ताज़ा खबर
 

बारादरी: बेपानी होकर उजड़ रही है दुनिया

राजेंद्रसिंह : छह अगस्त, 1959 को उत्तर प्रदेश के बागपत में जन्म। आज जलपुरुष के नाम से जाने जाते हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जुड़े एक कॉलेज से एमए किया। रेतीला राजस्थान, जहां पानी के नाम पर मृगमरिचिका ही दिखती थी, वहां तालाब बहाने में योगदान दिया। पानी के संकट को भांप कर उसके लिए कुछ करने की ठान ली। अपनी शादी के कुछ समय बाद ही घर का सारा सामान बेच कर पानी का संरक्षण करने के लिए चल दिए। 1980 के दशक में राजस्थान में छोटे-छोटे तालाब बना कर उनमें बारिश का पानी संरक्षित किया, जिससे भूमि को नमी मिली। अब तक कई जलस्रोतों के पुनर्जीवन में योगदान दे चुके हैं। तरुण भारत संघ संस्था के जरिए करीब एक हजार गांवों को पानी मुहैया कराया। ‘गार्डियन’ ने उन पचास लोगों में शुमार किया जो पृथ्वी बचा सकते हैं। ‘स्टॉकहोम वॉटर प्राइज’, जिसे पानी के लिए मिलने वाला नोबेल पुरस्कार कहा जाता है, से भी नवाजा गया और 2001 में रैमन मैगसैसे से सम्मानित किया गया।

बारादरीजलपुरुष राजेंद्र सिंह (फोटो- अरुष चोपड़ा इंडियन एक्सप्रेस)

जलपुरुष के नाम से मकबूल सामाजिक कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह का कहना है कि इक्कीसवीं शताब्दी में दुनिया बेपानी होकर उजड़ रही है। अफ्रीकी और मध्य पश्चिमी एशियाई देशों के लोग जलवायु शरणार्थी बन गए हैं। सौभाग्य से, अभी हमारा देश वैसा नहीं है। हमारे देश में लोग गांव से शहर तक ही आ रहे हैं। शहर में पीने का पानी कहीं न कहीं से मिल ही जाता है। चाहे उस पानी को लूट कर लाया जाए या फिर तीन सौ किलोमीटर दूर से लाना पड़े। लेकिन हमारे देश के लोग जलवायु शरणार्थी कब तक नहीं बनेंगे, इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता हूं। कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने। 

