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बारादरी: समान नागरिक संहिता पर सार्थक बहस की जरूरत

नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में संसदीय कार्य, अल्पसंख्यक कार्य राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार), अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के केंद्रीय कैबिनेट मंत्री रहे। 31 मई, 2019 को पुन: अल्पसंख्यक मंत्रालय के केंद्रीय कैबिनेट मंत्री का कामकाज संभाला।

Author August 4, 2019 2:08 AM
मुख्तारअब्बास नकवी

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद के गांव भदारी में 15 अक्तूबर, 1957 को मुख्तारअब्बास नकवी का जन्म हुआ। आपातकाल में जयप्रकाश नारायण के ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन में सक्रिय होकर सत्रह वर्ष की उम्र में जेल में नजरबंद किए गए। स्नातक और जनसंचार में परास्नातक किया। लेखन, सांस्कृतिक गतिविधियों और दस्तकारों, शिल्पकारों के उत्थान के लिए सक्रिय रहे। 1998 में रामपुर, उत्तर प्रदेश से भाजपा के पहले मुसलिम लोकसभा सदस्य चुने गए। 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में सूचना प्रसारण एवं संसदीय कार्य राज्यमंत्री रहे। नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में संसदीय कार्य, अल्पसंख्यक कार्य राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार), अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के केंद्रीय कैबिनेट मंत्री रहे। 31 मई, 2019 को पुन: अल्पसंख्यक मंत्रालय के केंद्रीय कैबिनेट मंत्री का कामकाज संभाला। कई सुधारपरक बिलों को पास करवाने में विपक्ष के साथ संवाद और समन्वय बनाने में अहम भूमिका रही है।

अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी का कहना है कि तीन तलाक शुद्ध रूप से जघन्य अपराध है। एक देश एक कानून पर सार्थक बहस की जरूरत है, इस पर राष्टÑीय जनमत बनाना चाहिए। भीड़ द्वारा की जा रही हिंसा पर उन्होंने कहा कि न तो किसी अपराध को जायज ठहराना चाहिए और न उसे सांप्रदायिकता के चश्मे से देखना चाहिए। बातचीत कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

मनोज मिश्र : तीन तलाक विधेयक को लेकर विरोध हो रहा है। कहा जा रहा है कि जब शौहर जेल में होगा, तो बीवी के भरण-पोषण का खर्च कैसे उठाएगा। दूसरा कि इस्लाम में जब विवाह एक तरह का अनुबंध है, तो तलाक को आपराधिक मामला क्यों बनाया गया?
मुख्तार अब्बास नकवी : तीन तलाक शुद्ध रूप से एक जघन्य अपराध है। इसको हम इस्लाम के साथ जोड़ कर नहीं देखते। किसी धर्म, मजहब से जोड़ कर नहीं देखते। बहुत सालों से इसे लेकर देश भर में आवाजें उठती रही हैं। आंदोलन भी हुए। तमाम इस्लामिक देशों ने, सबसे पहले 1936-37 में मिस्र ने, अपने यहां प्रतिबंधित कर दिया था। उन्होंने प्रतिबंध के साथ-साथ यह घोषित भी किया कि यह गैर-इस्लामी भी है और आपराधिक भी है। उसके बाद सीरिया से लेकर तुर्की, यहां तक कि पाकिस्तान आदि तमाम देशों ने अपने यहां उस पर रोक लगा दी। हमारे यहां अंग्रेजों ने मुसलिम पर्सनल लॉ का गठन करवा दिया था। उसके पीछे की मानसिकता किसी से छिपी नहीं है। उसके बाद से यह हुआ कि मुसलिम पर्सनल लॉ को किस नागरिक कानून के तहत मानेंगे, क्योंकि आपराधिक दंड संहिता तो सबके लिए समान है। और, मजेदार बात यह है कि जो भी लोकतांत्रिक देश हैं, वे एक समान आचार संहिता की दिशा में आगे बढ़े हैं और ज्यादातर देश उस पर अमल कर रहे हैं। मगर कुछ लोगों का एतराज रहता था कि यह इस्लाम में दखल है। जब सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई हुई तो उसने कहा कि यह गैरकानूनी और असंवैधानिक है। अमानवीय भी है। उसके बाद यह चर्चा हुई कि उसके लिए कोई न कोई तो कानून होना चाहिए। फिर तर्क दिया जाने लगा कि जब गैरकानूनी हो गया तो कानून की क्या जरूरत है? सवाल यह है कि गैरकानूनी तो कत्ल भी है, आतंकवाद भी है। चोरी, डाका सब गैरकानूनी है। उनके लिए भी तो कानून हैं। तो तर्क दिया गया कि शौहर जेल चला जाएगा, तो कैसे भरण-पोषण देगा, वगैरह। तो, यह तर्क तो सभी लोग देंगे कि साहब, हम कत्ल करेंगे, जेल चले जाएंगे, तो हमारे परिवार का भरण-पोषण कौन करेगा? तो, मुझे लगता है कि यह तर्क नहीं, कुतर्क है। अब कांग्रेस पार्टी की समस्या यह है कि उसके पास न तो कोई नेतृत्व है और न नीतियां हैं, इसलिए उसके पास कोई तर्क भी नहीं है। शाहबानो मामले में जब फैसला आया था, तब कांग्रेस के पास एक मौका था, पर उन्होंने उसका फायदा नहीं उठाया।

