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बारादरीः मनुष्यता की रक्षा के लिए है प्रेमचंद का साहित्य

प्रेमचंद, गांधी, पत्रकारिता और साहित्य आज बीच बहस में हैं। प्रेमचंद अपने साहित्य से एक ऐसा दौर दे गए, जिसका मूल्यांकन हर दौर में अपने-अपने तरीके से होता है। प्रेमचंद और गांधी की यही प्रासंगिकता है कि ये ऐसा रच गए हैं, ऐसा कह गए हैं जो कालजयी है। खासकर मौजूदा दौर में जो विचारधाराओं की जंग चल रही है उसमें वह औपनिवेशिक दौर फिर सामने आ जाता है जब साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल था। उस दौर के जरिए इस दौर को समझने के लिए प्रेमचंद के प्रखर अध्येता कमल किशोर गोयनका से लंबी बातचीत हुई। कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

कमल किशोर गोयनका का जन्म उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुआ। दिल्ली विश्वविद्यालय में चालीस साल अध्यापन कर चुके गोयनका की खास पहचान है प्रेमचंद पर मौलिक शोध।

दीपक रस्तोगी : क्या आपको लगता है कि अलग-अलग वादों के तहत प्रेमचंद और गांधी के व्यक्तित्व के आकलन की वजह से कहीं कोई गलती हुई है?

कमल किशोर गोयनका : निश्चय ही हुई है। आपको मालूम है कि गांधी को कम्युनिस्टों ने किस तरह देखा। इसी तरह प्रेमचंद को लेकर कम्युनिस्ट लोगों ने यह सिद्ध करने की कोशिश की कि वे मार्क्सवाद के प्रचारक हैं। मगर जब मैंने प्रेमचंद पर काम करना शुरू किया, तो जो वैचारिक समाज हमारे सामने था, उसमें यह था कि प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की, जो कि गलत तथ्य है। प्रलेस की स्थापना की थी इंगलैंड में मुल्कराज आनंद और उनके साथ तीन-चार लोगों ने मिल कर। हिंदुस्तान आने के बाद उन्होंने प्रलेस का घोषणापत्र प्रेमचंद को भेजा। उस घोषणापत्र को प्रेमचंद ने हंस में प्रकाशित कर दिया। उसके आधार पर यहां प्रलेस की स्थापना की गई। उसका पहला अधिवेशन लखनऊ में हुआ। प्रेमचंद ने उस अधिवेशन का उद्घाटन किया, तो उन्होंने कहा था कि किसी लेखक को प्रगतिशील कहने की आवश्यकता ही नहीं है, क्योंकि लेखक होता ही प्रगतिशील है। फिर उसके घोषणापत्र में कहीं मार्क्सवाद का कोई उल्लेख नहीं है। उसमें सिर्फ कहा गया है कि हम भारतीय राष्ट्रीय चेतना चाहते हैं और उसे रूढ़ियों से मुक्त करना चाहते हैं। प्रेमचंद अंधविश्वासों, रूढ़ियों, कुरीतियों के विरुद्ध लिख रहे थे। प्रेमचंद ने कहा था कि मेरे साहित्य के दो लक्ष्य हैं- एक, भारतीय आत्मा को जागृत करना और दूसरा स्वराज की प्राप्ति। प्रलेस के उनके भाषण में भी कहीं उन्होंने मार्क्सवाद का कोई जिक्र नहीं किया है।

मुकेश भारद्वाज : आज चिंता यह है कि पत्रकारिता मुश्किल में है। गांधी और प्रेमचंद के औपनिवेश काल में भी क्या पत्रकारिता इतनी ही मुश्किल थी।

