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बारादरीः सकारात्मक बदलाव की शुरुआत है मीटू

जो एनपीए हुआ, वह भाजपा के शासन में नहीं हुआ, वह कांग्रेस की सरकार करके गई। पेट्रोल और डीजल के दाम भाजपा सरकार की वजह से नहीं बढ़े हैं, अंतरराष्ट्रीय एजंसियों की वजह से बढ़े हैं। जब दुनिया भर की मुद्रा में गिरावट आ रही है, तो रुपया भी गिरा है, पर दूसरे देशों के मुकाबले कम गिरा है।

नई दिल्ली से सांसद और भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता मीनाक्षी लेखी का मानना है कि हैशटैग मीटू मुहिम का सकारात्मक असर पड़ेगा।

नई दिल्ली से सांसद और भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता मीनाक्षी लेखी का मानना है कि हैशटैग मीटू मुहिम का सकारात्मक असर पड़ेगा। इस संवेदनशील मुद्दे को सावधानी से लेना होगा और यह भी नहीं मान लेना होगा कि यह सारी समस्याओं का अंत कर देगा। भाजपा नेता ने कहा कि अच्छी बात है कि जिन मुद्दों को ढक दिया जाता था उन पर बात शुरू हुई है। हमें कार्यस्थलों को यौन उत्पीड़न से मुक्त बनाकर महिलाओं को बेखौफ और बराबरी का माहौल देना ही होगा। कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

मनोज मिश्र : ‘मीटू’ मुहिम ने राजनीति पर भी असर डाला है क्या?

मीनाक्षी लेखी : नहीं पड़ा है, तो पड़ जाना चाहिए। यह बहुत गंभीर बात है। यह एक सच्चाई भी है। दूसरी बात कि राजनीति से पहले, यह आपके पेशे से जुड़े लोगों के खिलाफ आया है। मीडिया वालों के खिलाफ, जो पूरी दुनिया को ज्ञान बांटते हैं। इसमें ऐसे ऐसे नाम जुड़े हुए हैं, जिनका पूरा ब्योरा अभी मेरे सामने नहीं आया है। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न उन महिलाओं पर बहुत गलत असर डालता है, जो अपने दम पर कुछ करना चाहती हैं। अगर महिलाएं डरी रहें, पूरी ईमानदारी से अपने काम को न कर पाएं या उन्हें कहीं समझौता करना पड़े तो यह उनके काम की क्षमता प्रभावित करता है। दूसरा पक्ष यह है कि समाज में ऐसी भी धारणा बन जाती है कि अगर आपको कुछ बनना है, आगे बढ़ना है, तो आप अपनी सेक्सुअलिटी का इस्तेमाल करके आगे बढ़ सकते हैं। तो, यह महिलाओं के खिलाफ जाता है, क्योंकि जो महिलाएं अपनी बुद्धि, कौशल के बल पर आगे बढ़ना चाहती हैं, उन्हें लगता है कि हम पिछड़ जाएंगी।

हो सकता है कि कुछ महिलाएं काबिल न होते हुए भी इस तरह आगे बढ़ना पसंद करें। इसलिए अगर हम क्षमतावान समाज बनाना चाहते हैं, जहां पर व्यक्ति की क्षमता आधार हो आगे बढ़ने के लिए, तो यह मानसिकता आड़े आती है। इसलिए इसके भी खिलाफ आवाज उठनी चाहिए। मुझे कहीं न कहीं लगता है कि यह जो कुछ हो रहा है, इसके बारे में सबको जानकारी थी, पर सबके मुंह पर ताला था। वह सामने आ रहा है, तो यह अच्छी बात है। पर यह संवेदनशील मसला है और इसे संवेदनशीलता के साथ ही हल किया जाना चाहिए। ऐसा न हो कि बहुत सारे सही लोग भी लपेटे में आ जाएं। मैं तो महिलाओं से यही कहती हूं कि जब भी उनके साथ ऐसा कुछ हो, तो वे उसके बारे में उसी वक्त बताएं, आवाज उठाएं। मगर जो बातें इतनी पुरानी हैं, उससे आप यह भी अंदाजा लगा सकते हैं कि उन महिलाओं ने इतने सालों तक अपने भीतर उस पीड़ा को झेला होगा। उनका मन कितना दुखी रहा होगा। इस अभियान के बाद यह तो हुआ है कि अब महिलाओं की अस्मिता रेखांकित हुई है। इस तरह यह एक सकारात्मक बदलाव है।

