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बेबाक बोल: फौजी हुक्मरान

पाकिस्तान का वजीर-ए-आजम बनने के साथ इमरान खान ने खर्च कटौती, सरकारी बंगला न लेना, प्रधानमंत्री निवास को शैक्षणिक संस्थान बना देना जैसे जो लोकलुुभावन वादे किए थे, उनकी मियाद बड़ी छोटी निकली। जम्मू कश्मीर में पंचायत चुनावों के समय सीमा पार से हिंसा का अत्यधिक बढ़ जाना, जम्मू कश्मीर में भारतीय सुरक्षाबलों द्वारा मारे गए आतंकवादियों का पाकिस्तान में भारत द्वारा प्रताड़ित आजादी के नायकों के रूप में प्रचारित करना जैसे मुद्दे सामने आने के बाद यह अहसास हो गया है कि इमरान खान नया इतिहास बनाने के बजाए अपने पूर्ववर्तियों की राह पर ही चलेंगे। यह राह है बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे पाकिस्तानी अवाम को फौज के इशारे पर भारत विरोध का नशा खिलाना और वजीर-ए-आजम के तख्त पर बैठ कर सेना प्रमुख का हर हुक्म बजाना। इमरान ने नारा तो नया पाकिस्तान बनाने का दिया था, लेकिन भारत से वार्ता को लेकर उन्होंने जिस तरह से सार्वजनिक मंच पर अपशब्दों का इस्तेमाल किया, उसने नए वजीर-ए-आजम की एक अनुभवहीन अहंकारी नेता की छवि बनाई। लोकशाही के जरिए चुने गए फौजी हुक्मरान पर इस बार का बेबाक बोल।

पाकिस्तानी चुनाव में जीत के बाद इमरान अहमद खान नियाजी के भारत के प्रति ये उद्गार थे।

‘हिंदुस्तान… मुझे थोड़ा अफसोस हुआ कि वहां के मीडिया ने मुझे विलेन की तरह दिखाया। मैं वो पाकिस्तानी हूं, जिसे भारत के लोग सबसे ज्यादा जानते हैं क्रिकेट की वजह से…हम बातचीत के लिए पूरी तरह तैयार हैं। अगर भारत एक कदम आगे बढ़ाता है तो हम दो कदम आगे बढ़ाएंगे…।’ पाकिस्तानी चुनाव में जीत के बाद इमरान अहमद खान नियाजी के भारत के प्रति ये उद्गार थे। इस उद्गार के पहले और बाद में जो कुछ हुआ उसमें अहम यह है कि पाकिस्तान की डाक सेवा ने बुरहान वानी सहित जम्मू कश्मीर में भारतीय सुरक्षाबलों द्वारा मारे गए 20 आतंकियों के नाम पर डाक टिकट जारी किए। जो भारत में आतंकी हैं उनकी तस्वीरों के नीचे पाक डाक सेवा ने स्वतंत्रता का प्रतीक शब्द जोड़ा है। अपने वतन की भूख, गरीबी और अशिक्षा को भूल पाक के हाकिमों को कश्मीर के आतंकियों के दुख पर रोना ज्यादा भाता है। इन आतंकियों में से एक बुरहान वानी को पाक के पूर्व वजीर-ए-आजम नवाज शरीफ ने संयुक्त राष्टÑ में कश्मीरी इंतिफादा का प्रतीक कहा था। फिलस्तीनियों के संघर्ष के संदर्भ में इंतिफादा का मतलब क्रांतिकारी शहीद होता है। शरीफ पाक हुकूमत का वो चेहरा थे जिन्होंने भारत के साथ बेहतर संबंध बनाने की कोशिश की थी। लेकिन पाकिस्तानी फौज को उनका शांति दूत बनना मंजूर नहीं था।

फौज का ही दबाव था कि जल्द ही उन्हें कश्मीर और भारत विरोध का राग अलापते हुए बुरहान वानी को क्रांतिकारी शहीद घोषित करना पड़ा। जो बुरहान वानी कश्मीर में भारत की संप्रुभता को चुनौती देते हुए आतंकियों का आका बना बैठा था उसे फौज के इशारे पर शहीद बताने वाले नवाज शरीफ कब फौज के इशारे पर सियासी शहीद बना दिए गए इसका इल्हाम तो इमरान को होगा ही। तो यही इमरान खान भारत की ओर से विदेश मंत्री स्तर की वार्ता खारिज करने के बाद लिखते हैं, ‘शांति बहाली के लिए वार्ता की मेरी पहल पर भारत ने अहंकारी और नकारात्मक प्रतिक्रिया दी है, जिससे मैं बेहद निराश हूं। हालांकि, मैं पूरी जिंदगी छोटे लोगों से मिला हूं, जो ऊंचे पदों पर बैठे हैं, लेकिन इनके पास दूरदर्शी सोच नहीं होती है’। कश्मीर और भारत-पाक दोस्ती जैसे संवेदनशील मुद्दे पर यह बयान उस नए राष्ट्राध्यक्ष का है जो नया पाकिस्तान बनाने का राग अलाप रहे थे। इस एक ट्वीट से इमरान खान ने खुद को बेनकाब कर लिया कि वे एक अनुभवहीन सियासतदान हैं। ऐसा ओछा बयान देकर इमरान ने भारत के साथ बातचीत के रास्ते बंद कर लिए हैं। भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने ट्वीट कर कहा, ‘बातचीत के पीछे पाकिस्तान की मंशा साफ हो गई है। सरकार में आने के शुरुआती दिनों में ही प्रधानमंत्री इमरान खान का असली चेहरा सामने आ गया है’। इमरान के ट्वीट के अलावा भी सरहद पर जो नापाक हरकतें चल रही हैं उससे यही साफ है कि पाकिस्तान के हुक्मरान बातचीत और शांति की राह चाहते ही नहीं हैं। पंचायत चुनावों के पहले जम्मू कश्मीर में बढ़ती हिंसा इसका सबूत है।

