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बेबाक बोलः कुनैन कथा

कोरोना विषाणु ने जब दवा और दुुआ दोनों को अशक्त साबित कर दिया, धर्म और विज्ञान के पास भी सामाजिक अलगाव के सिवाय कोई हल नहीं था तब भी अमेरिका को यही चिंता थी कि उसके मुनाफे में कोई कमी नहीं आए और वैश्विक संबंधों पर उसकी धौंस कायम रहे। पहले तो कोरोना विषाणु के संक्रमण पर घोर लापरवाही बरती और बाद में हालात बेकाबू हो जाने के बाद दूसरे देशों के वेंटिलेटर से लेकर मास्क तक पर कब्जे की बदनीयती दिखाई। मलेरिया की दवा पर भारत के दोस्ताने रुख के बावजूद अमेरिका के अगुआ ने पहले जिस आक्रामक भाषा का इस्तेमाल किया, वह नई नहीं है। कोरोना पर ट्रंप की भाषा से लगता है कि मानो अमेरिका को बचाने की जिम्मेदारी पूरी दुनिया की है। एकध्रुवीय वैश्विक संबंध पर एक बार फिर सवाल उठाता बेबाक बोल।

कोरोना विषाणु से जूझ रहे विश्व में अमेरिका की धमकी, स्वार्थ और तंज की भाषा नया राजनीतिक कथ्य गढ़ रही है।

‘लोग समझे अपनी सच्चाई की खातिर जान दी
वर्ना हम तो जुर्म का इकरार करने आए थे’

नंगी आंखों से नहीं दिखने वाले कोरोना विषाणु ने पूरे विश्व की व्यवस्था को नंगा कर दिया है। अभी तक हम कोरोना को लेकर अमेरिका की असहाय स्थिति की बात कर रहे थे और आज जेरे बहस में है उसकी आक्रामकता। बजरिए अमेरिकी लोकतंत्र डोनाल्ड ट्रंप का शासन पूरे विश्व में नवउदारवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था के लिए पुनर्पाठ सा है। इस महाशक्ति पर आरोप लगता है कि उसने एक कमजोर देश के लिए भेजे जा रहे वेंटिलेटर पर कब्जा कर लिया। कनाडा, जर्मनी से लेकर फ्रांस तक ने आरोप लगाए कि अमेरिका मास्क जैसी चीजों पर गंदी राजनीति कर रहा है। विषाणु का खतरा जब पूरे ग्लोब पर है तो इसका स्वयंभू सरपंच कहता है, सबसे पहले मैं और मेरा अमेरिका।

राजनीतिक विद्वानों का कहना रहा है कि साम्राज्यवाद और राष्ट्रवाद का अंतर संकट के समय ही सामने आता है। अमेजन के जंगल में लगी आग हो या जलवायु परिवर्तन का संकट, डोनाल्ड ट्रंप की भाषा एक अहंकारी अधिनायकवादी की ही रही है। पर्यावरण की रक्षा के लिए स्कूली छात्रा ग्रेटा थुनबर्ग से वो जिस तरह उलझे वह समसामयिक इतिहास के पन्नों पर दर्ज है। आज कोरोना विषाणु को लेकर अमेरिका और चीन से लेकर क्यूबा तक का मॉडल हमारे सामने है। अगर इन तीनों का फर्क अभी तक समझ नहीं आ रहा था तो मलेरिया की दवा से निकली बहस को ही समझ लें।

अमेरिकी राष्ट्रपति भारत से मलेरिया की दवा हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वाइन मांगते हैं और उन्हें सकारात्मक जवाब मिलता है। मतलब उनकी मांग उन तक पहुंचनी थी। ट्रंप ने पत्रकारों के सामने कहा कि वो खुद इस दवा की गोली लेना चाहेंगे, अगर उनके चिकित्सक अनुमति देंगे। अमेरिका वह देश है जो स्वास्थ्य क्षेत्र में अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 18 फीसद तक खर्च करता है। वहां की प्रयोगशालाओं में दवाओं को लेकर अंधाधुंध प्रयोग होते रहते हैं, जहां से हर मर्ज का पेटेंट के साथ इलाज निकलता है। पेटेंट यानी कि सार्वजनिक हित की चीज पर खास वर्ग के हित का पट्टा मिल जाना, उसके उत्पादन से लेकर वितरण तक पर आर्थिक हित का लगाम अपने हाथ में पकड़े रहना। कोरोना काल में अमीर देशों से ही खबरें आईं कि पेटेंट के शिकंजे के कारण चाह कर भी सस्ता इलाज नहीं दिया जा सका। अमेरिका में ही पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा सी गई।

अब कुनैन की गोली पर किचकिच को किस संदर्भ में देखें। पूरे परिदृश्य में मलेरिया की दवा को इतना उछाल मिलने के बाद उस कंपनी के स्वामित्व और मुनाफे की कुंडली भी खंगाली गई जो इसे बनाती है। जब ट्रंप के दावे और भारत के इस दवा पर से निर्यात की पाबंदी हटाने की तारीख पर बहस चल रही थी तो भारत श्रीलंका के लिए इस दवाई की खेप जारी कर चुका था जहां इसकी बहुत जरूरत थी। ब्नाजील के राष्ट्रपति दवा भेजने के लिए भारत के प्नधानमंत्री को धन्यवाद कह चुके हैं। हालांकि दवा के लिए धन्यवाद ज्ञापन ट्रंप की ओर से भी आ चुका है।

