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बारादरीः किसान का देश के ऊपर कर्ज है

आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे योगेंद्र यादव आज स्वराज इंडिया के अगुआ हैं। समाज और राजनीति के सवालों पर संवाद के दौरान सक्रिय राजनीति का हिस्सा बनने तक के सफर को यादव सीखने और समझने का ही दौर कहते हैं। लोकतंत्र में व्यवस्थागत सुधार से लेकर किसानों तक के मुद्दों पर हुई इस बातचीत का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, पंजाब विश्वविद्यालय और राजस्थान विश्वविद्यालय से शिक्षा हासिल की। दिल्ली स्थित सीएसडीएस के वरिष्ठ फेलो रहे और कई शिक्षण संस्थानों से जुड़े हुए हैं।

मनोज मिश्र : आम आदमी पार्टी से अलग होने से लेकर अब तक आप जिस प्रयास में लगे हुए हैं, क्या वह प्रयास कुछ सार्थक हुआ है?

योगेंद्र यादव : दो-तीन बातों का मैं दावा कर सकता हूं। जब हम आम आदमी पार्टी से अलग हुए तो अधिकांश लोगों ने सोचा था कि अब ये लोग दिन-रात अरविंद केजरीवाल के पीछे पड़ेंगे। पर हमने पहले ही दिन तय किया था और खुल कर कहा था कि यह हमारा काम नहीं है। इस देश के सामने बहुत बड़ी समस्याएं हैं, हम उन पर बोलेंगे और अगर रास्ते में इनसे भी टकराहट हो गई, तो हो गई। मगर इनके पीछे हाथ धोकर पड़ना हमारा काम नहीं है। जब हम अलग हुए तो चार सवाल चिह्नित किए थे। पहला, किसानी का संकट। दूसरा, शिक्षा और रोजगार। तीसरा, भ्रष्टाचार और चौथा सांप्रदायिकता का। इसी के तहत हमने स्वराज अभियान के अंतर्गत चार संगठन बनाए। चारों बराबर सफल हुए, ऐसा मैं नहीं कह सकता। किसान वाला काम तेजी से आगे बढ़ा। भ्रष्टाचार के सवाल पर प्रशांत जी अपनी पूरी ऊर्जा और क्षमता से लगे रहे हैं। युवा के सवाल पर हमने कोशिश बहुत की है, पर उस तरह से परिणाम हमें नहीं मिले हैं, पर कोशिश कम नहीं की है। सांप्रदायिकता वाले सवाल पर हम लगे रहे, लेकिन कोई बड़ा काम कर पाए हों, ऐसा नहीं कह सकते। पर मैं समझता हूं कि इस परिस्थिति में टिके रहना, खड़े रहना शायद दूर से कोई बड़ी उपलब्धि न जान पड़े, पर मैं जानता हूं कि इतिहास के इस दौर में सिर्फ खड़े रहना भी कितनी बड़ी बात है। इस आंधी में विचार की एक लौ को जलाए रखना बड़ी बात है।

सूर्यनाथ सिंह : ऐसा क्यों है कि राजनीतिक विचारक जब चुनावी राजनीति में उतरते हैं, तो प्राय: विफल साबित होते हैं?

इसमें पहली बात तो यह कहनी चाहिए कि जिसे हम सिद्धांत कहते हैं, जरूर उसमें कोई खोट होगी। यह कहना कि हमारा सिद्धांत तो ठीक है, पर व्यवहार में लागू नहीं होता, यह ठीक बात नहीं है। इसके अलावा दो और बातें हैं। एक तो संसाधन। आजकल राजनीति संसाधन का खेल है। संसाधन का मतलब पैसा और मीडिया है। हम बाहुबल की बात करते हैं, पर आज बाहुबल राजनीति में कम है। आज से पच्चीस साल पहले ज्यादा था। लेकिन पैसा और पैसे से खरीदा हुआ मीडिया, इससे मुकाबला करना सबके वश की बात नहीं है। यह बहुत बड़ी चुनौती है। दूसरा, राजनीति में जो बना-बनाया ढर्रा है, उससे पार पाना भी बड़ी चुनौती है। पर जहां तक राजनीतिक विचारकों की बात है, उसमें हमारा देश एक मायने में अपवाद था। पश्चिम में अगर देखें तो वहां जितने भी राजनीतिक विचारक रहे हैं, वे प्राय: व्यावहारिक राजनीति से दूर रहे हैं। पर हमारे यहां डेढ़-दो सौ सालों में जिन्हें राजनीतिक विचारक कहा गया, वे सब राजनीति में थे। लेकिन जबसे चुनावी राजनीति शुरू हुई है, तबसे कुछ दिक्कतें जरूर आई हैं।

दीपक रस्तोगी : जिन दीर्घकालिक उपायों की बात आप कर रहे हैं, वे वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में कितने टिकाऊ हो सकते हैं?

