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बेहतर विकल्प का चेहरा बनी कांग्रेस

छत्तीसगढ़ सरकार में स्वास्थ्य एवं पंचायत विकास मंत्री टीएस सिंह देव सूबे में कांग्रेस की जीत को अहम मानते हुए कहते हैं कि हम सिर्फ बेहतर विकल्प के रूप में जनता द्वारा चुने गए। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कम बोलते हैं, लेकिन अपना बोला हुआ पूरा करते हैं। आम चुनाव के इस माहौल में राज्य और अन्य जगहों पर कांग्रेस की भूमिका पर उनसे बातचीत कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

त्रिभुनेश्वर शरण सिंह देव (फोटो: आरुष चोपड़ा)

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में 31 अक्तूबर, 1952 को जन्मे त्रिभुनेश्वर शरण सिंह देव का नाता शल्युजा (सरगुजा) शाही परिवार से है। छत्तीसगढ़ में ‘टीएस बाबा’ के नाम से चर्चित हैं। देव के राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1983 में अंबिकापुर नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष के रूप में हुई थी। इस पद पर टीएस सिंह देव दस वर्ष तक काबिज रहे। छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के समय कांग्रेस की ओर से विपक्ष के नेता की जिम्मेदारी संभाल चुके देव को कांग्रेस की नवगठित सरकार में स्वास्थ्य मंत्री की जिम्मेदारी दी गई है। राजघराने से नाता रखने वाले देव अपनी सौम्य और सरल छवि के के लिए जाने जाते हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ और विश्वसनीय चेहरों में से एक हैं।

दीपक रस्तोगी : माओवादी समस्या से निपटने में रमन सिंह सरकार के रवैए को लेकर काफी असंतोष व्यक्त किया गया। आपकी सरकार के पास इससे निपटने के लिए क्या योजना है?
टीएस सिंह देव : आमतौर पर लोग तीन आधारों पर इस समस्या से निपटने की बात करते हैं। एक, माओवादी विचारधारा के लोगों से संवेदना के दायरे में लगातार संवाद बनाए रखें। उसके साथ-साथ लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए भी प्रयास होते रहने चाहिए। अमूमन ऐसे ही क्षेत्रों में माओवादियों की सक्रियता देखी जाती है, जो कटे हुए होते हैं और विकास अपेक्षाकृत कम हुआ रहता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, जीवनस्तर उठाने वाले उपायों पर ध्यान दिया जाए। इसके अलावा ऐसे लोग हैं, जो बीच में आ जाते हैं यानी आम नागरिक। उनका इस्तेमाल माओवादी भी करते हैं। पुलिस भी उन पर दबाव बनाती है। ऐसे लोगों में भरोसा पैदा किया जाए कि संविधान के दायरे में उन्हें बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। इसलिए जब हमने पंचायतों के लिए विकास निधि का निर्धारण किया तो सामान्य क्षेत्रों की पंचायतों के लिए सत्तर लाख रुपए रखे और नक्सल प्रभावित इलाकों की पंचायतों के लिए एक करोड़ रुपए। इसके बावजूद अगर हिंसा का इस्तेमाल होता है, तो उसका दृढ़ता से सामना करना और जवाब देना होगा। घोषणापत्र बनाने के क्रम में हमें पता चला कि बहुत सारे लोगों को नक्सली गतिविधियों से जुड़ा हुआ बता कर जेलों में बंद कर दिया जाता है। फिर लंबे समय बाद उन्हें छोड़ा जाता है। हम लोगों का लक्ष्य है कि ऐसा न हो। अगर आपके पास सबूत नहीं है, तो किसी को लंबे समय तक जेलों में न बंद रखें।

अजय पांडेय : चुनाव के समय वादा किया गया था कि सरकार किसानों का कर्ज माफ करेगी। पर आरोप है कि चुनाव के बाद वादे पर पूरी तरह अमल नहीं हुआ। ऐसा क्यों?
’हम लोगों ने चुनाव के समय भी मंच पर खुले रूप से कहा था कि 2018 के धान की फसल के लिए जो अल्पकालिक ऋण लिया गया है, वह माफ होगा। उसके बाद तीस नवंबर तक चने या गेहूं की फसल के लिए कर्ज लिया है, तो वह माफ होगा। पर विपक्ष कह रहा है कि आपने ट्रैक्टर का कर्ज माफ नहीं किया, पंप का कर्ज माफ नहीं किया। हमने ऐसा करने को कभी नहीं कहा था। फसल खराब हुई, इसलिए उसका कर्ज हमने माफ किया। ट्रैक्टर और पंप तो संसाधन हैं। हमने तो अपने घोषणापत्र से आगे जाकर कुछ पुराने कर्ज भी माफ कर दिए। दस हजार करोड़ से ज्यादा कर्ज माफ किया गया है।

