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अ-शोक स्तंभ

अगर राहुल गांधी ने पहले की सांप्रदायिक घटनाओं पर ही अशोक गहलोत की जिम्मेदारी तय की होती तो आज सुंदर झीलों के शहर उदयपुर पर धर्मांधता के खौफ का साया नहीं तैर रहा होता। राहुल गांधी सांप्रदायिक मामलों में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से ही थोड़ा सीख लेते। राजस्थान में जो हुआ वह पूरी तरह से एक सरकार और पार्टी की नाकामी का सबूत है। अशोक गहलोत सरकार के प्रशासन की नाकामी से जिस तरह कट्टरपंथियों के मंसूबे पूरे हुए वह राहुल गांधी के राजनीतिक मंसूबों के लिए दावत-ए-बर्बादी ही है।

राजस्थान में पिछले चार साल से सांप्रदायिक तनाव और दंगे अशोक गहलोत पर सवालिया निशान लगा रहे थे। सांप्रदायिक तनाव के दीमक को कांग्रेस आलाकमान उसी रणनीति के तहत अनदेखा करता रहा जैसा कभी शाह बानो मामले में उनके पुरखों ने किया था। इस साल राजस्थान में पर्व-त्योहार सांप्रदायिक उपद्रवियों के उत्सव में तब्दील होता रहा। राजस्थान के मुखिया की हालत कांग्रेस के विरासती प्रतीक की तरह हो गई है जिनसे सिर्फ अतीत का सबक लिया जा सकता है, लेकिन भविष्य के लिए वर्तमान में नए निर्माण की दरकार होगी। कांग्रेस के लिए घोर अंधेरे इस समय में जो दो चिराग बचे हैं उन्हें हर तरह से बचाने की जरूरत थी। राजस्थान के चिराग को अशोक गहलोत ने जिस तरह सांप्रदायिक ताकतों की आंधी के हवाले कर दिया उससे अशोक स्तंभ कब शोक स्तंभ में बदल जाएगा यह राहुल गांधी को पता भी नहीं चलेगा। राजस्थान के हालात पर बेबाक बोल

‘राजस्थान सांप्रदायिक सौहार्द के लिए जाना जाता है। यहां के भाईचारा और अपनायत की मिसाल पूरे देश में दी जाती है…मेरा सभी धर्मगुरुओं, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों एवं समाजसेवियों से आग्रह है कि वे सामाजिक सौहार्द की अपील करें, ताकि प्रदेश में शांति का वातावरण बना रहे। प्रदेशवासी अशांति फैलाने एवं माहौल खराब करने वाले असामाजिक तत्त्वों के बहकावे में न आएं।’

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सरकारी कागजों पर जो अपील की है उसकी जरूरत न पड़ती अगर वे राज्य की जिम्मेदार सरकार की तरह व्यवहार करते। एक कुशल कामगार जो अपने हुनर से जिंदगी की गाड़ी चला रहा था उसने राज्य की मशीनरी को अपने ऊपर आए खतरे को लेकर आगाह भी किया था। सुरक्षा मांगी थी। एहतियातन कुछ दिन घर में भी बैठा रहा। लेकिन शायद उसे राज्य और कानून की व्यवस्था पर भरोसा रहा होगा। इसी भरोसे वह काम पर लौटा। हत्यारे उसके ग्राहक बनकर आए। उसकी जघन्य हत्या कर वीडियो इंटरनेट पर डाला।

भारत में इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों की शैली में इस हत्या के बाद राहुल गांधी से क्या उम्मीद थी? उन्हीं राहुल गांधी से जो भट्टा-पारसौल से लेकर उत्तर प्रदेश में हुई हर ज्यादती के बाद लोकतंत्र के रखवाले के तौर पर पहुंचते हैं। उत्तर प्रदेश की सरकार से सवाल पूछते हैं कि आखिर हत्यारों की इतनी हिम्मत कैसे हुई? कहां था उत्तर प्रदेश का कानून व प्रशासन? वही राहुल गांधी जो विदेशी मंचों पर वहां की जनता के बीच भारत के राजधर्म की बात करते हैं। जिस हत्या ने पूरे देश को खौफ भरा रतजगा दे दिया, उसके बारे में एक ट्वीट कर राहुल गांधी सो गए।

