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बेबाक बोलः प्रण और रण

महाभारत काल के समाज में कई तरह के प्रयोग हो रहे थे। इन्हीं प्रयोगों का परिणाम है द्रौपदी का असाधारण किरदार। पौरांिंणक आख्यानों में जन्म के स्वरूप का अपना महत्व है जो व्यक्ति का ध्येय भी तय करता है। याज्ञसेनी यानी हवन कुंड से पैदा हुई द्रौपदी का जीवन, प्राण लेने के प्रण और उसके लिए हुए रण में बीत जाता है। जातिवादी और कुलवादी अभिमान के संवाद बोलते हुए अस्मिता के अतिरेक पर पहुंची द्रौपदी सामंती न्याय का प्रतीक बन जाती है। जीवन-हरण जैसा तुरंता न्याय ही उसके मान को तुष्ट करता है। नए भारत के लिए महाभारत में द्रौपदी के किरदार का प्रयोग समाज में आदर्श नहीं बन सका। मानव कल्याण के ऊपर निजी प्रतिशोध का आख्यान होने के कारण आज भी आम धार्मिक घरों में न तो रखी जाती है महाभारत और न कन्याओं को दिया जाता है द्रौपदी का नाम। बेबाक बोल में महाभारत की एक और किरदार।

द्रौपदी का हर प्रण, रण की मांग कर रहा था जिसका नतीजा था महाभारत।

महाभारत का युद्ध रोकने के लिए शांतिदूत बनकर जा रहे श्रीकृष्ण को द्रौपदी धिक्कारती है। पांच महारथियों की पत्नी को महसूस होता है कि वासुदेव यह युद्ध कहीं रोक न दें। वह उन्हें अपने खुले केशों का हवाला देती है और अपने अपमान की याद दिलाती है। द्रौपदी महाभारत की वह स्त्री किरदार है जिसका आधुनिक से लेकर उत्तर-आधुनिक पाठ किया गया है। ज्यादातर पाठों में उसे स्त्री अस्मिता के केंद्र में ही रखा गया है। महाभारत में सबसे मुखर पात्र स्त्री है तो उसके क्या मायने है?

यहां हम एक बार फिर रामायण और महाभारत की तुलना करेंगे खास कर केंद्रीय स्त्री किरदारों से। इस तुलना के वक्त इतिहास के कालक्रम का ध्यान रखेंगे जब रामायण के आदर्शों के विपरीत सामंती समाज का विकास हो रहा था। रामायण की सीता का जन्म धरती से होता है और वो धरती में ही समा जाती हैं। मर्यादा की सर्वोच्च अवस्था का पालन करने में सीता की अपनी भूमिका रही और बाद में आदर्श ऐसा कि राम के पहले सीता का नाम बोला गया और सिया बिन राम की करुणा और मर्यादा स्थापित नहीं हो पाती है। इस चरित्र का ऐसा असर कि आम भारतीय घरों में सीता पसंदीदा नामों में से एक रहा लेकिन द्रौपदी नाम से परहेज ही किया जाता रहा। महाभारत में भी सीता के चरित्र की महिमा उकेरी जाती है। द्रौपदी के पास भी आदर्श के रूप में सीता है।

रामायण के समाज के बाद महाभारत में कबाइली समाज खत्म हो सामंती ढांचे पर खड़ा हो रहा था। संपत्ति अर्जन पर खास वर्ग और जाति समूहों का वर्चस्व हो रहा था। संपत्ति की लड़ाई बढ़ने के साथ स्त्री की स्वतंत्रता घट रही थी। स्त्री भी संपत्ति की श्रेणी में गिनी जाने लगी और उस पर जबरन आधिपत्य के आख्यान गढ़े जाने लगे। इसी ढांचे का प्रतिनिधि चेहरा है द्रौपदी। महाभारत की स्त्री किरदार अपने स्वर से सशक्त दिखती है। स्त्री को शाप देने और सौगंध लेने का अधिकार है, लेकिन इसका इस्तेमाल पुरुषवादी सामंती ढांचे को मजबूत करने के लिए ही होता है।