मुकेश भारद्वाज : जीवन, जीविका और जमीर से जुड़े जल पर जो राजनीतिक प्रक्रिया है, उस पर आपकी पहली टिप्पणी क्या होगी?
राजेंद्र सिंह : मुझे यह बताते हुए दुख है कि इस वक्त हमारी सरकारों की ओर से एक के बाद एक बड़े नारे लगाना, एक के बाद एक बड़े संदेश देना तो बहुत चल रहा है। ‘हर घर में नल, नल में जल’ जैसे नारे लगाए जा रहे हैं। मैं जानता हूं आप हर घर में प्लास्टिक का नल तो लगा दोगे क्योंकि इसके लिए बड़ी कंपनियों को आपको पैसा देना है। यह कार्य करना आसान है पर हर घर में जल आप कैसे दोगे, मैं यह नहीं जानता हूं। क्योंकि आपका 72 फीसद भूजल भंडार खाली हो चुका है। यह तथ्य मैं नहीं बता रहा हूं, यह खुद भारत सरकार का आंकड़ा है। ऐसे में हमारा भविष्य क्या है? ऐसी स्थिति के बाद भी ‘हर घर में नल, नल में जल’ में देने की बात कर रहे हो। गांव में यदि नल नहीं भी लगेगा तो भी वहां की महिलाओं को कुएं से पानी मिल जाएगा। लेकिन जब गांव के जोहड़ में पानी नहीं है, कुएं में पानी नहीं है, तालाब में पानी नहीं है, झील में पानी नहीं है, नदी में पानी नहीं है, नाले में पानी नहीं है तो पानी कहां से आएगा। इस संबंध में जब सरकारी अधिकारियों से बातचीत होती है तो वे कहते हैं कि यह तो जलवायु परिवर्तन व वैश्विक तापमान की वजह से यह वैश्विक समस्या बनी है। इसका हम क्या हल निकाल सकते हैं। इस पर मेरा जवाब होता है कि भारत के ज्ञानतंत्र में इसका हल था। इसमें बताया गया था कि हम कम पानी में भी कैसे ज्यादा से ज्यादा अपने जीवन को चला सकते थे। कैसे कम पानी का उपयोग कर अधिक से अधिक पैदावार कर सकते थे? लेकिन सरकारी तंत्र ने इस ज्ञानतंत्र को खत्म कर दिया और अब कहते हैं हमारे पास कोई हल नहीं है। मैंने पिछले 37 सालों में सिर्फ पानी का काम किया है। मैंने देखा है कि जो लोग अपने देसी तरीके से काम कर रहे हैं, उन्हें परिणाम मिल रहे हैं। और ऐसी जगहों की संख्या कई सौ होगी। इसका एक उदाहरण हमारे गांव में मिलता है, जहां पहले पानी की बहुत कमी थी और देसी तरीकों के उपयोग से यहां पानी की कमी को दूर किया गया। इसकी वजह से धरती भी बदली है, कुदरत भी बदली है और लोग भी बदले हैं। लेकिन देसी तरीकों का इस्तेमाल करने वालों को यह सरकार न सुनना चाहती है और न यह सरकार उन्हें आंखों से देखना चाहती है।
पंकज रोहिला : देश की राजनीति में पानी एक बड़ा मुद्दा बना है, लेकिन राजनीतिक दल इस मुद्दे को सही तरह से संभाल नहीं पा रहे हैं। इस पर आपका क्या कहना है?
राजेंद्र सिंह : पिछले तीस सालों में गंगा की बात करके देश में तीन प्रधानमंत्री बने। सबसे पहले गंगा का नाम लेने वाले व्यक्ति ने सबसे अधिक सीटें हासिल कर सरकार बनाई थी। हालांकि लोगों ने कहा कि उन्हें यह सांत्वना मत मिला है, क्योंकि उनकी माताजी की हत्या कर दी गई है। लेकिन किसी ने नहीं कहा कि उन्हें पूरे देश का मत गंगा की वजह से मिला था और उन्होंने 424 सीटें जीतीं। क्या तब इस देश के राजनेताओं को यह समझ नहीं आया था कि उन्हें गंगा की वजह से गद्दी मिली थी। दूसरे नेता रहे मनमोहन सिंह, जिन्होंने दूसरे कार्यकाल में गंगा के नाम पर मत लिया और सरकार बनाई। मनमोहन सिंह ने पहले कार्यकाल के दौरान गंगा के लिए कई कड़े फैसले किए। उन्होंने भागीरथी पर जो तीन बांध बन रहे थे, उन्हें एक झटके में रद्द किया। इसके अलावा गोमुख से लेकर उत्तरकाशी तक भागीरथी को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील घोषित किया और साथ ही ये लाइनें भी लिखीं कि अब भागीरथी पर कोई बांध नहीं बनेगा। मैं इतना कहना चाहता हूं कि मनमोहन सिंह पूरी गंगा को तो ठीक नहीं कर सके लेकिन गंगा जिस भागीरथी से बनती है, उसे अविरल बना दिया। इसके बाद गंगा सिर्फ वोट बैंक बन गई।

सूर्यनाथ सिंह : उत्तर प्रदेश सरकार ने एक कानून बनाया जिसके मुताबिक तालाब या अन्य जल इकाइयों पर कब्जा करने वालों पर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। लेकिन देखा यह गया है कि उस कानून का कोई असर नहीं हुआ और लोगों ने कई स्थानों पर ऐसे कब्जे किए। ऐसे में सरकार का काम क्या सिर्फ कानून बनाना भर है या उसे ठीक से लागू कराना भी है?
राजेंद्र सिंह : ’सबसे पहला सवाल जो यह है कि भारत के पानी और पानी की इकाइयों पर कब्जा कौन करा रहा है? यह कब्जा हमारा वर्तमान तंत्र ही करा रहा है। कानून बनने से चीजें नहीं सुधरती हैं। कानून तो चीजों को और जटिल करता है। कानूनों के माध्यम से ही जमीनों पर अतिक्रमण हो रहे हैं। जिस सरकार ने यह कानून बनाया, उस सरकार ने अपने राज्य की जल इकाइयों की न पहचान की और न ही उन्हें चिह्नित और न ही अधिसूचित किया। जब सरकार कोई कानून बनाती है तो उससे पहले उसे कैसे लागू किया जाएगा, वह उस कानून में रखा जाता है। जल इकाइयों को कब्जे से मुक्त रखना था तो उनकी पहचान जरूरी थी। उनका रिकॉर्ड बनाया जाना चाहिए। मुझे बताइए किसी राज्य सरकार ने ये काम किए हैं, जबकि मैं पिछले 20 सालों से इस बात के लिए लड़ता रहा हूं कि अगर भारत की जल संरचनाओं को कब्जे से मुक्त रखना है तो उनकी पहचान और उन्हें चिह्नित करना और उन्हें अधिसूचित करना बहुत जरूरी है। लेकिन मुझे कहते हुए बहुत दुख हो रहा है कि किसी सरकार ने ऐसा नहीं किया।