’जब मैंने प्रेमचंद पर काम शुरू किया, तो गांधी को पढ़ा। क्योंकि गांधी के बिना प्रेमचंद पर काम नहीं हो सकता है। जिस तरह गांधी ने स्वाधीनता आंदोलन शुरू किया-1915 में वे दक्षिण अफ्रीका से भारत आए, तो प्रेमचंद एक लेखक के रूप में स्थापित हो चुके थे। गांधी पर प्रेमचंद की पहली टिप्पणी 1916 में मिलती है। फिर जब गांधी ने 1920-21 में असहयोग आंदोलन शुरू किया तो प्रेमचंद ने कई कहानियां लिखीं, गांधी के पूरे प्लॉट पर और असहयोग आंदोलन पर उनका एक लंबा लेख मिला। तो, उस युग के संदर्भ में प्रेमचंद को समझना है, तो गांधी को जरूर साथ लेकर चलना पड़ेगा। आप देखेंगे कि प्रेमचंद के साहित्य में कई ऐसे चरित्र हैं, जो गांधी के प्रतीक बन गए हैं। जैसे ‘रंगभूमि’ का सूरदास। मुझे लगता है कि वह युग ऐसा था जब गांधी और प्रेमचंद ही नहीं, भारत के अनेक महान लोग एक तरह से विचार कर रहे थे। उन सबमें मूल रूप से भारतीयता की चेतना थी। इसलिए कुछ लोगों ने उसे हिंदू और हिंदुस्तान की चेतना भी कहा। मेरी समझ से वहां हिंदू शब्द का अर्थ भारतीय लेना चाहिए।

अजय पांडेय : प्रेमचंद की मूल चेतना क्या थी?

’यह सत्य है कि प्रेमचंद सांप्रदायिकता के विरोध में थे, चाहे वह हिंदू सांप्रदायिकता हो, मुसलिम या फिर ईसाई। सबके बारे में उन्होंने लिखा है। मंदिरों में पंडितों और पुरोहितों के पाखंड पर उन्होंने बहुत विस्तार से लिखा। हिंदू कुरीतियों पर उन्होंने बहुत कठोरता से लिखा है। पर, हिंदू परंपरा के जो मूल्य हैं, उसके बिना उनका साहित्य चल ही नहीं सकता। वे उन परंपराओं के पक्ष पर खड़े हैं। वे मनुष्यता पर विश्वास करते हैं। वे गीता के कर्मयोग का उल्लेख करते हैं। उन्होंने सेवा का बहुत बार उल्लेख किया है। स्वामी विवेकानंद पर उनके दो लेख हैं। उनके ‘महाजनी सभ्यता’ लेख का बहुत उल्लेख किया जाता है, उसी समय उनकी कहानी भी छपी थी ‘रहस्य’। प्रेमचंद को मार्क्सवादी साबित करने के लिए ‘महाजनी सभ्यता’ लेख का उल्लेख तो बहुत किया जाता है, पर उनकी ‘रहस्य’ कहानी का जिक्र तक नहीं किया जाता। क्यों? सवाल है कि किसी लेखक को उसकी रचनात्मकता से समझेंगे या उसकी वैचारिकता से समझेंगे? उस कहानी का मूल भाव है कि मनुष्य का अगर कोई सर्वश्रेष्ठ काम है, तो वह है सेवा। आपको यह मानना ही पड़ेगा कि प्रेमचंद अंत समय तक मनुष्य को देवत्व तक ले जाने के लिए प्रयत्नशील थे। प्रेमचंद का सारा साहित्य मनुष्यता की रक्षा के लिए है।

प्रतिभा शुक्ल : आज के दौर में मनुष्यता की रक्षा के लिए क्या विकल्प है?

’मुझे लगता है, आज के दौर में हम प्रेमचंद को भूल रहे हैं। जीवन का सत्य ज्यादा मूल्यवान है। इसलिए प्रेमचंद ने आदर्शोन्मुख यथार्थ की बात की थी। पर, कम्युनिस्टों ने केवल यथार्थ को चुन लिया और आदर्श को फेंक दिया। आदर्श के बिना जीवन चल नहीं सकता। बिना आदर्श के कोई लेखक लिख भी नहीं सकता।

सूर्यनाथ सिंह : कहानी या उपन्यास में पात्र जो विद्रोह करता है, वह एक तरह से लेखक का विद्रोह होता है। प्रेमचंद के समय में सत्ता इतनी सहिष्णु तो थी कि वे ऐसा विद्रोह दिखा पाए। पर आज की परिस्थिति में क्या ऐसा विद्रोह संभव लगता है आपको?

