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बारादरी: इस बार मुकाबला दो महागठबंधनों के बीच

वरिष्ठ कांग्रेस नेता अजय माकन का कहना है कि राजनीति में कोई स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होता है। लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी से गठबंधन की वकालत करते हुए उन्होंने कहा कि दिल्ली के विधानसभा चुनाव में इसकी जरूरत नहीं रहेगी। परिवारवाद के आरोप पर उन्होंने कहा कि सिर्फ एक साल पुरानी पार्टी में ही यह नहीं हो सकता है। आगामी आम चुनावों को लेकर उन्होंने कहा कि इस बार भी मुख्य मुद्दा वही है, जो 2014 में था। बातचीत कार्यक्रम का संचालन किया जनसत्ता के कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

अजय माकन (आरुष चोपड़ा)

अजय माकन दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में 1985 में भारतीय राष्टÑीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) के उम्मीदवार के तौर पर अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज कर अपना सियासी सफर शुरू करने वाले अजय माकन 1993 में पहली बार दिल्ली विधानसभा के लिए चुने गए। लगातार तीन बार विधायक चुने गए। दिल्ली सरकार में मंत्री रहे। दिल्ली में डीजल से चलने वाली बसों को सीएनजी में बदलने का काम उनके परिवहन मंत्री रहते ही हुआ। दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। दो बार नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव जीता और केंद्र सरकार में शहरी विकास राज्य मंत्री से लेकर गृह राज्यमंत्री और खेल तथा युवा मामलों के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के रूप में भी भूमिका निभाई। 2015 में दिल्ली विधानसभा में कांग्रेस की करारी हार के बाद दिल्ली प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। करीब तीन साल तक दिल्ली कांग्रेस के मुखिया रह चुके माकन ने खराब सेहत के कारण पद से इस्तीफा दे दिया। इस बार के आम चुनावों में कांग्रेस के सक्रिय चेहरों में से एक हैं।

मृणाल वल्लरी : इस आम चुनाव में आपके मुख्य मुद्दे क्या होंगे?
अजय माकन : इसमें हमारे मुख्य मुद्दे वही हैं जो 2014 में भाजपा के भी थे- बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अर्थव्यवस्था। इन्हीं मुद्दों पर भाजपा ने देश भर में प्रचार किया था। तमाम आंकड़े बता रहे हैं कि आज तक के इतिहास में इतनी बेरोजगारी कभी नहीं बढ़ी। भ्रष्टाचार के मोर्चे पर देखें, तो जो लोकपाल कानून हम लोग पास करके गए थे, उस कानून को अभी तक लागू नहीं किया जा सका है। अब वे लोग कहां हैं, जो कहते थे कि अगर सात दिन में लोकपाल कानून नहीं बनेगा, तो हम भूख हड़ताल पर बैठ जाएंगे। अब उनमें से कई लोग मंत्री बन गए, तो वे उस कानून को भूल गए, जिसे हमने पास किया था। रफाल सौदे के मामले में राहुल गांधी ने बहुत साफ बोला है। इसके अलावा हमारी पार्टी ने पिछले चार सालों में अलग-अलग मुद्दों पर देश भर में चर्चा की है। जिस तरह से नोटबंदी और जीएसटी लागू किया गया, उससे हमारी अर्थव्यवस्था बुरी तरह लड़खड़ा गई है। आज डॉलर के मुकाबले रुपए की हालत बहुत खराब है। पहले रुपया कमजोर हुआ था तो यही लोग कहते थे कि रुपया गिरता है, तो देश की साख गिरती है। अब जब रुपए की कीमत इतनी तेजी से गिर रही है, तो क्या देश की साख नहीं गिर रही! ये लोग चाहे जितना ध्यान भटकाने का प्रयास करें, पर लोग इन तीनों मुद्दों पर हकीकत जानते हैं।

