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बेबाक बोल- कांग्रेस कथा: आगे बंगाल की खाड़ी

ममता बनर्जी जुझारू नेता हैं और वो अपनी जमीन बचाए रखने की पूरी कोशिश करेंगी और भाजपा वहां के हिंदी भाषी प्रदेशों में अपनी पैठ बना चुकी है। ममता बनर्जी ने जिस परिवर्तन को वाम की ओर मोड़ा था आज भाजपा ‘खोए गौरव’ के नारे से उसे तृणमूल की ओर मोड़ चुकी है।

कांग्रेस कथा, बेबाक बोलबिहार के बाद बीजेपी का अगला निशाना बंगाल है। वहां वह ममता बनर्जी के किले को तोड़ने के लिए जी तोड़ कोशिश कर रही है।

बिहार के बाद चुनावी विश्लेषकों की गाड़ी बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ गई है। बिहार में महागठबंधन की सरकार नहीं बनने का ठीकरा कांग्रेस पर फूटा है। बंगाल में वो दल सत्ता में है जिसके नाम में भी कांग्रेस है। कांग्रेस से अलग हुआ हिस्सा तृणमूल बनकर वाम को परिवर्तन के नाम का किस्सा बना गया था। जिस परिवर्तन के नारे के साथ ममता बनर्जी ने तीन दशक से ज्यादा की वाम सत्ता को नेस्तोनाबूत किया था वह अब भाजपा का जयकारा बन रहा है। दस साल के तृणमूल कांग्रेस के शासन की तरफ परिवर्तन की सुई घुमा दी गई है। वाम और कांग्रेस के लिए यहां रणनीति बनाना आसान नहीं होगा क्योंकि भाजपा इन दोनों को पूरे विमर्श से ही खारिज कर तृणमूल से सीधा मुकाबला चाहेगी। कांग्रेस और वाम का गठबंधन होगा कि नहीं और ममता बनर्जी को लेकर क्या रवैया होगा ये वो सवाल हैं जो बंगाल की जमीन पर गूंज रहे हैं। इन्हीं सवालों के साथ बंगाल पर बेबाक बोल की शुरुआत।

आखिरकार बिहार में ‘ठीकै रहे नीतीशे कुमार’। बिहार की जमीन ने हवाई राजनीतिक विद्वानों को जमीनी गृहकार्य करने का संदेश दे दिया है। जनता की पटखनी के बाद मात खाए चुनावी विश्लेषक धूल झाड़ कर बंगाल की ओर रुख कर चुके हैं। बिहार के बाद बंगाल वो राज्य है जो 2024 की राजनीतिक शक्ल का खाका खींचेगा। राजनीतिक रूप से बिहार सक्रिय है तो बंगाल अति सक्रिय। भारतीय राजनीति की कई धाराएं बंगाल की खाड़ी में उतर कर अपने अस्तित्व को डूबने से बचाने की कोशिश करेंगी। कांग्रेस से निकली सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस, भाजपा, वाम दल और खुद कांग्रेस।

बिहार से तुलना करें तो भाजपा के लिए बंगाल की स्थिति विपरीत है। बिहार में भाजपा और जद (एकी) के गठबंधन की सरकार लगभग डेढ़ दशक तक खींचतान कर साथ निभा गई और आगे के लिए भी गांठ बांध ली है। लेकिन बंगाल में पिछले दस साल से ममता बनर्जी की सरकार है। दो बार के कार्यकाल के बाद ममता बनर्जी के खिलाफ एक स्वाभाविक असंतोष पसरा है जैसा बिहार में नीतीश कुमार के खिलाफ था।

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि इस बार बंगाल में बहुकोणात्मक मुकाबले का माहौल रहेगा। लेकिन भाजपा अपनी रणनीति के तहत उसे दो कोण में समेटना चाहेगी। उसकी कोशिश होगी कि ऐन चुनाव तक आमने-सामने सिर्फ भाजपा और तृणमूल कांग्रेस रहे। वाम और कांग्रेस को वह पूरे विमर्श से ही खारिज करने की रणनीति बनाएगी। ऐसे में वहां के राजनीतिक हालात का अनुमान लगाया जा सकता है। इसके लिए पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तूफानी आमद को याद कर लिया जाए। तीन दशक से ज्यादा के वाम शासन के खिलाफ जनता में जबरदस्त नाराजगी थी।

