाता तो नियम बचे रहते और वह सूर्यास्त होने के बाद घर जा पाता अपनी मां और गर्भवती पत्नी के पास। वह युद्ध के दोनों पक्षों का सार बता रहा है कि कुनीति और पक्षपात का परीक्षण कर उसे समय रहते समानता, समझौते और सौहार्द की भाषा में बदला जाना चाहिए ताकि सूर्यास्त के बाद हर बच्चा घर लौट सके।

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