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बारादरीः पहले नाम पर दिया अब काम पर वोट देंगे लोग

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का मानना है कि पर्वतीय विकास के विमर्श को लोकलुभावन चश्मे से न देखा जाए। पहाड़ में विकास की पहाड़ जैसी चुनौतियां हैं।

Author June 24, 2018 04:13 am
डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक का जन्म 15 जुलाई, 1958 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के पिनानी गांव में हुआ।

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का मानना है कि पर्वतीय विकास के विमर्श को लोकलुभावन चश्मे से न देखा जाए। पहाड़ में विकास की पहाड़ जैसी चुनौतियां हैं। उत्तराखंड से पलायन की बात को ख्रारिज करते हुए उन्होंने कहा कि पहाड़ के गांवों में बसे लोग अपनी सुविधा या जरूरत के कारण दूसरी जगहों पर जा रहे हैं, जिसे समग्र परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। निशंक का दावा है कि जिस राज्य से अलग होकर उत्तराखंड बना उस उत्तर प्रदेश को तो उसने विकास दर में पीछे छोड़ा ही है, इस मामले में वह राष्ट्रीय औसत से भी काफी आगे है। राज्य बनने के बाद उत्तराखंड का जितना विकास हुआ उतना उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहने के लंबे अरसे में नहीं। निशंक से बातचीत का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

मुकेश भारद्वाज : अब देश चुनाव वर्ष में प्रवेश कर गया है। इसमें आप अपना और पार्टी का भविष्य कैसे देखते हैं?

रमेश पोखरियाल निशंक : पहली बात तो यह कि सबने मन बनाया हुआ है कि 2019 में नरेंद्र मोदी ही देश का प्रधानमंत्री बनने चाहिए। उसके पीछे तमाम कारण हैं। 2014 में जब हताशा-निराशा का वातावरण था, तब लोगों ने नरेंद्र भाई को प्रधानमंत्री के रूप में देखा और लोगों को उनसे उम्मीद बनी थी। उस माहौल में नरेंद्र मोदी के नाम पर लोगों ने वोट दिया। अब लोग वोट देंगे नरेंद्र मोदी के काम पर। जिस तरह नरेंद्र मोदी ने समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति की चिंता की है, अब तक किसी ने नहीं की थी। उन्होंने अंतिम छोर के व्यक्ति की शौच संबंधी सुविधाओं, उसके आवास से लेकर, उज्ज्वला गैस, मुफ्त बिजली कनेक्शन, उजाला बल्ब देने तक की चिंता की। और दूसरा छोर वह है कि दुनिया भर देशों को विकास दर के मामले में चुनौती पेश की। अमेरिका और चीन जैसे शक्तिशाली देशों की तुलना में भारत की विकास दर आगे निकल गई। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामले में इन चार सालों में भारत ने अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया है। इन सब चीजों को देखते हुए लोगों को यह कहने पर मजबूर होना ही पड़ेगा कि इस देश को नरेंद्र मोदी की जरूरत है।

राजेंद्र राजन : आप खुद को मूल रूप से क्या मानते हैं- राजनेता या लेखक?

’मूल रूप से तो मैं कभी राजनीतिक रहा ही नहीं। मेरी पृष्ठभूमि बचपन से लेखन से जुड़ी रही है। पत्रकारिता से जुड़ी रही है। जब मैं मुख्यमंत्री था तब भी यह सवाल पूछा जाता था। मैंने हमेशा ही बेबाक ढंग से कहा है कि अगर कोई मुझे दोनों में से चुनने को कहे, तो मैं राजनीति तो एक सेकेंड में छोड़ दूंगा, मेरा असली जीवन तो लेखन का है।

मृणाल वल्लरी : आपके लेखन का मूल स्वर राष्ट्रीय चेतना है। आज राष्ट्रवाद पर बहुत बातें होती हैं। आपके अनुसार राष्ट्रवाद क्या है?