’हमारी संवेदनाएं समाप्त हो रही हैं। हम अपने विरोधियों को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। हम चाहते हैं कि हमारा ही पक्ष सर्वोत्तम है और वही स्वीकार्य होना चाहिए। यह नहीं चल सकता। इस देश में सबका एक भाव होना चाहिए और वह भाव यह है कि हमें देश का कल्याण करना है। इस भाव का जहां भी जरा-सा भी खंडन होगा, तो उसका कष्ट आने वाली पीढ़ियां भुगतेंगी।

अरविंद शेष : प्रेमचंद की कुछ रचनाओं में दलित पात्रों के चरित्र चित्रण को लेकर काफी विवाद है, उसे आप कैसे देखते हैं?

’मेरा मानना है कि विवेकानंद पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने दलितों के बारे में काफी कुछ कहा और प्रेमचंद ने उनसे प्रेरणा लेकर उनके बारे में लिखा। ‘गोदान’ में मातादीन के मुंह में जिस तरह सिलिया के परिवार वाले हड्डी डाल कर अपना विद्रोह प्रकट करते हैं, वैसा विद्रोह आज कोई दिखा सकता है क्या? उनकी एक और कहानी है ‘घासवाली’। उसमें जब ठाकुर घासवाली का हाथ पकड़ लेता है तो वह कहती है कि ठाकुर, अगर इसी तरह मेरा पति तुम्हारी ठकुराइन का हाथ पकड़ लेता, तो क्या तू उसका हाथ नहीं काट देता! उस कालखंड में ऐसा कोई लिख सकता था?

मृणाल वल्लरी : इस जनतंत्र में अल्पसंख्यक की क्या जगह होगी?

’मैं कहता हूं कि पहले बहुसंख्यक की जगह तय कीजिए। जब सरकार आप बहुसंख्यक के वोट से चलाते हैं, तो पहले उसकी जगह तय करेंगे, न कि अल्पसंख्यक की। मैं पूछता हूं कि जो अधिकार अल्पसंख्यकों को मिले हुए हैं, वे अधिकार बहुसंख्यकों को भी मिले हुए हैं क्या। क्या यह लोकतंत्र का अधिकार नहीं हो सकता? लोकतंत्र बहुमत से चलता जरूर है, पर वह बहुमत बहुसंख्यक बनाता है।

निर्भय कुमार पांडेय : साहित्य की तरफ युवाओं का रुझान कम होता जा रहा है, इसकी क्या वजह है?

’तकनीकी की वजह से। साहित्य की तरफ तो पहले भी लोगों का रुझान कम था। ऐसा नहीं था कि सारा समाज साहित्य की तरफ जा रहा है। पर, पहले पाठक ज्यादा थे, आज पाठक कम हो गए हैं। आज पाठक इंटरनेट के हो गए हैं। वैसे, साहित्य कभी मरेगा नहीं। अगर मनुष्य में संवेदना जिंदा रहेगी, तो साहित्य कभी नहीं मरेगा।

अजय पांडेय : पहले साहित्य और पत्रकारिता में चोली-दामन का साथ था। आज उनमें फासला बन गया है, क्या आप इसे महसूस करते हैं?

’हां, बिल्कुल करता हूं। आजादी के बाद की जो पत्रकारिता मैंने देखी उसमें पत्रकार लेखक भी हुआ करते थे, पर अब विशेषीकरण की वजह से दोनों अलग हो गए हैं। आज पत्रकार का सम्मान बढ़ गया और साहित्यकार नीचे होते गए। तो, साहित्यकारों ने सोचा कि मैं भी पत्रकार बन जाऊं, पर अब तो पत्रकार की भी दुर्गति हो रही है।

प्रतिभा शुक्ल : संचार और तकनीक के इस दौर में हिंदी के सामने किस तरह की चुनौतियां हैं?

