X

राजकाजः बेबाक बोल – भ्रमजाल

अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस के उदारवादी चेहरे 2019 के चुनावी मैदान में नीतियों की बात आते ही परेशान हो जाते हैं। गुजरात विधानसभा चुनाव में कपड़ा कारोबारियों के बीच कांग्रेस उस जीएसटी की मुखालफत भला कितनी देर और मजबूती से कर सकती थी जिसकी पैदाइश ही उसके उदारवादी-सुधारवादी अस्पताल में हुई। इसलिए गुजरात से लेकर कर्नाटक तक कांग्रेस अध्यक्ष मंदिर मार्ग की परिक्रमा करते रहे और अंत तक तो ब्राह्मण और जनेऊ भी निकल आया। कर्नाटक में जनता दल (सेकु)-कांग्रेस की सरकार के पहले बजट में ब्राह्मण विकास बोर्ड के गठन के वादे को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। साफ है कि आप भी रोजी और रोटी के रास्ते और नीतियों पर बात करने के बजाए बाबरी, मुसलमान और पाकिस्तान पर ही पत्ते खेलना चाहते हैं। चुनावी मैदान में हिंदू और पाकिस्तान के नाम पर बुने जा रहे इसी भ्रमजाल पर बेबाक बोल।

सच को बुरी तरह से तोड़-मरोड़ कर भ्रमजाल बुनने जैसे भाव को व्यक्त करने के लिए जब शशि थरूर ने ‘फरोगो’ शब्द का इस्तेमाल किया तो ट्विटर उपयोगकर्ता परेशान हो गए थे। कई लोग अपनी कमजोर अंग्रेजी पर शर्मिंदा हुए तो बहुतों ने इसे एक और थरूरवादी प्रयोग करार दिया। ‘फरोगो’ का शाब्दिक अर्थ सत्य का विखंडन है। सत्य के विखंडन से परेशान वही शशि थरूर अब कहते हैं ‘अगर भाजपा 2019 का चुनाव जीत जाती है तो भारत हिंदू पाकिस्तान बन जाएगा…अगर भाजपा दोबारा जीतती है तो हमें लगता है कि हमारा लोकतांत्रिक संविधान नहीं बचेगा…उनका नया संविधान हिंदू राष्ट्र के सिद्धांतों पर होगा’। अपनी विशिष्ट और क्लिष्ट अंग्रेजी के लिए खास पहचान रखने वाले कांग्रेस नेता शशि थरूर जब यह डर जताते हैं तो इसके क्या मायने हैं? वे किसके प्रति चिंतित दिख रहे हैं। भारत की जनता के प्रति या अपनी पार्टी के अस्तित्व के प्रति? और वे खतरे के रूप में क्या दिखा रहे हैं। हिंदू और पाकिस्तान। चुनावी मैदान में आप हिंदू और पाकिस्तान को लेकर तोड़-मरोड़ कर कौन सा भ्रमजाल फैला रहे हैं। कांग्रेस नेता अपनी एक किताब में हिंदू होने की अपनी तरह से व्याख्या करते हैं, इसके उदार पक्ष को दिखाते हैं। लेकिन भारत के चुनावी मैदान में आपकी तरफ से खतरा-ए-जान वही पाकिस्तान क्यों है? चुनावी मैदान में तुरुप का पत्ता के नाम पर आपकी जेब से भी पाकिस्तान ही क्यों निकलता है?

क्या कांग्रेसी नेताओं के मुंह से ऐसी बातें पहली बार निकली हैं? नहीं, जरा पिछली सर्दी में हुए गुजरात चुनाव याद करें। पहले तो कांग्रेस जीएसटी और किसानों के मुद्दे को उछालती रही। लेकिन जीएसटी पर वह कांग्र्रेस क्या नीति देती जिसकी पैदाइश ही उसके उदारवादी सुधारवादी अस्पताल में हुई थी। गुजरात में आपके पास जीएसटी के खिलाफ बोलने के लिए था भी क्या? और जब कृषि से लेकर अर्थशास्त्र और शिक्षा तक में आपके पास नीति को लेकर अलग कुछ था ही नहीं तो वहां आप पाकिस्तान कार्ड लेकर आ गए। वहां पाकिस्तान आपकी जरूरत बना ताकि चुनाव का ध्रुवीकरण हो भाजपा बनाम कांग्रेस में। भाजपा के सामने कांग्रेस को खड़ा करने के लिए इस्तेमाल किया गया पाकिस्तान और उस वक्त भी पाकिस्तान का नाम जिन कांग्रेसी नेताओं के साथ उछाला गया था वे वही उदारवादी चेहरे थे, मणिशंकर अय्यर से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री तक। वहां पर कांग्रेस पीड़ित पत्ता खेल रही थी कि देखो हमारे नेताओं के साथ क्या हो रहा है। कारोबारियों और किसानों को नेपथ्य में कर पाकिस्तान का नगाड़ा बजने लगा था।
गुजरात से लेकर कनार्टक तक में राहुल गांधी मंदिर-मंदिर ही रटते गए। मीडिया में संख्या गिनाई जा रही थी कि उन्होंने कितने मंदिरों में मत्था टेका। मंदिर में उनके हिंदू होने वाले सवाल को जरूरत से ज्यादा उछाला गया और जब मंदिर मार्ग से बात नहीं बनी तो हिंदू और वह भी उच्च तबके के हिंदुओं के प्रतीक जनेऊ को भी निकाला गया। क्या तब कांग्रेस नेता को यह नहीं दिख रहा था कि राहुल गांधी जीएसटी और बेरोजगारी छोड़ हिंदूवादी क्यों हो रहे थे।