मुकेश भारद्वाज : इन मामलों की कानूनी स्तर पर छानबीन कैसे हो पाएगी?

अभी तक किसी महिला ने एफआइआर तो किया नहीं है। और इसमें छानबीन के जो तरीके होते हैं, वे अलग होते हैं। एक तो संस्थानों में प्रशासनिक स्तर पर समितियों की सुनवाई को देखना पड़ता है। उसकी गवाही में कहीं कोई झूठ तो नहीं है। वह जो बातें कह रही है, सब ठीकठाक हैं, उनमें कोई गड़बड़ी नहीं है। आपराधिक मामलों की छानबीन अलग होती है। ऐसे मामलों की सच्चाई तक पहुंचना बहुत जरूरी होता है। हर मामले को स्वतंत्र रूप में देखना पड़ेगा, क्योंकि इसमें कई बार पुरुष ही नहीं, महिला भी दोषी हो सकती हैं। ‘मीटू’ में एक चीज हुई है कि कारपेट के नीचे डाल दिए गए मुद्दों पर बात होने लगी है। पर मीटू ही काफी नहीं है। जब तक कार्यस्थलों पर मान-सम्मान नहीं मिलना शुरू होगा, तब तक इस समस्या का अंत नहीं होगा।

अजय पांडेय : मीटू मध्य वर्ग या उच्च मध्यवर्ग का मामला है, पर दिल्ली इससे बड़ी समस्या से जूझ रही है। महिलाओं के खिलाफ अपराध लगातार बढ़ रहे हैं, बलात्कार की घटनाएं हो रही हैं। इसे कैसे हल किया जा सकता है?

मेरे लिए गंभीरता दोनों विषयों की है। बलात्कार होता है, तो वह बहुत बड़ी खबर होती है, लेकिन ‘मीटू’ जैसी घटनाएं हर महिला के जीवन में किसी न किसी स्तर पर हुई होती हैं। यह उनके मौलिक अधिकारों के खिलाफ है, लेकिन उस विषय पर कोई बात ही नहीं करता। अगर पढ़े-लिखे, संपन्न समाज के अंदर ऐसी घटनाएं हो रही हैं, तो जो तबका आर्थिक रूप से कमजोर है, जैसे कोई घरेलू सहायिका है, उसके साथ ऐसी घटना होती है, तो उसे हम कैसे कम करके आंक सकते हैं। उसके साथ बलात्कार ही नहीं हुआ, बाकी सब कुछ तो हो गया न! इसलिए दोनों ही समस्याएं गंभीर हैं। यह मानसिकता का सवाल है। उस मानसिकता को खत्म करना होगा। कोई भी व्यक्ति अचानक बलात्कारी नहीं बन जाता, वह उसके पहले कई बार छेड़छाड़ कर चुका होता है। और जब हम उसे खुला छोड़ देते हैं, तो वह बलात्कारी बनता है। इसलिए छेड़छाड़ के खिलाफ भी बात होनी चाहिए, फिर बलात्कार के बारे में बात कर सकते हैं। महिलाओं की असुरक्षा के अनेक कारण हैं, उन्हें भी सुलझाया जाना चाहिए। जब हम सिर्फ बलात्कार की बात करते हैं, तो बाकी चीजों को हटा देते हैं, जो गलत है। जब तक मानसिकता को बदलने का प्रयास नहीं होगा, ऐसी घटनाओं पर रोक लगाना मुश्किल बना रहेगा।

दीपक रस्तोगी : एमजे अकबर मामले के संदर्भ में ऐसा क्यों हुआ कि उनके खिलाफ फैसला करने में सरकार को कई दिन लग गए?

