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बेबाक बोल: गुरु हो गए शुरू!

2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से ही कांग्रेस के लिए करो या मरो का नारा दिया जा रहा है। कांग्रेस की इन चुनौतियों पर विश्लेषण की भरमार है। लेकिन कांग्रेस नेता हर उस पैरोकार को शर्मिंदा कर रहे हैं जो भारतीय लोकतंत्र के लिए इस ऐतिहासिक राजनीतिक पार्टी को जरूरी मान रहे हैं। पंजाब एकमात्र ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस मजबूती से शासन में है। लेकिन वहां के नेता तू-तू मैं-मैं कर पार्टी की पूरी फजीहत कराने पर तुले हैं। दिल्ली में शीला दीक्षित और पीसी चाको का टकराव देख कर लगता है कि इन्होंने तय कर लिया है कि हम स्वार्थों के लिए मरेंगे लेकिन पार्टी को जिंदा करने के लिए कुछ नहीं करेंगे। सेवा दल तो कांग्रेस में रहा नहीं, अब मेवा खाने वालों के मेले पर बेबाक बोल।

Author नई दिल्ली | July 20, 2019 9:18 AM
कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह। (फोटो सोर्स पीटीआई)

क्रिकेट के बाजार में बीसीसीआइ दुनिया में एक ताकतवर संस्था बन चुकी है। लेकिन भारतीय क्रिकेट टीम पर आरोप लगते रहे हैं कि वह टीम की तरह नहीं खेलती है। भारतीय क्रिकेट के ‘भगवान’ पर भी अपने व्यक्तिगत प्रदर्शन पर तवज्जो देने के आरोप लग चुके हैं। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व सितारा नवजोत सिंह सिद्धू के पंजाब मंत्रिमंडल से इस्तीफा और कैप्टन अमरिंदर सिंह से लंबे समय से उनकी तनातनी कांग्रेस की राजनीति में भी उसी प्रवृत्ति का इशारा कर रही है। देश के सबसे पुराने राजनीतिक संगठन कांग्रेस के नेता एक संगठन की तरह काम करना भूल चुके हैं। अब जब एकमात्र केंद्रीय चेहरा राहुल गांधी दृश्य से बाहर हैं तो क्षेत्रीय क्षत्रप सिर्फ अपनी बल्लेबाजी कर क्षेत्ररक्षण से फरार होने की कोशिश कर रहे हैं।

2014 से ही हम राजनीतिक टिप्पणीकार कांग्रेस की समस्या पर बात कर रहे हैं और इस पर बहुत कुछ लिखा भी जा चुका है। अब एक बार फिर से सिद्धू और अमरिंदर की कहानी के जरिए कांग्रेस की कहानी पर बात कर ली जाए क्योंकि जो इन दोनों की समस्या है वही कांग्रेस की भी समस्या है। हिंदुस्तान के नक्शे पर पंजाब इकलौता सूबा बचा है जहां कांग्रेस की साख बची हुई है। विधानसभा से लेकर लोकसभा चुनावों में पंजाब की जनता ने कांग्रेस नेतृत्व पर भरोसा जताया। राजस्थान, मध्यप्रदेश से लेकर कर्नाटक में वह अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। इन राज्यों में कभी भी लुढकने वाली हालत में होकर भी पार्टी के नेताओं को अक्ल नहीं आई है। ऐसे समय में जब पंजाब की छवि को मजबूत करना था तो दोनों नेता उसी डाल को कुल्हाड़ी से काटने में जुट गए जिस पर बैठे हैं।

2014 लोकसभा चुनावों में शर्मनाक हार के बाद उम्मीद थी कि पार्टी अपनी विरासत और जिम्मेदारियों को समझते हुए उठ खड़ी होगी। लेकिन तभी पता चला कि कांग्रेस के नेताओं को विचारधारा के नाम पर सिर्फ सत्ता समझ में आती है। ये कांग्रेसी इसलिए थे क्योंकि ये सत्ता में थे। सत्ता से हटते ही पद लोलुप नेता भाजपा को कांग्रेस-युक्त करने में जुट गए। सबका मकसद एक ही था, खुद के लिए या फिर संतान के लिए टिकट हासिल कर लेना। पिछले पांच साल में किसी कांग्रेसी नेता ने जनता से जुड़ने के लिए कोई जमीनी लड़ाई नहीं छेड़ी। हां, करारी हार के बाद आपस में लड़ कर एक-दूसरे की जमीन जरूर खिसकाने लगे।

अशोक गहलोत जैसे वरिष्ठ नेता कांग्रेस के ऐतिहासिक संकट के दौर में इतिहास के पन्नों में इसलिए दर्ज किए जाएंगे कि वे युवा नेता सचिन पायलट को कह रहे हैं कि वे उनके बेटे की हार की जिम्मेदारी लें। राजस्थान में कांग्रेस नेतृत्व ने जितनी मेहनत चुनाव जीतने में नहीं की थी उससे ज्यादा मेहनत वहां के मुख्यमंत्री को चुनने में करनी पड़ी। समझौते और तुष्टीकरण के बाद राहुल के दाएं और बाएं खड़े अशोक गहलोत और सचिन पायलट वाली जो तस्वीर जारी हुई थी उसने आलाकमान के हाथ से कमान निकल जाने की कथा कह डाली थी।

