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कांग्रेस कथा 1: कुकर क्रांति

सत्ता के अहंकार में आसमानी घमंड से झूम रही पार्टी को वही संगठन जमींदोज कर सकता था जो पिछले तीन दशकों से जल, जंगल, जमीन पर काम कर अपने अनुकूल पर्यावरण को रच रहा था। कांग्रेस सिर्फ अपने कुछ नहीं करने के कारण खत्म हुई ऐसा नहीं था। वह संघ का संगठन था जिसने कांग्रेस को जलवायु संकट में धकेल दिया।

बेबाक बोलछह साल बाद अण्णा आंदोलन की बुनियाद की पड़ताल।

2014 भारतीय राजनीति की दशा और दिशा दोनों बदलने वाला समय था। आजादी के बाद पहली बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अपने निम्नतम और उसके विकल्प में भारतीय जनता पार्टी जनादेश के उच्चतम पर थी। वह वक्त छवि निर्माण के युद्ध में बदल गया था जिसमें कांग्रेस बुरी तरह खारिज हुई। आज छह साल बाद अण्णा आंदोलन के प्रमुख चेहरा रहे प्रशांत भूषण कहते हैं कि कांग्रेस के खिलाफ उभरे उस प्रचंड जनविरोध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका थी। सवाल है कि जनता ने विकल्प में भारतीय जनता पार्टी का ही चेहरा क्यों देखा? जब कांग्रेस का ‘सेवा दल’ खुदाई खिदमतगार से सत्ता के स्वार्थ तक ही सिमट चुका था तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सांस्कृतिक और सामाजिक जमीन पर काम कर वैकल्पिक राजनीतिक जमीन तैयार कर चुका था। जनांदोलन की जमीन पर जमींदोज होने वाली कांग्रेस पर संवाद की नई कड़ी के साथ विपक्ष पर बात करने की जरूरत बताता बेबाक बोल

‘कांग्रेस मुक्त भारत’
2014 के आम चुनाव के समय देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का यह नारा था। उसके छह साल बाद पिछले हफ्ते वकील प्रशांत भूषण टीवी पर साक्षात्कार के दौरान खुलासा करते हैं कि अण्णा आंदोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक की भूमिका थी। गनीमत थी कि इस रहस्योद्घाटन के बाद एक राजनीतिक दल के पूर्व संस्थापक सदस्य और देश के सबसे काबिल वकील ‘रसोड़े में कौन था’ सरीखे सवाल की तरह तीन बार भौंचक होते नहीं दिखाए गए। बस उनसे यह नहीं पूछा गया कि प्रेशर कुकर से चने निकाल कर खाली कुकर को चूल्हे पर किसने चढ़ाया था।

आज छह साल बाद अण्णा आंदोलन की बुनियाद की पड़ताल करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या उस वक्त प्रशांत भूषण और पत्रकारों को यह नहीं पता था कि देश किस असंतोष की आग में झुलस रहा है और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ही उस आग पर अपना प्रेशर कुकर रख पाई थी। जाहिर सी बात है कि उससे जुड़ी संगठनात्मक इकाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसके लिए जमीन तैयार कर रही थी और उस चुनाव को बहुत गंभीरता से लेकर हर मोर्चे पर कांग्रेस को घेर रही थी। अण्णा आंदोलन में जो अखंड भारत का नक्शा व राष्ट्रवादी सुर था, वह और किस संगठन का हो सकता था? मामूली राजनीतिक समझ का आदमी भी देख सकता था कि कांग्रेस के खिलाफ हुए अखिल भारतीय आंदोलन के पीछे किसकी मेहनत थी।

सत्ता के अहंकार में आसमानी घमंड से झूम रही पार्टी को वही संगठन जमींदोज कर सकता था जो पिछले तीन दशकों से जल, जंगल, जमीन पर काम कर अपने अनुकूल पर्यावरण को रच रहा था। कांग्रेस सिर्फ अपने कुछ नहीं करने के कारण खत्म हुई ऐसा नहीं था। वह संघ का संगठन था जिसने कांग्रेस को जलवायु संकट में धकेल दिया। यह दूसरी बात है कि कुछ लोगों को इसे कबूल करने में छह साल का समय लग गया।

इस स्तंभ में हम कांग्रेस पर सिलसिलेवार बात करेंगे। सवाल उठ सकता है कि आज के समय में देश की सबसे पुरानी पार्टी पर हम नई बात क्या कर लेंगे जिसका इतिहास दुनिया भर के विद्वानों ने लिखा है व आज के समय में जिसके सबसे ज्यादा विशेषज्ञ हैं। इन सबके होते हुए कांग्रेस पर चर्चा इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि विपक्ष पर संवाद जरूरी है। सत्ता की प्रकृति वर्चस्ववादी ही होती है। वह ना, ना करते हुए भी विपक्ष की बात करते हुए लोकतंत्र से ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’ करने के लिए मजबूर कर देती है।

सवाल है कि आज के दौर में विपक्ष किसे चाहिए और जनतंत्र में उसकी क्या भूमिका है? 2014 के पहले कांग्रेस लगातार दो बार सत्ता में आकर जनता के सवालों से आंखें मूंद चुकी थी। केंद्रीय स्तर पर राजनीतिक निर्वात की स्थिति दिख रही थी। उसी समय जनता ने विपक्ष और जनतंत्र की जरूरत महसूस की। उसने आस-पास खोजा कि विकल्प क्या हो सकता है। ऐसी स्थिति में एक संगठन जो खुद को गैर राजनीतिक कह रहा था, वह जनआंदोलन के जरिए प्रतिपक्ष का निर्माण करता है। इससे पहले इसी तरह की भूमिका हम आपातकाल के समय भी देखते हैं जब विपक्ष के रूप में राजनीतिक दल की शून्यता थी।