इसके समांतर मैं आपको एक उदाहरण देती हूं। एनएसयूआई के एक अध्यक्ष के खिलाफ उसी के साथ काम करने वाली एक लड़की ने दो-तीन महीने पहले मामला दर्ज कराया। इतने दिन तक वह खबर कहीं छपी भी नहीं। उस पर अब जाकर कार्रवाई हुई है। जबकि वह मामला तो ताजा-ताजा था, उसमें कोई झूठ-फरेब भी नहीं था। पर अब ये सब मामले हैं दस-बीस साल पुराने। फिर मंत्री दिल्ली में नहीं थे। इसलिए तीन-चार दिन निकल गए। वापस आने के बाद उन्होंने कहा कि यह सब झूठ है। फिर कहा कि मुकदमा दर्ज कराएंगे। तो ऐसे में पार्टी को निर्णय करने में दिक्कत आई। वह उनका व्यक्तिगत मामला था, उसमें पार्टी कर भी क्या सकती थी। मगर जब लगा कि यहां तो बहुत सारी महिलाओं का नाम आया है, तो पार्टी को लगा कि किसी के व्यक्तिगत मामले को अपने सिर पर क्यों लेना चाहिए। फिर सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय ने इसमें हस्तक्षेप किया और यह निर्णय किया गया।

मृणाल वल्लरी : महिला उत्पीड़न के मामले में प्राय: राजनीतिक टालमटोल ही दिखाई देती रही है। ‘मीटू’ अभियान के बाद क्या अब राजनीतिक दल खुद को महिला समर्थक दिखाने और महिलाओं को वोट बैंक बनाने का प्रयास करेंगे?

अब महिलाओं को तवज्जो दी जाने लगी है। अगर महिलाओं को तवज्जो नहीं दी जाती तो हमारी सरकार में जितनी भी योजनाएं हैं, चाहे मातृत्व योजना हो, छब्बीस हफ्ते की छुट्टी बढ़ाने की बात हो, चाहे गर्भावस्था के दौरान उन्हें लाभ पहुंचाने की बात हो, चाहे प्रधानमंत्री आवास योजना हो जिसमें महिलाओं को घर दिए गए, फिर मुद्रा बैंक में सत्तर प्रतिशत लाभ महिलाओं को मिला है, उज्ज्वला योजना का लाभ भी महिलाओं को मिला है। अगर महिलाओं को तवज्जो न दी जाती, तो यह सब काम इतने योजनाबद्ध तरीके से कैसे होता। महिलाओं को लेकर एक सोच है सरकार के दिमाग में। एक महिला को मजबूत कर पूरे परिवार को मजबूत किया जा सकता है। महिला अपने आप में एक बड़ा वर्ग है और उसे गिनती से बाहर नहीं रखा जा सकता। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह बात समझ में आ गई है, इसीलिए उनकी जितनी भी योजनाएं हैं, उनका फोकस स्त्रियों पर है।

आर्येंद्र उपाध्याय : मगर अभी तक महिला आरक्षण विधेयक पास क्यों नहीं हो पा रहा?

