ताज़ा खबर
 

बेबाक बोलः कुछ को’रोना

कुछ समय पहले एक समाचार प्रस्तोता ने आंखों के आंसू पर काबू पाते हुए अपने पति की मौत की खबर पढ़ी और हम सब उसके जज्बे को सलाम करते हुए रो पड़े थे। काम और कर्तव्य सबसे पहले और आपदा की हालत में घर से बाहर निकल सरफरोशी की तमन्ना रखने वाले लोगों के जीवनमूल्य को अचानक से एक विषाणु बदल देता है। ‘शो मस्ट गो आॅन’ का संवाद थम जाओ के सन्नाटे में खामोश है। डॉक्टरों, विमान कर्मचारियों से लेकर सफाई कर्मचारियों तक को उनके पड़ोसी घृणा की नजर से देख रहे क्योंकि वो जरूरी सेवाओं के दायरे में बीमारी से लड़ने के लिए घर से बाहर निकल रहे हैं। कामगार राजमार्ग से पैदल दूर अपने गांव लौट रहे क्योंकि मौत के खौफ में जी रहे शहर को उनकी जरूरत नहीं। कोरोना के कहर की कड़ी तोड़ने के लिए बंद किए बाजार में मांग और आपूर्ति की कड़ी टूटने से आगे क्या हालात हो सकते हैं? मौत के खौफ में ठहरी जिंदगी के द्वंद्व को उकेरता बेबाक बोल।

इंटरनेट का एक गलत इस्तेमाल यह भी है कि कमजोर तबके की जनसंख्या तक कोरोना को लेकर जागरूकता नहीं अफवाह पहुंची है।

यह एक प्रेमकथा है
जिसे मैं प्यार करता था वो मर गई।

ये पंक्तियां हैं 2001 में आई फिल्म ‘मौलिन रूज’ की। एक ऐसी प्रेमकथा जो आपको रोमानी दुनिया से खींच कर मौत के सामने रख देती है। सन 1900 का समय जब एक अंग्रेज लेखक क्रिश्चियन बोहेमियन क्रांति में शामिल होने के लिए पेरिस जाता है और टकराता है शहर की सबसे बड़ी थियेटर कंपनी मौलिन रूज से। वहां लेखक का मिलन होता है दिलकश अदाकारा साटिन से। मौलिन रूज वो जगह है जहां प्रेम और मिलन की फंतासी दैहिक रूप में लेखक के सामने है। इस खूबसूरत फिल्म का त्रासद अंत बेचैन करता है। रेशम जैसी देह वाली प्रेमिका अपने बेचैन प्रेमी की बाहों में दम तोड़ देती है। वह मरती है तपेदिक (टीबी) से।

टीबी, एक संक्रामक बीमारी। कभी अपने प्रेमी के फंतासी को दैहिक सच बनाने वाली प्रेमिका का निर्जीव देह प्रेमी की बांहों में है। फिल्म का नायक जब अपनी प्रेमिका की टूटती सांसों के साथ तड़प रहा होता है तो दर्शक मौत की घुटन को अपने अंदर महसूस करते हैं। थिएटर के विशालकाय स्क्रीन पर फंतासी की हार और मौत की जीवंत अदाकारी दर्शकों को किसी स्याह अंधेरे में धकेल देती है। दर्शकों के आंख और कान से होती हुई यह प्रेम कथा रूहानी परेशानी बन जाती है। कभी भी सब कुछ खत्म हो सकता है। मौत के मायने समझ में आने लगते हैं। फिल्म की समीक्षा में कहा गया था कि यह खेल का वैसा मैदान है जिसमें वयस्कता के मसालों के साथ दर्शक खुद को बच्चा सा महसूस करने लगता है। यह 1900 की बात है जब टीबी का कीटाणु एक परीकथा का अंत कर देता है। पूरे फिल्म का सेट एक रंगमंच है जहां ‘शो मस्ट गो ऑन’ का संवाद सबसे ज्यादा गूंजता है। पर टीबी का कीटाणु सब थाम देता है। यह तब का खौफ है जब टीबी लाइलाज था। आज हमारे सामने कोई टीबी का मरीज बैठा है तो कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन समय के साथ मौत और उसका खौफ अपने मायने बदल लेते हैं। गैब्रियल गर्शिया मार्केज का ‘लव इन द टाइम आॅफ कॉलरा’ कोरोना का रूप धर चुका है। फणीश्वरनाथ रेणु के ‘मैला आंचल’ का परिवेश मलेरिया और गरीबी के साथ अब वैश्विक विषाणु से भी लड़ रहा है।

