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बारादरी: राजनीति एक व्यवसाय बन चुकी है

दिल्ली सरकार के मंत्री सत्येंद्र जैन का कहना है कि राजनीति में टिकना आसान नहीं है, इसलिए अच्छी भावनाओं के साथ आए बहुत से लोग भी पार्टी छोड़ कर चले गए। अरविंद केजरीवाल पर तानाशाही के आरोपों को बेतुका बताते हुए उन्होंने कहा कि अगर किसी को सेनापति चुना है, तो उसकी बात तो सुननी पड़ेगी। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि राजधानी की स्वास्थ्य सेवाएं जनता के करीब पहुंची हैं और इनमें क्रांतिकारी सुधार हुआ है। कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

सत्येंद्र जैन (Photo Source: आरुष चोपड़ा)

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में तीन अक्तूबर 1964 को जन्मे सत्येंद्र जैन ने आर्किटेक्चर की पढ़ाई की और अण्णा आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के बाद आम आदमी पार्टी से जुड़े। अपनी नौकरी छोड़ कर पूर्णकालिक नेता बने। वे दिल्ली सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। स्वास्थ्य, उद्योग, गृह, सार्वजनिक कार्य विभाग, बिजली, शहरी विकास, परिवहन जैसे अहम महकमे उनके पास हैं।

सूर्यनाथ सिंह : आम आदमी पार्टी बनी तो वैकल्पिक राजनीति की उम्मीद जगी थी। पर अब ऐसा क्यों है कि आपकी पार्टी से लोगों का मोहभंग होने लगा है?
सत्येंद्र जैन : मोहभंग तो मेरा भी हुआ। मेरी बेटी तब बारहवीं कक्षा में पढ़ती थी, लोगों ने उसका नाम रख दिया दो करोड़। क्योंकि आरोप लगाया गया था कि सत्येंद्र जैन ने अरविंद केजरीवाल को दो करोड़ रुपए रिश्वत दी। उसे दिन भर टीवी पर चलाया गया। मगर जब मैंने उसके खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया, तो किसी ने नहीं दिखाया। तो इस तरह लोगों का मोहभंग कराया जा रहा है। मगर इतना कुछ हो जाने के बावजूद हम सरकार के अंदर हैं, लड़ रहे हैं। यह क्या कम है? और यह कहना कि लोगों का मोहभंग हो रहा है, ऐसा नहीं है। लोगों को अब भी हम पर विश्वास है। पूरे देश में सर्वे करा लीजिए, लोगों को आम आदमी पार्टी पर विश्वास है, यह अलग बात है कि हम चुनाव में पहले स्थान पर न रहें।

मुकेश भारद्वाज : ऐसा क्या हुआ कि लोग एक के बाद एक आम आदमी पार्टी छोड़ कर जाने लगे?
’मुझे लगता है कि अभी आप दो लोगों को ध्यान में रख कर बात कर रहे हैं। एक तो हैं आशुतोष जी, जो मीडिया से थे। दूसरे हैं आशीष खेतान। आशुतोष जी, आज भी हमारे बहुत अच्छे दोस्त हैं। पार्टी के खिलाफ नहीं हैं। राजनीति में टिके रहना आसान काम नहीं है। राजनीति बहुत गंदी है, इसे झेल पाना सबके वश की बात नहीं है। तो, उन्हें लगा कि राजनीति बहुत कर ली, अब मुझे फिर पत्रकारिता करनी चाहिए। पर आम आदमी पार्टी से जुड़े आदमी के लिए पत्रकारिता करना भी आसान काम नहीं रह गया है। आशीष खेतान ने भी सोचा कि अब थोड़ी वकालत कर लेता हूं, पर उन्हें भी एक केस नहीं मिल पाया है अब तक एक साल में। आजकल लंदन गए हुए हैं, कैंब्रिज में पढ़ रहे हैं। हरेक के लिए यह संभव नहीं है कि पार्टी के नाम पर बच्चों को भूखा रख ले।