पाकिस्तान में आम चुनाव जीतने के बाद इमरान ने भारतीय मीडिया को उन्हें खलनायक बनाने के लिए अफसोस जताया। भारतीय मीडिया पर तंजदारी करने के पहले शायद उन्होंने अपनी तलाकशुदा पत्नी रेहम खान की आत्मकथा की पांडुलिपि नहीं पढ़ी थी। आज रेहम की वह किताब वैश्विक स्तर पर बिक रही है, जिसमें इमरान खान को जादू-टोने में यकीन करने वाला एक अय्याश बताया गया है। बताया गया है कि किस तरह से लंदन में उनका घर कालेधन से चलता था। एक पूर्व पत्रकार और इमरान की पूर्व पत्नी ने जिस तरह से पाक के नए हाकिम को बेनकाब किया है वह उन्हें खलनायक बनाने के लिए काफी है, उसके लिए भारतीय मीडिया को मेहनत करने की जरूरत नहीं है। पाकिस्तानी मीडिया में नायक बनने के लिए इमरान खान ने अपना पूरा चुनाव प्रचार भारत विरोध और कश्मीर-कश्मीर के राग को समर्पित कर दिया था। वजीर-ए-आजम बनने के बाद जिस तरह से इमरान खान ने सरकारी खर्चे घटाने और अन्य तरह के लोकलुभावन नारे दे कर वैश्विक मीडिया की तवज्जो बटोरी वही मीडिया जानता था कि कभी घातक गेंदबाज रहे इमरान खान अब पाकिस्तानी फौज की गेंद भर हैं। यह फौज के आका पर निर्भर है कि वह अपने बल्ले से इस गेंद को किधर फेंकता है। फौज के बल्ले ने जब इस गेंद से भारत विरोध का छक्का लगाया तो एक कमजोर, अनुभवहीन सियायसतदान सामने आया। सार्वजनिक मंच पर इमरान की अशोभनीय बातें दर्ज होते ही वैश्विक मीडिया के मुंह से निकला, ‘हाउ इज दैट’ (क्रिकेट के मैदान में विपक्षी के खिलाफ खिलाड़ी की अपील)। तो इसे क्रिकेट नहीं, फुटबॉल की भाषा में आत्मघाती गोल कहते हैं। आपकी भाषा किसी भी तरह एक देश के प्रधानमंत्री की भाषा नहीं है। एक देश का प्रधानमंत्री जब सार्वजनिक मंच पर अपशब्द बोले, तो उससे ज्यादा शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता। शायद, ऐसा शर्मनाक इतिहास बनाने वाले जनाब खान पहले हैं।

रेहम खान ने अपनी किताब में इमरान पर जादू-टोने पर विश्वास करने का जो आरोप लगाया है उसकी तस्दीक हम इमरान खान के तीसरे निकाह में देखते हैं। आरोप है कि पीर की दुआ और ताबीज उन्हें राजयोग दिलाएगा, इसी अंधविश्वास के कारण इमरान ने बुशरा मानिका से शादी की। बुशरा मानिका पाकिस्तान में पिंकी बीबी के नाम से मशहूर पीर हैं।
इमरान खान की यह बात सही है कि भारत में ज्यादातर लोग उन्हें क्रिकेट के कारण जानते हैं। लेकिन वह समय कुछ ज्यादा ही जल्दी आ गया कि अपनी छोटी सोच सामने लाने के बाद इमरान अब पाकिस्तानी फौज की गेंद के रूप में जाने जाएंगे। प्रधानमंत्री बनने के बाद इमरान खान ने आखिरी पैगंबर मुहम्मद को अपनी प्रेरणा बताते हुए कहा था कि वे मुहम्मद साहब की तरह मदीना में एक आदर्श कल्याणकारी राज्य स्थापित करना चाहते हैं। सत्ता की हकीकत सामने आते ही वे इतनी जल्दी पैगंबर साहब की सीख को भूल सेना प्रमुख के उसूल पर चल रहे हैं।

इमरान को शायद अपने देश का इतिहास पढ़ने का मौका मिला ही होगा कि यहां का वजीर वह प्यादा है जिसे सेना कभी भी मैच खेलते हुए दर्शकदीर्घा में वापस बुला सकती है। इमरान खान को हमवतन पाकिस्तानी शायर हबीब जालिब का यह शेर जरूर पढ़ना चाहिए, ‘हुक्मरां हो गए कमीने लोग/खाक में मिल गए नगीने लोग/हर मुहिब्ब-ए-वतन ज़लील हुआ/रात का फासला तवील हुआ’। इमरान खान को लगता होगा कि अपनी पीर बीवी की वजह से वो प्रधानमंत्री बने। क्रिकेट के मैदान पर तो उन्होंने अपनी मर्जी की पारी खेली थी। लेकिन पाकिस्तानी सियासी मैदान से छोटे लोग और ऊंचा ओहदा जैसी अहंकारी तंजदारी करने वाले को जालिब साहब का एक और शेर याद रखना चाहिए, ‘तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहां तख्त-नशीं था/उस को भी अपने खुदा होने पे इतना ही यकीं था’। इमरान खान जैसे लोग भारत विरोध की जगह अपने देश में लोकशाही मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान देते तो शायद जनता का दिया कार्यकाल पूरा होने तक तख्तनशीं हो सकते थे। अभी तो फौज की खिलाई भारत विरोध की अफीम का नशा है। देखते हैं, आप कब तक तख्तनशीं रहते हैं।

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