बंगाल की जनता खुद को ठहरा हुआ महसूस कर रही थी। सिंगुर और नंदीग्राम के सवाल पर वाम पूरी तरह घिर चुका था। विपक्ष के पास सीधा सवाल था कि अगर वाम को भी पूंजीवाद के आम रास्ते पर ही चलना है तो फिर उसे खास क्यों रहने दिया जाए। ममता बनर्जी ने वाम सरकार के खिलाफ असंतोष को लामबंद कर जनता के बीच अपने भरोसे का आधार तैयार किया। मां, माटी और मानुष के नारे से ममता ने विकल्प बनने की अगुआई की और ‘लाल किले’ को ध्वस्त कर दिया। नेतृत्व से लेकर संगठन के स्तर तक ममता ने वाम को ऐसी टक्कर दी जो भारतीय राजनीति में मिसाल बन गई।

आज बंगाल में सबके लिए हाल बदल गया है। बदले हाल में सबसे बड़ा सवाल है रोजगार का। यहां लंबे समय तक वामपंथी शासन के लिए भी यह सवाल अहम रहा। बंगाल में वाम की जमीन बनी थी भूमि सुधार से। इसका सबसे बड़ा फायदा हुआ कि वाम संगठन लंबे समय तक गांव के स्तर पर मजबूत हुआ। लेकिन खेती आधारित अर्थव्यवस्था की एक सीमा होती है। उसके बाद क्या? इस सवाल से सामना करने के लिए ही वाम ने बंगाल में नवउदारवादी नीति को अपनाया। इसी नवउदारवादी नीति के खिलाफ ममता बनर्जी का हल्ला बोल था। इसका असर हुआ कि वाम और खास कर माकपा का चेहरा न सिर्फ बंगाल बल्कि पूरे देश में खराब हुआ। नाराजगी यही थी कि एक तरफ आप खुद को वाम कहते हैं और दूसरी तरफ नवउदारवादी नीति को लागू करते हैं।

वाम के खिलाफ जनअसंतोष को इकट्ठा कर ममता बनर्जी बंगाल की सत्ता पर काबिज हुईं। अब दस साल बाद असंतोष की सुई ममता बनर्जी की ओर घूम चुकी है। चूंकि ममता बनर्जी ने भी नवउदारवादी नीति का विरोध जारी रखा तो उसका नतीजा ये हुआ कि आज भी बंगाल में वो सवाल बना हुआ जो वाम से पूछा गया था कि भूमि सुधार के बाद का रास्ता क्या होगा। क्षेत्र में आगे विकास कैसे होगा इसकी कोई तस्वीर उभर कर नहीं आ रही है।

बंगाल ने विभाजन भी झेला है और यहां सांप्रदायिकता का भी उभार रहा है। सरकार के खिलाफ असंतोष और हिंदूवादी राजनीति के लिहाज से उर्वर जमीन की राजनीति में भाजपा अगुआई तो लेगी ही। यहां श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विरासत तो रही ही है। यह दूसरी बात है कि लंबे समय के वामपंथी शासन और आंदोलन की वजह से वह पृष्ठभूमि में चली गई थी। अभी भाजपा उसे उसी रूप में फिर से उभार रही है।

इसके साथ ही बंगाल के सीमाई इलाके की जनसंख्या का समीकरण क्लिष्ट है। हिंदू, मुसलमान, मैथिल से लेकर बीड़ी मजदूर तक घुले-मिले हैं। यह सब घुल कर एकसार होता है तब तक तो सामान्य लगता है लेकिन यह तार-तार होकर बिखर जाने की भी प्रवृत्ति रखता है। बंगाल की सीमा से सटे बिहार के इलाके पूर्णिया, कटिहार और किशनगंज में भाजपा को मिले बंपर वोट बंगाल में उसका जोश बढ़ाने के लिए काफी हैं।

