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संस्कृति सरकारों की प्राथमिकता ही नहीं

रंगकर्मी एमके रैना का कहना है कि लोकतंत्र में संस्कृति सेफ्टी वॉल्व की तरह होती है, जो असंतोष का भाप निकालती रहती है। संस्कृति और सिनेमा के मामले में हम अभी तक उपनिवेशवाद में जी रहे हैं और संस्कृति का कोई भारतीय ढांचा नहीं तैयार कर पाए हैं। उनका मानना है कि भारत जैसे देश में आज भी बहुत जटिल सवालों के सरल जवाब गांधी हैं। बातचीत कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

Author Published on: May 19, 2019 2:19 AM
बारादरी की बैठक में एमके रैना। सभी फोटो : आरुष चोपड़ा

मुकेश भारद्वाज : आज के समय में क्या आपको ऐसा लगता है कि पुरस्कार वापसी का कदम कुछ हड़बड़ी में उठा लिया गया था? अभी सरकार आई ही थी कि वह कदम उठा लिया गया?

एमके रैना : दरअसल, साहित्य अकादेमी ने अगर उस वक्त एक प्रस्ताव पारित कर दिया होता कि वह लेखकों पर हमले का विरोध करती है, तो कुछ नहीं होता। वह सारा आक्रोश देश में लेखकों पर हुए हमलों के विरोध में था। साहित्य अकादेमी, संगीत नाटक अकादेमी, यही तो हमारे फोरम हैं न! वही अगर हमारे पक्ष में बात नहीं करेंगे, तो कौन करेगा।

मृणाल वल्लरी : पुरस्कार वापसी को राजग सरकार ने कागजी क्रांति कह कर खारिज कर दिया। लेकिन इसके बाद एक प्रति-क्रांति भी दिखी कि सरकार के पक्ष में साहित्य और सिनेमा का एक वर्ग खड़ा हुआ। इसे आप कैसे देखते हैं?
’अच्छा है। मैं इसका स्वागत करता हूं। इससे हमारे काम को अहमियत मिलती है। यही तो प्रजातंत्र है। बहस होनी चाहिए। मगर उनमें भी गरिमा होनी चाहिए। वे बहस करेंगे, तो हम उसका जवाब देंगे। अगर आपके पास कहने को कुछ अच्छा है, तो लोग उसे स्वीकार करते हैं। हवाबाजी की बात नहीं होनी चाहिए।

मनोज मिश्र : पहले सिनेमा के तमाम चर्चित चेहरे नाटक से निकले लोग होते थे। अब वह परंपरा खत्म होती जा रही है। क्यों?
’नहीं, ऐसा नहीं है। आप देखेंगे कि इस वक्त सैलाब आया है, मुंबई शहर में, थिएटर के कलाकारों का। एनएसडी पास करते ही युवा तुरंत मुंबई की गाड़ी पकड़ने को तैयार रहता है। आजकल सिनेमा में आॅडीशन होते हैं। वहां देखेंगे कि अगर सौ लोग आॅडीशन दे रहे हैं, तो उसमें पचास तो एनएसडी के होंगे। यही स्थिति बंगाल में भी है, चेन्नई में भी है।