लोकतंत्र का जो कायदा है, उसी को स्वीकार करके चलना होगा, उसे दरकिनार करके नहीं। अब यह कि उस व्यवस्था में सुधार कैसे किया जाए? तो पहला यह कि कैसे संभव हो कि जिसके पास कोई अच्छी सोच है, जिसे जनता चाहती है, वह चुनाव जीत सके। इतना तो लोकतंत्र में न्यूनतम होना चाहिए कि जनता जिसे पसंद करे, वह चुनाव जीत जाए। पर इसमें सबसे बड़ी बाधा है कि जनता तक पहुंचा कैसे जाए। इसका तरीका यही है कि आप पोस्टर लगाएं, होर्डिंग लगाएं, मीडिया की मार्फत पहुंचें। पर यह सबके लिए संभव नहीं है। लोकतंत्र बनाते समय इस मूल विसंगति की तरफ ध्यान नहीं दिया गया। शुरुआती तीस-चालीस सालों तक यह विसंगति बनी रही, पर अब जो इसने भयावह रूप लिया है, वह तो इस लोकतंत्र को पूरी तरह तोड़-मरोड़ देगा। इस वक्त जिस तरह झूठ के बवंडर में चीजों को दबाया जा रहा है और मीडिया दरबारी की भूमिका निभा रहा है, उसमें लोगों को पता कैसे चलेगा कि लोकप्रिय कौन है, कौन अच्छा काम कर रहा है।

अजय पांडेय : आपकी एक पहचान चुनाव विश्लेषक के रूप में भी रही है। आज मायावती ने जो अलग से चुनाव लड़ने का फैसला किया, उसका महागठबंधन पर कितना असर पड़ेगा?

मुझे जो अपनी आंख से सच दिख रहा है, वह यह है कि अब वर्तमान केंद्र सरकार की लोकप्रियता घट रही है। उनसे लोगों का मोहभंग हो रहा है, उसका तिलिस्म अब टूट गया है। लेकिन ऐसा कोई विकल्प नहीं है, जिसमें लोगों को आशा का केंद्र दिखाई दे। विपक्षी नेताओं के पास भी कुछ नहीं है। जहां तक मायावती जी की बात है, अगर चुनाव का गणित देखें, तो इसमें बसपा और कांग्रेस का गठबंधन महत्त्वपूर्ण नहीं है। राजस्थान में तो अप्रासंगिक है। मध्यप्रदेश के एक छोटे से इलाके में थोड़ा-सा फर्क पड़ेगा। सबसे महत्त्वपूर्ण है सपा और बसपा का गठबंधन। उत्तर प्रदेश में यह गठबंधन बनते ही भाजपा सरकार बनाने के खेल से बाहर हो जाएगी। आज की तारीख में तो वह गठबंधन बनता हुआ नजर आता है, पर अगले छह महीनों में क्या होगा, सीबीआइ किसके खिलाफ मुकदमे दायर करेगी, क्या होगा, देखने की बात है।

मनोज मिश्र : अरविंद केजरीवाल को समझने में आप लोगों से गलती हुई या वे बदल गए?

