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कांग्रेस कथा: विपक्षाघात

कांग्रेस से लेकर बसपा तक का उदाहरण है कि सांगठनिक ढांचे को बर्बाद कर चुके राजनीतिक दल अपने हित समूहों को खो देते हैं। बिना हित समूहों के राजनीतिक संगठन बन ही नहीं सकता है। कांग्रेस के पतन के कारणों में उसके समर्थकों और संगठन का बिखराव स्पष्ट रूप से दिखता है।

हाथरसहाथरस में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी।

लोकप्रिय जुमले का सहारा लेकर बोला जा सकता है कि जब किसी राजनीतिक दल की मौत आती है तो वह व्यक्तिवादी बन जाता है। इंदिरा के समय से ही कांग्रेस इस प्रवृत्ति का शिकार होकर गर्त में गई और विपक्ष का भी दर्जा खो बैठी। पिछले दिनों हाथरस मामले के बाद जिस तरह राहुल और प्रियंका गांधी सड़क पर उतरे, उसमें विपक्ष के रूप में उभरने की उम्मीद देखने के लिए सड़कों पर इन नजारों के बार-बार आने का इंतजार करना बेहतर रहेगा। लेकिन राहुल के सड़क पर सक्रिय होते ही सत्ता पक्ष जिस तरह अति सक्रिय हो जाता है उससे लगता है कि इनमें विकल्प की संभावना दिख रही होगी। लेकिन यह तय है कि संगठन मजबूत किए बिना सिर्फ राहुल की छवि से कांग्रेस की विकल्प के रूप में वापसी नहीं हो सकती। व्यक्तिवाद के कारण देश की पुरानी पार्टी किस तरह से सांगठनिक ढांचे और नीति निर्माण के पक्षाघात की शिकार हुई, इसकी पड़ताल करता बेबाक बोल

हाथरस की दुखद घटना के बाद जातीय हिंसा भड़काने और दुनिया में भारत की छवि खराब करने की बड़ी साजिश में शामिल हुए राहुल गांधी बताएं कि पूर्णिया की घटना पर वो चुप क्यों हैं।’ भारतीय राजनीति में यह प्रहसन का दौर है। बिहार के उपमुख्यमंत्री कांग्रेस नेता राहुल गांधी से पूछ रहे हैं कि वे पूर्णिया की घटना पर चुप क्यों हैं। उन्हें ललकारा जा रहा है कि आप बिहार में आकर क्यों नहीं बोलते। आखिर सत्ता पक्ष, विपक्ष को लेकर इतना बेपरवाह कैसे हो गया है कि अपनी मूर्खता दिखाने में भी कोई संकोच नहीं करता। प्रियंका गांधी और राहुल गांधी को अगर सामान्य रूप से हाथरस जाने दिया जाता तो वह आम राजनीतिक कवायद बन कर रह जाती। लेकिन दिल्ली से उत्तर प्रदेश के राजमार्ग पर जिस तरह उनकी घेरेबंदी की गई, प्रियंका गांधी और विपक्ष के अन्य नेताओं के साथ दुर्व्यवहार किया गया वह प्रतिरोध का एक चेहरा बन गया।

पिछले कई मामलों के विश्लेषण से एक बात तो समझ आती है कि राहुल गांधी का मजाक उड़ा सत्ता पक्ष उन्हें बहुत गंभीरता से लेता है। राहुल जो क्रिया करते हैं उनके विरोध में सरकार की उससे कहीं बहुत बड़ी प्रतिक्रिया हो जाती है। सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया देख कर लगता है कि राहुल और कांग्रेस को अपनी क्रिया की कद्र नहीं है। इसलिए उसमें निरंतरता नहीं होती और वह एक छवि प्रबंधन समारोह भर ही दिखने लगता है। सवाल यह भी उठ रहा है कि किसानों से लेकर हाथरस तक के मुद्दे पर सक्रिय होने के बाद क्या राहुल के जरिए कांग्रेस में विकल्प का चेहरा बनता दिख रहा है? राहुल गांधी जिस तरह से सड़क पर सूरत बदलने की कोशिश करते हुए अचानक ओझल हो जाते हैं उसका इतिहास देखते हुए अभी उनके लगातार टिके रहने का इंतजार करना बेहतर होगा।

कांग्रेस की क्रिया में निरंतरता के अभाव को किस तरह देखा जाए? राजनीतिक पार्टी की इमारत खड़ी होती है सांगठनिक ढांचे की बुनियाद पर। सांगठनिक ढांचे के अभाव में बचता है सिर्फ व्यक्ति। लोकप्रिय संवाद के तर्ज पर कह सकते हैं कि किसी दल की जब राजनीतिक मौत आती है तो वह व्यक्तिवादी हो जाता है। भारतीय राजनीति इस तरह की कई उम्मीदों का मर्शिया पढ़ चुकी है। उत्तर प्रदेश में जब हाथरस की घटना को जाति के वर्चस्व से जोड़ा जा रहा था तो कभी दलित आंदोलन की महानायिका रहीं मायावती हास्यास्पद बयान दे रही थीं। उनके भरभराए सांगठनिक ढांचे के बगल से होते हुए दिल्ली के जंतर मंतर पर पहुंचते हैं भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद। सियासी पक्षाघात का असर यह है कि मायावती चंद्रेशखर के खिलाफ तो मुखर बयान देती हैं लेकिन बेसुर होकर ही सही, केंद्र सरकार के पक्ष में सुर जरूर मिला देती हैं।