अजय पांडेय : कहा जा रहा है कि तीन तलाक कानून के बाद देश समान नागरिक संहिता की तरफ कदम बढ़ा रहा है। इसमें कितनी सच्चाई है?
’संविधान में बहुत स्पष्ट प्रावधान है कि हमें समान नागरिक संहिता की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए और सरकारों का यह दायित्व है कि समान नागरिक संहिता के लिए बहस करे, समाज को तैयार करे, समाज में एकमत बनाए। यह संविधान में दिशा निर्देश है। मगर उसमें होता क्या है कि जैसे तीन तलाक पर हंगामा हुआ, वैसे ही समान नागरिक संहिता की बात उठती है, तो हंगामा शुरू हो जाता है। अब जिन देशों में समान नागरिक संहिता है, वहां पर लोग चर्च में भी जाते हैं, मंदिर में भी जाते हैं, मस्जिद में भी जाते हैं, गुरद्वारे में भी जाते हैं। समान नागरिक संहिता का यह अर्थ कतई नहीं है कि धार्मिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। या ऐसा भी नहीं है कि सबको एक समान धर्म अपनाना पड़ेगा। समान आचार संहिता का अर्थ शुद्ध रूप से एक देश एक कानून है। सबके लिए अपराध दंड संहिता और सिविल कानून एक होने चाहिए। मुझे लगता है कि इसे बंद नहीं करना चाहिए। इस पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए, राष्ट्रीय जनमत बनाने का प्रयास होना चाहिए।

मुकेश भारद्वाज : भारतीय जनता पार्टी के घोषणापत्र में जो बड़े मुद्दे थे, उनमें से तीन तलाक का मुद्दा तो निकल गया। अब पार्टी की अगली प्राथमिकता क्या है?
’हमारी प्राथमिकता तो एक सौ तीस करोड़ हिंदुस्तानियों तक विकास की रोशनी पहुंचाना है। हमारी प्राथमिकता गरीबी रेखा के नीचे रह रहे लोगों को पूरी तरह बाहर निकालना है। अशिक्षा के माहौल में रह रहे लोगों को उसके बाहर निकालना है। सबको रोजगार उपलब्ध कराना है। फिर हमारी प्राथमिकता में, जिसे कहें वैचारिक या सैद्धांतिक मुद्दे हैं, वे हैं। उन मुद्दों पर हम देश की आवश्यकता और स्थिति के हिसाब से आगे बढ़ेंगे, करेंगे।

