ताज़ा खबर
 

बारादरी: परीक्षा को बच्चे के स्तर पर लाया जाए

नवंबर 2017 में केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए प्रवेश परीक्षाएं आयोजित कराने के उद्देश्य से राष्ट्रीय परीक्षा एजंसी (एनटीए) की स्थापना की। एनटीए के महानिदेशक विनीत जोशी का कहना है कि अध्ययन-अध्यापन में बदलाव लाना है, तो उसके लिए परीक्षा प्रणाली को बदलना बहुत जरूरी है। अभी तक परीक्षण के नाम पर बहुत ऊंचे स्तर पर जाकर परीक्षा ली जाती है। हो सकता है कि जो बच्चा बारहवीं में पढ़ रहा है, उसे स्नातक स्तर के प्रश्नों का जवाब न आता हो। पठन, पाठन और परीक्षा जैसे अहम विषय पर बातचीत का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

Author Published on: April 14, 2019 4:14 AM
बारादरी की बैठक में विनीत जोशी (सभी फोटो : आरुष चोपड़ा)

मनोज मिश्र : नेशनल टेस्टिंग एजंसी के बनने से परीक्षा प्रणाली पर क्या असर पड़ेगा?

विनीत जोशी : हिंदुस्तान की शिक्षा पर जो प्रभाव पड़ता रहा है, वह इस पर निर्भर है कि परीक्षा प्रणाली कैसी है। चाहे वह दसवीं-बारहवीं की परीक्षा हो या फिर प्रवेश परीक्षा की बात हो। जिस तरीके की परीक्षा होती है, उसी तरीके की पढ़ाई होती है, उसी तरीके से पढ़ाया जाता है। स्वाभाविक है कि अगर परीक्षा प्रणाली बदलती है, तो पढ़ने-पढ़ाने का तरीका भी बदलता है। मैं विश्वास करता हूं कि अगर अध्ययन-अध्यापन में बदलाव लाना है, तो उसके लिए परीक्षा प्रणाली को बदलना बहुत जरूरी है। इस लिहाज से नेशनल टेस्टिंग एजंसी की इसमें एक बड़ी भूमिका रहेगी। इस एजंसी का मकसद है कि एक परीक्षा जिस स्तर की होनी चाहिए, वह उसी स्तर की हो। अभी तक परीक्षा के नाम पर होता यह रहा है कि परीक्षण के नाम पर बहुत ऊंचे स्तर पर जाकर परीक्षा ली जाती है। हो सकता है कि जो बच्चा बारहवीं में पढ़ रहा है, उसे स्नातक स्तर के प्रश्नों का जवाब न आता हो। ऐसे में बच्चे को स्कूल से बाहर के माध्यमों की मदद लेनी पड़ती है। इससे माता-पिता और बच्चों को बहुत सारा संसाधन खर्च करना पड़ता है। इसलिए अगर उसी स्तर पर परीक्षण हो, जिस स्तर पर पढ़ाई हो रही है, तो स्वाभाविक रूप से इन संसाधनों का खर्च बचेगा और बच्चे में विश्वास बढ़ेगा कि वह परीक्षा पास कर सकता है। इसलिए हमारी कोशिश है कि परीक्षा को बच्चे के स्तर पर लाया जाए। फिर परीक्षा को उद्देश्य से जोड़ना जरूरी है कि आप किस मकसद के लिए परीक्षण करना चाहते हैं।

दीपक रस्तोगी : इस साल मेडिकल और इंजीनियरिंग की जो प्रवेश परीक्षाएं होने जा रही हैं, क्या उनमें कोई बदलाव करने जा रहे हैं?
’इस साल की परीक्षाओं में कोई बदलाव नहीं है। जो बात हम कर रहे हैं, उसे करते-करते साल भर का समय तो लग जाएगा। उसके पहले हमें ब्योरों का विश्लेषण करना है। आने वाले समय में जरूर बदलाव दिखेगा।