राजनीतिक टिप्पणीकार से लेकर कई विश्लेषक जब यह साबित करने में जुटे हैं कि कांग्रेस ऐसे-वैसे उबर सकती है, फिर से उठ खड़ी हो सकती है तब कांग्रेस का हर चेहरा अपने अलग-अलग स्वार्थ दिखा इन उम्मीदों पर पानी फेर देता है। कोई एक विश्लेषक कह देता है कि कांग्रेस को मर जाना चाहिए तो ढेर सारे लोग उसे बचाने की जरूरत पर बोलते हैं, लेकिन ऐसे हर पैरोकारों को ये कांग्रेसी नेता अपने स्वार्थ से शर्मिंदा कर जाते हैं जो सवा सौ साल से ज्यादा पुरानी पार्टी को देश के लोकतंत्र के लिए जरूरी बताते हैं।

इकलौते मजबूत राज्य में भी जब कांग्रेसी तू-तू मैं-मैं में लगे हैं तो जरा सामने देखिए कि इसे चुनावों में लड़ना किससे है। जिससे लड़ना है अब कांग्रेस को सीखना भी उससे ही है अगर बचे रहना है तो। पिछले पांच सालों में भारतीय जनता पार्टी ने राजनीति का पूरा पाठ्यक्रम बदल कर रख दिया है। एक व्यक्ति केंद्रित प्रेसिडेंशियल चुनाव के स्वरूप को यहां की जनता स्वीकार चुकी है। केंद्रीयकृत मजबूत चेहरा ने भरोसा दिलाया है कि वह सबके साथ है। अब यह कोई अतिश्योक्ति नहीं रह गई कि लोग निगम चुनावों में भी नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट दे रहे हैं। नोटबंदी जैसे कड़े आर्थिक फैसले में जनता जिसके साथ रही उसकी छवि से मुकाबला करने के लिए कांग्रेस को जमीन-आसमान एक कर देने जैसी मेहनत की दरकार थी। लेकिन कांग्रेसी नेता जमीन से दूर रहकर नेहरु-गांधी वंश के नाम पर वोट मिल जाने की उम्मीद पाले बैठे रहे।

भारतीय जनता पार्टी ने पिछले पांच सालों में सांगठनिक अनुशासन की जो छवि पेश की है उससे कांग्रेस को सीखना होगा। झारखंड जैसे राज्य में भाजपा 13 उम्मीदवारों को बदल देती है और पार्टी से एक उफ्फ की आवाज नहीं आती है। इसके पहले भी उत्तराखंड से लेकर अन्य राज्यों के चुनावों में पार्टी ने कड़े फैसले किए और भाजपा आलाकमान को सबका साथ मिला। सत्रहवीं लोकसभा का मंत्रिमंडल गठन मीडिया और बाहरी लोगों के शब्दों में झटका था तो भाजपा में सामूहिक स्वीकार। मंत्रिमंडल गठन के पहले और बाद भी पार्टी में जिस तरह का अनुशासन देखा गया भारतीय राजनीति में वह लंबे समय के बाद लिखा गया नया अध्याय था।

तीन हिंदी प्रदेशों में कांग्रेस की जो जीत हुई उसमें अहम बात यह थी कि वहां की सत्ता से जनता नाराज थी। लंबे समय तक चले किसान आंदोलन के कारण भाजपा शासित राज्यों में नकारात्मक भाव आ चुका था। कांग्रेस का कौन नेता जीता इससे ज्यादा अहम यह दिखा कि शिवराज सिंह चौहान, रमण सिंह और वसुंधरा राजे हारे। कांग्रेस की दिक्कत यह रही कि इन राज्यों में जीत के बाद वहां कोई केंद्रीयकृत छवि नहीं उभरी। अशोक गहलोत या भूपेश बघेल जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों के उभार से राहुल गांधी के कद का विस्तार नहीं हुआ उल्टे कमलनाथ की छवि और राजस्थान में नेतृत्व के समझौते ने आलाकमान का कद घटाया ही। पंजाब में ही अमरिंदर ही कैप्टन की भूमिका में दिखे जहां दिल्ली की छवि बहुत दूर थी।

आज कांग्रेस का ‘सेवा दल’ इतिहास बन कर मेवा खाने वालों के मेले में तब्दील हो चुका है। जब कोई सांगठिनक ढांचा ही नहीं है तो किसी भी तरह के अनुशासन की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है। दिल्ली में शीला दीक्षित बनाम अन्य के साथ चल रही नौटंकी सब देख रहे हैं। बात हो रही है पुराने लोगों को हटा कर नयों को लाने की। सवाल है कि ये नए लोग कौन होंगे। नए तभी होंगे जब पुराने हटेंगे। तीन राज्यों में सत्ता पक्ष के लिए नकार था कांग्रेस के प्रति जनता की लामबंदी नहीं थी। बिना जनता के लामबंद हुए नेतृत्व की स्थिति कैसे बनेगी। कांग्रेस के पास न जनता है और न संगठन। ऐसी स्थिति में सिर्फ व्यक्ति और उसके हितों का टकराव रह जाता है। कांग्रेस की सारी राजनीति व्यक्तिवाद पर टिकी है, जहां जनता और संगठन के लिए कोई समर्पण नहीं और हार के लिए कोई और जिम्मेदार है। कांग्रेस की समस्या ऊपर से नीचे की है। जिस कांग्रेस में कभी करो या मरो का नारा दिया गया था उसके नेता अपने व्यक्तिवाद में करने के लिए नहीं राजनीतिक रूप से मरने के लिए तैयार हैं।

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