कांग्रेस से लेकर बसपा तक का उदाहरण है कि सांगठनिक ढांचे को बर्बाद कर चुके राजनीतिक दल अपने हित समूहों को खो देते हैं। बिना हित समूहों के राजनीतिक संगठन बन ही नहीं सकता है। कांग्रेस के पतन के कारणों में उसके समर्थकों और संगठन का बिखराव स्पष्ट रूप से दिखता है। एक समय था जब हिंदी पट्टी में उत्तर प्रदेश और बिहार कांग्रेस के सबसे मजबूत आधार थे। इन राज्यों में दलित, मुसलिम और ब्राह्मण उसके प्रतिबद्ध मतदाता थे। जवाहरलाल नेहरू ‘पंडित जी’ के रूप में इसलिए प्रसिद्ध थे कि ब्राह्मण समुदाय उनसे जातीय जुड़ाव भी महसूस करता था। वामपंथियों और समाजवादियों को लेकर जबरदस्त अभियान था कि ये नास्तिक होते हैं। इसलिए धर्मनिरपेक्षता के पूरे सूत्र की ठेकेदारी कांग्रेस के हाथ में थी।

वहीं हिंदी पट्टी की मध्यवर्ती जातियां समाजवादियों के साथ थीं। बिहार और उत्तर प्रदेश में समाजवादियों की अगुआई में ही ज्यादातर मध्यवर्ती जातियों के आंदोलन हुए जो बहुजन के नाम से जाने गए। इनमें किसानों का बहुमत था। ठाकुर व वैश्य जनसंघ और भाजपा से जुड़े हुए थे। हिंदी पट्टी की ये जातियां जमीन का सबसे बड़ा सच थीं और इन्हीं के आधार पर हितधारकों का सांगठनिक ढांचा खड़ा हुआ था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मंदिर आंदोलन को मजबूती के साथ शुरू करते ही कांग्रेस से जुड़े हितधारक कमजोर पड़ते गए। धर्मनिरपेक्षता की पूरी श्रेणी ही ध्वस्त होती सी दिखी। जब तक धर्मनिरपेक्षता का आधार रहा और भाजपा कमजोर रही तब तक कांग्रेस के साथ बड़ी संख्या में मुसलिम जुड़ते रहे थे।

दूसरा हित समूह खेती-किसानी में दिखेंगे जिनमें या तो ठाकुर या मध्यवर्ती जातियां हैं। यहां हितों का सीधा संघर्ष खेतिहर मजदूरों से है जो ज्यादातर दलित हैं। हाथरस के हवाले से भी वहां दलितों के संकट को समझा जा सकता है। वहां खेतों के मालिक ऊंची जाति के लोग हैं और दलितों को उनके आगे समर्पण करना ही पड़ता है। सवर्णों के आगे समर्पण के बिना उनके बचे रहने का कोई विकल्प नहीं है। कांशीराम और मायावती के दलित आंदोलन में मध्यवर्ती जातियां भी गोलबंद हुई थीं। उधर, मंदिर आंदोलन और धर्मनिरपेक्षता विध्वंस के बाद मुसलमानों के पास कांग्रेस को ही वोट देने का संकल्प नहीं रह गया था। उनके पास मंडल और कमंडल दो में से ही किसी एक को चुनने का विकल्प बचा। उत्तर प्रदेश में कभी वह मायावती तो कभी मुलायम के साथ जहां भी जीतने की संभावना दिखती थी, चला जाता था।

आज की स्थिति में ये सारे समीकरण बदल रहे हैं। उत्तर प्रदेश में विकास दुबे की मुठभेड़ के बाद ब्राह्मण भाजपा से विमुख होते दिखे। वहीं अब मुसलमान कांग्रेस से जुड़ रहे हैं और दलित मुद्दे के साथ विपक्ष एक शक्ल अख्तियार करता सा दिख रहा है। लेकिन इन हालात में सबसे बड़ा सच यह है कि सांगठनिक ढांचे में आए बिना कांग्रेस विकल्प के रूप में स्वीकार नहीं हो सकती है।

आज के दौर में अहम यह है कि अपने हितधारकों की वापसी के लिए कांग्रेस के पास क्या योजना है? अपने समर्थकों को निर्वात में छोड़ने और मंडल-कमंडल आंदोलन के कारण ही वह गर्त में गई थी। इसके साथ ही उदारवादी नीतियों की नाकामियां भी कांग्रेस को ही भुगतनी थीं। इंदिरा गांधी के ‘गरीबी हटाओ’ के दायरे में आने वाले वर्ग पर ही उदारीकरण की सबसे ज्यादा मार पड़ी तो वह भी कांग्रेस के खिलाफ जा खड़ा हुआ। कमजोर तबके और मजदूरों की कांग्रेस से दूरी बढ़ती गई। सवर्ण तो पूरी तरह भाजपा के हो ही गए थे।

कांग्रेस जितनी कमजोर हुई भाजपा उतनी ही मजबूत। अब कांग्रेस अपने हितधारकों की भाजपा खेमे से वापसी कराएगी तभी मजबूत हो पाएगी। लेकिन भाजपा की सबसे बड़ी मजबूती राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है जो अपने समर्थकों को सम्मान के साथ पहचान भी दे रहा है। कांग्रेस के पास आज की तारीख में न तो कोई राजनीतिक, सांगठनिक और न ही सांस्कृतिक आधार है। यह ढांचा कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय बनाया था। उस समय के बने ढांचे और साख का इस्तेमाल ही कांग्रेस लंबे समय तक करती आई थी। उस सांगठनिक ढांचे के कमजोर पड़ते ही व्यक्तिवादी पार्टी बन सिमट गई। इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक व्यक्ति आधारित राजनीति ही रही। आज भाजपा के पास व्यक्ति भी है और संगठन भी। इतिहास यही बता रहा है कि जब तक इसका मिश्रण नहीं बनेगा तब तक विकल्प के पक्षाघात से उबरने की उम्मीद नहीं है। (क्रमश:)

 

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