मृणाल वल्लरी : अभी भीड़ की हिंसा देश में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। इस पर आपका क्या कहना है?
’मैं मानता हूं कि कोई भी अपराध हो, उसे किसी रूप में उचित नहीं कहा जा सकता। इस तरह की जितनी भी घटनाएं हुर्इं, वे नहीं होनी चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। पर इन घटनाओं को जो सांप्रदायिकता के रूप में पेश किया जाता है, वह अपने आप में खतरनाक मानसिकता है। जब आप किसी अपराध को सांप्रदायिकता के खाते में डालते हैं, तो उस अपराधी का मनोबल बढ़ता है, उस अपराधी की सोच को ताकत मिलती है। 2014 में क्या हुआ, जब चुनाव के बाद सरकार बनी तो कुछ लोग इकट्ठा हो गए और असहिष्णुता का माहौल बनाने लगे कि साहब, देश में बहुत असहिष्णुता हो गई। उसके बाद 2019 के चुनाव के बाद एक बार फिर से वही माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है कि देश में बहुत मॉब लिंचिंग हो रही है। लोग बहुत डरे हुए हैं। दरअसल, लोग नहीं डरे हुए हैं, वे लोग डरे हुए हैं, जो डर का माहौल बनाने का प्रयास कर रहे हैं। और मैं तो कहता हूं कि इन तथाकथित बुद्धिजीवियों की वजह से इस समय अगर कोई सबसे अधिक असहिष्णुता का शिकार है, तो वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी हैं। इस देश में सबसे अधिक राजनीतिक असहिष्णुता का शिकार नरेंद्र मोदी जी हैं। कुछ लोगों को लगता है कि मोदी जी एक बार प्रधानमंत्री तो बन गए, दुबारा कैसे बन गए। तो वे लोग यह माहौल बनाने का प्रयास करते हैं। इससे नुकसान क्या होता है कि विदेशों में गलत संदेश जाता है। जबकि आप देखें तो पिछले पांच सालों में कहीं भी, एक दिन भी कर्फ्यू नहीं लगा, कहीं भी कोई दंगा नहीं हुआ।

पंकज रोहिला : अभी राम मंदिर सरकार के एजंडे में कितनी अहमियत रखता है?
’राम मंदिर का मुद्दा अभी अदालत में है। राम मंदिर अयोध्या में ही बनेगा। वह करोड़ों लोगों की भावनाओं और आस्था से जुड़ा हुआ है। जो भी अदालत का फैसला होगा, उस पर आगे बढ़ा जाएगा। सबसे आदर्श स्थिति तो यह थी कि जब अदालत ने मध्यस्थों को नियुक्त किया था, तभी बातचीत से, आपसी सहमति से तय हो जाना चाहिए था। अगर आपसी सहमति से नहीं हुआ, तो अदालत का जो निर्णय होगा, उसे सबको मानना होगा।

