Babaak Bol written by Mukesh Bharadwaj about The Wrath Era - बेबाक बोल : क्रोध काल मुकेश भारद्वाज - Jansatta
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बेबाक बोल : क्रोध काल

हमने अपने पूरे माहौल में गुस्से और अहंकार का जो गुबार रच दिया है वह अब हमारे बच्चों के दिमाग में फूट रहा है। किसी की हत्या से ज्यादा हिंसक कुछ नहीं हो सकता। एक स्कूली बच्चे पर आरोप लगता है कि उसने अपने ही स्कूल के छात्र की इसलिए हत्या कर दी कि परीक्षा की तारीखें आगे बढ़ जाएं। परीक्षा का ऐसा डर कि बच्चा किसी की जान लेने से भी नहीं हिचकता है। हमने परीक्षा और अन्य प्रदर्शनों की ऐसी साख बना दी है कि हमारे बच्चे उसमें बेसाख होने से डरने लगे। जिन आधुनिक मूल्यों और आजादी को टीवी पर दिखाया और किताबों में पढ़ाया जाता है परिवार और स्कूल के अंदर उसमें कतरब्योंत होने पर उनकी हिंसक प्रतिक्रिया होने लगी। और इसके हल के रूप में सामने रख दिए जाते हैं सीसीटीवी कैमरा और सुरक्षाकर्मी। अभिभावक कैमरा देखें और उनके बच्चे सुरक्षित, फिलहाल यही समझ बनी है। यानी हम मान बैठे हैं कि परिवार और स्कूल के अंदर कोई समस्या ही नहीं है। सीसीटीवी, सुरक्षाकर्मी और मां-बाप की निगरानी ही क्या इतनी बड़ी समस्या का हल है? हम कहां और कैसे इतने गलत हो गए कि हमारे बच्चे कातिल बन रहे हैं। इस बार का बेबाक बोल हिंसक होते बच्चों पर।

प्रद्युम्न

लंदन में भारतीय मूल के एक किशोर ने अपने पिता की हत्या के लिए उनकी गाड़ी में बम लगा देने की साजिश रची। इसके पीछे वजह यह थी कि उसके पारंपरिक सिख पिता को अपने बेटे की लड़की दोस्त पसंद नहीं थी। किशोर ने अपने पिता की हत्या के लिए ऑनलाइन विस्फोटक खरीदने की कोशिश की। पुलिस पहले इसे संगठित अपराध या आतंकवाद से जुड़ा मामला मान कर तफ्तीश कर रही थी। बाद में पता चला कि लड़के ने अपने मां-बाप के प्रतिबंध के खिलाफ इस तरह गुस्सा निकाला। दिल्ली से सटे गुरुग्राम के एक बड़े निजी स्कूल में स्कूली छात्र पर आरोप है कि उसने अपने ही स्कूल के एक छात्र की हत्या इसलिए कर दी क्योंकि वह चाहता था कि परीक्षा की तारीखें आगे बढ़ जाएं। ग्रेटर नोएडा में एक किशोर अपनी मां और बहन की हत्या इसलिए कर देता है क्योंकि मां उसे पढ़ाई के लिए डांटती थी। लखनऊ में एक स्कूली छात्रा पर आरोप है कि वह अपने से छोटे छात्र को स्कूल के अंदर चाकू से घायल करते हुए कहती है कि तुम मरोगे नहीं तो छुट्टी कैसे मिलेगी। वहीं एक छात्र स्कूल प्राचार्य को गोली से उड़ा देता है।