तो कुनैन की गोली के जरिए ट्रंप का मकसद था अमेरिका का अमेरिका की तरह दिखना। ट्रंप को अपनी भाषा में युद्धोन्माद से लेकर राष्ट्रवाद को लाना था और वो ऐसा करते रहे हैं। हम लोकतंत्र और साम्राज्यवादी सुर में अंतर करने की जिस अवधारणा की बात करते हैं यह उसका प्रयोगात्मक रूप है। अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश डूबने लगता है तो वो कमजोर देश के तिनके का सहारा लेता है। लेकिन उसकी नजर उस तिनके पर ही आधिपत्य की हो जाती है कि अब किसी कमजोर को भी मिले तो मेरे हिस्से के मुनाफे के साथ। उस पर मुहर मेरे वर्चस्व की रहे। अमेरिका के लोगों को लगना चाहिए कि उनका अगुआ उन्हें बचा सकता है। वह मसीहाई अंदाज में कहते हैं कि मलेरिया के इलाज की यह गोली मैं भी ले सकता हूं। नागरिकों की चिंता के नाम पर किए संबोधन में अपने मजबूत शासकीय चेहरे को बचाने की चिंता साफ झलकती है।

अब दूसरी ओर हम चीन के मॉडल को देखते हैं। चीन भी नवउदारवादी ढांचे में ही ढला हुआ देश है। लेकिन कोरोना काल में उसकी रणनीति रही कि पहले खुद बचेंगे फिर दूसरों को बचाएंगे। उसकी यह भी चिंता थी कि उसके बचने के लिए वैश्विक बाजार का बचना जरूरी है। बाजार रहेगा तभी उसका माल बिकेगा। सबसे पहले वो अपने ढांचे को बचाने के लिए जुटता है। सर्विलांस और तकनीक का सहारा ले जनवादी अधिकारों को बंधक बना कोरोना विषाणु के गढ़ को संक्रमण मुक्त करता है। वह इस तबाही के मंजर पर हाथ नहीं सेंकता है। खुद को बचाता है, बाजार को बचाने की कोशिश करता है और दूसरे देशों की मदद में जुट जाता है। अब जब वुहान में तालाबंदी खुल चुकी है और शहर में जीवन पटरी पर लौट रहा है तो अमेरिका के अगुआ से लेकर अन्य अधिकारियों ने इस बात पर सहमति जताई कि वे आधिकारिक भाषा में कोरोना को वुहान विषाणु या चीनी वायरस नहीं कहेंगे।

कोरोना संक्रमण के भारत में फैलने और हालात बिगड़ने के बाद से हम इस स्तंभ में इसी सवाल से जूझ रहे हैं कि इस वैश्विक विषाणु से थमने के बाद ग्लोब के चलने का इंजन क्या होगा। वैश्विक बाजार पर अपने एकाधिकार के लिए युद्धोन्माद की भाषा बोलते रहने वाला अमेरिका कभी वेंटिलेटर पर धमकाता है तो कभी विश्व स्वास्थ्य संंगठन को दिया जाने वाला अपना अनुदान रोकने का एलान करता है।

कोरोना विषाणु से जूझ रहे विश्व में अमेरिका की धमकी, स्वार्थ और तंज की भाषा नया राजनीतिक कथ्य गढ़ रही है। ट्रंप बता रहे हैं कि अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। और, अपने नागरिकों के लिए किसी भी हद तक जाने का मतलब है दूसरे देश के नागरिकों के लिए भेजे जा रहे वेंटिलेटर और मास्क को हड़पने की कोशिश करना। इतने बड़े संकट में भी अमेरिका ने उन देशों से आर्थिक पाबंदी नहीं हटाई जो अपनी तबाह अर्थव्यवस्था में भी कोरोना के खिलाफ पूरी दुनिया की मदद का जज्बा दिखा रहे हैं, जो कहते हैं कि हमने बम और मिसाइल नहीं, डॉक्टर तैयार किए हैं।

कोरोना जैसी वैश्विक महामारी बार-बार यह सवाल उठा रही है कि अब हमारा वैश्विक रुख क्या होगा। अमेरिका का रवैया तो ऐसा है कि मानो पूरी दुनिया की जिम्मेदारी है उसे बचाना, लेकिन दुनिया को लेकर उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है। अब भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश सहित चीन से पुराने रिश्ते को याद कर नए तरीके से विश्लेषण हो रहा है। अमेरिका एक ऐसी वैश्विक शक्ति बन चुका है जो पूरे वैश्विक संबंधों को चुनौती देता रहा है। एकध्रुवीय शक्ति संबंध का बोझ क्या यह दुनिया आगे उठा पाएगी? जनवरी से लेकर अब तक चीन को लेकर अमेरिका की भाषा का विश्लेषण किया जा चुका है।

अमेरिका में हालात भयावह हैं, लेकिन उसके अगुआ की भाषा ‘मेरा भय कायम रहे’ वाली है। चीन तेजी से उबर कर दूसरों की तरफ मदद का हाथ बढ़ा चुका है। आगे की बात करें तो चीन के पास रसायन निर्माण के कारखाने हैं तो भारत के पास उन रसायनों के मिश्रण से दवा बनाने की अद्भुत क्षमता। मौत के मंजर पर भी अमेरिका मुनाफे की मुनादी का शोर मचाता रहा और धौंस दिखाता रहा। सवाल यही है कि कोरोना संकट से निकलने के बाद नया विश्व किस व्यवस्था की ओर उम्मीद से देखे? कोरोना के बाद उभरे एकध्रुवीय विश्व के संकट पर यह बहस जारी रहेगी।

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