मनोज मिश्र : दिल्ली में कांग्रेस का सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी पार्टी ने किया। अब फिर आप लोग उसी से समझौता करने जा रहे हैं। क्यों?
’राजनीति में कोई भी स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता। अगर आप देखें तो महाराष्ट्र में शिव सेना और भाजपा भी एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाते हैं, दोनों एक ही वोट बैंक का इस्तेमाल करते हैं। उनमें मतभेद उभरते रहे हैं। पर वे अब साथ आए हैं। तो जब हम देख रहे हैं कि देश भर में भाजपा गठबंधन कर रही है, चाहे वह झारखंड में हो, असम में हो या दूसरे राज्यों में। वह छोटी-छोटी पार्टियों के साथ समझौते कर रही है, और अपनी अच्छी-खासी सीटें छोड़ रही है। बिहार में भी जितनी सीटों पर वे पहले लड़े थे, उससे कम पर लड़ रहे हैं। तो इससे साफ हो चुका है कि धीरे-धीरे दो गठबंधन बन रहे हैं। एक तरफ राजग अपने सहयोगियों को जोड़ रहा है, तो दूसरी तरफ यूपीए को भी अपना गठबंधन बनाना चाहिए। अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो राजग और भाजपा को लाभ की स्थिति में पहुंचा देंगे। जहां तक कांग्रेस को अपना वोट बैंक पाने की बात है, वह तो दिल्ली में हमारी लड़ाई जारी रहेगी ही। इस दिशा में कांग्रेस लगातार बेहतर कर रही है। अब राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में बात हो रही है, तो जब सामने वाली पार्टी गठबंधन बना रही है, तो दिल्ली में भी हमारा गठबंधन बनना चाहिए, ऐसा हमारा सोचना है। और लोकतंत्र में सबसे महत्त्वपूर्ण है कि कौन-सी पार्टी अधिक से अधिक सीटें जीत कर आए, उसी चीज को हम लोग मद्देनजर रखते हैं। हमारा मानना है कि दिल्ली में अगर हम लोग अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे, तो हम यहां की सातों की सातों सीटें प्लेट में सजा कर भाजपा को दे देंगे। पिछले लोकसभा चुनाव को देखें तो कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को कुल मिला कर जो वोट मिले थे, वे भाजपा से अधिक थे। नगर निगम चुनाव में भी ऐसा ही था। ऐसे में अगर हम अपनी नाक ऊंची रखने के चक्कर में अलग-अलग चुनाव लड़ें तो ठीक नहीं।

अजय पांडेय : लोकसभा चुनाव में अगर आप समझौता करने जा रहे हैं, तो क्या विधानसभा चुनाव में भी करेंगे?
’लोकसभा चुनाव के बाद इसका फैसला होगा कि विधानसभा चुनाव में क्या करेंगे। पर मैं विधानसभा और नगर निगम चुनाव में समझौते के पक्ष में नहीं हूं। लोकसभा के लिए राष्ट्रीय गठबंधन की वजह से गठबंधन हो रहा है, लेकिन विधानसभा में चूंकि राष्ट्रीय सहयोगी दल साथ नहीं होंगे, इसलिए उसमें समझौते की बात नहीं होगी। विधानसभा चुनाव में हम लोग अपनी स्थिति वापस प्राप्त करेंगे।

पंकज रोहिला : इस गठबंधन को लेकर पार्टी दो हिस्सों में बंट गई है। इससे आप कितना नुकसान मानते हैं?
’नुकसान इसका इसलिए भी नहीं होगा कि इससे पहले भी पार्टी के भीतर हमारे अलग-अलग मत रहे हैं। हालांकि, यह पहला मौका है कि दिल्ली में हम गठबंधन करके चुनाव लड़ेंगे, इसलिए यह फैसला आसान नहीं है। इसमें यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि पूरे के पूरे कार्यकर्ता एक तरफ होकर सहमति जता देंगे। पर यह गठबंधन चूंकि राजग को हराने के लिए हो रहा है, तो दिल्ली उसमें क्यों पीछे रहे।
दीपक रस्तोगी : राजग ने लगभग सब जगह अपने सहयोगी दलों का गठबंधन बना लिया है, पर कांग्रेस में कहीं न कहीं हिचक बनी हुई है। यह देरी क्यों हो रही है?
’कांग्रेस एक बड़ी पार्टी है और जब हम गठबंधन करेंगे, तो नेताओं-कार्यकर्ताओं से बात करना सहज नहीं है। जिन लोगों ने पांच साल काम किया है, तैयारी की है, उनसे बात करना सहज नहीं है। और यह फैसला बातचीत करके ही लेना होगा, एक झटके से फैसला नहीं कर सकते। यूपी की बात करें, तो वहां जिस तरह मायावती और अखिलेश ने आपस में समझौता करके दो सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ दीं, वह भी ठीक नहीं हुआ। उन्हें इतनी जल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए थी। पिछले के पिछले चुनाव में हमने वहां बाईस सीटें जीती थीं। यह ज्यादा पुरानी बात नहीं है। इस तरह केवल दो सीटें देकर हमसे कहा जाए कि आप गठबंधन में शामिल हो जाइए, तो यह भी हमारे कार्यकर्ताओं के लिए सहज नहीं है। लेकिन हमें उम्मीद है कि ज्यादातर जगहों पर गठबंधन हो जाएगा। राहुल जी ने भी कहा है कि सांप्रदायिक ताकतों को दूर रखने के लिए हमें कोई भी समझौता करना पड़े, तो करेंगे। उनका यह बयान अपने आप में अहम है।