मनोज मिश्र : मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ इसलिए बना था कि वहां विकास नहीं हो रहा था। पर अब भी स्थिति कुछ बेहतर नहीं है। इसे आप कैसे ठीक करेंगे?
’शुरू से ही यह माना जाता था कि मध्यप्रदेश से अलग होने की स्थिति में छत्तीसगढ़ को फायदा होगा, मध्यप्रदेश को नुकसान ज्यादा होगा। यहां खनिज स्रोत, बिजली संयंत्र आदि ज्यादा थे, बड़ी औद्योगिक इकाइयां भी यहीं पर थीं। मगर भावना यह थी कि छत्तीसगढ़ को उसका हक नहीं मिलता है। छत्तीसगढ़ बनने के बाद निस्संदेह छत्तीसगढ़ को फायदा हुआ है।

मुकेश भारद्वाज : छत्तीसगढ़ इस समय कांग्रेस की सरकार आने से अधिक चर्चा में है। इतने लंबे समय से वहां पर एक सरकार थी। क्या कारण रहे कि उस सरकार को जाना पड़ा और इस सरकार को लोगों ने चुना?
’कांग्रेस बेहतर विकल्प प्रस्तुत कर पाई। कोई नकारात्मक प्रचार नहीं था कि इस सरकार ने भ्रष्टाचार किया है, यह सरकार अमुक काम नहीं कर पाई, इस सरकार की अमुक कमी है वगैरह। कांग्रेस सफल रही वहां सकारात्मकता देने में कि हम सरकार में आए तो ये करेंगे। वहां मुख्यमंत्री के रूप में रमन सिंह थे, कुछ कांडों की बात उनसे जरूर जुड़ी, फिर भी उनकी छवि उतनी धूमिल या प्रभावित नहीं हो पाई थी, जिसके कारण वे चुनाव हार जाते। तो, कांग्रेस एक बेहतर विकल्प के आधार पर चुन कर आ सकी।

मृणाल वल्लरी : छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति ठीक नहीं है। आपने थाईलैंड जैसी व्यवस्था की बात की थी। इस दिशा में आपकी क्या योजना है।
’थाईलैंड जैसे विकल्प की स्थिति अभी नहीं है। अगर थोड़ा पीछे जाकर देखें तो 2014 में कांग्रेस के चुनाव घोषणापत्र में दो अधिकारों की बात की गई थी- आवास का अधिकार और स्वास्थ्य का अधिकार। उसी विचारधारा को और आगे ले जाने की बात की गई। सार्वभौम स्वास्थ्य सुविधाओं की जो अवधारणा है कि सार्वजनिक धन से सभी नागरिकों को निशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाएं, यह अंतरराष्ट्रीय अवधारणा है। आपके पास चुनाव का विकल्प है कि अगर आपको नागरिकों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करानी हैं, तो कैसे कराएंगे। क्या उसे इंश्योरेंश मॉडल से कराएंगे? अगर इसे चुनते हैं, तो यह कैसे संभव होगा, क्योंकि दूर-दराज के इलाकों में निजी इकाइयां न के बराबर हैं। इंश्योरेंश आधारित स्वास्थ्य सुविधाओं का अनुभव यह है कि आउटडोर पेशेंट के ऊपर यह लागू नहीं होता है। जब तक आप भर्ती नहीं होते, तब तक आपका कार्ड काम नहीं आता। कई जगह निजी अस्पताल कहते हैं कि हमारे यहां कार्ड लागू नहीं होता। फिर आज भी गांवों में सबके पास कार्ड नहीं है। इसलिए सार्वभौम स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराते हैं, तो उसमें ये सब दिक्कतें नहीं होंगी। हमारी कोशिश है कि सभी नागरिकों को सरकारी खर्च पर हर तरह का इलाज उपलब्ध कराया जा सके। जो पैसा आप एक बीमा कंपनी को दे रहे हैं, उसको यहीं पर इस्तेमाल कर सुविधाएं बढ़ाई जा सकती हैं। अगर कहीं सरकारी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, तो वे कराई जाएं, ताकि लोगों को निजी अस्पतालों या डॉक्टरों के पास न जाना पड़े। यही लक्ष्य हम लोग लेकर चल रहे हैं।

संजय शर्मा : अभी सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है, उससे करीब दस से पंद्रह लाख आदिवासी प्रभावित होंगे। उसमें छत्तीसगढ़ के आदिवासी भी प्रभावित होंगे। उस स्थिति से आप कैसे निपटेंगे।
’हम लोगों के यहां जो स्थिति है, कानून पहले यह बना कि 13 दिसंबर, 2005 तक जो नागरिक वन भूमि पर अपना अधिकार बनाए हुए हैं, अगर वे अनुसूचित जनजाति के हैं, आदिवासी हैं, तो उनको दस एकड़ तक का वनाधिकार पत्र दिया जाएगा। बाकी परंपरागत वन निवासी जो ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं, जहां वे तीन पीढ़ी से रह रहे हैं, तो उनको भी वनाधिकार पत्र का अधिकार होगा। तीन पीढ़ी यानी पच्चीस साल। इसका मतलब यह हुआ कि 12 दिसंबर, 2005 से एक दिन पहले भी किसी ने वन क्षेत्र में कब्जा किया है, तो उसे वनाधिकार पत्र की पात्रता होगी। गैर-परंपरागत क्षेत्र के निवासी का जब तक पचहत्तर साल का कब्जा नहीं होगा, तब तक उन्हें वनाधिकार पत्र नहीं मिलेगा। मगर कुछ लोगों ने इस पर एतराज जताया तो नियम बना कि अगर गैरआदिवासी क्षेत्र का व्यक्ति भी तीन पीढ़ी से उस जमीन पर रह रहा है, उस पर खेती कर रहा है, उसे वनाधिकार पत्र दिया जाएगा। मगर कई लोगों को एतराज है कि उनका जितनी जमीन पर कब्जा था, उतने का वनाधिकार पत्र नहीं मिला। इसमें नियम यह भी है कि किसी को उसके कब्जे वाली जमीन से बेदखल नहीं किया जा सकता। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बहुत असर नहीं पड़ेगा।