धर्मांधता के नाम पर राजस्थान में जो हत्या हुई उस पर उच्चतम कार्रवाई की उम्मीद थी। कन्हैयालाल की इस हत्या की कितने लोगों ने भर्त्सना की यह भी उंगलियों पर गिना जा सकता है। यह कोई आम आपराधिक घटना नहीं है। इसके तार उस अंतरराष्ट्रीय गिरोह से जुड़े बताए जा रहे हैं जिस पर पाकिस्तान में सलमान तासीर जैसे उदारवादी नेता की हत्या का आरोप है। तासीर जैसे उदारवादी नेताओं के हत्यारों को लेकर सहिष्णु रहने वाले देश पाकिस्तान का आज क्या हाल है हम देख सकते हैं।

कन्हैयालाल की पत्नी का बयान है कि मेरे पति ने मुसलमानों को भी काम पर रखा था। वे किसी धर्म को कमतर नहीं समझते थे। फिर कन्हैयालाल की पत्नी को अपने पति की हत्या का दृश्य याद आता है और वे हिंदुओं को संगठित होने की जरूरत भी बताती हैं। मुसलिमों के साथ रोजी-रोटी कमाने वाले व्यक्ति की पत्नी अगर अपनी धार्मिक अस्मिता को लेकर खौफजदा हो गई है, तो इसके सबसे पहले जिम्मेदार राज्य के मुखिया अशोक गहलोत हैं।

अगर गहलोत हत्या वाले दिन ही कन्हैयालाल के परिवार के पास पहुंच जाते तो शायद उनकी पत्नी और परिवार की मानसिक हालत कुछ और होती। उसी दिन पहुंच कर प्रियंका गांधी ने गले लगाया होता या राहुल गांधी मरने वाले के घर की चौखट पर गमजदा हुए होते, अशोक गहलोत पर सख्त कार्रवाई की होती तो बात समझ में आती कि यह सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा एजंसी नहीं बल्कि राज्य की राजनीति का भी मामला है।

इस आग के पहले राजस्थान में सांप्रदायिक तनाव की चिनगारी कई बार सुलग चुकी है। राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों की बात करें तो पिछले चार साल के अंदर राज्य में सांप्रदायिक हिंसा की छह बड़ी घटनाएं हो चुकी हैं। इस साल दो अप्रैल को करौली में हिंदू नव वर्ष पर हुई हिंसा में भयानक आगजनी में 35 से ज्यादा दुकानें जला दी गई थीं और इलाका पंद्रह दिन तक कर्फ्यू के साये में रहा था।

करौली हिंसा के तार कांग्रेस पार्षद से ही जुड़े होने के आरोप लगे थे। पिछली तीन मई को परशुराम जयंती और ईद का उत्सव साथ पड़ने पर अशोक गहलोत का गृह नगर आग और पत्थरों के हवाले हो चुका था, जिसके कारण तीन दिन का कर्फ्यू लगाना पड़ा था। झालावाड़ और बारां भी देश के नक्शे पर सांप्रदायिक दंगे के कारण दागी हो चुका था।

पिछले कुछ समय से ऐसा हाल हो गया था कि राजस्थान में हर पर्व-त्योहार और उत्सव को हिंसक माहौल में तब्दील कर दिया जा रहा था। गलियों में निकलने वाले हर उत्सवी जुलूस पर पत्थर बरसने लगते थे। हर दंगे व तनाव के बाद गहलोत कागजी सख्ती दिखा कर सो जाते थे और राजस्थान के गली-मोहल्ले किसी नई फसाद के खौफ में जागे रहते थे।

पिछले काफी समय से रोज शाम टीवी बहसों में राजस्थान में हो रहे सांप्रदायिक तनाव और धार्मिक हिंसा का जिक्र हो रहा था। इस जिक्र और फिक्र को अशोक गहलोत से लेकर राहुल गांधी तक ने कितनी तवज्जो दी? टीवी पर कांग्रेस के प्रवक्ता अपनी राजस्थान सरकार के बचाव के लिए तर्क तो गढ़ लेते थे। लेकिन वहां से लौट कर वे अपने नेताओं को यह बताने की जहमत क्यों नहीं उठाते थे कि राजस्थान में हम चौतरफा सवालों के घेरे में हैं। क्या प्रवक्ताओं का काम टीवी पर वाद-विवाद की प्रतियोगिता में हिस्सा भर लेना होता है। क्या राहुल गांधी जैसे कांग्रेस के अदृश्य अध्यक्ष की जिम्मेदारी नहीं बनती है कि कार्यकर्ताओं व प्रवक्ताओं से जमीनी हालात का जायजा लें।