मुकेश भारद्वाज : कांग्रेस पर आरोप लगता है कि एक परिवारवादी पार्टी है। और ऐसे समय में जब पार्टी के लोगों को इकट्ठा होना चाहिए, बिखरना शुरू हो जाते हैं। अभी टॉम वडक्कन छोड़ कर चले गए। आप इससे कैसे निपटेंगे।
’इसमें आपके दो सवाल हैं। दोनों का एक-दूसरे से कोई संबंध नहीं है। परिवारवाद है, इसलिए बिखर रहे हैं, ऐसा नहीं है। जहां तक टॉम वडक्कन की बात है, वे केरल से टिकट मांग रहे थे। रहते दिल्ली में हैं। जब उनसे कहा गया कि जहां आप रहते ही नहीं वहां से टिकट क्यों मांग रहे हैं, तो उनको पार्टी में परिवारवाद नजर आ गया। और जिस दूसरी पार्टी में वे गए, वहां भी परिवारवाद है। वहां पर क्या गोपीनाथ मुंडे की बेटी पार्टी में नहीं है, वसुंधरा राजे का बेटा सांसद नहीं है, क्या राजनाथ सिंह का बेटा विधायक नहीं है? जहां जाकर वे परिवारवाद की बातें कर रहे हैं, वहां खुद परिवारवाद भरा हुआ है। कहां परिवारवाद नहीं है। परिवारवाद वहीं नहीं है, जहां पार्टी एक साल पुरानी है। देखिए, कार्यकर्ता और लोग जिसे पार्टी में चाहते हैं, उसे पार्टी में लेने में हर्ज क्या है?

मनोज मिश्र : एक अनुभव यह भी रहा है कि जहां-जहां कांग्रेस ने क्षेत्रीय दलों से समझौता किया वहां-वहां वह खत्म हुई। यह जानते हुए भी यह खतरा क्यों उठा रहे हैं?
’इसमें तीन चीजें हैं। एक तो वह जो आप कह रहे हैं। दूसरा यह कि जहां कांग्रेस तीसरे नंबर पर आती है, वहां खत्म हो जाती है। तीसरा, जहां विधानसभा में अपनी जगह छोड़ देते हैं, वहां खत्म होते हैं। मगर यह सिर्फ छोटे चुनावों में होता है। राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा नहीं होता। वहां हमारे सहयोगी दल के कार्यकर्ता अपने बगल वाली सीट पर जाकर अपनी पार्टी के प्रत्याशी का सहयोग करने लगता है। इसी तरह वहां का हमारा कार्यकर्ता इधर आकर अपनी पार्टी के प्रत्याशी का सहयोग करने लगता है। मगर विधानसभा चुनाव में ऐसा नहीं होता। फिर, जब आप बराबर-बराबर सीटों पर समझौता करते हैं, तो ऐसी परेशानी नहीं आती। तब कोई नुकसान नहीं होता।

अजय पांडेय : माना जाता है कि कांग्रेस का जनाधार सवर्ण हैं, पर सवर्ण अब तेजी से आपसे दूर होकर, भाजपा की तरफ गए हैं। इस चुनाव में कांग्रेस उन्हें वापस लाने के लिए क्या करने जा रही है?
’हमारी नीति में कभी ऐसी सोच नहीं रहती। हम उसको इस तरह से देखते हैं कि जो हमारे अच्छे नेता हैं, उनको आगे बढ़ाएं। अच्छे सवर्ण नेता हैं, वे प्रमोट होते हैं, फिर वे दूसरों को आकर्षित करते हैं। लेकिन कांग्रेस की ऐसी कोई नीति नहीं है और होनी भी नहीं चाहिए कि सवर्ण को आकर्षित करें।

पंकज रोहिला : पीसी चाको बोल रहे हैं कि अभी एक सर्वे होगा, फिर तय होगा कि किसे टिकट देना है!
’यह तो पार्टी के अंदर एक अच्छा कदम है। यह राहुल जी की सोच है कि महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर हम कार्यकर्ताओं से चर्चा करें। हमारे पास हमारे सदस्यों, कार्यकर्ताओं का एक डाटा है। हम टेलीफोन संदेश के जरिए उनसे राय लेते हैं। तो, मेरा मानना है कि पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र के लिए यह एक अच्छी बात है। एक तरफ हमारे ऊपर आरोप लगता है परिवारवाद का, एक तरफ हमारे ऊपर आरोप लगता है कि फैसले ऊपर से थोपे जाते हैं, तो अगर हम लोग कार्यकर्ताओं से पूछ कर निर्णय करना चाहते हैं तो इसमें बुराई क्या है। यहां तक कि प्रत्याशियों के बारे में भी कार्यकर्ताओं की राय ली जाती है। तो, अंतिम निर्णय लेते समय अगर नेतृत्व किसी के बारे में उसकी जीत की संभावना, उसकी अच्छाई-बुराई आदि सभी पहलुओं पर ध्यान देता है, और फिर कार्यकर्ताओं की राय भी जानना चाहता है, तो मेरे खयाल से यह एक अच्छी पहल है।

