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बेबाक बोल-राजकाज-कांग्रेस कथा: सत्ता और संत

जयप्रकाश नारायण की अगुआई में जनता के प्रतिरोध की आंधी इंदिरा गांधी महसूस कर रही थीं। उस समय चंद्रशेखर ने उन्हें जेपी की ताकत की चेतावनी देते हुए उनके साथ सुलह-समझौते का रिश्ता बनाने की सलाह दी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने चंद्रशेखर की सलाह न मान कर संत को ही साधने की ठान ली। लेकिन संत से टकराने के बाद इंदिरा गांधी की सत्ता का विनाश हुआ। इसी तरह अण्णा हजारे के आंदोलन की ताकत पहचानने की नसीहत को सोनिया गांधी ने परे रखा और कांग्रेस रसातल में चली गई। आज दिल्ली की सीमाओं पर किसान संतन की तरह धुनी रमाए हैं और चंद्रशेखर जैसी भूमिका सुप्रीम कोर्ट निभा चुका है। हम गांधी से लेकर जेपी और अण्णा तक की कथा को एक बार फिर से सुनेंगे तो पाएंगे कि आजादी के पहले से लेकर आज तक के भारत में बड़े सियासी परिवर्तन उन्हीं संत जैसे लोगों के कारण हुए जिन्हें सत्ता का मोह नहीं था। <strong>बेबाक बोल</strong> में संतन से भिड़ी सत्ता पर बात।

congress katha, bebaak bolइंदिरा गांधी के साथ राजेंद्र सिंह सोलंकी (बाएं से पहले)।

जब सत्ता संत से टकराती है तब विनाश होता है…
देश की प्रधानमंत्री को यह चेतावनी दे रहे थे युवा तुर्क चंद्रशेखर। लेकिन सत्ता का अहंकार इतिहास से कहां कुछ सीखता है। आज हमें अपनी बात आगे बढ़ाने से पहले संत शब्द के निहितार्थ में जाना होगा। संत तो निजत्व में भी है, लेकिन महज भगवा चोला डाल कर कोई संत नहीं बन जाता। भगवा चोला डाले संत के वेश में कोई व्यापारी भी हो सकता है, कोई आसाराम और रामपाल जैसा अपराधी भी हो सकता है।

हम जिस संत की बात कह रहे हैं वह तो सामूहिकता का प्रतीक है। वह सत्ता के प्रति ‘संतन को कहां सीकरी सो काम’ का भाव रखता है, लेकिन सत्ता का अहंकार जब लोक के विनाश पर उतारू हो जाता है तो वह उसे ध्वस्त करने तक उससे डट कर टकराता है।

कांग्रेस में सत्ता के अहंकार के संत से टकरा कर उसके मलबा बन जाने की कथा को अपनी स्मृति से आगे बढ़ा रहे हैं राजेंद्र सिंह सोलंकी। यह उस समय की बात है जब कांग्रेस में जीवंत सेवा-दल हुआ करता था जिसके जरिए युवाओं को राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन का प्रशिक्षण मिलता था। बुलंदशहर के नरोरा (परमाणु विद्युत केंद्र के लिए प्रसिद्ध) जिले में कांग्रेस की एक बैठक हुई थी। बैठक इंदिरा गांधी ने बुलाई थी। यह 1974 के अंत का वह समय था जब जेपी आंदोलन शुरू हो चुका था। इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ जनता की गोलबंदी की जा रही थी। जिस विश्वविद्यालय को पिता के नाम पर बनाया गया था उस जेएनयू के छात्र उनकी बेटी के खिलाफ नारे लगा रहे थे।

राजेंद्र सिंह सोलंकी बताते हैं, ‘मैं किशोरावस्था में कांग्रेस सेवा दल का सदस्य बना था। पूरे देश में दिल्ली की सत्ता के खिलाफ माहौल बन रहा था। इन हालात में नरोरा में हुई बैठक में कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों, मुख्यमंत्री और अहम कैबिनेट मंत्रियों को बुलाया गया था’। सोलंकी बताते हैं कि सेवा दल का सदस्य होने के नाते मैं बैठक स्थल के आस-पास होता था और उसमें हुई बातें मुझे भी पता चलती थीं। वे कहते हैं, ‘वहां हुई कार्यसमिति की मीटिंग में चंद्रशेखर जी भी थे। उस समय तक जेपी आंदोलन इतना नहीं बढ़ा था कि आपातकाल लगाना पड़े’। बकौल राजेंद्र सोलंकी, कार्यसमिति की बैठक शुरू होते ही इंदिरा जी ने कहा, ‘ये जेपी आंदोलन तो शुरू हो गया है।

चंद्रशेखर ने इंदिरा गांधी को जयप्रकाश नारायण से समझौता करने की सलाह देते हुए कहा-मैडम जब सत्ता संत से टकराती है तो विनाश होता है। मेरा आपसे निवेदन है कि चूंकि जयप्रकाश नारायण आपके पिता के मित्र भी रहे हैं, आपको इंदु कह कर बुलाते हैं तो आप उनकी बेटी की तरह हैं। आप उनके साथ बातचीत का रास्ता अख्तियार करें। चंद्रशेखर की इस सलाह पर इंदिरा गांधी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। तभी सिद्धार्थ शंकर रे ने इंदिरा जी की चुप्पी का पक्ष लेते हुए कहा कि ऐसा नहीं होना चाहिए।