मृणाल वल्लरी : पिछले चुनाव में भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा था। पर अब निजता और दो ध्रुवीय राजनीति दिखने लगी है। क्या अब भ्रष्टाचार मुद्दा नहीं रह गया है?
’देश में यह पहली सरकार है, जिसका मुख्यमंत्री पैसा नहीं खाता, मंत्री पैसा नहीं खाते। भ्रष्टाचार ऐसे ही तो खत्म होगा। बहुत सारे लोग आते हैं, हमारे पास कि आटे में नमक चलता है, इसलिए थोड़ा-बहुत लेने में कोई हर्ज नहीं। पर मैं कहता हूं, हमारी सरकार के पास पैसे की कमी नहीं है, हमारी पार्टी बहुत गरीब है। उसे चंदा दे दो। फिर वे कहते हैं, हमारा ये वाला काम कर दें। हम कहते हैं कि काम का चंदे से कोई संबंध नहीं है। काम कर देंगे, तो चंदा नहीं ले पाएंगे आपसे। हम मरने को तैयार हैं, चुनाव नहीं लड़ सकते, पर रिश्वत लेकर अपना खजाना नहीं भरना चाहते। सरकार का पचास हजार करोड़ का बजट है, उसमें से एक प्रतिशत भी लेते तो कम से कम चुनाव लड़ने का पैसा तो निकाल लेते, पर ऐसा नहीं किया। हमने तय किया कि पंजाब, दिल्ली और हरियाणा लड़ेंगे, बाकी छोड़ दिया। यह ईमानदारी तो हम दिखा रहे हैं न, और क्या चाहिए!

सूर्यनाथ सिंह : दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री और मंत्री रिश्वत नहीं लेते, तो क्या आपके विभागों के अफसर भी नहीं ले रहे!
’खूब ले रहे हैं। सारे ले रहे हैं। केंद्र सरकार को तकलीफ और किस बात की है! इस देश के अंदर सबसे बड़ी दिक्कत ही यही है कि अगर अफसर रिश्वत लेना बंद कर दें, तो नेताओं की दुकानें बंद हो जाएं। राजनीति एक व्यवसाय बन चुकी है। जिसका कोई और धंधा नहीं चलता, वह आकर नेता बन जाता है। अगर यहां कमाई बंद हो जाए, तो सबका धंधा बंद हो जाए। सब चाहते हैं कि कमाई की यह अविरल धारा बहती रहे।

आर्येंद्र उपाध्याय : मुख्यमंत्री केजरीवाल पर तानाशाह होने के आरोप क्यों लगते हैं?
’जब सेनापति चुन लिया है, तो युद्ध के समय उसकी बात तो माननी पड़ेगी न! युद्ध के बाद बेशक आप उसे हटा दें। ऐसा तो नहीं हो सकता न कि आप उसे सेनापति भी चुनेंगे और उसकी बात भी नहीं मानेंगे! लोग कहते हैं कि वे सुनते किसी की नहीं हैं, पर ऐसा नहीं है। सुनते सबकी हैं, पर करने की बात आती है, तो सबकी तो नहीं कर सकते न! किसी एक की ही करेंगे! इस तरह एक-दो लोग नाराज हो जाएंगे। कहते हैं कि तानाशाह हैं। पर यही एक मुख्यमंत्री है, जिससे रोज सुबह बिना वक्त लिए मिला जा सकता है। उनके किसी भी मंत्री से मिल सकते हैं।

मनोज मिश्र : स्वास्थ्य विभाग में आपने क्या-क्या बदलाव किए हैं?
’सबसे पहले तो दृष्टिकोण बदला है। अभी तक दृष्टिकोण यह था कि हम सेवा प्रदाता हैं। यानी हम देने वाले हैं और सामने जैसे याचक हो। अब उल्टा हो गया। अब जो लेने वाला था, वही सेवा प्रदाता हो गया है। सारी योजनाएं अब रोगी को ध्यान में रख कर बन रही हैं। आम आदमी के लिए बन रही हैं। उदाहरण के लिए, पहले दवाएं नहीं मिलती थीं। कहा जाता है कि सरकारी अस्पतालों में दवाएं मुफ्त हैं, पर मिलती नहीं थीं। अगर डॉक्टर छह दवाएं लिखता था, तो उसमें से दो ही मिलती थीं, चार नहीं मिलती थीं। आज भी दिल्ली सरकार को छोड़ दीजिए तो पूरे देश में किसी अस्पताल में नहीं मिलती हैं। हमने दिल्ली सरकार के सभी अस्पतालों में सौ फीसद दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की। पिछले साढ़े तीन सालों में हमने बड़ी सख्ती से पालन कराया है। इसी तरह से हमने जांचें मुफ्त कराई। जैसे एमआरआइ की जांच करानी हो तो बाजार में छह हजार रुपए लगते हैं, एम्स में तीन हजार रुपए लगते हैं और उसके लिए करीब एक साल इंतजार करना पड़ता है। उसको हमने बदल दिया। दिल्ली में सत्तर जगहों पर आप उसी दिन मुफ्त में यह जांच करा सकते हैं। वह अमीर हो या गरीब हो, सबकी मुफ्त जांच होती है। इसी तरह सीटी स्कैन, पैट स्कैन तक मुफ्त में कराते हैं। जितनी भी महंगी से महंगी जांचें हैं, वे हम मुफ्त करा रहे हैं, दिल्ली के लोगों के लिए करा रहे हैं। हमारा ध्येय है- स्वास्थ्य सबके लिए। अभी हम दिल्ली सरकार के सभी अस्पतालों को रेनोवेट कर रहे हैं, सभी को वातानुकूलित कर रहे हैं। आने वाले दिनों में वे किसी भी प्राइवेट अस्पताल से किसी भी रूप में कम नहीं होंगे। बस अंतर यह होगा कि सरकारी अस्पतालों में एक ही श्रेणी होगी, सिर्फ वार्ड होंगे, अलग श्रेणी के कमरे नहीं होंगे। वहां जो भी जाएगा, सभी को एक तरह से रखा जाएगा। मोहल्ला क्लीनिक में हम ढाई सौ प्रकार के टेस्ट मुफ्त कराते हैं। कई लोगों के कई हजार रुपए के टेस्ट होते हैं, पर वे सब हम मुफ्त कराते हैं।