महाभारतकालीन समाज के केंद्र में शक्ति संघर्ष था। यहां एक अस्मितावादी संघर्ष भी देखा जा सकता है। हर किसी के जीवन का ध्येय किसी न किसी तरह का प्रतिशोध है। पांचाल नरेश के प्रतिशोध की दहक द्रौपदी को जन्म देती है जिसे याज्ञसेनी के नाम से भी जाना जाता है। द्रौपदी का जन्म ही उस हवन से होता है जो द्रोणाचार्य से बदला लेने के लिए होता है। यानी उसके जन्म का ध्येय ही युद्ध है। अब कबीलाई समाज पितृसत्तामक हो रहा है तो एक स्त्री का विवाह पांच पुरुषों से करवाया जाता है। पांच पतियों की पत्नी होने का आशीर्वाद तो उसे पिछले जन्म में ही मिल गया था इसलिए इस जन्म में कर्ण से उसकी पहली नजर के प्रेम में बाधक भी कृष्ण ही बने और द्रौपदी ने कर्ण के कथित नीच कुल का उपहास किया। इसी जातीय उत्पीड़न की टीस ने कर्ण को अनुदार बना दिया और उसने भरी सभा में कौरवों के साथ द्रौपदी का अपमान किया। द्रौपदी को हर जगह अपने कुल पर गर्वित होते दिखाया गया है। किस महारथी की बेटी है, किनकी बीवी है, किनकी मां है और सबसे ज्यादा अहम कि वह किसकी सखा है। द्रौपदी महाभारत की सबसे शक्तिशाली किरदार बनकर उभरती है क्योंकि उसकी तरफ कृष्ण हैं।

महाभारत में द्रौपदी के जरिए नए समाज का प्रयोग हो रहा था। एक स्त्री का पांच पतियों के साथ दांपत्य का हल भी श्रीकृष्ण ही निकालते हैं यौन शुचिता के अपने नियम बनाकर। जैसे प्रतिदिन प्रात: स्नान के साथ ही द्रौपदी को कन्या रूप में वापस आने का वरदान मिला तो संतति की प्रक्रिया के लिए पांचों के बीच संबंधों में एक-एक साल का अंतराल भी रखा गया। अस्मिता को लेकर अति सजगता ने एक स्त्री को सामंती पितृसत्ता का औजार बना दिया जिसके जीवन का एक ही लक्ष्य प्रतिशोध और युद्ध था। वह अपने पति से यह सवाल पूछती है कि जो खुद जुए में हार गया वो अपनी पत्नी को कैसे दांव पर लगा सकता है। लेकिन वह यह भी चाहती है कि उसके पति उसे तुरंता न्याय दिलाएं। वह हमेशा खुद को पांच महारथियों की पत्नी कह कर संबोधित करती है। लेकिन जब कृष्ण शांतिदूत बनने की बात करते हैं तो वह ससुराली पक्ष के पुरुषत्व पर सवाल उठा कहती है कि अब मेरे वृद्ध पिता, भाई और पुत्र इसका बदला लेंगे।

द्रौपदी को अपनी हर समस्या का तुरंता सामंती हल चाहिए था और इसके लिए उसने अज्ञातवास का भी भेद खुलने की परवाह नहीं की। कीचक ने सैरंध्री के रूप में उसका अपमान किया तो उसके लिए तुरंत मृत्यु दंड की मांग कर डाली। युधिष्ठिर ने जब कहा कि यह दंड देने का उचित समय नहीं है तो उनके संयम पर ताने मारे। अब सौगंध ले चुकी है कि कीचक कल का सूर्यास्त नहीं देखे तो फिर युधिष्ठिर के विकल्प में भीम है। भीम के पास भुजाओं का बल है लेकिन बड़े भाई की तरह धीरज नहीं। वह कीचक की हत्या कर पत्नी की सौगंध पूरी करता है। द्रौपदी जुए में हारी जा चुकी है और यह अपमान उसके अस्तित्व को छलनी कर रहा है। लेकिन वह इसका हल भी उसी सामंती प्रवृत्ति में चाहती है जहां स्त्री को जुए में हारने वाली वस्तु समझा जाता है। एक मनुष्य की शक्ति उससे ज्यादा शक्तिशाली के सामने बंधक हो जाती है।

