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बारादरीः भाजपा का कोई विकल्प नहीं

इन दिनों केंद्र में विपक्षी दल सरकार के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं। सरकार के कामकाज को लेकर कई तरह के आरोप लगा रहे हैं। अगले आम चुनाव में महागठबंधन बना कर भाजपा को शिकस्त देने के मंसूबे भी बांधे जा रहे हैं। ऐसे में भाजपा के राज्यसभा सांसद और आंध्र प्रदेश के प्रभारी वी. मुरलीधरन का कहना है कि विपक्ष के सारे आरोप निराधार हैं। अपनी विस्तृत बातचीत में उन्होंने कहा कि सरकार के कामकाज से आम लोग संतुष्ट हैं और वे आने वाले आम चुनाव में भाजपा का साथ देंगे। भाजपा का कोई विकल्प नहीं है। बातचीत का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

अजय पांडेय : देश और दुनिया में कम्युनिस्टों का दायरा सिमट गया है, पर केरल में अब भी उनकी सरकार चल रही है। इसकी क्या वजह है?

वी. मुरलीधरन : सीपीएम खत्म हो गया बहुत साल पहले। उसमें कई मेरे मित्र हैं। जब 1989 में रूस टूट गया, जर्मनी टूट गया, तो उनमें से किसी ने कहा कि हमारा क्या होगा? भारत का क्या होगा। तो किसी ने कहा कि नहीं नहीं, जब तक यह दूध वाली सोसायटी मेरे हाथ में है, मैं यहां कम्युनिस्ट ही रहूंगा। केरल में हर गांव में अस्पताल सीपीएम के लोग चलाते हैं- सहकारी अस्पताल। वहां सहकारी बैंक, सहकारी कॉलेज चलते हैं। सब सीपीएम के लोगों के हाथ में हैं। सहकारिता एक तरह से अच्छा है, पर केरल के सभी क्षेत्रों में सहकारिता है और उसे चलाते हैं सीपीएम कार्यकर्ता की पत्नी, भाई वगैरह। इस तरह केरल में सीपीएम एक आंदोलन नहीं है, एक संस्था बन गई है। और जब संस्था बन गई है, तो वह किसी न किसी दिन टूटेगी। इनमें संस्थाओं में निहित स्वार्थ बहुत होता है। उसमें कोई विचारधारा नहीं है, कोई ध्येयवाद नहीं है। पश्चिम बंगाल में भी तो यही हुआ। क्योंकि वहां जो भी आया, कम्युनिज्म के साथ नहीं आया, सत्ता के साथ आया।

मनोज मिश्र : केरल पूर्ण साक्षर राज्य है, पर क्या वजह है कि वहां राजनीतिक हिंसा बहुत है।

’इसको राजनीतिक ढंग से मत देखिए। केरल की खासियत यह है कि वहां मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीएम की स्थिति दूसरी जगहों की अपेक्षा काफी भिन्न है। जो वहां उनका साथ नहीं देते हैं, या थोड़ा-सा भी उनसे अलग होते हैं, तो वे उन्हें बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। जब पिछले दिनों देश भर में असहिष्णुता की बात हो रही थी, तो मुझे हैरानी हो रही थी कि सबसे अधिक असहिष्णुता केरल में है, पर उसकी कोई बात नहीं होती। मैं एक ऐसे गांव से आता हूं, जहां सीपीएम के अलावा किसी भी पार्टी को लोग वोट नहीं देते थे। इस असहिष्णुता का अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं कि जब मैं सरकारी नौकरी में आया तब भी आरएसएस की गतिविधियां चलाता था, तो सीपीएम के लोगों को वह बर्दाश्त नहीं हुआ और उन लोगों ने मुझे एक झूठे मामले में फंसा दिया। दो महीने जेल में रखा। पहले जो संघ के प्रचारक हुआ करते थे, उन्हें रहने के लिए मकान तक कोई नहीं देता था, कहते थे कि आपके लिए यहां कोई जगह नहीं है। कहने का मतलब यह कि केरल में एक प्रकार का सांगठनिक अनुशासन है और सीपीएम के कारण वह सभी पार्टियों में है। एक हद तक संघ में भी है। वही हिंसा में बदल जाता है। केरल में चालीस से चौवालीस फीसद वोट सीपीएम का है। भाजपा का अभी मुश्किल से पंद्रह फीसद हुआ है। अगर भाजपा की वजह से वहां हिंसा होती, तो वे उसके खिलाफ कार्रवाई करते, पर नहीं की तो इसलिए कि वे खुद सबसे अधिक असहिष्णु हैं।

दीपक रस्तोगी : अगले चुनाव में दक्षिण भारत में आप भाजपा की क्या स्थिति देखते हैं?