अजय पांडेय : आपका मानना है कि हिंसा को रोकने में रंगकर्म का बड़ा योगदान हो सकता है। दुर्भाग्य से हमारे देश के कई हिस्से हिंसाग्रस्त हैं। क्या वहां थिएटर के जरिए कोई तब्दीली लाई जा सकती है?
’बिल्कुल लाई जा सकती है। मैं 2000 से कश्मीर के गांवों में काम कर रहा हूं। मैंने वहां शहर के तीन-साढ़े तीन सौ बच्चों को प्रशिक्षित किया। शुरू के प्रशिक्षण ऐसे थे, जिनमें बच्चों को पूरे वक्त महीने-डेढ़ महीने मेरे ही साथ रहना था। उन्हें यह नहीं पता था कि आतंकवाद के खिलाफ काम करना है। पर एक दिन जब एक सूफियाना गायक को हम ले आए और उसने गाना शुरू किया, तो वहां बैठे सारे बच्चे कतार से रोने लगे। सब गा रहे थे और रो रहे थे। तब मुझे लगा कि यहां कैथार्सिस इतना है कि इसका असर होगा। वे बच्चे सब अपने-अपने गांवों-कस्बों में अपने छोटे-छोटे समूह चला रहे हैं। फिर मैंने वहां की लोकशैली के लोगों के पास गया। उन पर बहुत जुल्म हुआ है। तब नए लोग उसकी तरफ आकर्षित हुए। हालांकि उस वक्त मेरे साथ कुछ हादसे भी हुए। पर धीरे-धीरे गांव के लोगों का समर्थन मिलना शुरू किया। फिर हमने लोकशैली से चुपके से हट कर शेक्सपियर का ‘किंग लियर’ किया। उसका जबर्दस्त असर हुआ। उन सबसे मेरे भीतर यह विश्वास मजबूत हुआ कि थिएटर के जरिए बदलाव किया जा सकता है।

पंकज रोहिला : इस बार थिएटर और सिनेमा के बहुत सारे चेहरे राजनीति में दिखाई दे रहे हैं। राजनीति को लेकर फिल्में भी बन रही हैं। इसे आप कैसे देखते हैं?
’फिल्म के व्याकरण के हिसाब से अगर अच्छी फिल्म होगी, तो मैं तो उसे दाद दूंगा। अगर विषय-वस्तु गड़बड़ हुई, तो उसे मैं कोई तवज्जो नहीं देता। हिटलर पर एक फिल्म बनी थी। वह फिल्म जिस महिला ने बनाई, वह हिटलर के साथ रह चुकी थी। वह फिल्म गजब की थी। फिल्म के व्याकरण के हिसाब से देखें, तो आपके होश उड़ जाते हैं कि आपका दुश्मन इतना होशियार कैसे है। यह समझना हमें बहुत जरूरी है।

दीपक रस्तोगी : जो फिल्मी कलाकार राजनीति में आ रहे हैं, उसे आप कैसे देखते हैं?
’पृथ्वीराज कपूर जब संसद में थे, तो लगता था कि वह शोभा थी। हबीब तनवीर का पचास सालों का काम था, हुसेन का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम था। इन लोगों का होना संसद की शोभा थी। मगर अब आप शोभा ही नहीं चाहते, तो क्या कहें। अभी जो लोग जा रहे हैं, वे बात तो कभी करते नहीं। खिलाड़ी कभी कोई बात करते नहीं। इसलिए अब उनके प्रति कोई सम्मान का भाव भी कहीं खोता गया है।

आशीष दुबे : आपने एक बार कहा था कि गांधी इज रॉक फॉर मी। आज गांधी भी आलोचना से परे नहीं हैं। इसे आप कैसे देखते हैं?
’बिल्कुल। गांधी अपने आप में जवाब हैं। इस बहुसांस्कृतिक, बहुधार्मिक, बहुजातीय, बहुभाषिक देश के लिए वही जवाब हैं। पर समस्या यह है कि उन्हें लोग पढ़ते नहीं हैं। अभी मैं उन पर चौथा नाटक करने वाला हूं- द ग्रेट ट्रायल।

आर्येंद्र उपाध्याय : नई पीढ़ी का रुझान नाटकों और संस्कृतिकर्म की ओर ज्यादा नहीं हो पा रहा है। इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
’सरकार। सरकार का संस्कृति मंत्रालय इसके लिए जवाबदेह होना चाहिए। आप विश्वास करेंगे कि सरकार संस्कृति कर्मियों को अनुदान कितना देती है! छह हजार रुपया महीना। उसके लिए भी तरह-तरह का अपमान झेलना पड़ता है। फिर कौन जाएगा उसे लेने! यह सरकार का काम करने का तरीका नहीं होना चाहिए। ऐसा विदेश में नहीं होता होगा। वहां कारोबारी मदद करते हैं। वे दान देते हैं और फिर कोई हस्तक्षेप नहीं करते कि आप कैसे काम करते हैं। वहां नाटक को प्रतिष्ठा दी जाती है। वहां उनके राष्ट्रीय थिएटर हैं। हमारे यहां वैसा कुछ है ही नहीं।