’मेरे लेखन का एक पक्ष राष्ट्रीय चेतना भी है। मेरी कहानियों, उपन्यासों आदि का दुनिया की सत्रह-अठारह भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इसके अलावा आठ-दस देशों में पढ़ाई भी जाती हैं। यहां भी कई प्रदेशों के पाठ्यक्रमों में लगी हुई हैं। इसलिए ऐसा नहीं कि मेरी रचनाएं केवल राष्ट्रीय पक्ष की हों, लेकिन हां, राष्ट्र मेरे लिए महत्त्वूर्ण है। मैंने गांव पर लिखा है, पहाड़ पर लिखा है, मेरी जीवन-यात्रा में जो-जो मिला है, वह सब कुछ मैंने पिरोने का प्रयास है। जो मेरे संघर्ष थे, कष्ट के क्षण थे, वे सब मेरी कहानियों में आए हैं। यह बात सच है कि मेरे लेखन में राष्ट्रीय भावना होती ही है। मैं सरस्वती शिशु मंदिर में आचार्य रहा हूं। जब मैंने बच्चों को समाज और राष्ट्र पढ़ाया है, तो उसमें राष्टÑीय चेतना आनी ही है।

अजय पांडेय : पहाड़ के गांव बहुत तेजी से खाली हो रहे हैं। क्या वजह है कि इतने बड़े पैमाने पर वहां से पलायन हो रहा है?

’दरअसल, जब उत्तराखंड को लोग देखते हैं, तो केवल उसके एक पक्ष को देखते हैं। उत्तराखंड का सत्तर प्रतिशत तो वन क्षेत्र है। शेष तीस प्रतिशत में गांव हैं, शहर हैं, दुकान-मकान, सड़क, नदी-नाले हैं। उस तीस प्रतिशत में से भी मान कर चलिए कि दस-पंद्रह प्रतिशत ही कहीं जमीन है। अब उसमें मान लीजिए कि किसी व्यक्ति के चार बेटे हैं। जब उसके खेत चार हिस्सों में बंट गए, तो अंदाजा लगाइए कि उनकी आने वाली पीढ़ियों में वह बंटेगा तो एक-एक टुकड़ा भी नहीं मिलेगा। तो असल समस्या है कि उसे रोकें कैसे। दूसरी बात है कि पहाड़ के लोग संघर्षशील होते हैं, इसलिए पहाड़ की प्रतिभाएं विभिन्न क्षेत्रों में फैली हैं। उसे मैं पलायन नहीं मानता। देश का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं होगा, जिसके शीर्ष पर पहाड़ का आदमी न हो। ऐसे में जब कोई आदमी किसी नौकरी में आ गया, वहां से बाहर आ गया, तो वह चाहता है कि उसके बच्चे थोड़ी सुविधाओं में पल-बढ़ जाए। सो, वह बाहर बस जाता है। इसलिए यह कहना चाहिए कि पहाड़ के गांव सुविधा के अनुसार थोड़ा नीचे उतर आए हैं। हरिद्वार में आ गए, उधर से हल्द्वानी में आ गए, कोटद्वार में आ गए, देहरादून में आ गए। इस तरह गांव में उनका मकान खाली पड़ा रहता है। इसलिए हम कोशिश कर रहे हैं कि पहाड़ की जवानी और पानी दोनों का कैसे बेहतर समन्वय हो सकता है। उसके लिए हमारे पास जैव विविधता है, वहां की जड़ी-बूटियों का निर्यात करने का प्रयास कर रहे हैं। इसके अलावा वहां के उद्योगों और पर्यटन को भी बढ़ावा देने पर जोर दे रहे हैं। इस तरह हमारी पढ़ी-लिखी पीढ़ी धीरे-धीरे वापस लौटने लगी है।

मनोज मिश्र : उत्तराखंड की राजधानी गैरसैण में बनाने की मांग उठती रहती है, उसे राजधानी बनाने में क्या अड़चन है?