अजय पांडेय : आज अभिभावकों और बच्चों के मन में यह बात रहती है कि बिना कोचिंग के हम प्रतियोगी परीक्षाएं पास नहीं कर सकते। तो क्या इससे परीक्षा के नाम पर शिक्षा के व्यवसायीकरण को बढ़ावा नहीं मिल रहा?
’कुछ इस तरीके की धारणा बन गई है कि अगर आपने कोचिंग नहीं की तो आप परीक्षा पास नहीं कर सकते। मगर मैं कई लोगों को जानता हूं, जिन्होंने कहीं कोई कोचिंग नहीं ली। हम लोग जो परीक्षाएं लेते हैं, चाहे आप जेई, नीट वगैरह की बात करें, तो उसमें प्रश्न इस तरीके के नहीं होते कि बच्चे ने अगर ग्यारहवीं और बारहवीं की किताबें अच्छे तरीके से पढ़ ली है, तो उसके लिए उनका जवाब देना मुश्किल हो। मगर समस्या वहां पर आती है कि चूंकि माहौल ऐसा बना हुआ है कि बच्चा ग्यारहवीं-बारहवीं का पाठ्यक्रम एनसीईआरटी की किताबों से नहीं पढ़ता है। उसके दिमाग में हमेशा यह द्वंद्व चलता रहता है कि इससे कुछ नहीं होने वाला है। इसलिए उसमें आत्मविश्वास नहीं पैदा हो पाता। यह मैं गारंटी के साथ कह सकता हूं कि अगर बच्चा ग्यारहवीं और बारहवीं की एनसीईआरटी की किताबों को ठीक से पढ़ ले, उन्हें ठीक से समझ ले, उसकी हर चीज उसे आती है, तो उसे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। तो यह सोचना कि कोचिंग के बिना सफलता पाना असंभव है, ठीक नहीं है।

पंकज रोहिला : जेई की परीक्षा में रैंकिंग के मामले को कैसे चुनौतीपूर्ण मानते हैं?
’अगर प्रश्नपत्र सही स्तर पर तैयार किया गया होगा, तो इस तरह की समस्या नहीं आएगी। मान लीजिए अभी तीन सौ साठ अधिकतम अंक है और माइनस नब्बे न्यूनतम अंक है, तो इस तरह साढ़े चार सौ नंबर का विस्तार बनता है। अब इन साढ़े चार सौ अंकों में दस लाख बच्चों को लाना है, कहीं न कहीं थोक में बच्चों की छंटाई होगी। अभी इसलिए छंटाई अधिक हो रही है क्योंकि प्रश्नपत्र उचित ढंग से तैयार नहीं हो रहा है। उसका कारण यह है कि कुछ प्रश्नों के जवाब सब लोग दे दे रहे हैं, और बहुत सारे प्रश्नों के उत्तर ज्यादातर लोग नहीं दे पा रहे हैं। हर प्रश्नपत्र का एक कठिनाई स्तर (डिफिकल्टी लेवल) होता है, पर वह बच्चे के स्तर को ध्यान में रख कर तय किया जाना चाहिए। अगर ऐसा होगा, तो बच्चे की समस्या दूर हो जाएगी। इसलिए हम प्रश्नपत्र तैयार करने वालों के सामने पिछले साल के प्रश्नपत्र रख कर बताते हैं कि उसमें क्या कमियां थीं। हमारी एजंसी का फोकस बच्चे के साइकोमेट्रिक टेस्ट पर होगा। पर रैंकिंग तो फिर भी होगी।