मैं इस मामले में अपना व्यक्तिगत पक्ष दे रही हूं। मैं पूछती हूं कि आप मुझे कम क्यों आंक रहे हैं। मैं दो पुरुषों को हरा कर यहां आई हूं। जहां तक महिला आरक्षण की बात है, नरेंद्र मोदी जी इस विधेयक की अहमियत को समझते हैं। उन्होंने तो 2010 में ही गुजरात विधानसभा में यह विधेयक पारित करके राष्ट्रपति को भेज दिया था। तो यह जब भी होगा, पर होगा। फिर मेरा मानना है कि केवल तैंतीस फीसद सीटें आरक्षित करके बराबरी हासिल नहीं कर सकते। राजनीतिक दलों द्वारा तैंतीस फीसद टिकट महिलाओं को देकर हम वह बराबरी हासिल कर सकते हैं। इस तरह पार्टियों की भी बाध्यता होगी कि वे महिलाओं को टिकट दें, नहीं तो इनकी बीवी, उनकी बेटी को टिकट देकर संसद में भेजने का प्रयास करते रहेंगे। जो काबिल महिला अपनी क्षमता के आधार पर अपनी जगह बनाना चाहती हो, उसे बस एक मौके की जरूरत होती है। वह मौका देना जरूरी है। दो महिलाएं एक-दूसरे खिलाफ खड़ी होकर चुनाव लड़ें, यह आवश्यक नहीं है। तो, तैंतीस फीसद सीटें आरक्षित न करें, हर पार्टी तैंतीस फीसद टिकट महिलाओं को दे। जो पार्टी ऐसा नहीं करती, उसका चुनाव चिह्न ले लेना चाहिए।

मनोज मिश्र : साढ़े चार साल का कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद भी अगर सरकार कहती है कि पुरानी सरकार या विपक्ष के लोग हमें काम नहीं करने दे रहे, तो यह कहां तक ठीक बात है?

ऐसा हमने कब कहा? हां, इसे मैं दूसरे तरीके से कह सकती हूं कि अगर हमें दूसरे लोगों का सहयोग मिले, तो मैं और बेहतर काम कर सकती हूं। एक सांसद के नाते मैंने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया है, पर कई बार अधिकारियों और दिल्ली सरकार का अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाता। तो, कई बार दूसरे लोगों का सहयोग न मिल पाने की वजह से कई काम नहीं हो पाते। अगर आपसी सहयोग मिले तो बहुत सारे काम बेहतर तरीके से हो सकते हैं, पर जब आप व्यक्तिगत मतभेद को राजनीतिक मनभेद बना कर चलेंगे, तो कैसे काम होगा!

सूर्यनाथ सिंह : एक आरोप है कि सरकार तमाम संस्थाओं को अपने प्रभाव में लेकर काम कर रही है। न्यायपालिका पर भी उसका दबाव है। इस तरह लोकतंत्र कहां तक सुरक्षित रह पाएगा?

यह आरोप गलत है। इन संस्थाओं में जो लोग बैठे हुए हैं, वे सब पहले की सरकार के समय के बिठाए हुए हैं। इसलिए अगर वे प्रभाव में होंगे, तो पूर्व सरकार के प्रभाव में होंगे। सुप्रीम कोर्ट के जजों ने इसके पहले प्रेस कान्फ्रेंस क्यों नहीं की? कोलेजियम प्रणाली क्यों आई? उसे क्यों लाना पड़ा? अस्सी के दशक में किस तरह से न्यायपालिका का गला घोंटा जा रहा था, छिपी बात तो नहीं है। दुनिया में कहीं ऐसा नहीं है कि जज खुद जजों की नियुक्ति करते हैं। तो, यह सब सरकार के प्रभाव में कैसे हुआ? कौन-सा ऐसा फैसला हुआ, जो सरकार के प्रभाव में हुआ? यह गलत माहौल बनाया जा रहा है उन लोगों द्वारा, जिन्होंने इन लोगों की नियुक्ति की।

मृणाल वल्लरी : चुनाव आयोग को लेकर भी आरोप लग रहा है कि वह सरकार के प्रभाव में काम कर रहा है। जैसे प्रधानमंत्री की रैली को टीवी पर दिखाए जाने के लिए पांच राज्यों में चुनाव की तारीखों की घोषणा का समय बदल दिया।

’प्रधानमंत्री की रैली को टीवी पर चलाने से क्या हो गया? चुनाव आयोग उसी समय प्रेस कान्फ्रेंस करता, जब प्रधानमंत्री की रैली चल रही थी, तो उसे कोई नहीं दिखाता। यह सरकार के प्रभाव में कैसे हो गया? चुनाव आयोग को पता है कि जिस वक्त प्रधानमंत्री की रैली चल रही है, उस वक्त उसकी प्रेस कान्फ्रेंस को कोई नहीं सुनेगा।

सूर्यनाथ सिंह : भाजपा का निरंतर प्रचार चलता रहा है, पर देखा यह जाता है कि हर समय राहुल गांधी को लक्ष्य बना कर बातें की जाती हैं। क्या इससे ऐसा नहीं लगता कि आप उन्हें ज्यादा महत्त्व दे रहे हैं या उनसे डर रहे हैं?