सूर्यनाथ सिंह : देखा गया है कि चुनाव आता है, तो लोग पार्टी छोड़ कर दूसरी पार्टी में जाते हैं। वहां जाकर वे किसी ऐसे व्यक्ति का हक छीनते हैं, जो पार्टी के लिए पिछले पांच सालों से काम कर रहा था। यह लोकतंत्र और पार्टी के लिए कहां तक उचित है?
’यह सब पार्टियों में है। ऐसा दो वजहों से करती हैं पार्टियां। एक तो माहौल बनाने के लिए कि हमारे यहां लोग दूसरी जगहों से भाग-भाग कर आ रहे हैं। दूसरा कारण होता है जीत का। जैसे मान लीजिए, पिछले चुनाव में किसी ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में लड़ लिया और जीत गया। वहां दूसरी पार्टी का कोई सशक्त उम्मीदवार नजर नहीं आता तो वह सशक्त उम्मीदवार को अपने साथ ले लेती है। फिर लोकतंत्र में सरकार तो उसी की बनती है, जिसके पास जीते हुए नेता अधिक होते हैं। और जिस पार्टी की सरकार होती है, उसी के कार्यकर्ताओं में उत्साह अधिक होता है।

अरविंद शेष : अभी आपने जो अपने चुनावी मुद्दे गिनाए, वे चौदह फरवरी से पहले हावी होते दिख रहे थे, पर अब देशभक्ति महत्त्वपूर्ण मुद्दा बन गई है। इससे कैसे मुठभेड़ करेंगे?
’सच्चाई से बड़ी कोई ताकत नहीं होती है। हमें पूरा यकीन है कि असलियत यही तीन मुद्दे हैं, जिससे कि हर परिवार रोजाना जूझता है। ऐसे में जो भाजपा चाहती है, वे चीजें चौबीस घंटे, अड़तालीस घंटे तो सिर चढ़ कर बोलती हैं, पर जब लोग अपनी जेब देखते हैं, परिवार की स्थिति देखते हैं, तो उन्हें हकीकत नजर आती है।

मृणाल वल्लरी : प्रियंका गांधी अपनी पीठ पर काफी भारी जिम्मेदारियां लाद कर आई हैं। पर दूसरी तरफ उनके पति राबर्ट वाड्रा पर लगे आरोप उनकी मुश्किलें और बढ़ा रहे हैं। इससे कैसे निपटेंगे?
’उन पर जो भी आरोप लगे हैं, उनमें से कोई भी सही नहीं है। भाजपा के पास पांच साल थे, मगर वह इस मामले में कुछ नहीं कर पाई। इन पांच सालों में भाजपा कहीं पर भी चार्जशीट तक तो दाखिल करवा नहीं पाई है। ये आरोप साबित करने के लिए उसे और कितने साल चाहिए! ये सिर्फ राजनीतिक लाभ उठाने के लिए आरोप उछाले जा रहे हैं। और राबर्ट वाड्रा ने जो कुछ किया, वह कोई भी विशुद्ध व्यवसायी करता है, उसमें कहीं से भी भ्रष्टाचार का मामला नहीं है। अगर था तो क्यों नहीं अभी तक अदालत ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई की।

सूर्यनाथ सिंह : पिछले पांच सालों में आप सशक्त विपक्ष के रूप में नजर नहीं आए। तीन राज्यों में जीत के बावजूद आम चुनाव में कोई खास ऊर्जा नजर नहीं आ रही। ऐसे में कैसे मान लें कि आप सफल होंगे?
’मैं इससे सहमत नहीं हूं। राहुल गांधी ने देश का कोई ऐसा कोना नहीं छोड़ा- रोहित वेमुला से लेकर राजस्थान में मेघवाल वाला मामला रहा हो, या ऐसा कोई भी मामला, हर जगह सबसे पहले राहुल गांधी पहुंचे हैं। जीएसटी पर सबसे आक्रामक रुख उनका रहा। इन पांच सालों में विपक्ष के तौर पर अगर सबसे अधिक सुर्खियों में कोई रहा है, तो वे राहुल गांधी हैं। अब रफाल मुद्दे पर वे सबसे अधिक मुखर हैं। तो, ये चीजें लोग देख-समझ रहे हैं।

मनोज मिश्र : दिल्ली में जिस आम आदमी पार्टी का आप विरोध करते रहे हैं, जब उसके साथ मिल कर चुनाव लड़ेंगे, तो कैसे उसका विरोध कर पाएंगे?
’यह चुनाव स्थानीय मुद्दों का नहीं है। एक वैचारिक लड़ाई है, इसलिए साथ आ रहे हैं। जब स्थानीय चुनाव होंगे, तब हम स्थानीय मुद्दों पर उनके खिलाफ बात करेंगे।

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