जब कोई पार्टी उस रूप में नहीं रहती है जो विकल्प और विपक्ष दे सके तो जनतंत्र खत्म होता हुआ दिखता है। फिर जनांदोलन से ही विपक्ष और विकल्प पैदा होता है चाहे वह जेपी वाला हो या अण्णा का। सत्ता को विस्थापित करने का एकमात्र यही जरिया हो सकता है। लेकिन वह खुद विकल्प का चेहरा नहीं बनता है। न तो जयप्रकाश नारायण कोई मूर्त विकल्प दे रहे थे और न अण्णा ही किन्हीं खास चेहरों को सत्ता के दावेदार बना कर संसद भेज रहे थे। वो सत्ता की मुखालफत का मंच तैयार करते हैं और भारतीय जनता पार्टी विकल्प बन जाती है। अब जबकि दो बार राजग सरकार जीत चुकी है तो फिर उन्हीं कारणों से विपक्ष की जरूरत महसूस हो रही है।

आप पूछ सकते हैं कि कांग्रेस की जरूरत किसको है? जवाब है कि कांग्रेस की किसी को जरूरत नहीं है, जरूरत है प्रतिपक्ष की, जनतंत्र की। लेकिन जनतंत्र की खाली ताकत को वही भरेगा जो संगठित ताकत के रूप में होगा। नहीं तो कभी अखंड भारत के नक्शे तले भाषण देने वाले दिल्ली के अगुआ कोरोना काल में एलान कर देते हैं कि दिल्ली सरकार के अस्पतालों में किसी बाहर वाले को इलाज नहीं मिलेगा। अपनी संकुचित कार्यप्रणाली और अलोकतांत्रिक संगठनात्मक ढांचे के कारण विकल्प की यह आंधी दिल्ली तक ही सिमट कर रह गई।

विकल्प के नाम पर खड़ा हुआ नेता अब जन को कहता है कि मैं ही पूरा तंत्र हूं और मैं ही ‘लोकपाल’। आज की तारीख में देखा जाए तो अखिल भारतीय स्तर पर कोई भी पार्टी विपक्ष के चेहरे के तौर पर नहीं दिख रही है। दूर तलक देखने पर कांग्रेस की जमीन पर उसका मलबा नजर आता है और उम्मीद जगती है कि शायद यह धूल झाड़ कर उम्मीदों का फूल बन जाए।

वर्तमान को समझने और भविष्य को गढ़ने के लिए इतिहास का तुलनात्मक अध्ययन जरूरी होता है। बात अगर आजादी के बाद की करें तो सियासी दलों की संस्कृति तो छोड़ दीजिए इस देश में ढंग की राजनीतिक संस्कृति भी नहीं दिखती है। ऐतिहासिक रूप से देखें तो कांग्रेस ने इस देश में लोकतांत्रिक राजनीतिक चरित्र के गठन में गतिरोध का ही काम किया है। जब तक उसका अंकशास्त्र बताता रहा कि राजनीतिक खतरा नहीं है तब तक उसने विकेंद्रित राजनीति को इस कदर कुचलने का काम किया कि वैकल्पिक जमीन तैयार होते ही ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा दिया गया। आम आदमी पार्टी के एक और पूर्व संस्थापक सदस्य कहते हैं कि इस देश में विकल्प तब तक नहीं हो सकता है जब तक कांग्रेस रहेगी।

आजादी के लंबे समय बाद तक कांग्रेस ने अपने चरित्र को समावेशी बनाने की कोशिश नहीं की। राजनीति की गिरावट के हर वर्तमान पर इस पार्टी का इतिहास भारी पड़ जाता है। राज्यपाल की बर्खास्तगी से लेकर चुनी हुई सरकार को गिराने की बात हो सारी अलोकतांत्रिक कवायद इनके खाते में दर्ज है। आजादी मिलने के बाद महात्मा गांधी ने कहा था कि कांग्रेस को मरने नहीं दिया जा सकता है, उसका खात्मा तभी हो सकता है जब राष्ट्र का खात्मा होगा। गांधी ने एक राजनीतिक दल के रूप में कांग्रेस का विघटन कर उसे लोक सेवक संघ बन जाने की सलाह दी थी।

लेकिन कांग्रेस में इस सेवा भाव वाले मूल्य को विकसित ही नहीं किया गया। किसी राजनीतिक मूल्य और संस्कृति की स्थापना न तो अपने दल के अंदर और न अपने दल के बाहर होने दी। कांग्रेस का इतिहास डेढ़ सौ साल का है। इसका इतिहास आजादी के पहले और आजादी के बाद अलग तरह से देखा जाएगा। आज के लिए यह ज्यादा अहम है कि उसने आजाद भारत के लिए क्या किया? नेहरू और पटेल की विरासत किस ओर गई। वैकल्पिक राजनीतिक जमातों को खड़ा क्यों नहीं होने दिया गया। इसने संघात्मक ढांचे को ऐसा रूप दिया कि उस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। कांग्रेस महज एक राजनीतिक दल नहीं इस देश का राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आख्यान भी है। लेकिन जब प्रशांत भूषण 2014 का रसोड़े में कौन था वाला ‘खुलासा’ करते हैं तो हम एक बार फिर 1947 से बात करने की जरूरत महसूस करते हैं। वर्तमान का इतिहास के साथ एक और संवाद जारी रहेगा।

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