मृणाल वल्लरी : आप अल्पसंख्यक विकास विभाग के मुखिया हैं। अभी एक ऐसा माहौल है कि इस सरकार के रहते इस देश में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं है। आपको ज्यादातर उन्हीं के साथ काम करना पड़ता है। आप उन्हें कैसे समझा पाते हैं, उनके साथ काम करने का क्या अनुभव है?
’मुझे तो कहीं नहीं दिखता कि अल्पसंख्यक डरा हुआ है। दरअसल, अल्पसंख्यकों को एक बात का यकीन हो गया है कि मोदी जी के राज में बिना भेदभाव के विकास हुआ है और उन तक विकास की रोशनी पहुंची है। जैसे पक्के मकान बने, तो आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को मिले। उनमें सबसे अधिक अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को फायदा मिला। इसी तरह प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत ज्यादातर वे इलाके लाभान्वित हुए जहां सड़कें नहीं थीं, उसमें भी पचास फीसद से अधिक अल्पसंख्यक बहुल इलाके हैं। जब हमने सभी जगहों पर बिजली पहुंचाने का निर्णय किया, तो देखा गया कि उनमें ज्यादातर वे इलाके थे, जहां अल्पसंख्यक समुदाय के लोग रहते हैं। पहले जानी-बूझी, सोची-समझी रणनीति के तहत यह प्रयास किया गया कि उन तक विकास की रोशनी न पहुंचे और वे डरे रहें, सहमे रहें। हताश रहें, निराश रहें। इस तरह उनकी गरीबी का राजनीतिक फायदा उठाने का प्रयास किया गया। पहले वे कहते थे कि नब्बे जिलों में ही अल्पसंख्यक रहते हैं। पर जब यह सरकार आई तो इसने बिना किसी भेदभाव के विकास कार्य किए। नब्बे के बजाय एक सौ आठ जिलों में विकास कार्य आबंटित किए गए। हमने तय किया कि पच्चीस फीसद भी अल्पसंख्यक समाज जहां रह रहा है, वहां बिजली, पानी, सड़क देना चाहिए। स्कूल, कॉलेज, हॉस्टल, अस्पताल देने चाहिए। और वे सुविधाएं दी गर्इं। इसलिए लोगों को इस बात का अहसास है कि मोदी जी के शासन में ईमानदारी के साथ विकास हो रहा है, हुआ है।

मनोज मिश्र : अभी आपने कहा कि वक्फ बोर्ड की संपत्तियों का डिजिटलीकरण करेंगे। इतने तरह के मुकदमे चल रहे हैं, इन पर। क्या यह संभव है?
’बिल्कुल होगा। अभी क्या है कि वक्फ माफिया और वक्फ बोर्डों पर बड़े पैमाने पर साठ-गांठ होती थी। अभी फौज के बाद वक्फ की संपत्ति सबसे ज्यादा है। छह लाख संपत्तियां तो अभी पंजीकृत हैं। अपंजीकृत तो बहुत होंगी। लेकिन उनके कागज वक्फ बोर्ड से ही गायब हो जाते थे। वक्फ बोर्ड में बैठे लोग ही उसे गायब करते थे। तो, हमने अभियान चलाया कि हम वक्फ बोर्ड की सारी संपत्ति का डिजिटाइजेशन करेंगे। वे कहने लगे कि हमारे पास कर्मचारी नहीं हैं, तो हमने सबको कर्मचारी मुहैया कराए। इसके अलावा हम सारी संपत्ति की जियो मैपिंग कर रहे हैं। इससे संपत्तियों के जो कागज गायब हो जा रहे थे, वे नहीं हो पाएंगे।

सूर्यनाथ सिंह : सूचना का अधिकार कानून में बदलाव को लेकर भी विवाद है। मांग की जा रही है कि उसे कमेटी के पास भेजा जाना चाहिए। क्या सरकार उसे भेजेगी?
’नहीं, क्यों भेजा जाना चाहिए? 2004 से लेकर 2014 तक लोकसभा और राज्यसभा में लगभग पचहत्तर फीसद विधेयक स्टैंडिंग समिति और सेलेक्ट समिति की बिना समीक्षा के पारित हुए हैं। 2014 से लेकर 2019 के बीच में लगभग अस्सी फीसद विधेयक या तो सेलेक्ट समिति के पास भेजे गए या स्टैंडिंग समिति के पास भेजे गए। चाहे वह जीएसटी बिल हो, एनिमी प्रॉपर्टी बिल हो या दूसरा कोई भी बिल, हर किसी को स्टैंडिंग या सेलेक्ट समित या दोनों के पास समीक्षा के लिए भेजा गया। कोई ऐसा महत्त्वपूर्ण विधेयक नहीं है, जो समीक्षा के बगैर पारित हुआ हो। सूचना का अधिकार कानून में तो बहुत मामूली बदलाव किया गया है। बहुत बड़ा कोई बदलाव नहीं हुआ है। मगर लोगों के पास कोई मुद्दा नहीं है, तो इसे लेकर शोर मचाना है। जो लोग विरोध कर रहे हैं, उनसे पूछिए कि जब सूचना आयोग ने कहा था कि सभी राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार कानून के दायरे में लाना है, तब कांग्रेस पार्टी ने क्यों उसका विरोध किया था? हर कानून में समय और जरूरत के हिसाब से बदलाव होते हैं।