मृणाल वल्लरी : बिस्तरों की संख्या बढ़ाने की दिशा में क्या काम कर रहे हैं?
’दिल्ली सरकार के अस्पतालों में दस हजार बिस्तर हैं हमारे पास। इस साल चार हजार बिस्तर और तैयार हो जाएंगे। हम कुल पच्चीस हजार बिस्तर की सुविधा देना चाहते हैं। बाकी बिस्तरों के लिए काम शुरू हो जाएगा। इसके लिए निविदाएं हो चुकी हैं, अलग-अलग स्तर पर काम शुरू होने हैं। आज तक किसी भी सरकार ने यह नहीं सोचा कि हमें दस हजार बिस्तर को पच्चीस हजार बिस्तर तक ले जाना है। हमने सोचा। इसका नौकरशाही के स्तर पर बहुत विरोध हुआ कि इतने बिस्तर क्यों बढ़ाने! क्या जरूरत है? संयुक्त राष्ट्र के मानक के आधार पर हमने यह काम शुरू किया।

अजय पांडेय : अभी जेएनयू में राजद्रोह के मामले में दिल्ली पुलिस कह रही है कि आप उसे परमिशन नहीं दे रहे!
’ऐसा क्या दबाव था दिल्ली पुलिस के ऊपर कि उसे अचानक रातोंरात चार्जशीट दाखिल करनी पड़ी? तीन साल उन्होंने जांच करने में लगा दिए और चार्जशीट अचानक दाखिल कर दी। क्या उन्हें पता नहीं था कि इसमें परमिशन लेनी होती है? अगर पता था तो परमिशन ले लेते! ऐसी क्या आफत आ गई कि अब वे एक के बाद एक कहानी गढ़ रहे हैं। कह रहे हैं कि दिल्ली सरकार बैठी हुई है। फिर आप क्या कर रहे थे तीन साल से? इतनी मोटी फाइल है, उसे पढ़ना तो पड़ेगा कि नहीं। दूसरी बात यह कि आप बताएं न कि आज तक कितने देशद्रोह के मामले हुए हैं इस देश में, वह भी किसी कैंपस के अंदर? अभी तो मैं देख रहा हूं कि सोशल मीडिया में कई वीडियो चल रहे हैं, जिसमें वही नारे लग रहे हैं। उन पर भी देशद्रोह का मामला चलना चाहिए। अदालत में भी दिल्ली पुलिस एक के बाद एक झूठ बोली। अगर पुलिस इतनी ही गंभीर थी, तो पहले परमिशन ले लेती। मगर चार्जशीट दाखिल करके परमिशन लेने आई। हमें यह भी देखना पड़Þेगा कि आखिर इस कानून में पेच क्या हैं, इसका मकसद क्या है, यह बना क्यों था।

दीपक रस्तोगी : पुलिस को लेकर अक्सर दिल्ली सरकार और केंद्र के बीच संघर्ष-सा बना रहता है। इसे ठीक करने की दिशा में क्या कोई प्रस्ताव सरकार के पास है?
’दिल्ली के अंदर दो चीजें हैं- पुलिस और भूमि। ये हमारे अधीन नहीं आते। संविधान के अनुसार ये केंद्र के अधीन हैं। हम पूर्ण राज्य की मांग कर रहे हैं।