सांप्रदायिक तनाव व हिंसा किसी भी राज्य की शक्ति में लगा वह दीमक होता है जो उसे अंदर ही अंदर खोखला कर रहा होता है। सरकारें पहले उसे नजरअंदाज कर पुलिस थाने से जुड़े लोगों पर जिम्मेदारी थोप कर सो जाती हैं। लेकिन एक दिन ऐसा आता है कि दीमक उसे अंदर से इतना खोखला बना देता है कि सत्ता भरभरा कर गिर जाती है। राहुल गांधी अगर राजस्थान की सत्ता में लगे इस दीमक को देख कर भी इसका इलाज नहीं कर रहे थे तो फिर यही माना जाए कि सांप्रदायिकता व कथित राजधर्म पर उनका विदेशों में बोलना और ट्वीट करना उनके छवि-प्रबंधन तंत्र का हिस्सा भर ही है।

राजस्थान पुलिस ने कन्हैयालाल को सांप्रदायिक तनाव के आरोप में गिरफ्तार किया था तो जाहिर सी बात है कि वे कट्टरपंथियों की नजरों में दुश्मन बन गए थे। उन्होंने पुलिस को बताया कि उनकी जान पर खतरा है लेकिन कानून-प्रशासन ने उन्हें कट्टरपंथियों के हाथों मरने के लिए अकेला छोड़ दिया। पुलिस-प्रशासन की इस एक लापरवाही ने देश के इंटरनेट पर वह वीडियो डाल दिया जो सिर तन से जुदा वाले आतंकवादियों के नारे का महिमामंडन करता है।

अशोक गहलोत आज प्रधानमंत्री से लेकर धर्मगुरुओं से कह रहे हैं कि वे सूबे में शांति की अपील करें। राजस्थान के लोगों ने केंद्र के नेताओं व धर्मगुरुओं को नहीं कांग्रेस को वोट दिया था। भाजपा की आंधी के समय में भी कांग्रेस पर भरोसा किया था। ऐसे विपरीत माहौल में कांग्रेस के कंधों पर ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी आती है कि वे राज्य के शासन-प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त रखें।

अगर राहुल गांधी ने पहले की सांप्रदायिक घटनाओं पर ही अशोक गहलोत की जिम्मेदारी तय की होती तो आज सुंदर झीलों के शहर उदयपुर पर धर्मांधता के खौफ का साया नहीं तैर रहा होता। राहुल गांधी सांप्रदायिक मामलों में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से ही थोड़ा सीख लेते। राजस्थान में जो हुआ वह पूरी तरह से एक सरकार और पार्टी की नाकामी का सबूत है। अशोक गहलोत सरकार के प्रशासन की नाकामी से जिस तरह कट्टरपंथियों के मंसूबे पूरे हुए वह राहुल गांधी के राजनीतिक मंसूबों के लिए दावत-ए-बर्बादी ही है।

कांग्रेस के लिए घनघोर अंधेरे से भरे इस समय में ऐसा लग रहा है कि राहुल गांधी अपने बचे-खुचे चिरागों को खुद ही फूंक मार कर बुझा रहे हैं। अगले साल राजस्थान में चुनाव है तो क्या अब भी वहां के मुखिया को अशोक स्तंभ की तरह ही देखा जाएगा? राजनीति में अशोक स्तंभ का ऐतिहासिक महत्त्व हो सकता है, असल अशोक स्तंभ की तरह उनकी सराहना तो की जा सकती है लेकिन उन पर नई इमारत नहीं खड़ी हो सकती। उसके लिए आपको नया नक्शा और नई सामग्री की दरकार होगी। यह बात राहुल गांधी जितनी जल्दी समझ लें उतना ही कांग्रेस की सेहत के लिए अच्छा होगा।

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