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बेबाक बोल: सत्ता का सिनेमा

मथुरा के गांवों में फसल काटतीं हेमा मालिनी हैं तो बेगूसराय में कन्हैया के पक्ष में खड़ीं स्वरा भास्कर। कलाकारों के एक समूह ने मौजूदा सरकार को वोट नहीं देने की अपील की तो दूसरा खेमा सत्ता के पक्ष में अपील करता नजर आया। सत्ता और सिनेमा में लोकप्रियता खासा मायने रखती है। सिनेमाई चेहरों को राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए भुनाते रहे हैं। दक्षिण भारत में तो सिने कलाकार लोकप्रियता और जनसरोकार की अगुआई करते हुए नए राजनीतिक दल बना चुके हैं। सत्ता और सिनेमा के इस संबंध पर बेबाक बोल।

भाजपा में शामिल हुईं जयाप्रदा तो भाजपा को छोड़ कांग्रेस में आने वाले शत्रुघ्न सिन्हा। तस्वीर : आरुष चोपड़ा

(2019 : पाठ 15)

‘सुन ताऊ, तै इस बार हुड्डा नै वोट करेगा या खट्टर नै, रै, नास ही मारना है तो सपना चौधरी के बुरी सै’। वॉट्सऐप के कारखाने में बने हरियाणवी बोली के इस चुटकुले को राजनीतिक रूप से अगंभीर मानकर इससे किनारा किया जा सकता था। इसमें मर्दवादी सोच की बदबू भी है, लेकिन लोक गायिका सपना चौधरी को अपने खेमे में लाने के लिए कांग्रेस और भाजपा के बीच जो प्रहसन चला, उसके बाद उपरोक्त चुटकुला कुछ ज्यादा ही गंभीर लगने लगा। सपना चौधरी के कांग्रेस में आने की हां और न के बीच तो अच्छे राजनीतिक टिप्पणीकार और पत्रकार तक उलझ गए। कांग्रेस में शामिल होने की खबर रिपोर्ट करने वाले ‘फेक न्यूज’ के आरोप में फंस गए। सपना चौधरी पर मीम और चुटकुलों की बौछार ही उनकी राजनीतिक दलों में मांग की वजह है। जब किसी कलाकार से लोक खुद को जोड़ता है तो राजनीति उसे अपने पक्ष में भुनाना जानती है।

मनोज तिवारी और दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ के बाद अगर सपना चौधरी की कांग्रेस और भाजपा में इतनी जरूरत समझी जा रही थी तो उसके पाठ पर एक बार बात करने की जरूरत है। जब दिल्ली में भाजपा संकट में थी तो मनोज तिवारी को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाता है। उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सामने निरहुआ को खड़ा किया गया है। उर्मिला मातोंडकर से लेकर मिमी चक्रवर्ती और मुनमुन सेन तक चुनावी मैदान में हैं। हेमा मालिनी तो टिकट पाने के बाद फसल काट आई हैं, लेकिन चंडीगढ़ में किरण खेर के नाम पर अभी इंतजार है। चुनावी समर में उत्तर प्रदेश के मथुरा के खेत में गेहूं की फसल काटतीं हेमा मालिनी हैं तो बिहार के बेगूसराय में हंसिया और हथौड़े के निशान के झंडे वाले कन्हैया कुमार के साथ स्वरा भास्कर। सरकार के साथ सेल्फी खिंचवाते फिल्मी कलाकार तो मौजूदा सरकार को वोट नहीं देने वाले कलाकारों की सामूहिक अपील। भाजपा में शामिल हुईं जयाप्रदा तो भाजपा को छोड़ कांग्रेस में आने वाले शत्रुघ्न सिन्हा। ‘हम जहां खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है’ से लेकर ‘कह देना कि छेनू आया था’ जैसे अभिनेताओं को नेताओं के बरक्स खड़ा किया जाता रहा है।

नेता और अभिनेता में समानता यह है कि दोनों लोक से जुड़े यानी लोकप्रिय होते हैं, लेकिन दोनों में अंतर भी है। नेता का संबंध सामाजिक कल्याण से है तो अभिनेता का संबंध मनोरंजन से। साथ ही दोनों की भूमिकाओं में भी अंतर है। अपनी-अपनी भूमिका के साथ दोनों लोकप्रियता पाने को प्रयासरत रहते हैं। भारत में इस श्रेणी में क्रिकेट या अन्य लोकप्रिय खिलाड़ियों को भी रख सकते हैं। जिसका भी सामाजिक दायरा बड़ा होता है वह लोकप्रियता के दायरे में आता है और राजनीतिक मंच पाता है। राजनीतिक दलों के आम राजनेता अभिनय नहीं कर सकते, क्रिकेट या हॉकी नहीं खेल सकते। लेकिन अभिनेता और खिलाड़ी चुनाव लड़ सकते हैं। अपने-अपने क्षेत्रों में इनकी लोकप्रियता को वोट में बदला जा सकता है। भारतीय संविधान के रचनाकारों की समझ थी कि कला और खेल के क्षेत्र के लोग सीधे चुनावी मुकाबले से संसद में नहीं आ सकते हैं। इसलिए उनके प्रतिनिधित्व के लिए राज्यसभा में विशेष व्यवस्था की गई। लेकिन भारतीय राजनीति की विडंबना यह है कि राजनीति के कद्दावर नेता इस पिछले दरवाजे से आने के लिए मजबूर हो जाते हैं तो अमिताभ बच्चन जैसे अभिनेता हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे सरोकार वाले नेता को सीधे मुकाबले में हराकर संसद पहुंचते हैं। पटकथा और भव्य सेटों के बल पर बनी अभिनेताओं की विश्वसनीयता का राजनीतिक उपयोग करना तो आसान होता है, लेकिन इन चेहरों का जनउपयोग कितना हो पाता है। आज जिस तरह से चुनाव प्रक्रिया महंगी होती जा रही है उस कारण आम लोग इससे बेदखल हो रहे हैं। आज कन्हैया कुमार दलीय भावना से ऊपर उठकर इसलिए प्यार पा रहे हैं कि वे साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं। लेकिन कन्हैया के चेहरे के पीछे के भी समीकरण हैं वरना ऐसे कितने लोग हैं जो जनसरोकारी भावना के बावजूद सिर्फ जनता की मदद से चुनाव लड़ने के लिए 70 लाख जुटा पाते हैं। अब चुनावों का सामान्यीकरण यही है कि सामान्य लोग इसमें घुस नहीं पाते हैं।