’भाषा के रूप में थोड़ा विकास तो हो रहा है। हिंदी क्षेत्रों में जाकर देखें तो वहां पढ़ाई-लिखाई का माध्यम आज भी हिंदी है, पर शहरों में अंग्रेजी का वर्चस्व है। पर यह लंबे समय तक चलने वाला नहीं है। अब हमारे प्रधानमंत्री विदेशों में जहां जाते हैं, वहां हिंदी में बोलते हैं। कुछ विवशताएं जरूर हैं, सरकार के सामने, पर उन्हें समाप्त किया जा सकता है। इसके लिए वोट की राजनीति से बाहर निकलना पड़ेगा।

आर्येंद्र उपाध्याय : आपने लेखक के लिए आदर्श की बात की, पर राजनीति में अब कोई आदर्श नजर नहीं आता। राजनीति का क्या आदर्श होना चाहिए?

’आदर्श का क्षरण तो हुआ है। मैं मान लेता हूं कि यह पतन का काल है। पर मैं यह भी मानता हूं कि मनुष्यता समाप्त नहीं हुई है। मनुष्यता समाप्त नहीं हो सकती। जब-जब मनुष्यता का ह्रास होगा, आदर्शों का भी ह्रास होगा, क्योंकि आदर्श मनुष्य बनाता है। मनुष्यता सद्भाव पैदा करती है। मनुष्य जब मनुष्य के लिए जिंदा रहता है, तभी समाज आगे बढ़ता है, नहीं तो उसका पतन होता है। हम तो उत्थान और पतन में विश्वास करने वाले लोग हैं, अगर पतन हो रहा है, तो फिर उत्थान भी होगा।

दीपक रस्तोगी : पिछले कुछ सालों से हम देख रहे हैं कि हमारा राजनीतिक दर्शन इतिहास दर्शन को प्रभावित करने का प्रयास कर रहा है। क्या अपको नहीं लगता कि इससे हमारी परंपराओं से जुड़ी सही बातें लोगों तक ठीक से पहुंच नहीं पा रहीं?

’देखिए, इतिहास कभी स्थायी नहीं होता, अंतिम नहीं होता। उसमें नए तथ्य सामने आते हैं, तो बदलाव होता है। अभी बागपत में खुदाई में रथ के अवशेष निकले हैं, हथियार निकले हैं। उसने इतिहास बदला। अगर आप इतिहास को नहीं बदलेंगे, तो पीढ़ियों के साथ अन्याय करेंगे। अभी पाकिस्तान में क्या हो रहा है? वहां वह सब इतिहास के रूप में पढ़ा रहे हैं, जो सत्य ही नहीं है। इतिहास का सत्य अगर आप नहीं बताएंगे, तो आप धोखा दे रहे हैं। इसलिए इतिहास में अगर कोई परिवर्तन होता है, तो उसे हमें स्वीकार करना चाहिए। अगर अयोध्या की खुदाई में तीस मूर्तियां निकली हैं, जिससे साबित होता है कि वहां हिंदू मंदिर था, तो क्या हम उसे इसलिए अस्वीकार कर दें कि उससे सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ सकता है? अगर उस इतिहास को हम नकारेंगे, तो वही काम करेंगे, जो पाकिस्तान में हो रहा है। अगर इतिहास के प्रति संवेदनशील नहीं हैं तो संस्कृति का विकास नहीं हो सकता।

आर्येंद्र उपाध्याय : आपने प्रेमचंद पर ही काम करना क्यों शुरू किया?

’मेरे पिता जमींदार थे, पर मैंने तय किया कि व्यापार नहीं करना है। दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए किया और यह सोच कर किया कि प्रोफेसर बनना है। फिर जब पीएचडी करने की बारी आई तो डॉक्टर नगेंद्र ने मुझे प्रेमचंद पर काम करने को कहा। पीएचडी के बाद प्रेमचंद के बेटे श्रीपत राय से मिला। वे प्रेमचंद का एक कोश तैयार कर रहे थे। 1980 में प्रेमचंद का शताब्दी वर्ष था। तब मैंने एक संस्था बनाई थी प्रेमचंद जन्मशताब्दी समिति। उसकी वजह से उन पर काम बढ़ता चला गया। फिर मैंने देखा कि बहुत सारी चीजें दबी पड़ी हैं। तो मैंने खोज शुरू की। इस तरह प्रेमचंद पर काम होता चला गया।

प्रीति जायसवाल : आजकल साहित्य में विमर्श के नाम पर व्यक्तिगत आक्षेप ज्यादा लगते हैं, यह कितना उचित है?