ऐसे मामलों में सबसे पहले हमें अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए। हमारी गलती तो रही ही होगी। उस वक्त के दो मूल्यांकन ऐसे थे, जो शायद गलत हुए। एक तो यह कि इतिहास के इस मोड़ पर खड़े होकर आप उंगली नहीं दिखा सकते। मैंने बार-बार कहा था कि यह लोकपाल का आंदोलन नहीं है। लोकबल का आंदोलन है। लोकपाल तो एक बहाना है। दूसरी भूल यह हुई कि जिस वक्त आम आदमी पार्टी बनी, हमें लगता था कि जिस नेतृत्व ने अण्णा आंदोलन को खड़ा किया है, उसे कुछ खुला हाथ मिलना चाहिए- नई संस्था को खड़ा करने का। और उसमें कई चीजें हुर्इं, जो हम कहते रहे कि अभी शैशव काल है, कुछ गलतियां हर इंसान से होती हैं, बनने दीजिए, पर हमें इस बात का बिल्कुल अनुमान नहीं था कि वहां पार्टी के अंदर एक तरह की व्यूह रचना हो रही है। और वह व्यूह रचना ऐसी थी कि एक तरह का पर्सनालिटी कल्ट बन रहा था। इस व्यूह रचना को कब चुनौती दी जाए, और कैसे दी जाए, इसके मूल्यांकन में निश्चित रूप से हमसे गलती हुई। रही बात अरविंद की, तो यह कहना ठीक नहीं होगा कि अरविंद अचानक बदल गए, क्योंकि पूत के पांव तो पालने में ही दिख जाते हैं। जो मुझे अनुमान नहीं था और मैं हैरान हूं कि यह पार्टी इतनी जल्दी सामान्य पार्टियों से भी बदतर हो जाएगी। यों आंदोलन से निकली पार्टियां दस-पंद्रह सालों में सामान्य पार्टियों की तरह हो जाया करती हैं, पर यह पार्टी इतनी तेजी से गिर सकती है, यह हैरान करने वाली बात थी। इसकी वजह यही थी कि वहां न तो विचार था, न आदर्श।

सूर्यनाथ सिंह : आज किसान अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसे संभालने के क्या उपाय हो सकते हैं?

यह सही बात है कि पिछले सत्तर सालों में हर सरकार ने किसान को रगड़ा है। इस राजसत्ता का पूरा चरित्र किसान-विरोधी रहा है। यह आज कोई नई बात नहीं है। खेती घाटे का सौदा है, यह बात अस्सी के दशक से कही जा रही है। तो यह पुराना संकट है। या यों कहें कि आजादी के बाद जो भला-चंगा किसान था, उसकी चाहे जैसी भी स्थिति थी, उसको हमारी सत्तर साल की किसान-विरोधी राजसत्ता ने मरीज बना कर अस्पताल में दाखिल कर दिया। राजग सरकार की उपलब्धि यह है कि उसने उसे जनरल वार्ड से निकाल कर आइसीयू तक पहुंचा दिया। इसलिए मैं राजग सरकार को अब तक की सबसे घोर किसान विरोधी सरकार मानता हूं। ऐसा नहीं कि इससे पहले वाली सरकार किसान की पक्षधर थी। कतई नहीं। इस समय भारत की किसानी के तीन बुनियादी संकट हैं और तीनों एक के ऊपर एक चढ़े हुए हैं। एक, आर्थिक संकट है। किसान की बचत नहीं हो रही। दूसरा, पर्यावरण का संकट है। हरित क्रांति का सपना अब एक अंधे मोड़ पर आकर खत्म हो गया है। न हमारा पानी बचा, न हमारी मिट्टी की उर्वरता बची। अभी जो जलवायु परिवर्तन की वजह से बारिश का तरीका बदल रहा है, वह तो हिंदुस्तान की खेती को तबाह कर देगा। और तीसरा, इन दोनों से पैदा हुआ, अस्तित्व का संकट है। अब कोई किसान अपने बेटे को किसान नहीं बनाना चाहता। किसान किसानी छोड़ कर भाग रहा है। आत्महत्या हो रही है। ये लगभग स्थायी संकट हैं भारत की कृषि के। जाहिर है, इसका समाधान सिर्फ न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं। लेकिन इस समय किसान को उसके संकट से निकालने के लिए दो चीजों की सख्त जरूरत है। पहला तो यह कि किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी दी जाए। एक कानून बने, जो यह कहे कि आपको लागत का कम से कम डेढ़ गुना दाम मिलेगा। दूसरा, एक बार एकमुश्त उसे कृषि ऋण से मुक्त किया जाए। उसके बाद कृषि संबंधी तमाम बातें उसे बताई-समझाई जाएं। लेकिन इस सरकार की दिक्कत यह है कि वह शब्दों से किसान का पेट भरने की कोशिश कर रही है।

मृणाल वल्लरी : पर, कर्जमाफी को लेकर विरोधाभास हैं। छोटे किसान साहूकार से कर्ज लेते हैं और जो बड़े किसान हैं, उन्हें पचास हजार या ऐसी ही रकम का दायरा तय होने की वजह से कोई फायदा ही नहीं मिल पा रहा है। कर्जमाफी सरकारों के लिए आडंबर बनती जा रही है। किसान संगठन इससे कैसे निपट सकते हैं।