’अभी जो स्थिति है, उससे बेहतर स्थिति होगी। कर्नाटक में अभी भाजपा की सत्रह सीटें हैं। आंध्र में दो हैं, तेलंगाना और तमिलनाडु में एक एक हैं। यानी कुल मिला कर इक्कीस सीटें हैं। इक्कीस सीटों से हम आगे बढ़ेंगे, इसमें कोई दो राय नहीं। कर्नाटक में स्थिति आप जानते हैं कि बिल्कुल अलग है। वहां लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में मतदाता का रुख बिल्कुल अलग होता है। लोकसभा के समय वे राष्ट्रीय पार्टी के साथ जाते हैं। वहां बेशक उनकी सरकार बन गई है, पर अंदर शांति नहीं है। इसका असर पड़ेगा।

मुकेश भारद्वाज : क्या दक्षिण में आपकी स्थिति इतनी बेहतर हो जाएगी कि जो उत्तर भारत में आपको नुकसान होने वाला है, उसकी भरपाई हो जाएगी?

’उत्तर भारत में बहुत ज्यादा नुकसान होगा, ऐसा तो नहीं लगता। हां, वहां आगे बढ़ने की संभावना कम है। क्योंकि उत्तर प्रदेश में अस्सी में से तिहत्तर सीटें मिल गर्इं, राजस्थान में सभी सीटें जीत गए, मध्यप्रदेश में कुछेक सीटों को छोड़ कर सारी सीटें मिल गर्इं, तो इससे आगे तो नहीं जा सकते। इसलिए एकाध सीट तो घटेगी, पर उसकी भरपाई दक्षिण और पूर्वोत्तर से हो जाएगी। लोग बेशक आकलन कर रहे हैं, पर आकलन और चुनावी राजनीति अलग होती है। अभी देखिए, महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन चल रहा है, कुल मिलाकर नकारात्मक संकेत मिल रहे हैं, पर वहां सांगली और जलगांव में हम चुनाव जीत गए। आराम से जीत गए। क्योंकि पांच करोड़ लोगों को उज्ज्वला योजना का फायदा मिला है।

इसी तरह कई योजनाओं का लोगों को लाभ मिला है। इसके अलावा मोदी जी पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है। अभी कांग्रेस जो रफाल को लेकर संयुक्त संसदीय समिति की मांग कर रही है, अगस्ता वेस्टलैंड में जेपीसी हुआ, बोफर्स में हुआ- पर किस परिस्थिति में हुआ, यह भी तो देखिए। उन देशों की अदालतों में मुकदमे चले, तब हुआ। यहां तो किसी भी अदालत में कुछ नहीं है। एके एंटनी ने तो खुद स्वीकार कर लिया था कि हां, इसमें कुछ है घोटाला। अगस्ता वेस्टलैंड और बोफर्स मामले में उन लोगों को रिश्वत दी गई, जो इसकी खरीद में शामिल थे। रफाल में ऐसा नहीं हुआ। इसलिए आम लोग नरेंद्र मोदी को साफ-सुथरा मानते हैं। फिर यह भी कि प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में नरेंद्र मोदी जैसा कोई व्यक्ति विपक्ष के पास है ही नहीं।

अजय पांडेय : आपने उज्ज्वला योजना की बात की। पर हकीकत यह है कि अब लोगों के पास गैस खरीदने के पैसे न होने के कारण उसका लाभ ही नहीं लेना चाहते, क्योंकि गैस के दाम लगातार बढ़ रहे हैं!

’इसका आकलन अगर आप गैस की कीमत के आधार पर करेंगे, तो बात नहीं बनेगी। इसके कई पक्ष हैं। अभी मैं प्रधानमंत्री जी की बातचीत सुन रहा था। उसमें श्रीनगर की एक महिला ने उनसे बात करते हुए बताया कि रमजान के समय हमें रात के डेढ़ बजे उठ कर खाना पकाना पड़ता है। पहले जब मैं चूल्हा जलाती थी, तो धुएं की वजह से हमारा बच्चा सो नहीं पाता था। अब जबसे गैस मिली है, वह समस्या नहीं रही। तो, ऐसी कई बातें, कई तरह के फायदे हुए हैं। कई महिलाएं बताती हैं कि पहले जो लकड़ी इकट्ठा करने के लिए जो समय गंवाना पड़ता था, वह समय बच रहा है और उस समय का उपयोग वे दूसरे कामों में कर रही हैं।

सूर्यनाथ सिंह : अभी आप रफाल सौदे की बात कर रहे थे। क्या आप मानते हैं कि वह पूरी तरह ठीक सौदा हुआ है?