’कुछ लोग जरूर यह कहते हैं कि समान रूप से विकास नहीं हो पा रहा। पर आप विचार करें, तो यह स्वाभाविक है। क्योंकि समग्र विकास के बारे में कोई नहीं सोचता, वह अपने-अपने इलाके के मुताबिक विकास को देखता है। हिमालय बहुत संवेदनशील है। अब आप ऊपर पहाड़ पर क्या विकास करेंगे? मैं गैरसैण का पक्षधर हूं, पर दूसरी बात कहता हूं। मान लीजिए गैरसैण में राजधानी हो ही, तो क्या हो जाएगा। एक जमाना था, जब एक शासनादेश लाने के लिए हमें लखनऊ जाना पड़ता था। अब तो इंटरनेट पर क्लिक कीजिए, पूरी दुनिया सामने है। तो, यह विवाद राजधानी का नहीं है, मुद्दा वहां के संयुक्त रूप से विकास का है। इसलिए विकास की व्यावहारिक रूपरेखा बनाने की जरूरत है। जब मैं मुख्यमंत्री था, तब मैंने विजन ट्वेंटी ट्वेंटी बनाया था, जिससे विकास ऊपर की तरफ गया।

पारुल शर्मा : उत्तराखंड में राजनीतिक उथल-पुथल के क्या कारण हैं?

’ऐसा भी नहीं है। छोटे राज्यों की अपनी मुश्किलें होती हैं। वहां जितनी खूबियां हैं, उतनी खराबियां भी हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से मानता हूं कि कभी भी राजनीतिक अस्थिरता नहीं होनी चाहिए। जिस आदमी को जितना समय मिलना चाहिए, उसे पूरा वक्त दीजिए। अस्थिरता हमारी पार्टियां ही पैदा करती हैं। राजनीतिक कलुषिता की शुरुआत कांग्रेस ने की। राजनीतिक दल कोई भी क्यों न हो, उसे स्थिरता बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए। जो भी सरकार बनी है, उसे पूरा समय मिलना चाहिए। जहां तक उत्तराखंड की बात है, तो वहां मुझे नहीं लगता कि ऐसी कोई अस्थिरता है।

दीपक रस्तोगी : जब आप मुख्यमंत्री थे तो गंगा सफाई को लेकर एक योजना बनाई थी। बाद में वह रुक गई। अब वह किस स्थिति में है?

’यह सच है कि गंगा पर हम लोगों को जितना ध्यान देना चाहिए, उतना नहीं दिया। गंगा सिर्फ नदी नहीं है। वह हमारी संस्कृति है, वह हमारी जीवनदायिनी है और मोक्षदायिनी भी है। गंगा को संजोने में हमसे चूक हुई है, मैं यह नहीं कहता कि उसमें किसकी गलती ज्यादा है। जब मैं मुख्यमंत्री था, तो स्पर्श गंगा अभियान चलाया था और गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक गंगा की सफाई के लिए जो कुछ किया जा सकता था किया था। मेरी प्राथमिकता गंगा और ग्लेशियर था। अभी नमामि गंगे योजना चल रही है, उस पर भी बहुत काम हो रहा है। पर ये स्थायी प्रकार के काम हैं। जो गंदे नाले गंगा में आकर मिलते हैं, उन्हें रोकने, साफ करने का काम हो रहा है।

मुकेश भारद्वाज : उत्तराखंड में चार धाम हैं, क्या सरकार के मन में कभी यह आया कि भीड़भाड़ को नियंत्रित करने और तीर्थयात्रियों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए एक व्यावहारिक तंत्र विकसित करने की जरूरत है?

’हां, ऐसी व्यवस्था है। हमने बदरीनाथ मंदिर समिति अलग ही बनाई है। आपने देखा होगा कि जो अन्य जगहों पर होता है, वह हमारे बदरी-केदार में नहीं होता। वे बाकायदा सरकार द्वारा संचालित हैं। दोनों व्यवस्थाएं हैं-पंडे लोगों का भी है, पर अंतत: उस पर नियंत्रण सरकार का ही होता है। हम लगातार देखते रहते हैं कि चारों धाम और हेमकुंड साहिब में किस तरह व्यवस्था को सुचारु बनाए रख सकें। केदारनाथ की त्रासदी ने हमको यह भी समझा दिया है कि तीर्थयात्रियों की अतार्किक भीड़भाड़ खतरनाक हो सकती है, तो हम उसे नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं।

अजय पांडेय : पहाड़ पर नशे की लत बढ़ती जा रही है। तो क्या उत्तराखंड में भी शराबबंदी जैसा कोई कदम उठाने की जरूरत है?