अभी तक हम अमेरिका और इंग्लैंड की बाल हिंसा पर चौंकते थे और अपनी महान भारतीय परंपरा का गुणगान करके खुश हो लेते थे कि हम तो अपने बच्चों को छड़ी से पीटने और उन्हें मुर्गा बनाने और उठक-बैठक कराने वालों में से हैं। हमारे यहां गुरु जी, मास्टर या टीचर जी माने छड़ी। हमारे देश में पांच दशक पार हर इंसान के पास अपनी बचपन की पिटाई की कहानी है कि हमें तो पिता ने या शिक्षकों ने इतना मारा। सारी सफलता का श्रेय उस पिटाई को ही दिया जाता। गोया ये गुरुजी की पिटाई न होती तो कोई डॉक्टर, इंजीनियर या आइएएस नहीं बनता। आज जब इक्कीसवीं सदी भी अपनी जवानी का एलान कर चुकी है तो इस बालिग समय में हमारे बच्चे हमें डरा रहे हैं। आभासी दुनिया में ब्लू वेल के कार्य के लिए जान देते बच्चे या गृहकार्य और परीक्षा के नाम पर मां से लेकर सहपाठियों और शिक्षकों तक की जान लेते बच्चे। कहां से आया है इनमें इतना गुस्सा और कहां पर जाकर हम इतने गलत हो गए कि हमारे बच्चे हत्यारे बन बैठे। अब जब इतनी बड़ी समस्या दिख रही है तो उसके हल पर भी बात होगी ही।

ऊपर वर्णित घटनाओं में बच्चों का गुस्सा हिंसक प्रतिक्रिया के रूप में बाहर निकल रहा है। गुस्सा और गुस्से के जरिए हिंसा। इंग्लैंड से लेकर यमुनानगर तक बच्चों के गुस्से की वजहें अलग-अलग हैं। एक तरफ तो आधुनिक मूल्यों के तहत दी गई आजादी है और जब उसमें कतरब्योंत होती है, अभिभावक या शिक्षक उसमें बाधा बनते दिखते हैं तो वे उस बाधा को खत्म करने पर उतारू हो जाते हैं। दूसरी तरफ पारिवारिक लालन-पालन और शिक्षण पद्धति की भी समस्या है। अभी पिछले दिनों दिल्ली सरकार ने एलान किया कि उसके सारे स्कूलों की कक्षाओं में सीसीटीवी कैमरे लगेंगे और उन कैमरों को अभिभावकों के मोबाइल से जोड़ा जाएगा। खास मोबाइल ऐप के जरिए अभिभावक स्कूल के दौरान अपने बच्चों पर नजर रख सकेंगे। बच्चे को कौन और कैसे पढ़ा रहा है, वह किससे और कैसे बात कर रहा है यह सब अभिभावकों की निगरानी की जद में होगा। तो सरकार, कैमरा और अभिभावक। फिलहाल यही हल सूझा इतनी बड़ी समस्या का। लेकिन इस हल में समस्या यह है कि हम परिवार और लालन-पालन की समस्या को छूना ही नहीं चाहते। परिवार, समाज की और शिक्षा की सबसे छोटी इकाई है। हम यह मान कर चल रहे हैं कि परिवार, अभिभावकों, माहौल और समाज में कोई समस्या ही नहीं है। सरकार भी बच्चों को कैमरों और अभिभावकों के भरोसे छोड़ पल्ला झाड़ रही है।