अजय पांडेय : अभी राहुल गांधी ने वहां जाकर कई आदिवासियों के जमीनों के पट््टे बांटे। उसके बारे में जरा समझाइए।
’भट्टा परसौल से यह बात चली थी कि सरकार जमीन अधिग्रहीत कर सकती है। इसे लेकर कई विचार सामने आए। एक तो यह कि जब आप किसान की जमीन लेंगे, तो बाजार भाव से अधिक उसकी कीमत चुकानी होगी। फिर यह कि कुछ अपवादों, जैसे सेना आदि के लिए जमीन लेने के अलावा अगर सरकार भी जमीन लेना चाहे, तो जब तक भूस्वामी की सहमति नहीं होगी, वह जमीन नहीं ली जा सकती। दूसरा इसमें यह जोड़ा गया कि अगर कोई जमीन ली जाती है, उस पर अगर पांच साल तक काम शुरू नहीं होता है, तो वह जमीन किसान को वापस देनी होगी। या वह जमीन सरकार के लैंडपूल में चली जाएगी। छत्तीसगढ़ में भी यह प्रावधान है। लोहंडीगुड़ा में जो जमीन आदिवासियों से ली गई थी, उस पर पांच साल से काम शुरू नहीं हुआ था। टाटा कंपनी ने लिख कर भी दे दिया था कि हम फैक्ट्री नहीं लगाएंगे। इस स्थिति में वहां के नागरिक आंदोलनरत थे, क्योंकि फैक्ट्री न लगने से उन्हें नौकरी नहीं मिल पा रही थी और दूसरी तरफ उनकी पुश्तैनी जमीन फंसी हुई थी, जिस पर वे खेती नहीं कर पा रहे थे। तब हमारी सरकार ने उस जमीन में लैंडपूल में लेने के बजाय किसानों को देने का निर्णय किया। पैंतालीस करोड़ रुपए की राशि जो किसानों को मुआवजे के रूप में वितरित की गई थी, उसे भी वापस नहीं लिया गया। फिर राहुल जी वहां गए थे और उन्होंने उस जमीन के पट्टे बांटे।

आर्येंद्र उपाध्याय : तीन राज्यों में कांग्रेस को पुनर्जीवन मिला और तीनों में मुख्यमंत्री के चयन को लेकर विवाद हुआ। एक जगह एक को उपमुख्यमंत्री बनाना पड़ा, एक जगह उपमुख्यमंत्री बना नहीं पाए तो उसे केंद्र में लेना पड़ा। क्या इसलिए ये फैसले प्रभावित हो रहे हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की स्थिति कमजोर है?
’राष्ट्रीय स्तर पर तो पार्टी की स्थिति बहुत मजबूत है, तब इतना खुलापन है। राहुलजी की कार्यप्रणाल में मैंने देखा है कि बहुत खुलापन है। पार्टी के लोगों से चर्चा करना, स्थानीय नेताओं की बातें सुनना। तो, यह केंद्र की कमजोरी का मामला नहीं, महत्त्वाकांक्षाएं आड़े आती हैं।

मृणाल वल्लरी : किसानों को लेकर जैसा कि राहुल गांधी अभी भाषा बोल रहे हैं क्या सरकार में आए तो उस पर कायम रह पाएंगे?
’अभी उन्होंने बहुत क्रांतिकारी बात की है, जिसे आज तक कोई भी देश नहीं अपना सका है। उदारवादी से उदारवादी देश भी। छोटी आबादी वाले देश भी। यूपीए सरकार ने पहली बार काम का अधिकार कानून के तहत मनरेगा लागू किया। वैसे ही वार्षिक आय का अधिकार कानून लागू करने की बात उन्होंने की है। मैं मानता हूं कि इससे समाज में बहुत बड़ा बुनियादी परिवर्तन आएगा। और राहुल जी कहते हैं कि मैं सिर्फ कहने के लिए कोई बात नहीं कहता, जब तक कि उसे करने की मंशा न हो। आप देखें, तो उन्होंने बहुत कम बातें बोली होंगी, पर जो बोला है, उसे जहां भी मौका मिला है, किया है।

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