आज चांद की फंतासी को सच करने वाला मनुष्य दोबारा बच्चा बन पड़ा है और विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्देशों के अनुसार हाथ धोना सीख रहा है। कहीं से आवाज कानों में गूंज जाती है, लोग अभी भी हाथ ठीक से नहीं धो रहे हैं। उफ्फ, हमें हाथ धोना भी नहीं आता था। कुछ ही दिनों पहले की बात है कि इसरो प्रमुख रो रहे थे कि चांद से संपर्क टूट गया, आज मां रोते हुए अपने बच्चे को समझा रही है कि किसी इंसान को स्पर्श मत करो। बच्चे बालकनी में इंतजार कर रहे कि अभी हवाई जहाज की आवाज आएगी और ताली बजाएंगे, लेकिन आज उड़ना मना है, क्योंकि हवा में मौत उड़ रही है। सबसे ज्यादा भीड़ और शोर झेलने वाली रेल चुपचाप खड़ी है। नागरिकता का नियम अब अलगाव है।

अपने देश में पहली बार 21 दिनों की पूर्णबंदी के बाद रतजगा कर रही कई आंखें मानो मिर्जा गालिब का शेर कह रहीं कि-

मौत का एक दिन मुअय्यन है/
नींद क्यूं रात भर नहीं आती।

अब तक के जीवन में परेशानियों के हर दौर में घर से बाहर निकल सरफरोशी की तमन्ना ही तो दिल की सबसे बड़ी फंतासी होती थी। पंजाब में आतंक और कर्फ्यू के दिनों में जब हम पत्रकार बाहर निकलते तो मां आंखों में आंसू भर कहती, बाहर मत जाओ। हम बेलौस हंसते हुए और उसके आंसू को चिढ़ाते हुए हैरत इलाहाबादी की तरह कहते थे-

आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं/
सामान सौ बरस का है पल की खबर नहीं।

हमारी पीढ़ी शेक्सपियर को पढ़ कर बड़ी हुई थी कि ‘शो मस्ट गो ऑन।’ बीसवीं सदी के शोमैन ने मेरा नाम जोकर में बताया कि तीन महबूबा छोड़ कर चली जाए तो क्या और मंच पर आपकी अदाकारी को देखते हुए आपकी मां की भी मौत हो जाए तो आपको हंसते रहना है, दुनिया में सब कुछ चलते रहना है यही वैश्विक ब्रह्म सत्य बनाया गया था।

आज एक विषाणु ने शेक्सपियर को ‘शो मस्ट गो ऑन’ के उदाहरण से बेदखल कर थोड़ा थमने का संदेश दे दिया। आज का उदाहरण यह है कि शेक्सपियर ने ‘किंग लियर’ प्लेग महामारी के दिनों में लिखा था जब वो एकांतवास कर रहे थे। आज घर में घुस जाना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। यह सिर्फ अपनी नहीं पूरे देश की सुरक्षा के लिए जरूरी है। फिलहाल हम सबकी देह विषाणु की वाहक हो सकती है इसलिए हर किसी को अलग हो जाना है। हम सब अलग हो घरबंद हो गए हैं, तो अब क्या।