राजनीति में आप निशाना तब बनते हैं, जब आप खुद को प्रोजेक्ट करते हैं। जैसे ही आप किसी व्यक्ति को किसी कुर्सी के साथ जोड़ देते हैं, तो वह निशाने पर आ जाता है। तो, यह लक्ष्य हमने नहीं बनाया है, कांग्रेस ने बनाया है। कांग्रेस ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है। आप प्रधानमंत्री का उम्मीदवार किसी को भी घोषित करेंगे, तो वह लक्ष्य पर होगा ही। मुकाबला ऐसे ही होता है। उन्हें हमारे खिलाफ लक्ष्य बनाया गया है। तो, जो हमारे खिलाफ लक्ष्य होगा, उस पर निशाना तो हम साधेंगे न?

मनोज मिश्र : एनडीए के घटक दल कम होते जा रहे हैं, इसका कितना असर पड़ेगा?

यह राजनीति है। अभी सीटें बंटनी हैं। अभी कौन साथ होगा, कौन नहीं, कहना ठीक नहीं।

सूर्यनाथ सिंह : ऐसा क्या हुआ कि अर्थव्यवस्था को संभाल पाने में सरकार विफल साबित हुई?

आपको कहां से लगता है कि हमसे अर्थव्यवस्था को संभालने में चूक हुई है। महंगाई कम हुई है। हम फ्रांस को हटा कर दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए। अर्थव्यवस्था खराब थी तो कैसे बन गए? विश्वबैंक आपको प्रमाणपत्र दे रहा है, तो इसलिए कि आपकी अर्थव्यवस्था खराब थी? आप भूल गए उन बुरे दिनों को?

अजय पांडेय : महंगाई बढ़ी है, रुपए की कीमत गिर रही है, बैंकों में घोटाले हुए हैं। इन सबके बावजूद लोग क्यों भाजपा को वोट दें?

जो एनपीए हुआ, वह भाजपा के शासन में नहीं हुआ, वह कांग्रेस की सरकार करके गई। पेट्रोल और डीजल के दाम भाजपा सरकार की वजह से नहीं बढ़े हैं, अंतरराष्ट्रीय एजंसियों की वजह से बढ़े हैं। जब दुनिया भर की मुद्रा में गिरावट आ रही है, तो रुपया भी गिरा है, पर दूसरे देशों के मुकाबले कम गिरा है। आपको यह मानना होगा कि जब अर्थव्यवस्था को डॉलर तय कर रहा है, तो रुपए की गिरती कीमत के लिए भारत सरकार नहीं, अमेरिका सरकार जिम्मेदार है।

मीनाक्षी लेखी

मीनाक्षी लेखी का जन्म राजनीतिक पृष्ठभूमि के परिवार में 30 अप्रैल 1967 को हुआ। दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की शिक्षा हासिल करने के बाद वकालत के क्षेत्र में पहचान बनाई। दिल्ली में लॉटरी पर प्रतिबंध और शांतिमुकुंद बलात्कार मामलों की सुनवाई के दौरान जाना-पहचाना नाम बनीं। महिला आरक्षण बिल और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की समस्याओं जैसे मामलों में ड्राफ्टिंग समिति की सदस्य रहीं। मानवाधिकार और जेंडर प्रशिक्षण कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी निभाती हैं। इस वक्त नई दिल्ली की सांसद हैं और भाजपा की वरिष्ठ नेता के तौर पर विभिन्न मंचों पर पार्टी का पक्ष मजबूती से रखती हैं।

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