मनोज मिश्र : क्या परीक्षा का दबाव कम करने का भी आपका प्रयास होगा?
’हम लोगों का प्रयास अपनी परीक्षा प्रणाली को सुधारने का है, फिर हम अलग-अलग बोर्डों से भी चर्चा करेंगे कि वे किस तरह से परीक्षाएं आयोजित कर रहे हैं। उन्हें हम यह भी बताएंगे कि देखिए, हम लोगों ने किस तरीके से प्रश्नपत्र तैयार किए थे और आपके यहां कैसे प्रश्न तैयार हुए हैं और दोनों में क्या तालमेल संभव है, जिससे कि बच्चों का भला हो सके। और दूसरी चीज तय हो कि परीक्षा का उद्देश्य क्या है। अगर उस उद्देश्य को ध्यान में रख कर प्रश्नपत्र तैयार होगा, तो जिन लोगों ने उस पाठ्यक्रम को जिस उद्देश्य से लिया होगा, उन पर स्वाभाविक रूप से दबाव कम होगा।

अजय पांडेय : कोचिंग संस्थान कहां तक सहायक हैं?
’मेरा मानना है कि कोचिंग संस्थान मांग और अपूर्ति के बीच के गैप को भरने का प्रयास करते हैं। हो सकता है कि कुछ बच्चे इतने भाग्यशाली न हों कि उनके अध्यापक उतने अच्छे न हों या उन्हें इतना समय न मिलता हो। इसलिए हो सकता है कि कुछ बातें उन्हें समझ में न आती हों। इसी गैप को वे पूरा करते हैं। इसी के चलते वे व्यावसायिकता को बढ़ावा देते हैं।

मृणाल वल्लरी : परीक्षा केंद्रों पर कई बार ऐसी अशोभनीय स्थिति पैदा हो जाती है कि किसी के कपड़े उतरवाए जाते हैं, तो किसी के धार्मिक चिह्न उतरवा दिए जाते हैं। ऐसी स्थिति क्यों आती है?
’ऐसा कम्युनिकेशन गैप की वजह से होता है। जो एजंसी परीक्षा आयोजित करती है, वह कुछ मानक इसलिए तय करती है कि कोई बच्चा अनुचित तरीके से फायदा न उठा पाए। इसलिए कहा जाता है कि अच्छी तरह से जांच हो। देखें कि कहीं उसने कान में ब्लूटूथ तो नहीं लगा रखा है या अपने कुर्ते के भीतर तो कुछ नहीं छिपा रखा है। इसको अगर ठीक से नहीं समझाया जाएगा, तो अगर किसी आदमी को यह नहीं पता है कि लंबी बाजू के कपड़े नहीं पहन कर आने हैं, तो वह आएगा। मगर इसका मतलब यह नहीं कि अगर किसी ने लंबी बाजू के कपड़े पहन लिए तो आप उसे काट कर छोटी कर दीजिए। परीक्षक से ऐसी अपेक्षा नहीं की जाती है। इसके लिए बहुत स्पष्ट निर्देश हैं कि अगर कुछ लोग अपनी धार्मिक आस्था के चलते कुछ अलग तरह का पहनावा या दूसरे तरह की चीजें पहनते हैं, तो वे समय से थोड़ा पहले आ जाएं, ताकि उनकी ठीक से जांच हो सके। मगर कम्युनिकेशन गैप की वजह से जांच करने वाले खुद यह जिम्मेदारी ले लेते हैं कि हम परीक्षार्थियों को ऐसा करके भेजेंगे अंदर। वहां पर कई बार विवाद हो जाता है। इसलिए हमारी कोशिश है कि लोगों को ठीक से बातें समझाएं।

सुशील राघव : अभी ज्यादातर परीक्षाएं, जो एनटीए करा रही है, वे कंप्यूटर आधारित हैं। इस तरह ग्रामीण परिवेश से आने वाले बच्चों को क्या परेशानियां नहीं पैदा हो रहीं?
’जब यह प्रणाली शुरू हुई थी, तब तो ऐसी बातें कही जा रही थीं। इसलिए इस परेशानी को दूर करने के लिए हमने पूरे देश में चार हजार प्रैक्टिस सेंटर खोले हैं। वहां बच्चा बिना फीस दिए शनिवार और रविवार को देख-जान सकेगा कि किस तरह का परीक्षण होगा। इस तरह इस समस्या को दूर करने का प्रयास किया गया। पर देखा गया कि वहां बहुत कम लोग जाते हैं। दूसरी बात कि आज तकनीक से हर बच्चा वाकिफ है। हर घर में स्मार्टफोन पहुंच चुका है। तीसरी चीज कि हर साल परीक्षाओं में बच्चों की उपस्थिति बढ़ रही है। तो, यह कहना कि ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को परेशानी होगी, ठीक नहीं है।