सही बात है। कर्जमाफी अपने आप में किसान के संकट से मुक्ति का उपाय नहीं है। अगर सिर्फ कर्जमुक्त कर देंगे और हमारी आमदनी नहीं होगी, तो हम फिर छह महीने बाद कर्ज के लिए आपके पास पहुंच जाएंगे। मूल समस्या है कि आमदनी की समस्या को सुलझाया जाए। इसलिए हम दो फार्मूले देते हैं। पहला है, किसान को नियमित आय का स्रोत दीजिए। वह उसे फसल का वाजिब दाम देकर पूरा किया जा सकता है। दूसरा है, एकमुश्त कर्जमाफी। कर्ज बार-बार माफ किया जाए, ऐसा मैं नहीं कहता। देश के किसान के साथ जो हुआ है, उसके लिए वह जिम्मेदार है ही नहीं। सरकारी नीतियां ऐसी बनाई गई हैं कि अनाज के दाम दबा कर रखे गए हैं। इस देश का पैंतीस-चालीस प्रतिशत किसान अब भी ऐसा है, जो कोई संस्थागत ऋण नहीं लेता, महाजन से लेता है। इसलिए ऋण-मुक्ति सबसे पहले वहां से होनी चाहिए। इसके अलावा देश का एक बड़ा किसान, जो न जाने कितनी कारें और कोठियां लेकर बैठा है, उसे उतना ही बड़ा कर्ज मिल रहा है, इसे बंद होना चाहिए।

अजय पांडेय : कहा जाता है कि जब सरकार बड़े उद्योगपतियों का कर्ज माफ कर सकती है, तो किसानों का क्यों नहीं। एक राजनीतिक दल का अगुआ होने के नाते आप इसे कैसे देखते हैं।

पहली बात तो यह कि कर्जामाफी किसी का अधिकार नहीं होना चाहिए। विशुद्ध अपवाद की स्थिति में ऐसा किया जा सकता है। मैं तो कहता हूं कि उद्योगपतियों का भी न करो। किसान के बारे में मैं मानता हूं कि निस्संदेह अपवादपूर्ण स्थिति है। उसे कर्जदार हमने बनाया है। दुनिया भर में यह नियम है कि जो कर्ज लौटाने की स्थिति में न हो, जिसका कर्ज उसकी अपनी वजह से न हो और जिसका कर्ज देश के ऊपर हो, उसका कर्ज माफ होना चाहिए। किसान का देश के ऊपर कर्ज है। किसान ने इतने सालों तक सस्ता अनाज बेचा है। हर साल किसान लगभग दो लाख करोड़ रुपए की सबसिडी इस देश को देता है। उस हिसाब से अगर उसकी कर्जमाफी की जाती है, तो उसका कर्ज इससे ज्यादा नहीं बैठेगा।

मुकेश भारद्वाज : क्या हरियाणा में आप विधानसभा चुनाव लड़ेंगे?

अभी हमारी रणनीति केवल लोकसभा तक है। किस तरह बड़ी संख्या में लोगों को जोड़ सकें, यह प्रयास रहेगा और उसमें हमारा फोकस हरियाणा पर जरूर रहेगा।

योगेंद्र यादव

योगेंद्र यादव का जन्म 5 सितंबर, 1963 को हरियाणा के रेवाड़ी में सहारनवास गांव में हुआ था। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, पंजाब विश्वविद्यालय और राजस्थान विश्वविद्यालय से शिक्षा हासिल की। दिल्ली स्थित सीएसडीएस के वरिष्ठ फेलो रहे और कई शिक्षण संस्थानों से जुड़े हुए हैं। यूपीए सरकार में बने शिक्षा का अधिकार कानून 2009 की परामर्श समिति के सदस्य थे। चुनाव विश्लेषक के रूप में शुरुआती पहचान बनाने वाले यादव वैकल्पिक राजनीति के नारे के साथ राजनीति के मैदान में उतरे और आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे। अरविंद केजरीवाल से वैचारिक मतभेद के बाद स्वराज इंडिया के बैनर तले किसानों और राज तथा समाज की अन्य समस्याओं को लेकर संवाद का वैकल्पिक मंच तैयार करने में जुटे हैं।

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