मनोज मिश्र : आप पर यह भी आरोप लगा कि अपने परिवार के लोगों को ही सरकार में नियुक्त कर लिया! शुंगलू समिति भी इसके लिए बनी।
’मेरे ऊपर दो आरोप लगे। एक तो निजी सचिव नियुक्त करने का। सीबीआइ ने मुझे बुला कर पूछा कि आपने फलां आदमी को ओएसडी क्यों नियुक्त किया। मैंने पूछा कि आप कौन होते हैं यह सवाल पूछने वाले? मैं मंत्री हूं, मेरा अधिकार है कि मैं किसेअपना सचिव नियुक्त करूं, किसे न करूं। यह आपसे पूछ कर तो करूंगा नहीं। दूसरा आरोप था कि मैंने अपनी बेटी को एक लाख पंद्रह हजार रुपए की नौकरी पर रख लिया। जबकि मेरी बेटी को किसी नौकरी पर नहीं रखा गया था, वह सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत वालंटियर के तौर पर काम कर रही थी। एक रुपया भी, किसी भी तरह का मानदेय उसे नहीं दिया गया था। उसका आइआइएम इंदौर में दाखिला हो गया था। उसने कहा था कि मैं एक साल वालंटियरशिप करूंगी। हमारे यहां इसका चलन ज्यादा नहीं है, पर विदेशों में सरकार के करीब चालीस फीसद काम वालंटियरशिप पर चलते हैं। एक लाख पंद्रह हजार रुपए की कहानी यह है कि आइआइएम अमदाबाद में सत्तर लोगों को भेजा गया था। उनमें एक मेरी बेटी भी थी। उसका खर्चा था एक लाख पंद्रह हजार रुपए। वह चेक मैंने अपने खाते से काट कर दिया था। तो जब इसकी जांच हुई तो बात उल्टी निकली कि वह पैसा सरकार ने नहीं, मैंने दिया था। मगर भाजपा वाले तो बात का बतंगड़ बनाते रहते हैं! शुंगलू समिति को मेरे खिलाफ एक भी तथ्य नहीं मिला।

प्रतिभा शुक्ल : दिल्ली सरकार ने मोहल्ला क्लीनिकों को आयुष्मान भारत से क्यों नहीं जोड़ा है?
’आयुष्मान भारत एक फ्रॉड है। सरकारी अस्पताल में आयुष्मान भारत का क्या तर्क है। दिल्ली के अस्पतालों में तो सब कुछ मुफ्त है- दवाएं, जांच सब कुछ। वहां कोई बिलिंग काउंटर नहीं है। मगर आप उत्तर प्रदेश में जाइए, वहां हर चीज के पैसे मांगते हैं। फिर कहा जाता है कि अयुष्मान भारत के तहत कराओ, सब कुछ मुफ्त है। सरकारी अस्पताल में पैसे क्यों भाई! अगर आपको इंश्योरेंस लाना भी था, तो उसे निजी अस्पतालों में लाते। सरकारी अस्पताल के अंदर क्यों लाए? हम तो दूसरे राज्यों से आए मरीजों का इलाज करने से मना नहीं करते। हमारे अस्पतालों में उत्तर प्रदेश के बहुत सारे मरीज आते हैं। तो आयुष्मान भारत तो अपने आप लागू है न वहां!

अजय पांडेय : शीला दीक्षित के आने से क्या अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता पर कोई प्रभाव पड़ेगा?
’शीला जी का मकसद कांग्रेस को जिताना नहीं, आम आदमी पार्टी को हराना है, बेशक उसमें भाजपा ही क्यों न जीत जाए। भाजपा का वोट काफी खिसका है, इसलिए वह भी कांग्रेस के जरिए जीतना चाहती है। वे खुद भी लोगों से कह रहे हैं कि कांग्रेस को वोट दे दो। मुझे लगता है कि अगर वे इस सोच से काम कर रही हैं, तो कांग्रेस को लोग वैसे ही पसंद नहीं कर रहे, और पसंद नहीं करेंगे।

प्रतिभा शुक्ल : सड़क हादसे के मामले में आपने कहा कि इलाज का सारा खर्च दिल्ली सरकार उठाएगी। उसमें कितनी सफलता मिली है?
’किसी भी अस्पताल में, चाहे वह निजी ही क्यों न हो, भर्ती कराया जाता है, तो उसका सारा खर्च हम उठाते हैं, चाहे वह कितना भी बड़ा खर्च क्यों न हो। मगर लोग भर्ती कराने ले ही नहीं जाते। पुलिस को भी यह बात पता है, आॅटो, टैक्सी वालों को भी पता है, पर ले नहीं जाते। यहां तक कि सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने वाले को दो हजार रुपए इनाम भी हम देते हैं।

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