मुकेश भारद्वाज : स्कूली शिक्षा में जो एक प्रणाली विकसित की गई थी सीसीए, उसका उद्देश्य भी यही था कि आप बचपन से बच्चे का सतत मूल्यांकन करें। मगर उसका इतना दुरुपयोग और विरोध हुआ कि उसे वापस लेना पड़ा। क्या कोई और तरीका हो सकता है कि बच्चे के तनाव को और कम किया जा सके?
’वह फैसला वापस क्यों लिया गया, मैं नहीं जानता, क्योंकि मैं तब वहां नहीं था। पर एक सामान्य नागरिक के तौर पर कह सकता हूं कि उसे लागू करने में जरूर कोई समस्या रही होगी। सिद्धांत के तौर पर तो वह ठीक था कि एक परीक्षा के बजाय साल भर मूल्यांकन होगा और उस मूल्यांकन का उद्देश्य बच्चे के स्तर का मूल्यांकन करना नहीं था। उसका उद्देश्य था कि बच्चा क्या जानता है, क्या नहीं जानता है, उसे समझिए और तुरंत उसका समाधान कीजिए। अगर कोई चीज उसे नहीं आती है, तो उसका समय रहते समाधान किया जाए। उसका मकसद था कि बच्चा समय के साथ-साथ सीखता भी चले। पर व्यावहारिक तौर पर कुछ दिक्कतें रही होंगी, इसीलिए उसे वापस लिया गया होगा।

सूर्यनाथ सिंह : प्रतियोगी परीक्षाओं में ढेर सारे सवाल पूछ कर बच्चे की जानकारी का परीक्षण तो हो जाता है, पर उसके बोध का परीक्षण नहीं हो पाता, जबकि आगे चल कर उसे किसी विशेष क्षेत्र में दक्षता हासिल करनी होती है। यह शिकायत कैसे दूर करेंगे?
’एनटीए का एक उद्देश्य यह भी है कि कैसे बच्चे के व्यावहारिक ज्ञान का परीक्षण किया जाए। इसके लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय से भी मंजूरी मिल गई है कि जल्दी से जल्दी हम व्यावहारिक ज्ञान का परीक्षण करें। जैसे जो लोग इंजीनियरिंग में जाना चाहते हैं, उनमें इंजीनियरिंग का व्यावहारिक ज्ञान है कि नहीं। इसका प्रयास है, पर उसके लिए प्रश्नपत्र बनाना भी आसान नहीं है। उसमें समय लगेगा, पर हमारा प्रयास है कि इसे शुरू किया जाए।

अरविंद शेष : परीक्षा संबंधी जिन चुनौतियों की बात आपने की, क्या वह पूरी शिक्षा प्रणाली की चुनौती नहीं है?
’बिल्कुल है। परीक्षा सिर्फ यह आकलन करने का माध्यम है कि आपने क्या सीखा है। मगर परीक्षा का एक उद्देश्य भी होता है। अभी जो प्रतियोगी परीक्षाएं करवा रहे हैं, वे पूरी तरह से चयन और छंटाई के लिए किए जा रहे परीक्षण हैं। मगर एक पाठ्यक्रम के बाद जो परीक्षाएं होती हैं, उनमें यह देखा जाता है कि बच्चे ने कितना सीखा। वहां पर यह बात बिल्कुल लागू होती है कि अगर पाठ्यक्रम अच्छा है और उसका पठन-पाठन ठीक से हुआ है तो निश्चित रूप से अच्छा करेंगे। मगर बच्चे अच्छा नहीं कर रहे, तो इसका यह मतलब नहीं कि बच्चे ही बेकार हैं। यह भी हो सकता है कि बच्चों को ठीक से बताया नहीं गया हो। इसके लिए केवल बच्चा नहीं, माता-पिता, अध्यापक सभी जिम्मेदार हैं।