आशीष दुबे : कश्मीर को आज आप किस रूप में देखते हैं?
’हिंदुस्तान के हाथ से निकल चुका है, इस वक्त। आज कश्मीर के नौजवानों को पता नहीं है कि सामान्य दिन क्या होता है। हमारे बड़े कवि हैं रहमान राही। मैंने उन पर डाक्यूमेंट्री बनाई। उन्हें लेकर जाता था। शाम होते ही उनकी बीवी घर के बाहर डरी हुई उनका इंतजार करती रहती। जब फिल्म खत्म होने को थी, तो उन्होंने कहा कि तुमने मेरा डर निकाला। मैं छह महीने से घर से बाहर नहीं निकला था। हालत यह है कि किसी को पता ही नहीं कि बच्चे का स्कूल आज होगा कि नहीं होगा। हाल के दिनों में एक और चीज हुई है। वहां से बहुत सारे बच्चे इधर पढ़ने आए थे। उन पर मैदानी इलाकों में जो मार पड़ी, उसका बहुत बुरा संकेत गया है। अब वे इधर आना नहीं चाहते।

सूर्यनाथ सिंह : मराठी के लोग फिल्मों में जाते हैं पैसा कमाने, फिर वह पैसा थिएटर में लगाते हैं। पर हिंदी थिएटर में ऐसा नहीं है। यहां कुछ विचित्र स्थिति है। यहां के रंगकर्मी अपने दम पर थिएटर का विकास करने का प्रयास क्यों नहीं करते?
’हिंदी की समस्या यह है कि इसका सिनेमा मुंबई में है। मुख्य क्षेत्र में नहीं है। अगर इसका स्वरूप प्रादेशिक हो जाता, जैसे कि कन्नड़ सिनेमा का हुआ, केरल के सिनेमा का है या बांग्ला सिनेमा का है, तो शायद थिएटर में कुछ बेहतर हो पाता। मगर यहां ऐसा नहीं है। स्थिति यह है कि बेशक दृश्य उत्तर प्रदेश का होगा, पर उसमें बैल महाराष्ट्र का होगा। इससे पता चलता है कि वास्तविकता से कितनी दूरी है। समस्या यह है कि संस्कृति हमारे सरकारों की प्राथमिकता है ही नहीं। इसलिए कि थिएटर सवाल पूछता है, इसीलिए वह राजनीति के लिए असहज है।

अरविंद शेष : सरकारों को संस्कृतिकर्म से दिक्कत क्यों है?
’दरअसल, सरकार को संस्कृति के क्षेत्र में हस्तक्षेप करना ही नहीं चाहिए। उसका दायित्व है कि बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराए, क्योंकि संस्कृति का कोई भी क्षेत्र लोकतंत्र के सेफ्टी वॉल्व की तरह होता है। वह भाप निकालता रहता है। असली थिएटर को आप सहयोग नहीं दे रहे हैं, फिर भी चल रहा है, कोई बात नहीं। मगर जिस संस्कृति की बात आज की जा रही है, वह संस्कृति नहीं है। वह तो सिर्फ प्रचार है। आप एकांगी समाज क्यों बनाना चाहते हैं।