दीपक रस्तोगी : भीड़ की हिंसा को लेकर जो कानून बनाने की बात उठी थी, वह किस स्थिति में है?
’अच्छा अब यह बताइए कि भीड़ द्वारा हिंसा एक अपराध है, पर अभी जो कानून हैं, वे इस पर काबू पाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं क्या? क्या किसी ने कहा कि भीड़ हिंसा जायज है? दूसरी चीज कि इस तरह के जो अपराध होते हैं, उन पर काबू पाने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है। तीन-चार ऐसी घटनाएं हैं, जिन्हें बहुत बढ़ा-चढ़ा कर बताया जाता है- एक हरियाणा की, एक राजस्थान की, एक उत्तर प्रदेश और एक झारखंड की। इनमें से कोई भी घटना बताइए, जिसमें चौबीस घंटे के भीतर कार्रवाई न हुई हो। तो, राज्य सरकारें कार्रवाई कर रही हैं।

दीपक रस्तोगी : गृह मंत्रालय ने कहा था कि भीड़ की हिंसा को परिभाषित करते हुए अलग से कोई कानून नहीं है। क्या इसके लिए अलग से कानून बनाने की जरूरत नहीं है?
’इसे रोकने के लिए, जैसा कि मैंने पहले कहा, पर्याप्त कानून हैं। क्या अभी तक किसी राज्य सरकार ने कहा कि साहब, हमारे पास तो भीड़ की हिंसा को रोकने के लिए कोई कानून ही नहीं है? जब लाख-लाख लोगों की भीड़ होती है, और उसमें हिंसा हो जाती है, तो उसे भी रोकने के लिए सख्त कानून हैं। अपराध को सांप्रदायिकता के चश्मे से देखेंगे, तो इस पर काबू नहीं कर पाएंगे।

अजय पांडेय : आपने हज सबसिडी कम करने का फैसला किया। इसके क्या नतीजे निकले हैं?
’हज सबसिडी के छल को हमने ईमानदारी के बल से खत्म किया। सबसिडी एक धोखा थी। लोगों को समझा कर रखा जाता था कि देखो, हम सबसिडी दे रहें, तभी तुम हज कर पा रहे हो। यह तो मोदी सरकार की हिम्मत थी कि उसे खत्म किया। सबसिडी खत्म होने के बाद जो पिछला हज हुआ है, उसमें संख्या बढ़ी। सबसिडी होती थी तब एक लाख पैंतीस हजार लोग जाते थे, सबसिडी हटी तो एक लाख पचहत्तर हजार लोग गए। इस बार दो लाख जा रहे हैं। जितना पैसा लोग सबसिडी के साथ देते थे, अब उससे कम देना पड़ता है। यानी कहीं न कहीं गड़बड़झाला था।

मृणाल वल्लरी : जब उन्नाव या मध्यप्रदेश जैसी घटनाएं होती हैं, तो उसकी निंदा तो होती है, पर पार्टी अपना काम करती नहीं दिखती या फिर बहुत ज्यादा देर कर देती है। ऐसा क्यों?
’पार्टी कोई इंस्पेक्टर नहीं है न! यह तो कानून का पालन कराने वाली संस्थाएं करेंगी। उन्हें करना चाहिए और करते हैं। फिर, क्या किसी व्यक्ति ने आपराधिक काम किया है, तो पार्टी ने उसका बचाव किया है? तो, उनके खिलाफ जो भी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, वह होती है। वैसे पार्टी ने भी काफी कार्रवाई की है, पर शोर नहीं मचाया।

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