’जब तक उसके विरुद्ध कोई सबूत नहीं निकलता, जैसे अगस्ता वेस्टलैंड और बोफर्स मामले में निकला, तब तक आप इसे गलत कैसे कह सकते हैं। ऐसी खरीद को लेकर जो देश की नीति है, उसी के तहत खरीद हुई। मैं रक्षा सौदों के मामले में विशेषज्ञ तो नहीं हूं, पर इतना जरूर कहूंगा कि जब तक उसमें अनियमितता का कोई सबूत नहीं मिलता तब तक खाली अरोप लगाने से कुछ नहीं होगा। भ्रष्टाचार का मतलब है कि उस सौदे से किसी को आर्थिक फायदा हुआ कि नहीं। इसमें किसको फायदा हुआ?

आरुष चोपड़ा : पर इस मामले में सरकार ने अब तक कोई खंडन क्यों नहीं किया कि उसने जहाजों के दाम नहीं बढ़ाए। अगर सरकार साफ-सुथरी है, तो उसे जेपीसी बनाने में क्या परेशानी है?

’दाम नहीं बढ़ाए, यह बात तो संसद में निर्मला सीतारमन कह चुकी हैं। और जेपीसी बनाने में भी कोई दिक्कत नहीं है, पर विपक्ष जो मांग कर रही है, उसका कोई आधार ही नहीं है, तो जेपीसी क्यों गठित करें!

आर्येंद्र उपाध्याय : पिछले चुनाव में जो काला धन लाने का वादा किया गया था, वह फुस्स कैसे हो गया?

’पिछले दिनों राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में मौखिक रूप से बताया गया ता कि अखबारों में जो लगातार छप रहा है कि बैंक घाटे बढ़ रहे हैं, वह निराधार है। और तब सब इस बात से संतुष्ट हो गए थे। अगर संतुष्ट न होते, तो मंत्री जी के खिलाफ आवाज उठाते। पिछले चार सालों में सरकार की तरफ से काले धन को पूरी तरह समाप्त करने का भरपूर प्रयास किया गया है। हां, बाहर से काला धन लाने को लेकर कई देशों के साथ समझौते हो रहे हैं, उसे लाने का प्रयास चल रहा है, उस दिशा में पूरी तरह कामयाबी नहीं मिली है, यह मैं स्वीकार करता हूं।

मुकेश भारद्वाज : उत्तर भारत में भी भाजपा के खिलाफ एक महागठबंधन बन रहा है, उसका आने वाले चुनाव में कितना असर पड़ेगा?

’चुनाव में उसका कोई असर नहीं पड़ेगा। अभी तो वह गठबंधन बना ही नहीं है। अभी तो देखना है कि उसमें कौन-कौन आएगा। उत्तर प्रदेश में जरूर आप कुछ असर कह सकते हैं। मगर चुनाव में अभी समय है। महागठबंधन तो कांग्रेस के समय भी बना था। महागठबंधन से कुछ असर नहीं पड़ेगा। इतना सब होने के बावजूद राज्यसभा में, जहां एनडीए का बहुमत नहीं है, वहां भी हम जीत गए!

मनोज मिश्र : आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू और महाराष्ट्र में शिव सेना आपसे अलग क्यों हो गए?

’शिव सेना तो हमारे साथ है। चंद्रबाबू नायडू की समस्या अलग है। दरअसल, गठबंधन में ऐसा होता ही है। गठबंधन में जो रहता है, वह चाहता है कि उसे ज्यादा मिले, पर जो सरकार चलाता है, वह चाहता है कि मर्यादा का ध्यान रखते हुए कितना दिया जा सकता है। आंध्र में क्या हुआ कि वहां पिछली बार बहुत बारीक बहुत के साथ सरकार बनी थी और चंद्रबाबू के खिलाफ जो जगमोहन रेड्डी प्रयास कर रहे थे, उन्हें लग रहा था कि उन्हें समर्थन मिला है। इसलिए वे भाजपा से अलग होकर अलग प्रयास करने लगे। चंद्रबाबू आंध्र को विशेष दर्जा दिलाना चाहते थे। हालांकि विशेष दर्जा देने से जो फायदा मिल सकता था, उससे ज्यादा अभी मिला है। पर उन्होंने लोगों के बीच ऐसा माहौल बनाने में वे सफल हुए हैं कि आंध्र के साथ नाइंसाफी हुई है। भाजपा का प्रयास है कि आंध्र में विधानसभा की सभी सीटों पर सक्रिय रूप से काम हो।