दूसरी ओर, आपकी सरकारें लोगों को पानी निकालने के लिए कर्ज दे रही हैं। सरकारें नलकूपों के बिजली के बिल माफ कर रही हैं, धरती से पानी निकालने के लिए। इस तरह से वे धरती से पानी निकालेंगे और धरती का पेट खाली करेंगे। वे लोग जल के उपयोग में किसी अनुशासन का पालन नहीं करते हैं। वह जल उपयोग की दक्षता को नहीं बढ़ाता है। ऐसे में जब जल इकाइयों पर कब्जे का कानून बनाया जा रहा था तो लोगों में जल साक्षरता की मुहिम को भी शामिल करना चाहिए था। उन्हें बताना चाहिए था कि देश के सामने जल का संकट है। इस संकट से पार पाने के लिए एक तो हम यह कानून बना रहे हैं और दूसरी ओर, समाज को साक्षर कर रहे हैं। सबसे पहले दोषी है राज, जिसने जल का मालिकाना हक लिया। सरकारों ने पानी का मालिकाना हक इसलिए लिया क्योंकि वे पानी का निजीकरण करना चाहते हैं और निजी कंपनियों को इसका मालिक बनाना चाहते हैं। पिछले साल भारत में 50 हजार करोड़ रुपए का पानी का व्यापार हुआ, जबकि पानी की असली मालिक जनता है।

सुशील राघव : जल साक्षरता को लेकर विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में कोई पाठ्यक्रम नहीं है। पठन-पाठन में इसे शामिल किए बिना बात आगे कैसे बढ़ेगी?
राजेंद्र सिंह : ’मैं पिछले 15-16 सालों से सभी राज्यों की राज्यस्तरीय समितियों को व्यक्तिगत रूप से मिला हूं। उन्हें कह रहा हूं कि आपके यहां पानी का संकट है। तुम बेपानी हो रहे हो। ऐसे में अपने बच्चों को तो सिखाओ कि पानी क्या है? उनके जीवन में पानी की क्या अहमियत है? क्यों पानी बचाना चाहिए? क्यों पानी के साथ अनुशासित होना चाहिए? यह बात मैं राज्यों के मुख्यमंत्रियों से लेकर जल मंत्रियों तक सभी से कह रहा हूं। मैं लगातार राज्य सरकारों से कह रहा हूं कि अगर आप पानीदार रहना चाहते हो तो स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पानी को लेकर पाठ्यक्रम शुरू करो। यह अचरज की बात है कि भारत में एक भी जल विश्वविद्यालय नहीं है जबकि यहां पेट्रोलियम से लेकर रक्षा विश्वविद्यालय तक मौजूद हैं। हमारे जीवन के लिए सबसे जरूरी चीज पानी के लिए एक भी विश्वविद्यालय नहीं है।

अजय पांडेय : कहा जाता है कि तीसरा विश्व युद्ध हुआ तो वह पानी के लिए होगा। क्या आप मानते हैं कि दुनिया में पानी की इतनी कमी हो जाएगी कि उसके लिए युद्ध लड़ना पड़े?
राजेंद्र सिंह : ’दुनिया में पानी की कमी हो नहीं जाएगी, बल्कि हो चुकी है। मैं यहां बैठ कर यह कहने के लिए तैयार हूं कि पानी के लिए तीसरा विश्व युद्ध चल रहा है। हम उस तीसरे विश्व युद्ध को समझ नहीं रहे हैं। आपको पता है कि अफ्रीकी और मध्य पश्चिमी एशियाई देशों के लोग यूरोपीय देशों में जलवायु शरणार्थी के रूप में जा रहे हैं और उन्हें वहां पसंद नहीं किया जा रहा है। यूरोप के लोगों का कहना है कि इनके आने से हमारे शहरी भविष्य पर संकट छा रहा है। इससे यूरोप के देशों में भयानक तनाव की स्थिति है। इस तनाव को अभी तक हमारी सरकारें और संयुक्त राष्ट्र तंत्र शरणार्थी के नाम से दर्ज कर रहा है। वो इसे युद्ध की स्थिति नहीं बता रहा है। पहले दो विश्व युद्धों से अलग यह तीसरा विश्व युद्ध उनसे ज्यादा भयानक स्थिति में होगा। इस युद्ध में प्यासे और शक्ति के बीच युद्ध होगा। इस युद्ध में 80 फीसद दुनिया के सामने 20 फीसद दुनिया होगी। यह लड़ाई अगले कुछ सालों में सभी को समझ आने लगेगी।

