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नाम नहीं काम

देश में आइपीएल और आम चुनाव की धूम है। क्रिकेट और राजनीति दोनों विज्ञापन केंद्रित हो गए हैं। आइपीएल हर साल अपने विज्ञापन बदलता है तो राजनीतिक दल पांच साल बाद अपने पुराने विज्ञापन को बदल डालते हैं। सफेद से सुपर सफेद और मुकाबला से महामुकाबला वाले विज्ञापन की भाषा राजनीतिक दल भी बोल रहे। अभी जब टीवी पर दोनों के विज्ञापन साथ चल रहे हैं तो क्रिकेट वाला विज्ञापन राजनीति के धुरंधरों को सावधान करते हुए कहता है ‘गेम बनाएगा नेम’। क्रिकेट का बाजार भी खरीद कर उसे ही अनमोल करेगा जो बेहतर खेल कर अपना मोल बताएगा। बेबाक बोल में विज्ञापनों और मीडिया केंद्रित राजनीतिक दलों को यही सलाह कि मैदान अलग हैं नियम एक कि नाम को छोड़ो काम दिखाओ। सिर्फ नाम नहीं चलेगा, टिकना है तो काम ही काम आएगा।

विज्ञापनों की इसी अहमियत ने क्रिकेट को टीवी से लेकर मोबाइल फोन तक जोड़ा।

जब तक बिका न था तो कोई पूछता न था तू ने खरीद कर मुझे अनमोल कर दिया इस दुनिया को तीन चीजों ने बदला है बाजार, बाजार और बाजार। फिल्मी तर्ज वाले इस संवाद के आगे तीन की जगह कोई भी संख्या लगा दें लेकिन इस बाजार के असर में कोई कमी नहीं आएगी। पहली बार ऐसा है कि देश में आम चुनाव और इंडियन प्रीमियर लीग (आइपीएल) साथ-साथ चलेंगे। भारत के चौक-चौबारों, गली-मोहल्लों में दो ही विषयों पर बहसें होती हैं, तू-तू मैं होती है या तो चुनाव या फिर क्रिकेट। दोनों में सबसे अहम है पैसा और विज्ञापन।घर की आगे की सड़क पर ईंट से विकेट बनाकर खेलते बच्चे नदारद हैं। घर की बैठकी में आवाज है धोनी-धोनी। टीमों के एक से बढ़कर एक विज्ञापन। भारत में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक खेले जा रहे क्रिकेट की सामुदायिकता को बाजार ने परखा। गली-मोहल्लों में छिटके इस समुदाय को उसे एक जगह पर इकट्ठा करना था। क्रिकेट ऐसा क्षेत्र है जो बाजार के साथ सबसे ज्यादा बदला। क्रिकेट मैदान से ज्यादा मुनाफे में टीवी पर था। मैदान पर देखने कितने लोग जा सकते थे। टीवी पर एक साथ दादा-दादी, बच्चे, मियां-बीवी सब क्रिकेट के दर्शक थे। खिलाड़ी के पैड से लेकर बैट और मैदान की चारदीवारी तक विज्ञापन ही विज्ञापन। कैमरे का एंगल खिलाड़ियों के हैलमेट का विज्ञापन भी टीवी पर जूम कर दिखा दिया जाता है। इसके साथ ही खेल के बीच में ‘पौष्टिक’ पेय पदार्थ, शीतल पेय, साबुन और शैंपू बेचते खिलाड़ी।

विज्ञापनों की इसी अहमियत ने क्रिकेट को टीवी से लेकर मोबाइल फोन तक जोड़ा। इसे ज्यादा से ज्यादा केंद्रित करने के लिए जरूरी था इसमें और ज्यादा रोमांच का तड़का लगाना। क्रिकेट में इसी रोमांच को भुनाने के लिए आगाज हुआ आइपीएल का। टीम में नाम जुड़ा राजस्थान और कोलकाता का और उसमें शामिल हैं ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के भी खिलाड़ी। जिस अफगानिस्तान को दुनिया के नक्शे पर कट्टरपंथियों के आतंकवाद ने तबाह कर रखा है वहां के राशिद खान की कीमत को आइपीएल के जौहरियों ने पहचाना है तो तमिलनाडु के गुमनाम वरुण चक्रवर्ती को 8.4 करोड़ में खरीद कर चौंका दिया जाता है। दर्शकों का यही चौंकना तो बाजार के चौके और छक्के हैं। कोई धोनी का धुरंधर है तो कोई ‘करबो, लड़बो, जीतबो रे’ का नारा लगा बंगाल की मिट्टी का भी तड़का लगा रहा है। चाहे नारा हो या विज्ञापन यह सब केंद्रित है मीडिया पर। गली-मोहल्ले अपने-अपने महेंद्र सिंह धोनी और विराट कोहली को टीवी और मोबाइल फोन के सामने खो चुके हैं। वही हाल चुनाव में खड़े नेताओं का भी है। दीवार पर हाथ से लिखे राजनीतिक नारे गायब हैं। गलियों में चुनाव के समय बजने वाला गाना ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का, अब नहीं बजता। घर-घर घूमकर वोट मांगने वाले नेताओं की भी कमी हो गई है। चुनावी जंग भी मीडिया आधारित है, नए सोशल मीडिया के साथ। नेताओं का जनता के साथ आमने-सामने का संवाद घट रहा है और जो भी है वह विज्ञापन है। चुनाव का मैदान घरों के टेलीविजन सेट तक सिमट चुका है। ट्वीट, रीट्वीट, हैशटैग और ट्रोल मुद्दे शुरू और खत्म कर दे रहे हैं। विज्ञापन देने वाला सिर्फ अपनी बात कहता है, सामने वाले की सुनता नहीं। एक विज्ञापनी मुद्दे पर समस्या पैदा होते ही ताजा विज्ञापन तैयार हो जाता है।