अजय पांडेय : पिछले चुनाव में लोगों को भाजपा से बहुत उम्मीदें थीं। क्या तब लोगों से जो वादे किए गए थे वे पूरे हुए?

’उस समय जो बातें हमने जो वादे किए थे, उसमें से बहुत सारे पूरे किए जा चुके हैं। राम मंदिर बनाने का वादा भी पूरा होगा।

सूर्यनाथ सिंह : आपकी सरकार पर एक आरोप यह भी है कि प्रचार बहुत होता है, पर काम कुछ नहीं होता, यह कितना सही है?

’इसका उल्टा है। इस प्रधानमंत्री की विशेषता यह है कि बिना तैयारी के कुछ नहीं बोलते। पहले योजना की तैयारी करते हैं, उसके बाद उसके बारे में बोलते हैं। जैसे जन-धन योजना की तैयारी पहले की गई थी, उसके बारे में बोला बाद में गया। हमारे कार्यकर्ता और आम लोग बहुत तरह के काम करने की सलाह देते हैं, पर प्रधानमंत्री उसकी घोषणा नहीं करते। पहले वे तैयारी करते हैं और फिर जब उन्हें लगता है कि कर सकते हैं, तभी बोलते हैं।

दीपक रस्तोगी : यह भी कहा जाता है कि यह सरकार पुरानी योजनाओं पर नया रैपर चढ़ा कर अपना बता देती है।

’ऐसा नहीं है। देखिए, जब अर्थव्यवस्था में प्रगति होती है, तो लोगों को रोजगार मिलता है। आधारभूत ढांचे के विकास पर जोर दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि माल ढुलाई वाले वाहनों का निर्माण बढ़ा। इससे रोजगार के अवसर बने।

आर्येंद्र उपाध्याय : सारे बड़े अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर सरकार फेल हुई है। आप क्या मानते हैं?

’अभी दो बड़े निर्णय हुए- नोटबंदी और जीएसटी। इसका असर हुआ है। हां, बीच में विकास दर में थोड़ी कमी जरूर दर्ज हुई थी, पर अब वह उसे पार कर चुकी है।

मनोज मिश्र : अगले आम चुनाव में केरल में कोई सीट ला पाएंगे क्या?

’हां, बिल्कुल। हम उसके प्रयास में हैं। पिछली बार एक सीट हम सिर्फ चौदह हजार वोटों के अंतर पर हार गए थे, शशि थरूर जीते थे।

वी. मुरलीधरन

भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सदस्य और केरल भाजपा के पूर्व अध्यक्ष वी. मुरलीधरन का जन्म केरल के कन्नूर जिले के एरनजोली गांव में हुआ। स्कूली शिक्षा के दौरान ही वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी और संघ की गतिविधियों से जुड़ गए। बाद में वे एबीवीपी की केरल इकाई के संगठन सचिव बने। फिर एबीवीपी के अखिल भारतीय महासचिव चुने गए। उस दौरान उन्होंने देश भर की शैक्षणिक संस्थाओं में गोष्ठियां आयोजित करके और संस्थाओं के मुखिया, कुलपतियों आदि से मिल कर शिक्षा संबंधी विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की। भाजपा से उनका जुड़ाव 1998 के आम चुनावों के दौरान हुआ, जब उन्हें पार्टी के केंद्रीय चुनाव नियंत्रण कक्ष में सहयोग के लिए तैनात किया गया। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय मुरलीधरन नेहरू युवा केंद्र के उपाध्यक्ष नियुक्त किए गए। इस दौरान उन्होंने युवा मामलों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर काम किया। फिर 2006 में केरल भाजपा के उपाध्यक्ष चुने गए। अब वे आंध्र प्रदेश के प्रभारी हैं। मुरलीधरन को विश्वास है कि अगले चुनाव में दक्षिण भारत में भाजपा को अधिक कामयाबी मिलेगी।