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बेबाक बोल : नापाक इरादे

दुनिया के बाकी देशों का इतिहास रहा है कि वे कश्मीर मुद्दे को मिल-बैठ कर ही सुलझाने की बात करते रहे हैं।

पाकिस्तान में भारत के साथ व्यापार पाबंदी से दवाओं की कमी का खतरा

इमरान खान अपना कार्यकाल संभालने के एक साल के अंदर एक अगंभीर राजनेता के तौर पर साबित हो चुके हैं। भारत सरकार के कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने के बाद उन्होंने पाकिस्तान की जश्न-ए-आजादी को कश्मीर एकजुटता दिवस के नाम कर दिया और उस खास दिन पाक प्रशासित कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद की प्रांतीय संसद में भाषण दिया। अपने भाषण में उन्होंने नरेंद्र मोदी पर जिस तरह व्यक्तिगत हमले किए, भारत के धार्मिक समुदायों से लेकर मीडिया और जजों की चिंता की उससे ऐसा लगा कि उन्हें अगला आम चुनाव भारत में लड़ना है। अनुच्छेद 370 खत्म होने जैसे भारत के घरेलू मामले पर इमरान खान का इतना परेशान होना इस बात का सबूत है कि उनकी राजनीति की रोटी कश्मीर की आग से ही पकती है। कश्मीरियों की चिंता के पीछे छुपे इमरान खान के पाखंड पर बेबाक बोल।

जब हमने तिरानबे हजार फौजियों को छोड़ा तब हमने कागज पर लिखवा लिया था कि अब जितने भी हमारे-आपके मसले हैं, वे अंतरराष्ट्रीय नहीं हैं। अब वे द्विपक्षीय हैं। उनके प्रधानमंत्री ने उस पर दस्तखत किए थे। यह तो कतई हो नहीं सकता कि जिस दिन आपको तिरानबे हजार कैदी छुड़वाने हैं, उस दिन आप इसे द्विपक्षीय मान लीजिए और जिस दिन आप उस स्थिति से बाहर निकल जाइए, उस दिन उसे अंतरराष्ट्रीय करार दे दीजिए। यह कैसे हो सकता है?’
आरिफ मोहम्मद खान कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट से लेकर अमेरिका और मुसलिम देशों में ले जाने पर इमरान खान को बांग्लादेश के गठन का आईना दिखाते हैं।

बांग्लादेश की मुक्ति के लिए भारत-पाक युद्ध में जब पाकिस्तान को भारी नुकसान उठाना पड़ा था और उसके 93 हजार फौजी भारत के कब्जे में थे, तब उसने इसे आराम से द्विपक्षीय मसला माना था। आज कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म हो जाने के बाद वह भारत के घरेलू मसले का अंतरराष्ट्रीयकरण करने में जुटा है। मुसलमान अस्मिता का कार्ड तो अरब, ईरान, तुर्की जैसे मुसलिम देशों के साथ संयुक्त अरब अमीरात ने ही खारिज कर दिया। दुनिया के बाकी देशों का इतिहास रहा है कि वे कश्मीर मुद्दे को मिल-बैठ कर ही सुलझाने की बात करते रहे हैं।

जब पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की कमर टूटी हुई है, वह विदेशी कर्जे में डूबता जा रहा है, तब वहां के वजीर-ए-आजम देश की आजादी के दिन को ‘कश्मीर एकजुटता दिवस’ के नाम कर देते हैं। इस खास दिन वे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद पहुंच जाते हैं। प्रांतीय संसद का विशेष सत्र बुलाते हैं और भारत को सबक सिखाने की धमकी देते हैं। इमरान खान ने मुजफ्फराबाद में कहा, ‘नरेंद्र मोदी ने जो आखिरी कार्ड खेला है, वह मोदी और बीजेपी को बहुत भारी पड़ेगा’। इमरान खान पाकिस्तान के ऐसे वजीर-ए-आजम हैं जिनको अपने देश के ही बारे में क्रिकेट के मैदान से भी कम जानकारी है।

शायद उन्होंने कभी इतिहास के पन्नों पर नजर डालने की जहमत नहीं उठाई कि 1970 के दशक में ही पाकिस्तान सरकार ने गिलगित-बाल्टिस्तान में राज्य विषय नियम को खत्म कर वहां के शिया बहुल बसावट को बदलने की मुहिम शुरू कर दी थी। आरोप है कि इलाके में चीन को फायदा पहुंचाने की कोशिश की जाती रही है। यह पूरा इलाका पाकिस्तानी फौज के वर्चस्व और बुनियादी अधिकारों व बुनियादी संसाधनों के अभाव से जूझता रहा है। यहां मानवाधिकारों के उल्लंघन की जो खबरें आती हैं, इमरान उन पर ध्यान देंगे तो उन्हें कश्मीर के बारे में सोचने की फुर्सत ही नहीं मिलेगी।

जब श्रीमान खान प्रांतीय संसद में कश्मीर की आजादी की बात कर रहे थे उसी वक्त पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस पर बलूचिस्तान में आजादी के नारे लग रहे थे और पाक हुकूमत को याद दिलाया जा रहा था कि कैसे बलूचों की इच्छा के खिलाफ उन्हें पाकिस्तान में विलय के लिए मजबूर किया गया और उनकी सभ्यता-संस्कृति को तबाह करने की हर संभव कोशिश की जा रही है। पाकिस्तान की जश्न-ए-आजादी को कश्मीर से जोड़ने का मुंहतोड़ जवाब उसे अपने घर में ही मिल गया। ट्विटर पर ‘बलूचिस्तान सॉलिडिरिटी डे’, ‘बलूचिस्तान इज नॉट पाकिस्तान’ और ‘बलूचिस्तान एकता दिवस’ ट्रेंड कर रहा था। बलूचिस्तान की आजादी को लेकर पाकिस्तान में प्रदर्शन तो लंदन में सम्मेलन हो रहे थे। अपने देश में इन विडंबनाओं के बीच अगर इमरान खान को कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने की फिक्र है और वतन की जश्न-ए-आजादी को कश्मीर की आजादी से जोड़ देते हैं तो इसे पाखंड की पराकाष्ठा ही कहा जा सकता है।

पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना दावा किया करते थे कि पाकिस्तान उनकी जेब में है। जिन्ना की इस गलतफहमी को पाक के आज तक के हुक्मरान विरासत की तरह ढोते रहे हैं। उन्हें लगता है कि जब तक वे अपनी जेब में कश्मीर रखेंगे तब तक पाकिस्तान की जनता उनसे नहीं पूछेगी कि उनकी जेब में पैसे क्यों नहीं हैं और सरकारी खजाना खाली क्यों पड़ा है। वो यह नहीं पूछेगी कि हमारे कारखाने की चिमनियां ठंडी पड़ी हैं तो कश्मीर के लिए आग क्यों उगला जा रहा है। वह यह नहीं पूछेगी कि हमारे बच्चों के लिए कायदे के स्कूल नहीं हैं, लेकिन आतंकवाद के पोषक नेताओं के बच्चे विदेशों में क्यों पढ़ रहे हैं। लेकिन एक समय आता है जब जनता जाग जाती है और हुकूमत से सवाल करती है।

पाकिस्तान में अभी वह समय आ चुका है। वहां का मध्यवर्गीय तबका कश्मीर राग से ऊब चुका है और अपने देश के घरेलू मसलात पर बात करना चाहता है। वह चाहता है कि पहले देश में रोजी-रोटी, स्कूल और अस्पताल की बात हो। पिछले कुछ समय से मुसलमान-मुसलमान और कश्मीर-कश्मीर का जाप करते इमरान की दैहिक भाषा बता रही है कि हालात उनके काबू से बाहर जा चुके हैं। वैसे, इमरान खान ने एक बात सही ही कही कि नरेंद्र मोदी कश्मीर पर अपना तुरूप का पत्ता खेल चुके हैं। इमरान खान जैसे अपरिपक्व राजनीतिज्ञ से सही भाषा की उम्मीद तो बेमानी है और कश्मीर ताश के खेल का कोई पत्ता नहीं भारत की सभ्यता और संस्कृति का धड़कता हिस्सा है।

हां, कश्मीर में भारत सरकार के अनुच्छेद 370 खत्म करने जैसा मजबूत फैसले के बाद उम्मीद की रोशनी में यही दिखता है कि वो दिन जल्द आएगा जब पाकिस्तान के हुक्मरान कश्मीर को अपनी जेब में रखने की सोच भी नहीं पाएंगे। इमरान खान ने अपने कार्यकाल की पहली जश्न-ए-आजादी कश्मीर की एकजुटता के नाम तो रख दी, लेकिन हम यह नहीं कह सकते कि कश्मीर मसले पर मुंह की खाने और पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को रसातल में पहुंचाने के ‘जुर्म’ में वे वजीर-ए-आजम के रूप में पाकिस्तान की अगली यौम-ए-पैदाइश देख भी पाएंगे या नहीं।

मुजफ्फराबाद में जब इमरान खान भारत में मीडिया से लेकर नाजी और हिटलर की बात कर रहे थे, तो शायद अपने देश की जेलों को भूल गए थे। पाकिस्तान में जम्हूरियत के चेहरे के रूप में चमकने वाले सारे लोग विपक्ष में आते ही जेल की सलाखों के पीछे हैं। वहां पूर्व प्रधानमंत्री से लेकर पूर्व राष्टÑपति तक की क्या हालत है वह दुनिया देख रही है। वो इंसान जिसने इस अंधविश्वास में एक धर्मगुरु से शादी रचाई कि उसे राजगद्दी मिले, वह भारत में धर्मनिरपेक्षता की फिक्र कर रहा है। भारत के कांग्रेसी से लेकर समाजवादी और वामपंथी नेता से लेकर पूरा विपक्ष इमरान का भाषण सुन कर घबरा गया होगा कि हमें यूं ही पाकिस्तान भेजने का फतवा जारी नहीं कर दिया जाता है, इमरान साहब तो वो बोल रहे जो हम अपनी संसद में बोलते हैं।

किसी भी देश और समाज में एक समय संक्रमण काल का आता है। कश्मीर मसले को लेकर भारत उसी संक्रमण काल से गुजर रहा है। अभी तो भारत ने कश्मीर पर ही फैसला किया है जो नितांत उसका घरेलू मामला है। लेकिन भारत की संप्रभुता को परे रख इमरान खान जिस तरह बेतुके भाषण दे रहे हैं उससे साबित होता है कि हमारे देश में यह समय धैर्य और जिम्मेदारी की मांग करता है। देश में हर्ष से लेकर आशंकाओं का मिलाजुला भाव है और हर कोई एक बेहतर कल की उम्मीद में है। कल क्या होगा, यह कोई नहीं कह सकता। लेकिन यह समय न तो राजनीतिक टिप्पणीकारों की भविष्यवाणियों का है और न किसी भी तरह की तात्कालिक गैरजिम्मेदार प्रतिक्रिया देने का। यह समय भारत की 130 करोड़ जनता का है। कश्मीर को वर्जनाओं से आजादी मिले इसकी कामना हम सब कर रहे हैं।

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