इस स्तंभ में पहले भी इस बात का जिक्र किया है कि विद्रूपताओं के इस समय में पत्रकारिता के चौखटे में बात करना असंभव सा हो जाता है तो हम ‘मौलिन रूज’ जैसे बड़े फलक के सिनेमा का सहारा लेते हैं। इस स्तंभ में जब हमने दिल्ली दंगों के संदर्भ में टूटी रीढ़ की हड्डी को छोड़ पीठ पर टूटने वाली लाठी को मरहम लगाने का व्यंग्य लिखा था तो कल्पना भी न की थी कि कुछ ही दिनों बाद लाठी को कीटाणु मुक्त करने का वीडियो वायरल हो जाएगा। नेटफ्लिक्स पर थ्रिलर देख घरबंदी के मजे लेने वाला अमीर तबका घर से निकले लोगों पर डंडे मारने के चुटकुले गढ़ रहा है। यह नेटफ्लिक्स मनोरंजन आपको इतना अमानवीय बना रहा है कि आप पुलिस की हिंसा में रोमांच खोज रहे हैं। वे घर से निकले और घरविहीन का फर्क जानना भी नहीं चाह रहे। तो इंतजार कीजिए, किसी अकादमी पुरस्कार फिल्म का जो आपको यह फर्क समझाए और आप अपनी बैठकी में रोते हुए टिशू से नाक पोंछें।

इंटरनेट का एक गलत इस्तेमाल यह भी है कि कमजोर तबके की जनसंख्या तक कोरोना को लेकर जागरूकता नहीं अफवाह पहुंची है। पूर्वोत्तर भारत के लोगों को कोरोना विषाणु कह अपमानित करने के वीडियो भी संक्रामक हो ही गए।

जब हर जगह घर से दफ्तर का काम हो रहा है तो घर से देश के सबसे बड़े दफ्तर संसद के सदस्यों से सवाल पूछना नकारात्मकता बताया जा रहा है। जब प्रजा और तंत्र घर में थमा हुआ था तब मध्य प्रदेश में हाथ में हाथ डाल समर्थकों के झुंड में नई सरकार बन रही थी। कमलनाथ सरकार गिरने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया और शिवराज सिंह चौहान इसे सत्य की जीत बता रहे थे और वहीं संविधान के पूर्व रक्षक जब संसद में संविधान बचाने की शपथ ले रहे थे तो शर्म शर्म के नारे लग रहे थे। संसद में जब सत्य से हाथ धोए जा रहे थे तो वाट्सऐप से संचालित हो रही जनता के लिए कीटाणु रहित लाठी तैयार हो रही थी।

अगर विदेशों से आए लोगों की समय पर जांच होती और उसी वक्त अलगाव का दौर शुरू होता तो आज अफवाहों के कुचक्र में पड़ी जनता पर लाठी चलाने की नौबत नहीं आती। हर बार की तरह हम फिर देर हैं पर आगे की दुरुस्तगी में अंधेर न करें। जांच उपकरण की उपलब्धता और पृथक केंद्रों पर काम तेजी से शुरू हो। बड़े स्टेडियम से लेकर कई ऐसी जगहें हैं जहां पृथक केंद्र बनाए जा सकते हैं। कोरोना की कड़ी टूटे यह जरूरी है, लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि अर्थव्यवस्था में मांग और आपूर्ति की कड़ी बनी रहे। मांग और आपूर्ति की कड़ी को ज्यादा दिन तक तोड़ना एक बड़ी जनसंख्या के लिए खतरनाक होगा। यह इक्कीस दिन का चक्र लक्षित रखना होगा कि बड़े स्तर पर जांच हो और निदान केंद्रों की कमी न हो। हम बहुत दिनों तक घर में रह सिनेमा और साहित्य के किरदारों के जरिए बात नहीं कर सकते, देश का सबसे बड़ा दफ्तर यह समझेगा। पत्रकारिता से लेकर हर दफ्तर जल्द घर से बाहर निकले इस उम्मीद के साथ बस ये देखते रहें, घर के बाहर भूख और बदइंतजामी के विषाणु से कोई न मरे।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 बेबाक बोल : विश्वाणु
2 बेबाक बोलः सिंधिया विच्छेद
3 राजकाज: बेबाक बोल- दर्जा ना-उम्मीद