हाल ही में दिल्ली के एक नामी विश्वविद्यालय के प्रबंधन ने एक ऐसा ऐप जारी करने का एलान किया जिसके जरिए अभिभावक यह जान सकेंगे कि उनका बच्चा किस दिन कॉलेज नहीं पहुंचा। शिक्षक जब कक्षा में जाएगा तो उसका मोबाइल विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों से भी जुड़ जाएगा। ये वो बच्चे हैं जो 18 साल की उम्र में पहुंच कर अपनी सरकार चुनने का अधिकार हासिल कर चुके हैं। लेकिन विश्वविद्यालय प्रबंधन ने इन बालिगों को भी अभिभावकों की निगरानी में छोड़ दिया। यहां तक कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे संस्थान में भी कक्षाओं में तयशुदा मौजूदगी का रडार बना दिया गया है। खास कर लड़कियों की आजादी को लेकर हर शिक्षा संस्थान में नकार का भाव है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में भी आंदोलनरत छात्राओं को ‘शांत’ करने के लिए हॉस्टल खाली करा अभिभावकों के पास भेज दिया गया। प्रशासन को सबसे मुफीद यही लगा कि मां-बाप-भाई समझाएंगे और लड़कियां चुपचाप कक्षाओं में लौट जाएंगी। छात्राओं की समस्या सुलझाने के बजाए उसे दबाने के लिए पारिवारिक मदद ली गई। गुरुग्राम के स्कूल की घटना के बाद केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल अपनी एक योजना लेकर सामने आया जिसके तहत उसने स्कूलों के सामने लाखों रुपए के सुरक्षा पैकेज रखे। बल का दावा है कि उसने मुंबई के एक विख्यात स्कूल जिसमें सभी बॉलीवुड कलाकारों और नेताओं के बच्चे पढ़ते हैं उसे भी शुल्क लेकर सुरक्षा मुहैया कराई है। अभिभावकों की निगरानी के बाद निजी सुरक्षाकर्मियों का भी बाजार खड़ा कर दिया गया है। जाहिर है कि इन सुरक्षाकर्मियों के खर्च का बोझ बच्चों के स्कूल शुल्क और अभिभावकों की जेब पर पड़ेगा। अभिभावक अपने बच्चों के लिए पैसे खर्च कर भी दें। लेकिन गुरुग्राम से लेकर इंग्लैंड तक की घटना क्या सिर्फ सुरक्षा और निगरानी से जुड़ा मामला है। ग्रेटर नोएडा का बच्चा अपनी मां को मार डालता है क्योंकि वह उसे सोफे पर बैठकर पढ़ने से मना करती है। इस बच्चे के मन में जो एक छद्म अहंकार घर कर गया क्या उसे सोसायटी या स्कूल के बाहर खड़ा सुरक्षाकर्मी दूर कर पाएगा? अभी हमारे पूरे समाज में जो उग्रता का माहौल है उसका असर बच्चों की संवदेनशीलता पर पड़ रहा है।

एक बच्चे को लगता है कि परीक्षा में कम अंक आने से उसका सामाजिक उत्पीड़न होगा। मां-बाप और शिक्षक की फटकार उसे अपनी गरिमा के खिलाफ लगती है। स्कूल एक ऐसी जगह बन जाता है जहां जाने से उसे डर लगने लगता है। अपनी छवि को लेकर वह इतना संवेदनशील हो जाता है कि परीक्षा की तारीखें बढ़वाने के लिए हत्या जैसा असंवेदनशील कदम उठा लेता है। उसे लगता है कि ऐसी हिंसा कर वह परीक्षा देने और कम अंक लाने पर सामाजिक रूप से प्रताड़ित होने से बच जाएगा। वह उस चीखते हुए इंसान के प्रति संवदेनशील नहीं होता जो उसके हाथों मर रहा है, उसे अपने परिवार, स्कूल और दोस्तों में वैसी ही साख हासिल करनी है जैसा उसके मां-बाप चाहते हैं और जैसा बनाने के लिए स्कूल का पूरा संसाधन खर्च होता है। ऐसा नहीं होने पर वह हिंसा का सहारा लेता है। यहां समस्या सीधे परिवार से लेकर स्कूल तक में दिख रही है। शिक्षण व्यवस्था से लेकर लालन-पालन तक की है। सीसीटीवी और पारिवारिक निगरानी के भरोसे हल निकालने के बजाए बात इस पर हो कि परिवार, स्कूल और सरकार तीनों का रचनात्मक तालमेल कैसे कराया जाए जिसमें एक व्यक्ति (इंडिविजुअल) को व्यस्त रख उसे सही दिशा मे ले जाया जाए। सिर्फ सीसीटीवी और सुरक्षाकर्मी के भरोसे हम अपने बच्चों को नहीं बचा पाएंगे।

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