इस बार मायावती ने एलान किया है चुनाव नहीं लड़ने का। मायावती चेहरा रही हैं संगठन का। अगर वे चुनाव लड़ने से इनकार कर रही हैं तो इसका मतलब है कि उन्हें अब संगठन के जरिए जीत का भरोसा नहीं रह गया है। कांशीराम ने संगठन की शक्ति से ही बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की थी। लेकिन दलों का सांगठनिक स्तर पर मजबूत होना दिन-रात और सफेद जर्सी वाले टेस्ट मैच की तरह पुराना हो गया है। अब संगठन से ज्यादा अहम है उम्मीदवार का चेहरा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) जैसे वामपंथी दल की चुनावी उम्मीदवार खड़े करने की एक प्रक्रिया रही है। लेकिन अब तो आइपीएल का समय है इसलिए जेएनयू में सत्ता के खिलाफ उठी पहली आवाज के बाद ही उन्हें भाकपा का चुनावी उम्मीदवार घोषित किया जा चुका था। सांगठिनक स्तर पर बुरी तरह टूट चुकी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) को कन्हैया कुमार को अपना उम्मीदवार घोषित करना ही पड़ा क्योंकि अब जो सबसे ज्यादा अहम है वह है छवि। संगठन से ज्यादा मायने रखती है छवि। एक तरफ कन्हैया की छवि को भुनाने के लिए भाकपा मजबूर हो रही है तो उधर टीवी पर धोनी-धोनी की आवाज बताती है, जो दिखेगा वही टिकेगा। वाम चेहरों में कन्हैया को मीडिया ने सबसे ज्यादा दिखाया तो वही चेहरा चुनावी टिकट भी पा सका। इस चुनाव में बिहार में बेगूसराय की सीट नया चुनावी कथ्य बना रही है। विपक्ष के लोगों को पूतना कह पाकिस्तान भेजने वाले गिरिराज सिंह बेगूसराय से चुनाव लड़ने से हिचक रहे थे तो कन्हैया के पक्ष में जो लहर बन रही है उसकी जमीन पर जाति ही दिख रही है। तेजस्वी यादव 2024 में चुनाव नहीं होने का डर तो दिखा चुके लेकिन खुद किस डर से कन्हैया कुमार वाली पार्टी को महागठबंधन में शामिल नहीं किया इसकी वजह भी साफ है। सामाजिक न्याय का दावा करने वाली पार्टियों में उत्तराधिकार का हकदार सिर्फ बेटा हो तो फिर बेटे का सामाजिक न्याय युवा फायर ब्रांड चेहरे से परहेज करेगा ही।

अब तो चुनावी टिकट भी आइपीएल की तर्ज पर है। संगठन पीछे छूट कर व्यक्ति हावी हो चुका है। चाहे वह अपने धनबल से हावी हो या संघर्ष की राह का चेहरा बना हो। पांच साल पहले आम आदमी पार्टी ने जो संगठन की शक्ति दिखाई थी इस बार वह भी टूट चुकी है। उनके नेताओं ने क्रांति का उपनाम हटा जाति को जोड़ लिया है। संगठन के नाम से जुड़ने वाले लोग अब दूर हैं और खास जाति व पैसे के आधार पर जुड़ने वाले ही ‘आम’ हो रहे हैं। राजनीतिक दल जितने ज्यादा पैसे प्रचार पर खर्च कर देते हैं उसके कारण हर चुनाव में उन्हें अपना नया विज्ञापन बनाना पड़ता है। नए सीजन में सफेद को सुपर सफेद और मुकाबले को महामुकाबला बनाने सरीखा। आइपीएल का विज्ञापन हर साल बदलता है तो चुनावी दलों का विज्ञापन पांच साल पर। आंकड़े बता रहे हैं कि आइपीएल खर्च के मामले में लोकसभा चुनावों को टक्कर दे रहा है। वहीं 2019 के आगामी लोकसभा चुनाव का आकलन दुनिया के सबसे खर्चीले चुनावों के रूप में किया गया है। विभिन्न स्रोतों से जारी रपटें बताती हैं कि 2014 में भाजपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों ने अपने प्रचार पर जितना ज्यादा खर्च किया उससे ज्यादा विज्ञापन आइपीएल को मिले। 2018 में आइपीएल की ब्रांड वैल्यू 43 हजार करोड़ रुपए थी। क्रिकेट हो या चुनाव, ये अब वास्तविक मैदान नहीं माध्यमों की जंग बन गए हैं। करोड़ों टीवी सेट पर दोनों के विज्ञापन शुरू हो चुके हैं। लेकिन राजनीति को सलाह है आइपीएल के विज्ञापन से सीख लेने की। ‘गेम बनाएगा नेम’ वाला क्रिकेट का विज्ञापन नेताओं को याद दिला रहा है कि जो असल में काम किया है वही काम आएगा। तो रिमोट से चैनल बदलिए और कभी क्रिकेट तो कभी चुनाव का मैदान देख अपने-अपने पाठ तय कीजिए। दोनों के विज्ञापन टकराएं तो थोड़ा मुसकुराएं, क्योंकि नियम एक हैं।

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