मृणाल वल्लरी : पानी को लेकर राज की उदासीनता तो है ही लेकिन समाज में भी नदियों और पानी को लेकर साझा भविष्य की चिंता हम मध्य और उच्च मध्यवर्ग में नहीं देखते हैं। साझेदारी के भाव के अभाव को कैसे खत्म किया जाए?
राजेंद्र सिंह : ’यह तो साफ दिख जाता है कि उच्च वर्ग में साझे भविष्य को लेकर कोई चिंता नहीं है। लेकिन अब भी साझे भविष्य की चिंता करने वाला एक बड़ा वर्ग देश में है। जहां पर अभी तकनीक नहीं पहुंची है, वहां रहने वाले लोग अभी भी साझे भविष्य के बारे में सोचते हैं। इस देश में सैकड़ों स्थान हैं जो साझे भविष्य की चिंता करते हुए बादल से निकलने वाली बूंद को धरती के पेट में पहुंचाते हैं जबकि उन्हें यह पता है कि इस बूंद का उपयोग वे नहीं कर पाएंगे। राज और समाज दोनों इस वर्ग की अनदेखी कर रहे हैं। वो मानते ही नहीं है कि यह वर्ग कहीं है भी। इसलिए हमारा ध्यान समाज के उस वर्ग की ओर नहीं जाता है और न उनके ज्ञान की ओर जा पाता है। मुझे पानी का काम सिखाने वाले मांगू मीणा (मांगू काका) अनपढ़ थे। उनके पास शब्द नहीं थे लिखने और बोलने के लिए। लेकिन उन्होंने एक ही दिन में मुझे जियो हाइड्रो साइंस का पूरा ज्ञान करा दिया। उन्होंने मुझे चमड़े के चरस में बिठाकर सूखे कुएं में नीचे डाल दिया। पांच मिनट बाद बाहर निकाल कर पूछा कि तुमने कुएं में क्या देखा। मैंने कहा कि इस कुएं में तो ऊपर से नीचे तक दरारें हैं। जहां सीधी दरारें होती हैं, वहां लंबी जड़ वाले पेड़ होते हैं। यानी पेड़, जमीन और सूरज के संबंध को जानने में मुझे सिर्फ एक दिन लगा। ये वही लोग हैं जो साझे भविष्य की चिंता में लगे रहते हैं।

दीपक रस्तोगी : वैश्विक अर्थव्यवस्था के इस दौर में बड़ी विकास परियोजनाएं मजबूरी हैं। इनमें पानी और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन होता है। विकास और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग में वैकल्पिक रास्ता क्या होना चाहिए ताकि धरती भी बचे और आर्थिक विकास भी हो।
राजेंद्र सिंह : ’हमें वैकल्पिक नहीं बल्कि सनातन रास्ते की बात करनी होगी। सनातन का अर्थ है सदैव रहने वाला। इसमें ना विस्थापन होता है, ना विकृति होती है और ना विनाश होता है। सनातन रास्ता प्रकृति से ही निकलता है। प्रकृति ने हमें जो दिया है उसे हमें इतने प्यार से सहेजने की जरूरत है कि जिससे हमारा वर्तमान और भविष्य सुरक्षित रहे। यदि आप इस देश का सचमुच सतत विकास चाहते हैं तो वह सनातन रास्ते पर ही चलना होगा।