कर्नाटक चुनाव में अपनी साख खो चुकी कांग्रेस ने जद (सेकु) के साथ मिलकर सरकार बनाई। इस सरकार बनाने की लड़ाई में भी वही पार्टी पीड़ित का चेहरा दिखाने में सफल रही जिससे कि सीधा सवाल पूछना था कि जनता ने आप पर भरोसा क्यों नहीं किया। उसी कांग्रेस और सेकुलर के सर्वनाम वाली पार्टी के ताजा फैसले पर जरा गौर फरमाएं। कर्नाटक की कुमारस्वामी सरकार ने अपने पहले बजट में ‘ब्राह्मण विकास बोर्ड’ का प्रस्ताव रख उसे 25 करोड़ रुपए देने का एलान किया है। कर्नाटक में ‘ब्राह्मण विकास बोर्ड’ का एलान होने और भारत के हिंदू पाकिस्तान बन जाने का खौफनाक सपना देखने के पहले शशि थरूर के कानों तक एक और खबर जरूर पहुंची होगी कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी देश के कुछ प्रमुख मुसलिम बुद्धिजीवियों के साथ बैठक करेंगे। कांग्रेस की तरफ से जारी बयान में कहा गया कि इस दौरान ‘अल्पसंख्यक विरोधी विमर्श’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ के मुद्दे पर विचारों का आदान-प्रदान होगा। कांग्रेस ने अपने बयान में कहा, ‘देश में इस समय अल्पसंख्यक विरोधी विमर्श तैयार करने और धर्मनिरपेक्षता शब्द का मजाक बनाने की कोशिश हो रही है। देशहित में इसकी जरूरत है कि सबको साथ लेकर चला जाए और सबसे संवाद किया जाए। ऐसे में राहुल गांधी मुसलिम बुद्धिजीवियों के साथ संवाद का सिलसिला शुरू करने जा रहे हैं। बुद्धिजीवियों के साथ संवाद का यह सिलसिला चलता रहेगा’। राहुल गांधी की ओर से इस बैठक के लिए कुछ प्रमुख मुसलिम संगठनों के प्रतिनिधियों, सामाजिक क्षेत्र में काम करने वालों, प्रोफेसरों और पत्रकारों को बुलाया जा रहा है।

राहुल गांधी जब बुद्धिजीवियों, प्रोफेसरों और पत्रकारों को मुसलिम पहचान देकर मिलेंगे तो क्या संदेश देंगे? किसान, कामगार, व्यापारी, शिक्षार्थी को छोड़ आप कभी जनेऊ तो कभी मुसलिम की पहचान के साथ जाते हैं। वह इसलिए कि आपको सिर्फ वोटों का ध्रुवीकरण चाहिए, चाहे गुजरात हो या 2019 का मैदान। इन सब तर्कों के पीछे बुनियादी बात यही है कि कांग्रेस संदेश दे रही है कि उसकी मंजिल भी धार्मिक धु्रवीकरण का मंच ही है। पिछले चार सालों में कांग्रेस की तरफ से सबसे ज्यादा आने वाला बयान यही है कि केंद्र सरकार की फलां नीति और योजना उनकी योजनाओं का ही विस्तार है। इसलिए शायद कांग्रेस चुनावी मैदान में नीति आधारित बहसों से बचना चाहती है। वह जीएसटी का विरोध सिर्फ यह कह कर करती है कि इसे ठीक से लागू नहीं किया गया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की जगह नई इकाई बनाने के खिलाफ कांग्रेस की छात्र इकाई (एनएसयूआइ) के कार्यकर्ता विरोध करने गए तो उन्हें अन्य दलों से लेकर मीडिया वालों तक से सुनना पड़ा कि आप इसका विरोध क्यों कर रहे हैं, यह आपकी नीतियों का ही तो विस्तार है।

बुनियादी समस्या यह है कि चुनावी मौसम में नवउदारवादी नीतियों पर बहस शुरू होते ही कांग्रेस में बैठे हुए नीतिनिर्धारक परेशान हो उठते हैं। इन नीतियों पर सवाल उठते ही उदारवादी मुखों पर बाबरी, मुसलमान और पाकिस्तान आ जाते हैं। शशि थरूर तो इस बार ‘हिंदू पाकिस्तान’ ले आए हैं। चुनावी ध्रुवीकरण के लिए हिंदू शब्द भ्रमजाल हो गया है। जनता उनसे न पूछ न बैठे कि क्या आप सत्ता में आते ही अपने सुधारवादी अस्पताल में पैदा किए गए जीएसटी को त्याग देंगे? क्या आप बहुराष्ट्रीय कंपनियों को निवेश के लिए नहीं बुलाएंगे? याद करें जरा न्यूनतम साझा कार्यक्रम का वह एजंडा और परमाणु करार जिसके कारण यूपीए-एक सरकार से वाम दलों ने नाता तोड़ा था। इस समय कांग्रेस अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। कभी राष्ट्रीय स्तर पर एकमात्र पार्टी होने का दावा करने वाली पार्टी आज देश के दस फीसद भूभाग पर सिमट चुकी है। देश के 70 फीसद भूभाग यानी 19 राज्यों पर भाजपा अपने सहयोगियों के साथ है। ऐसे में हिंदू, बाबरी और पाकिस्तान के नारों से ही आप विकल्प नहीं बन सकते हैं। और अगर विकल्प के लिए भी ‘हिंदू’ ही है तो उसके लिए पहले से मजबूत संकल्प खड़ा है।