मनोज मिश्र : क्या कंप्यूटर के जरिए परीक्षा लेने से नकल पर रोक लगाना आसान है?
’बहुत आसान है। हालांकि उसमें भी कुछ लोग सेंध लगाने का प्रयास करते हैं, पर ऐसा करना आसान नहीं है। कंप्यूटर आधारित परीक्षा का फायदा यह है कि पर्चे लीक होने की संभावना नहीं होती। उसमें आधा घंटा पहले पर्चा पहुंचाते हैं।

अजय पांडेय : प्रतियोगी परीक्षाओं में ऋणात्मक मूल्यांकन क्यों जरूरी है।
’ऋणात्मक मूल्यांकन का भी उद्देश्य होता है। जैसा कि पहले मैंने बताया, इससे एक तो आपका दायरा बढ़ गया। जैसे अधिकतम तीन सौ साठ और न्यूनतम नब्बे अंक है तो अंकों का दायरा साढ़े चार सौ हो गया। दूसरी बात कि कुछ संस्थान अनुमान लगाने को बढ़ावा नहीं देना चाहते। जैसे इंजीनियरिंग कॉलेजों में ऐसा है। हालांकि कुछ करना भी चाहते हैं। वे कहते हैं कि हम समझदारी से लगाए गए अनुमान को उचित मानते हैं, इसलिए वे ऋणात्मक मूल्यांकन नहीं कराते। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि ऋणात्मक मूल्यांकन ठीक है या नहीं है। यह इस बात पर निर्भर है कि आप परीक्षण से क्या चाहते हैं, उससे जो बच्चे निकल कर आ रहे हैं उनसे क्या चाहते हैं।

मृणाल वल्लरी : जब कोई भी नई संस्था गठित होती है, तो सबसे जरूरी होता है उसका आधारभूत ढांचा। आप अपना आधारभूत ढांचा कैसे मजबूत करेंगे?
’हमारी एजंसी को आत्मनिर्भर बनना है। पहले साल में तो नहीं हैं, पर आने वाले सालों में बिल्कुल आत्मनिर्भर हो जाएंगे। अगले साल से हमें इतनी फीस मिल जाएगी कि आत्मनिर्भर हो जाएंगे। फिर भी अगर कोई कमी रह जाती है, तो सरकार से बात करके उसे हल करेंगे। फिर अगर आपके खर्चे सीमित हैं, तो आत्मनिर्भर होने में कोई दिक्कत नहीं आती।

विनीत जोशी
इलाहाबाद के रहने वाले विनीत जोशी ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) कानपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। वे 1992 बैच के मणिपुर कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा (आइएएस) के अधिकारी हैं। 1999 में निजी सचिव के रूप में केंद्रीय युवा मामले एवं खेल मंत्रालय में नियुक्त हुए। 2000 से 2001 तक खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय से भी जुड़े। 2005 में उन्हें केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) का सचिव नियुक्त किया गया। इसके बाद 2010 से 2014 तक सीबीएसई के चेयरमैन रहे। अप्रैल 2018 में विनीत जोशी को राष्ट्रीय परीक्षा एजंसी का पहला महानिदेशक बनाया गया।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 बारादरी: इस बार भी मिलेगी हमें शानदार कामयाबी
2 कांग्रेस-आप गठबंधन की अटकलों पर केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन ने कहा- गिड़गिड़ा रहे हैं मुख्यमंत्री महाशय
3 बारादरी: इस बार मुकाबला दो महागठबंधनों के बीच