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बारादरीः चिंता है तो बचा लेंगे लोक संस्कृति को

हमारी फितरत है कि ध्वनि हमें आकर्षित करती है। जितने मन से उस जमाने में लोगों ने पाश्चात्य धुनों पर आधारित गीतों को सुना, उतने ही मन से ‘सुन मेरे बंधु रे, सुन मेरे मितवा’ जैसे गीतों को भी सुना। तो, लोगों ने लोक धुनों को भी पसंद किया, पाश्चात्य को भी पसंद किया। इसलिए मुझे नहीं लगता कि आज जो दर्शक-श्रोता पाश्चात्य गाने सुन रहा है, वह लोकगीत नहीं सुनेगा।

लोक गायिका और संस्कृतिकर्मी मालिनी अवस्थी का मानना है कि अगर हम अपनी लोक संस्कृति की चिंता कर रहे हैं, तो यकीनन इसे बचा भी लेंगे। उन्होंने कहा कि आज घरों में बच्चों को लोक से दूर कर दिया जाता है, फिर हम यह उम्मीद कैसे कर लें कि वे बड़े होकर लोकतत्त्व को समझ पाएंगे या उसे आगे बढ़ाएंगे। लोक के साथ तादात्म्य बिठाएंगे, उसे अपने जीवन में जगह देंगे तभी संस्कृति के साथ लोक भी आगे बढ़ेगा। बातचीत का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

मनोज मिश्र : अभी जिस तरह पश्चिमी संस्कृति हावी हो रही है, उसमें आपको लोक गायन और लोकभाषा का कैसा भविष्य दिखता है?

मालिनी अवस्थी : मुझे तो बहुत सुखद और सकारात्मक दिख रहा है आज की तारीख में। आज चिंता जाग गई है कि समेटना है, सहेजना है। यह अपने आप में सुखद है। चिंता है, तो हम बचा लेंगे। अभी भी एक पीढ़ी है हमारे पास, जिससे हम ले सकते हैं। जहां तक पश्चिमी संगीत की बात है, तो मुझे नहीं लगता कि उससे कभी भी लोकसंगीत की सेहत पर कोई असर पड़ा है। कभी नहीं पड़ सकता, क्योंकि वह हमेशा से सहअस्तित्व में रही है। संगीत में हर तरह का संगीत हमेशा रहा है। आज चूंकि दिखने लगा है, इसलिए हम लोगों को लगता है कि बहुत तेज संक्रमण हो रहा है। लेकिन अगर आप देखें तो हमारे माता-पिता के जमाने में भी जब लोग सहगल और सुरैया को सुनते थे, तब जब ओ गोरे गोरे ओ बांके छोरे… या मेरा नाम चिन चिन चू…, इना मीना डिका… वगैरह गाने आए होंगे- सन पचास-साठ के दशक में, तो लोगों ने उन्हें सुना होगा। ये गाने उस दौर में सुपरहिट हुए। हालांकि तब हमारा समाज बहुत कंजर्वेटिव था, लोग थोड़े संयम में रहते थे, फिल्में भी बहुत कम देखी जाती थीं, लेकिन जब भी ऐसे गाने आए, तो सब हिट हुए। दरअसल, हमारी फितरत है कि ध्वनि हमें आकर्षित करती है। जितने मन से उस जमाने में लोगों ने पाश्चात्य धुनों पर आधारित गीतों को सुना, उतने ही मन से सुन मेरे बंधु रे, सुन मेरे मितवा जैसे गीतों को भी सुना। तो, लोगों ने लोक धुनों को भी पसंद किया, पाश्चात्य को भी पसंद किया। इसलिए मुझे नहीं लगता कि आज जो दर्शक-श्रोता पाश्चात्य गाने सुन रहा है, वह लोकगीत नहीं सुनेगा। मगर तकलीफ इस बात की है कि हमने सुनना बंद कर दिया है, अपने बच्चों को सुनाना बंद कर दिया है। लोग युवा पीढ़ी को दोष देते हैं, पर मुझे लगता है कि माता-पिता ने खुद उन्हें लोक से अलग कर दिया, तो उसमें उनका क्या दोष!

प्रतिभा शुक्ल : लोकगीतों का श्रम से भी संबंध रहा है। क्या श्रम का रूप बदला है, इसलिए लोकगीत भी कम हुए हैं?

लोकगीत दरअसल, श्रमगीत या जीवनशैली के गीत हैं। जीवन के गीत हैं। सुबह उठ कर अगर आप जांता पीस रहे हैं, तो जंतसार गाएंगे। रोपनी कर रहे हैं, रोपनी गाएंगे। सबसे बड़ी बात, आज जो इतने तरह के तनाव बढ़ रहे हैं जीवन में, अपने सुख-दुख आदि को कहना और बांटना मानवीय गुण है, इन्हीं को साझा करने के लिए लोकगीत बने थे। और इस तरह बने थे कि अगर एक ने अपना दुख कहा, तो वह सबका दुख बन जाता था, साझा दुख बन जाता था, सामाजिक दुख बन जाता था। यानी उसमें दुख निजी न होकर सार्वजनिक बन जाता है। वे लोग ऐसा कर पाते थे, इसीलिए वहां कोई तनाव नहीं था, कोई अवसाद नहीं था। आज तो लोगों में इतना अहंकार है कि वे अपना दुख भी साझा नहीं कर पाते। शारीरिक दुख तो दूर, मन का दुख बढ़ रहा है, क्योंकि मन का फैलाव नहीं है।

मृणाल वल्लरी : प्रयोगधर्मिता के बजाय पूर्वांचल के लोकसंस्कृतिकर्मी संरक्षणवाद पर जोर दे रहे हैं। इसे काल सापेक्ष बना कर आधुनिक विमर्शों से जोड़ने की कोशिश कम ही दिखती है। आप इसे कैसे देखती हैं?