उनकी दखलंदाजी के बाद चंद्रशेखर ने कहा, ‘सिद्धार्थ शंकर रे जी, आप मुख्यमंत्री हैं। लेकिन आपकी पत्नी माया रे तो मुझसे दस दिन पहले मिल कर गई हैं। वो संसद की सदस्य हैं। उन्होंने (माया रे) मुझसे कहा कि चंद्रशेखर जी आपका विचार सही है, इंदिरा जी को जयप्रकाश नारायण जी से बात करके उन्हें साथ लेना चाहिए।’

राजेंद्र सोलंकी जब चंद्रशेखर की चेतावनी के जरिए सत्ता और संत के टकराव की कहानी सुनाते हैं तो इसका दुहराव हम 2011 के बाद देखते हैं। अब कहानी की मुख्य किरदार हैं सोनिया गांधी, जिनकी अगुआई वाले मनमोहन सिंह की सरकार के सामने खड़े हो उठते हैं अण्णा हजारे। यहां हजारे भी संत की सामूहिकता की भूमिका के निर्वाह में आते हैं। जयप्रकाश से लेकर हजारे तक की छवि को हम किस तरह देखें? छवि दो रूप में होती है। एक है वास्तविकता तो दूसरी है वास्तविकता की निर्मिति।

वास्तविकता की निर्मिति को हम जयप्रकाश नारायण के दौर में भी देख सकते हैं। जब जयप्रकाश एक जनांदोलन को नेतृत्व दे रहे थे तो सब जानते थे कि वे सत्ता में नहीं जाएंगे। वे खुद सत्ता पर काबिज नहीं होंगे, यह बात उनकी रैलियों में आने वाली जनता भी समझ चुकी थी।

जयप्रकाश नारायण संतन प्रवृत्ति के प्रतीक के तौर पर थे जिसका इस्तेमाल उस समय कांग्रेस को बेदखल करने के लिए किया गया था। इंदिरा गांधी सत्ता की इतनी बड़ी ताकत बन कर उभरी थीं जिसे कोई संत ही ध्वस्त कर सकता था। उस समय भी वही स्थिति थी कि कांग्रेस में कोई विकल्प नहीं था। तब भी आज वाले हालात ही थे जब कहा जा रहा है कि विकल्प कहां है? वाम को ध्वस्त कर क्षेत्रीय क्षत्रपों को भी खारिज कर दिया गया। भाजपा भी इतनी बड़ी ताकत नहीं थी। ऐसे में जब अण्णा आंदोलन शुरू हुआ तो कांग्रेस ने उसे उपेक्षा की नजरों से ही देखा था।

राजनीति के भी दो रूप होते हैं। एक होती है सत्ता की गद्दी हथियाने के लिए राजनीति। दूसरी होती है सत्ता के वर्चस्व के प्रतिरोध में जनतांत्रिक छवि की निर्मिति, जिसे संत या संतन कहा गया। जयप्रकाश नारायण के संत वाले प्रतिरोधी रूप को हम आज के किसान आंदोलन में भी देख सकते हैं। यह आंदोलन किसी तरह की सत्ता को हासिल करने के लिए नहीं है। इसमें 1975 और 2011 की तरह कोई एक चेहरा नहीं है। यहां तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं, बड़ी पूंजी और बड़े व्यापारी हैं। इनके सामने ऐसा वर्ग खड़ा है जो इनके वर्चस्व में खत्म हो रहा है।

खासकर बड़े किसानों का प्रतिरोध है जिन्हें खुद पर संकट मंडराता दिख रहा है। छोटे किसान और मजदूर तो पहले ही तबाह हो चुके हैं। इनके सामूहिक प्रतिरोध में कोई एकल चेहरा नहीं खोज पाने की सत्ता पक्ष की नाकामी ही इसकी सबसे बड़ी सफलता है। आखिर कोई इसमें एक चेहरे को अलग कर इसे नाकाम क्यों नहीं कर पा रहा है? दरअसल यह प्रतिरोध उसी संत परंपरा से निकला हुआ है जहां सत्ता से उसे काम नहीं है। वह तो सत्ता के चंद लोगों के इर्द-गिर्द घिर जाने के खिलाफ है। जो जियो और जीने दो की बुनियादी मांग करता है।

इतिहास रूप बदल कर एक बार फिर से खुद को दोहरा रहा है। दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर संत धुनी रमाए बैठे हैं और उनकी धुन के पक्केपन को देख कर एक बार फिर वही सलाह दी जा चुकी है जो कभी चंद्रशेखर ने दी थी इंदिरा गांधी को और कई लोगों ने सोनिया गांधी को। इंदिरा ने चंद्रशेखर की नहीं सुनी और सोनिया ने भी ‘अण्णा नहीं ये आंधी है, देश का दूसरा गांधी है’ नारे पर कान नहीं धरा।

चंद्रशेखर की बात नहीं मान जनता की आंधी में इंदिरा उखड़ गईं थीं तो अण्णा आंदोलन से उजड़ी कांग्रेस के संवरने की अभी तक कोई उम्मीद नहीं दिख रही है। अब देखना यह है कि दिल्ली की दहलीज पर बैठे संतों को लेकर आगे क्या रवैया रहता है? आज जब चंद्रशेखर वाली भूमिका शीर्ष न्यायालय निभा चुका है तो सत्ता और संत के टकराव की कहानी के पाठ का अपना ही महत्व है। हर सत्ता के पास एक चंद्रशेखर होता है जो तात्कालिक समय में अनसुना होने के कारण भविष्य के हर दौर में सत्ता के सबक की कथा बन जाता है। (क्रमश:)

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