’यह पीढ़ी हमारे लिए थाती है। उसे किसी भी तरह हमें बचाना है। लेकिन इसके लिए जब तक जनचेतना नहीं होगी, यह काम होगा नहीं। जब तक जनचेतना नहीं होगी, तब तक मात्र कानून बना देने से बात नहीं बनेगी। जनचेतना और कानून दोनों का पारस्परिक समन्वय होना चाहिए। जो आपकी चिंता है, वही मेरी भी चिंता है कि इस पीढ़ी को बचाए रखने की जिम्मेदारी हमारी है। हमारा संस्कार अच्छा होगा, परवरिश अच्छी होगी, तो बच्चे गलत रास्ते पर जाने से बचेंगे। यह सिर्फ पहाड़ का विषय नहीं है, पूरे देश का विषय है। पंजाब के बारे में हम लोग जानते हैं कि वहां क्या दशा हो गई थी। इसलिए जनचेतना और कानून दोनों की मदद से हम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।

सूर्यनाथ सिंह : केदारनाथ त्रासदी के बाद तमाम अध्ययनों से जाहिर हुआ कि अनियोजित विकास परियोजनाओं के चलते उत्तराखंड के पहाड़ खोखले होते गए हैं। क्या इसे रोकने या संतुलित करने की कोई योजना है?

’इसमें दो बातें हैं। जब उत्तराखंड राज्य बना तो विकास की बात की गई थी। अब जब हमें विकास चाहिए तो उसमें हर गांव तक सड़क पहुंचाने की जिम्मेदारी भी आती है। पहले जब गांवों में सड़कें नहीं थीं, तो प्रसूति के समय हमारी मां-बहनें अस्पताल पहुंचने से पहले रास्ते में ही दम तोड़ देती थीं। तो, देश की आजादी के बाद विकास में से उसका भी हक है। इसमें स्वाभाविक ही जब पहाड़ कटेगा, तभी सड़क चढ़ेगी। तो, जहां तक विकास की बात है, जो तीन राज्य एक साथ बने थे- छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड- उनमें सबसे अधिक विकास कहीं हुआ है, तो वह उत्तराखंड है। जिस राज्य की कोख से उत्तराखंड का जन्म हुआ, उस प्रदेश की विकास दर को भी उसने पीछे छोड़ दिया है। राज्य बनने के बाद से अब तक जितना विकास हुआ, उतना देश की सत्तर साल की आजादी के बाद भी नहीं हुआ। राज्य बनने से पहले पांच हजार पांच सौ किलोमीटर सड़क थी, राज्य बनने के बाद अब साढ़े बत्तीस हजार किलोमीटर सड़क हो गई है। वहां करीब बाईस विश्वविद्यालय ऐसे हैं, जिनकी देश और दुनिया में ख्याति है। इसके अलावा ऑटोमोबाईल के क्षेत्र में हम एशिया का नंबर एक हैं। उत्तराखंड की फार्मासिटी देश में नंबर एक है। चावल निर्यात के मामले में भी वह प्रगति कर रहा है, पर हां, मैं इस बात से सहमत हूं कि हमें हिमालय को बचाने की जरूरत है, ताकि उस पर फिर कोई संकट न आने पाए। विकास के लिए हमने सड़कें बनाई, औद्योगिक क्षेत्र बसाए, पर अब हमारे सामने चुनौती है कि किसी भी तरह उसे नियोजित किया जाए।

आर्येंद्र उपाध्याय : पहाड़ की बुनियादी समस्या क्या है?