अब ऐसे में कांग्रेस की भूमिका क्या होगी? क्या वह धर्मनिरपेक्षता के नाम पर चुनाव लड़ेगी? लेकिन फिर वह ममता बनर्जी को किस मुद्दे पर घेरेगी? इसका मतलब है कि कांग्रेस को तृणमूल के दस साल के असंतोष का भी बोझ ढोना है। और अगर वो इसे छोड़ती है, ममता बनर्जी के शासन के खिलाफ ही लड़ती है तो ऐसी स्थिति में आज के समय में वो इतनी बड़ी ताकत नहीं है कि खुद विकल्प बने। ऐसी स्थिति में कांग्रेस सिर्फ ममता बनर्जी को कमजोर करेगी। और ममता बनर्जी को कमजोर करने का मतलब है भाजपा की आमद को तय करना।

2014 के बाद से भाजपा बंगाल में हासिल ही करती जा रही है क्योंकि वहां उसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है। बंगाल वाम और कांग्रेस के लिए टूटा हुआ ख्वाब है, ममता बनर्जी के लिए टूट भी सकने वाला तो भाजपा के पास पहली बार बंगाल में सरकार का सपना देखने का समय है। भाजपा काफी समय से वहां सामाजिक समीकरण पर मेहनत कर रही है और वहां के प्रभारी इशारा कर चुके हैं कि नरेंद्र मोदी का चेहरा उनका तुरुप का पत्ता रहेगा ही।

ममता बनर्जी जुझारू नेता हैं और वो अपनी जमीन बचाए रखने की पूरी कोशिश करेंगी और भाजपा वहां के हिंदी भाषी प्रदेशों में अपनी पैठ बना चुकी है। ममता बनर्जी ने जिस परिवर्तन को वाम की ओर मोड़ा था आज भाजपा ‘खोए गौरव’ के नारे से उसे तृणमूल की ओर मोड़ चुकी है।

बंगाल में कांग्रेस और वाम की हालत ‘भई गति सांप छछूंदर केरी’ वाली होगी। सांप ने छछूंदर को चूहा समझ के मुंह में पकड़ लिया। अब छोड़ेगा तो अंधा होगा और निगलेगा तो मरेगा। देखना है कि दोनों वहां गठबंधन करते हैं या नहीं। विडंबना है कि दोनों का गठबंधन विकल्प बनने की कम और ममता बनर्जी को कमजोर करने के आसार ज्यादा पैदा करेगा।

हालांकि बिहार में वाम दलों का प्रदर्शन अच्छा रहा है और वहां सरकार न बनने का ठीकरा कांग्रेस पर ही फोड़ा गया है। भाकपा माले नेता दीपांकर भट्टाचार्य वाम दलों से लेकर कांग्रेस व तृणमूल कांगेस तक की साझा एकता का प्रस्ताव रख चुके हैं तो क्या ऐसे किसी मोर्चे की संभावना बनेगी? बंगाल की शुरुआत इन तमाम मुश्किल सवालों से है। राजनीतिक इम्तहानों में लगातार नाकाम होती जा रही कांग्रेस यहां क्या कथा बुन सकेगी इस पर बात जारी रहेगी। (क्रमश:)

ढाई दशक से ज्यादा समय तक कांग्रेस में जुझारू नेता की पहचान बनाने वालीं ममता बनर्जी ने अपना दम-खम दिखाते हुए एक जनवरी 1998 को पश्चिम बंगाल की जमीन पर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की। 2006 में हल्दिया विकास प्राधिकरण ने नंदीग्राम के एक बड़े हिस्से को जब्त करने का नोटिस देते हुए उन्हें वह इलाका खाली करने को कहा। इसके खिलाफ हुए आंदोलन की अगुआई ममता बनर्जी ने की और वहां की राजनीतिक तस्वीर बदल डाली।

 

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