आर्येंद्र उपाध्याय : अभी सिनेमा में वेब शृंखला बनाने पर जोर है। मगर उसमें कला के नाम पर जैसी चीजें परोसी जा रही हैं, वह समाज में सहजता से स्वीकार करने योग्य नहीं हैं। इसे आप कैसे देखते हैं?
’इसमें दो बातें हैं। एक तो यह कि दूध से धुली कोई फिल्म नहीं होनी चाहिए। परिवार के साथ बैठ कर देखने की बात भी एक धुंधली धारणा है। आजकल इंटरनेट के जमाने में तो बच्चे सब कुछ देखते हैं। वह जमाना अब नहीं रहा। पर मुझे अब डर लग रहा है कि कहीं फिल्म बनाने वाले ही उसे बंद न करा दें। वे उसे इतने चरम पर ले जाना चाहते हैं कि उसे बहुत सारे लोग स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। क्या पता कल को इस मुद्दे पर संसद में बहस हो जाए कि भाई, ये लोग तो कुछ अधिक छूट ले रहे हैं, क्या करें? पर नियंत्रण हमेशा गलत होता है। लोगों को तय करने दीजिए कि क्या सही है और क्या गलत है। हमें तो लोकतांत्रिक वातावरण बनाना है।

सूर्यनाथ सिंह : जो लोग फिल्म बनाते हैं, कुछ लिखते हैं, उनका भी तो एक मकसद होता है। केवल अभिनय या प्रदर्शन के लिए फिल्म बना देने से समाज का क्या भला होगा?
’हमें अपनी परंपरा को भी थोड़ा जानना चाहिए। कालिदास ने एक तरह से अपनी परंपरा से विद्रोह किया था। महाकवि भास ने जब ‘उरुभंगम’ लिखा तो उन्होंने भी विद्रोह किया। तो, हम अपनी परंपरा को तोड़ते हैं। एक नई परंपरा बनाते हैं। अगर वह नहीं होता, तो ‘घासीराम कोतवाल’ मास्टरपीस नहीं बनता। घासीराम पर तो तेंदुलकर को मारने आए लोग। हमें किसी न किसी रूप में जमीन तोड़नी पड़ेगी। बहुत सारे लोग लॉलीपॉप बना तो रहे हैं, पर वह हमारा काम नहीं है। हमें जमीन भी तोड़ना है, कला के मोर्चे पर भी काम करना है, विषय-वस्तु और शिल्प के स्तर पर भी काम करना है। नहीं तो नई परंपराएं कैसे बनेंगी?

दीपक रस्तोगी : मगर सरकारें इसी बात से तो नाराज होती हैं कि हम आपको पैसा भी दें और आपसे गाली भी सुनें! सभी सरकारें चाहती हैं कि उसका प्रचार करें और पैसा ले जाएं।
’मुझे नहीं लगता कि यह बहुत दिन चलेगा। मुझे अपने देश पर बहुत विश्वास है। यह किसी को नहीं बख्शता है। यह बहुत जटिल देश है।

मृणाल वल्लरी : अभी ज्यादातर फिल्में उच्च मध्यवर्ग और यौन संबंधों को लेकर बन रही हैं। जबकि समाज में इतनी गैर-बराबरी है, पर उस पर इक्का-दुक्का फिल्में ही मिलेंगी। तो, क्या यह भी भारतीय समाज में अतिरेक नहीं हो रहा?
’यह गंभीर समस्या है। वे ज्यादातर हॉलीवुड से विषय उठा रहे हैं। वहीं से यह मॉडल बन कर आया है। हमारी तो समस्या यह है कि हमने भारतीय परंपरा विकसित ही नहीं की है, हमने अपना मॉडल बनाया ही नहीं है। उसके लिए न तो पैसे मिलते हैं, न वातावरण बनाने का प्रयास किया गया। जिस तरह से हॉलीवुड की कहानी कहने की परंपरा है, वह हमारी परंपरा नहीं है, हमारा कहानी कहने का वह ढंग है ही नहीं। अभी भी हम उपनिवेशवाद में जी रहे हैं। कहानी के प्रतिमान कंपनियां बनाती हैं, बाजार बनाने के लिए। आपके सामने एक ऐसा सपना खड़ा कर दिया जाता है कि हम अमीर हो रहे हैं। इसका क्या नतीजा निकला है? खुदकुशी कर रहे हैं लोग। जब एनएफडीसी बना, तो उसके तहत अच्छी फिल्में बनीं। मगर उन फिल्मों के बारे में कहा गया कि वे चलती नहीं हैं। हालांकि वे एक नया रास्ता बना रही थीं। मगर आज वैसी फिल्में बनने नहीं दी जा रही हैं। कश्मीरी में एक कहावत है कि जिसके पास कान है, उसके पास जेवर नहीं है और जिसके पास जेवर है उसके पास कान नहीं है। यही हो रहा है हमारे साथ। जो अच्छी फिल्में बना सकते हैं, उनके पास पैसा नहीं है और जिनके पास पैसा है, उनके पास अच्छी फिल्मों की समझ नहीं है।