इस रास्ते पर चलकर हमारी अर्थव्यवस्था भी बेहतर होगी और हमारा स्वाबलंबन भी हो जाएगा। मुझे पानी का काम सिखाने वाले ने बताया था कि गांव का पानी गांव में, गांव की माटी गांव में, हर घर में बने गोबर का खाद, हर घर रखे अपना बीज और हर मानस को हो ग्रामसभा तब होगी गांव के हाथ में गांव की चोटी। इसे सामुदायिक विकेंद्रित अर्थव्यवस्था कहते हैं। जब हमारा समुदाय अपनी अर्थव्यवस्था को स्वावलंबी बनाता है तो वह सतत अर्थव्यवस्था के रास्ते पर जाती है। इसलिए यदि आप भारत को एक स्वाबलंबी राष्ट्र बनाना चाहते हैं, एक समृद्ध राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं तो भारत में बचे हुए ज्ञान से रास्ता निकालना होगा। यदि हम उस ज्ञान के रास्ते पर जाएंगे तो हमारी जिंदगी में विस्थापन नहीं आएगा, विकृति नहीं आएगी और विनाश नहीं आएगा। हमने आजादी के बाद दस गुणा ज्यादा सुखार और आठ गुणा ज्यादा बाढ़ बढ़ा दिया।

पंकज रोहिला : वॉटर ग्रिड को आप वर्तमान में कितनी बड़ी जरूरत मानते हैं?
राजेंद्र सिंह : ’मैं इसकी बिल्कुल भी जरूरत नहीं मानता हूं। मेरा मानना है कि यदि आप पूरे भारत में बाढ़ और सूखे से मुक्ति का काम करना चाहते हैं तो बादलों और वर्षा के साथ जुड़ कर नदियों के साथ कार्य करना होगा। इससे हमारा देश पानीदार बन जाएगा। ग्रिड बनाने से उसका पैसा बड़ी कंपनियों को मिलेगा। ग्रिड आम लोगों के लिए नहीं है। यह सिर्फ बड़ी कंपनियों के लिए है। अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मैं ऐसे तरीके ही बताऊंगा जिसमें विनाश नहीं है। जो तरीके लोगों के भले के लिए हैं और जिन तरीकों से गरीब से गरीब लोगों को फायदा होने वाला है। ग्रिड से कभी गरीब को फायदा नहीं होने वाला है। यदि आप गरीब को पानी देना चाहते हैं तो जहां पानी बरसा है, वहीं उसे पकड़कर तालाब, जोहड़ के माध्यम से धरती के पेट तक पहुंचाना होगा। हमें दूर की बड़ी चीजों की जगह अपनी छोटी चीजें देखनी चाहिए। अपने ज्ञानतंत्र से सक्षम और समृद्ध बन सकते हैं और इस ज्ञान को लागू करने में कोई जोखिम नहीं है। इसलिए हमें ग्रिड का जोखिम नहीं लेना चाहिए। यह बहुत ही जोखिम भरा है और भारत को इसकी कोई जरूरत नहीं है।

सूर्यनाथ सिंह : वर्षा जल संचयन को लेकर देश के हर राज्य में कानून है लेकिन यह प्रभावी रूप से लागू क्यों नहीं हो पाता है?
राजेंद्र सिंह : ’साल 1995 में चेन्नई की आयुक्त शांता शीला नायर होती थीं। मेरा उनसे मिलना हुआ। मैंने कहा कि आपका शहर सबसे अधिक पानी के संकट से जूझ रहा है। ऐसे में आपको कुछ करना चाहिए। उन्होंने पूछा कि क्या किया जाना चाहिए। इस पर मैंने उन्हें छत के पानी को रोकने की सलाह दी। अधिकारी शांता ने पूरे शहर में छत के पानी को धरती में डालने की योजना को लागू करा दिया। दिल्ली, मुंबई और जयपुर में इसलिए नहीं हुआ क्योंकि इसके लिए किसी की प्रतिबद्धता नहीं है। यह योजना कई शहरों में सिर्फ कागजों पर लागू है। फोटो दिखाकर मंजूरी ले ली जाती है। जब बारिश होती है तो कौन उसे जांचने जा रहा है। इसमें भी खूब भ्रष्टाचार होता है। जब तक इन योजनाओं से भ्रष्टाचार दूर नहीं होगा, तब तक ऐसी योजनाएं विफल होती रहेंगी। और यह देश पानीदार नहीं बन सकता है। देश को पानीदार बनाने के लिए सबसे पहले हमें अपनी आंखों के सूखे हुए पानी को वापस लाना होगा।

प्रस्तुति: सुशील राघव / मृणाल वल्लरी

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 जनसत्ता बारादरी: विपक्ष को संघर्ष की दिशा दे रहा है वाम
2 राजनीति में खेल भावना जरूरी है
3 जनसत्ता बारादरीः नागरिकता कानून पर जनजागरण से दूर करेंगे भ्रम
ये पढ़ा क्या?
X