’बुनियादी समस्या तो हर जगह सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार है। वह पहाड़ है, इसलिए वहां इन सब मामलों में चुनौतियां अधिक थीं, पर हमने उन समस्याओं को दूर करने में काफी हद तक कामयाबी हासिल कर ली है। वहां आयुर्वेद के क्षेत्र में हमने काफी काम किया है, अब हमारी कोशिश है कि बाहर से लोग वहां आएं और उसका लाभ उठाएं। पर्वतीय क्षेत्र के जितने भी राज्य हैं, उनमें जितनी अवस्थापनाएं उत्तराखंड में हैं, उतनी कहीं नहीं हैं। अब हम बाहर के लोगों को आकर्षित करने और अधिक शोध के लिए क्या-क्या कर सकते हैं, इस पर काम चल रहा है?

अजय पांडेय : आपने अभी फिल्म के क्षेत्र में भी पदार्पण किया है, तो क्या यह उम्मीद की जाए कि आपकी जो भी फिल्में होंगी उनमें उत्तराखंड की संस्कृति की झलक होगी?

’निश्चित रूप से। मैंने पहले ही कहा था कि मेरी किसी रचना पर अगर कोई फिल्म बने, तो वह गढ़वाली में बने। वह मेरा सपना अभी मेरी बेटी ने पूरा किया है।

पारुल शर्मा : इस समय क्षेत्रीय पार्टियां राष्ट्रीय पार्टियों के लिए चुनौती बन कर उभर रही हैं। इस पर आप क्या कहेंगे?

’एक समय था, जब कांग्रेस के खिलाफ सारे दल मिलते थे, क्योंकि वही ताकतवर पार्टी थी। अब वही स्थिति भारतीय जनता पार्टी की है। सब लोग इकट्ठा हो रहे हैं, इसका मतलब है कि भाजपा की ताकत इस सीमा तक बढ़ गई है। अब हमें उस ताकत को इस सीमा तक बढ़ाना है कि जो इकट्ठा भी हो रहे हैं वे ठीकठाक हो जाएं। अब यह जिम्मेदारी हमारी है कि लोगों को समझाएं कि कहीं का र्इंट, कहीं का रोड़ा अब चलने वाला नहीं है। ये सब लोग अपने-अपने स्वार्थ के लिए एकजुट हो रहे हैं, यह चलने वाला नहीं है।

रमेश पोखरियाल निशंक

डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक का जन्म 15 जुलाई, 1958 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के पिनानी गांव में हुआ। भारतीय जनता पार्टी के टिकट से पहली बार 1989 में उत्तर प्रदेश विधानसभा की कर्णप्रयाग सीट से चुने गए। उत्तराखंड राज्य के लिए चले आंदोलन का अगुआ चेहरा रहे। 2009 से लेकर 2011 तक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे और अब हरिद्वार से सांसद निशंक खुद को मूल रूप से लेखक मानते हैं। कविता, उपन्यास, खंडकाव्य, कहानी, यात्रा-वृत्तांत जैसी विधाओं में उनकी साठ से ज्यादा किताबें प्रकाशित हैं। इनमें से कई पुस्तकों का कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है। कई पुरस्कारों से सम्मानित निशंक की एक रचना पर हाल में ‘मेजर निराला’ नाम से फिल्म बनी है, और कहा जा रहा है कि इस फिल्म ने गढ़वाली सिनेमा को नया आयाम दिया है।

पहाड़ के लोग संघर्षशील होते हैं, इसलिए पहाड़ की प्रतिभाएं विभिन्न क्षेत्रों में फैली हैं। उसे मैं पलायन नहीं मानता। जब कोई आदमी किसी नौकरी में आ गया, वहां से बाहर आ गया, तो वह चाहता है कि उसके बच्चे थोड़ी सुविधाओं में पल-बढ़ जाएं। सो, वह बाहर बस जाता है। इसलिए यह कहना चाहिए कि पहाड़ के गांव सुविधा के अनुसार थोड़ा नीचे उतर आए हैं।

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