सूर्यनाथ सिंह : हिंदी में काफी समय से नए नाटक नहीं लिखे जा रहे। इसके चलते बार-बार वही कुछ नाटक खेले जाते हैं। इसकी क्या वजह है?
’इसके दो कारण हैं। एक तो यह कि हम थिएटर वालों को कहानी नहीं चाहिए। ड्रामा चाहिए। ड्रामा एक विज्ञान है। और हमारा लेखक ड्रामा मंडली से बहुत दूर है। नाटक लिखने वाले क्या करते हैं कि कहानी लिखते हैं। यहां तक कि भीष्म साहनी भी ड्रामा न लिख कर कहानी लिखते थे। ड्रामा एक शिल्प है। कहानी भी शिल्प है, पर ड्रामा का शिल्प जगह से जुड़ा हुआ है। इसलिए जब ड्रामा नहीं मिलता, तो हम कविता से, कहानी से प्ले राइट तैयार करते हैं। मैंने अभी गांधी और टैगोर के बीच हुई बहसों को लेकर ड्रामा तैयार किया है। इस तरह थिएटर का सरोकार बदला है। तेंदुलकर थिएटर वालों के साथ उठते-बैठते थे, इसलिए उनके ड्रामा मंच के अनुकूल थे। मोहन राकेश और बादल सरकार भी ऐसा करते थे। अब लोग ऐसा नहीं करते।

आर्येंद्र उपाध्याय : साहित्य और सिनेमा का संबंध कैसे क्षीण होता गया?
’दरअसल, सिनेमा की भाषा अब काफी बदल गई है। मैं जिस भाषा की बात कर रहा हूं, वह मुंबई की भाषा नहीं है। केरल में है, कर्नाटक में है, बंगाल में भी है। पर आप देखेंगे कि सोवियत रूस की जो एकाधिकारवादी सत्ता है, वह दोस्तोएवस्की पैदा कर देती है, और उसकी पूरी दुनिया में स्वीकृति बनती है। हमारे यहां समस्या है सिनेमा की भाषा को एक्सप्लोर करना। वही स्थिति थिएटर में है। हम कहानी कहना चाहते हैं उसमें। हॉलीवुड का बहुत असर है। और साहित्य हॉलीवुड तो लिख नहीं रहा। यथार्थ लिख रहा है। इसलिए वह सिनेमा में उठाया नहीं जा रहा।

एमके रैना
महाराज कृष्णा रैना का जन्म 1948 में श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर में हुआ था। इन्होंने अपनी पढ़ाई श्रीनगर से पूरी की। इसके बाद राष्टÑीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) आ गए। करीब तेरह भाषाओं में एक सौ तीस नाटकों की रचना करने के साथ कई हिंदी फिल्मों में अहम भूमिका निभाई। एक रुका हुआ फैसला, तारे जमीन पर, रब ने बना दी जोड़ी जैसी फिल्मों के लिए जान और हाल में कई फिल्म उत्सवों में तारीफें बटोर चुकी ‘तीन और आधा’ में इनकी भूमिका थी। रैना नाटकों में प्रयोगधर्मिता के लिए जाने जाते हैं। सांस्कृतिक आंदोलनों में इनकी मुखर भागीदारी रही है।

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