’हिंदी में कुछ ऐसे मठाधीश हुए, जो केवल अपना वर्चस्व चाहते हैं। उनके शिष्य भी वही चाहते हैं। यह जो साहित्य में वाम और दक्षिण का विभाजन है, उसे दक्षिणपंथियों ने नहीं किया है, वामपंथियों ने किया है। प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के बाद जो भी आलोचना है वह यही स्थापित करती है कि जो हमारा विरोध करते हैं, वे दक्षिणपंथी हैं। ये दक्षिणपंथी पूंजीवादी हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि पूरा साहित्य दक्षिण और वामपंथ में विभाजित हो गया। पर अब वे स्थितियों कुछ बदल रही हैं, क्योंकि उनके पास अब वैसे मौके नहीं हैं। पर आपकी बात ठीक है कि व्यक्ति की आलोचना से साहित्य की आलोचना नहीं होती।

सूर्यनाथ सिंह : पर सत्ता भी अपनी विचारधारा के लोगों को लाभान्वित करती रहती है!

’आपकी बात से सहमत हूं। सत्ता भी बौद्धिक वर्ग के बल पर ही टिकी रह पाती है। लोगों को आज तो दिखाई देता है कि सत्ता ऐसा कर रही है, पर वे यह नहीं देखते कि पहले की सत्ता ने क्या किया। पिछले सालों में कई संस्थाओं ने अपने लोगों को करोड़ों रुपए के प्रोजेक्ट दिए, जिन्होंने आज तक रिपोर्ट पेश नहीं की।

निर्भय कुमार पांडेय : क्या आपको लगता है कि वर्तमान लोकतांत्रिक प्रणाली देश के लिए ठीक है?

’अगर देश को ठीक रखना है, तो लोकतंत्र से बेहतर कोई प्रणाली नहीं है। जैसे-जैसे प्रांत शक्तिशाली होंगे, जैसे-जैसे प्रांत स्वायत्तता की मांग करेंगे, यह संकट देश के सामने बना रहेगा। समस्या प्रांतीय ताकतों के उभरने का है, जो हम अपनी आंखों के सामने देख रहे हैं। प्रेमचंद ने लिखा कि देश के लिए प्रांतीय स्वार्थों को भूलना पड़ेगा। जब प्रांतीय ताकतें बढ़ेंगी, तो केंद्र कमजोर होगा और केंद्र कमजोर होगा, तो विदेशी ताकतें हम पर आक्रमण करेंगी। आज विदेशी ताकतें हमारी तरफ आंख उठा कर नहीं देख पा रहीं, तो इसलिए कि केंद्र ताकतवर है। देश के लोकतंत्र जरूरी है और लोकतंत्र में केंद्र का शक्तिशाली होना जरूरी है।

कमल किशोर गोयनका

कमल किशोर गोयनका का जन्म उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुआ। दिल्ली विश्वविद्यालय में चालीस साल अध्यापन कर चुके गोयनका की खास पहचान है प्रेमचंद पर मौलिक शोध। प्रेमचंद की प्राप्य-अप्राप्य चीजों के संकलन में इनके अथक शोध ने एक ऐसी एकल खिड़की तैयार कर दी जहां खड़े होकर आप प्रेमचंद का हर नजरिए से आकलन कर सकते हैं। अगर प्रेमचंद अपने समय में अलहदा रहे हैं तो प्रेमचंद का यह अध्येता भी अलहदा है। प्रवासी हिंदी साहित्य के संकलन और अध्ययन में भी इनका अहम योगदान रहा है। हिंदी में हाइकु कविताएं भी लिखी हैं। ‘प्रेमचंद की कहानियों का कालक्रमानुसार अध्ययन’ के लिए इन्हें 2014 में व्यास सम्मान दिया गया। आज ये हिंदी के वैश्विक चेहरों में से एक हैं।

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