द्रौपदी का हर प्रण, रण की मांग कर रहा था जिसका नतीजा था महाभारत। जिस सामंती स्त्री अस्मिता की रक्षा के नाम पर महाभारत का युद्ध हुआ उसने सबसे ज्यादा नुकसान स्त्रियों को पहुंचाया। द्रौपदी को इस पीड़ा का अहसास तब हुआ जब अभिमन्यु मारा गया। हस्तिनापुर विधवा विलाप से गूंज उठा और मरघटी मंजर पर गिद्धों और चीलों का सुख देख कर पांचाली के मन में पश्चाताप उठता है। कुरुक्षेत्र में द्रौपदी के अपमान के अपराधी दु:शासन, दुर्योधन, कर्ण के साथ वह कौरव राजकुमार भी मारा जाता है जिसने चीर हरण के वक्त अपनी भाभी द्रौपदी का पक्ष लिया था और भरी सभा में कुलवधू का अपमान करने वालों पर सवाल उठाए थे।

कुरुक्षेत्र के मैदान में महाविनाश के बाद जब द्रौपदी खड़ी होती है तो उसके पास शोक के सिवा कुछ नहीं रहता। उसके अपमान के दोषी मारे जाते हैं। प्रण और प्रतिशोध पूरा हो चुका है तो उसका हासिल क्या है? उसे उन स्त्रियों की सुध भी होती है जिनके जीवन का ध्येय इस तरह का रण और प्रण नहीं था लेकिन अब उनके हिस्से कुछ नहीं रहा। क्या महाभारत से जुड़ीं सारी स्त्रियां युद्ध चाहती थीं? स्त्री के संताप का हल यह तो कतई नहीं था। अब कुंती को कर्ण का शोक है तो उत्तरा को अभिमन्यु का। द्रौपदी के प्रतिशोध से स्त्री-पक्ष के हिस्से क्या आया?

द्रौपदी ने मानव धर्म के बजाए अपने निजी प्रण को महत्व दिया जिसका नतीजा था कुरुक्षेत्र के मैदान में मानवता का मरघट बन जाना। द्रौपदी महाभारत में उस तरफ थी जिधर कृष्ण थे। कृष्ण उधर रहते हैं जिधर धर्म है। इतिहास और संस्कृति में द्रौपदी के किरदार को संक्रमण काल की सीमा पर ही छोड़ दिया जाता है। सीता आदर्श और मूल्यों की रक्षा के बाद धरती में समा जाती है लेकिन द्रौपदी अपने पांच पांडव पतियों के साथ स्वर्ग नहीं जा पाती है। हिमालय की सीमा छूते ही उसके पांव फिसल जाते हैं और जिन पतियों पर इतना अभिमान करती थी उनके अगुआ धर्मराज ने भाइयों को आदेश दिया कि पीछे मुड़ कर मत देखना। जो भीम कभी द्रौपदी के एक इशारे पर हत्या कर देता है वह अपने भाई की बात मान अपनी पत्नी को अकेला छोड़ आगे बढ़ जाता है।

द्रौपदी का हर प्रण मर्दवादी व्यवस्था को मजबूत करने का बंधन बना, इसमें कहीं भी स्त्री पक्ष के लिए मुक्ति का मार्ग नहीं खुलता है। निजी प्रण के लिए रण की पैरोकारी हिंसक समाज का ही रास्ता बनाएगी। स्त्री की मुक्ति का औजार हिंसा नहीं करुणा ही होगा। किसी भी समाज के पौराणिक और आध्यात्मिक आख्यान उसका आदर्श रचते हैं। द्रौपदी के चरित्र के साथ जो प्रयोग हुआ वह आज भी बहस के घेरे में है। लेकिन जब हम लोक की बात करते हैं तो आम धार्मिक घरों में न तो रखी जाती है महाभारत और न ही आदर्श के रूप में दिखाया जाता है द्रौपदी को।

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