आज पैसे के बोलबाले के कारण या तो क्षत्रपों की संतानें, या फिर बड़े कारोबारी ही संसद में प्रवेश कर पाते हैं। तीसरी श्रेणी है उन सितारों की, जिनके पास पैसा और ग्लैमर है। लेकिन इस तीसरी श्रेणी के लिए राजनीति उतनी आसान नहीं होती है जितना पटकथा पढ़ कर नायकत्व प्राप्त कर जाना। जनप्रिय चेहरों की जनउपयोगिता कितनी होती है यह इसी से पता चलता है कि बहुत से सिने कलाकारों के संसदीय क्षेत्रों में उनकी गुमशुदगी के पोस्टर लगते हैं।
सार्वजनिक चेहरों की लोकप्रियता को आम आदमी पार्टी ने भुनाया था। फिल्म कलाकारों से लेकर हर क्षेत्र की सार्वजनिक हस्ती को पार्टी का सदस्य बनाया गया और चुनावी टिकट भी दिए गए। लेकिन राजनीति के इतर अन्य लोकप्रिय चेहरों की दिक्कत होती है कि उनकी भाषा सामूहिकता की नहीं होती है। वे यहां तब तक ही टिके रहते हैं जब तक उन्हें निजी तवज्जो मिलती है। सामूहिकता की मांग करते ही वे एकला चलो रे का राग अलाप लेते हैं। आम आदमी पार्टी जब आंधी की तरह आई थी तो हर क्षेत्र के खास चेहरे उससे जुड़े थे। लेकिन जिन-जिन लोगों को लगा कि वे खास नहीं हो पा रहे, आम होने से इनकार कर पार्टी छोड़ गए। हम जहां खड़े होते हैं लाइन वहीं से शुरू होती है… फिल्म ‘कालिया’ में अमिताभ बच्चन के इस संवाद पर सिनेमा हॉल में खूब तालियां बजी थीं। अमिताभ बच्चन अपनी फिल्मों के संवाद के कारण घर-घर दुहराए जाने लगे थे। लेकिन राजनीति के मैदान में आने के बाद उन्हें अहसास होता है कि सिनेमा हॉल में तालियों और सीटियों की बदौलत राजनीति के मैदान का सामना नहीं किया जा सकता। पटकथा के संवादों और जमीन के असली सवालों का फासला ही होता है कि फिल्मों के ‘शहंशाह’ को राजनीति के मैदान से दूर हो जाना पड़ा था।

पारिवारिक टीवी धारावाहिक में तो ‘मदर इंडिया’ आसानी से बना जा सकता है, गलती कर रहे बेटे को गोली से उड़ा दिया जाता है। अगले एपिसोड में मां अपने बुरे बेटे को गोली मारेगी इसका विज्ञापन भी पहले से होने लगता है। बुराई के खिलाफ अच्छाई की जीत का प्रतीक बना जा सकता है, विरोधियों को ‘खामोश’ बोला जा सकता है। लेकिन राजनीति में पटकथा पहले से लिखी नहीं मिलती है। अभिनेता पूरे देश को फिल्मी सेट समझ लेते हैं, लेकिन जब जनता निर्देशक होती है तो वास्तविकता पर टिकना आसान नहीं होता है। सुनील दत्त जैसे अभिनेता भी रहे हैं जिन्होंने अपनी राजनीतिक पारी संजीदगी से खेली। दक्षिण भारत की राजनीति में सिनेमा के कलाकारों का वर्चस्व रहा है। एनटी रामाराव से लेकर जयललिता तक की खूबी यह रही कि इन्होंने अपनी लोकप्रियता को जनसरोकारों से जोड़ा और जनता के हो गए। जब आप अभिनेता होते हैं तो जनता आपसे जुड़ती है, लेकिन जनता के साथ लंबी पारी खेलने के लिए जन-जन का होना पड़ता है खुद को तजना पड़ता है। राजनीति का सेट बहुत आसान नहीं है। आपको लगता है कि आप अपनी लोकप्रियता का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन एक बार असली शूटिंग में फ्लॉप होने के बाद आप नकली सेट के लायक भी नहीं रह जाते हैं।

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