जब भी आप कुछ सचेष्ट लाने का प्रयास करते हैं कि ऐसा नहीं ऐसा होना चाहिए, तो उसका मूल स्वरूप कहीं न कहीं विकृत होता है। आज भी ऐसे अनेक गाने हैं, जिनमें स्त्री शोषित नहीं दिखती। यह नजर-नजर का फर्क है। हमारे यहां जानबूझ कर उस समय के गानों में भी औरत की ऐसी छवि पेश की गई है। कोई कहे कि एक संयुक्त परिवार में रहने वाली स्त्री स्वतंत्र नहीं थी, तो मैं कहूंगी कि उस परिवार में वही स्त्री धुरी भी थी। घर की मालकिन वही होती थी। जो लोग गांवों से जुड़े हैं, वे जानते होंगे कि अगर दादी की मर्जी न हो तो किसी लड़के की हिम्मत नहीं होती कि वह घर की ड्योढ़ी लांघ सके। पहले की बहुत सारी औरतें ऐसी होती थीं। घरों में मर्द सारा पैसा औरतों को देते थे और वही घर का खर्च चलाती थीं। इसलिए जब हम गाने देखते हैं, तो उसमें मुझे स्त्री बहुत सशक्त दिखाई देती है। जैसे रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे… गीत में आप कहेंगे कि स्त्री विरहन है। यह है भी वियोग का गीत। पर मेरा मानना है कि पूरी भारतीय संस्कृति में जिसने-जिसने प्रतीक्षा की, एकाकीपन में समय बिताया उन सबको हमने ऋषि-मुनि का दर्जा दिया। तो स्त्री को उनसे अलग क्यों करते हैं। जो स्त्रियां बारह-बारह बरस तक प्रतीक्षा करती रहीं, वे किसी तपस्विनी से कम हैं क्या! वे बहुत सशक्त स्त्रियां हैं।

अजय पांडेय : क्या आप मानती हैं कि आज की सूचना क्रांति ने लोकपक्ष से वियोग का तत्त्व कुछ कम किया है?

सिर्फ वियोग लोक का सशक्त स्वर नहीं है। उसमें तो सारे नौ रस दिखते हैं। पूरा जीवन दिखता है। वहां वियोग से ज्यादा उत्सव दिखता है। वियोग को भी उत्सव की तरह मनाया जाता है। और, जिस सूचना तकनीक की आप बात कर रहे हैं, वह तो अब गानों में आ गई है। मोबाइल फोन गानों में आ गया है। पहले चिट्ठी और तार का जिक्र होता था, अब मोबाइल का होने लगा है। लोक में यथार्थ आता है।

मीना : आपने अपने घरेलू दायित्व और गायन के बीच किस तरह तालमेल बिठाया?

मुझे लगता है कि मनुष्य वही कर पाता है, वही बन पाता है, जो वास्तव में वह होता है या जिन मूल्यों में विश्वास करता है। मैं बहुत पारंपरिक परिवार से हूं। मैं परिवार की इकाई में बहुत विश्वास करती हूं। मैं पांच-छह बरस की थी, तबसे गा रही हूं। मेरे परिवार ने मुझे गाना सीखने दिया। हालांकि संगीत छूटने की जो जो संभावनाएं हो सकती थीं, वह सब मेरे साथ हुआ, उसके बावजूद अगर वह चलता रहा, तो यह प्रभु की कृपा रही होगी। छोटी उम्र में शादी हो गई। पति नौकरशाह थे। लोगों में कई तरह के पूर्वग्रह थे। इस तरह मेरे ऊपर परिवार, पति, बच्चों वगैरह का दायित्व था। पर मैंने उसी में से अपने लिए रास्ता निकाला।

सूर्यनाथ सिंह : आपने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली, पर लोकगीतों की तरफ कैसे मुड़ गर्इं?

इसके पीछे दो कारण थे। बचपन के आठ साल मेरे मीरजापुर में बीते। तब मीरजापुर का माहौल बहुत संगीतमय हुआ करता था। पिताजी, संगीत के कार्यक्रमों में ले जाया करते थे। पूरब अंग का संगीत होता था। तो शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ मुझे वहां की बोली बहुत अच्छी लगती थी। उसके शब्द बहुत अच्छे लगते थे। फिर मैं शास्त्रीय संगीत सीख रही थी, तो चिंतन चलता रहता था। तो जब लखनऊ में मैं भातखंडे में सीखने गई, तो मैंने देखा कि सारी बंदिशें ब्रज, अवधी या काशिका में हैं। तो मुझे लगा कि संगीत का जो मूल स्वरूप है, उसे उठाना चाहिए। यानी लोक को। फिर यह भी था कि मुझे लगा, लोगों ने लोक साहित्य को ठीक से पढ़ा नहीं है, उसे सामने लेकर नहीं आए हैं, तो उसे सामने लाया जाना चाहिए। फिर मुझे लगा कि खयाल, ठुमरी, गजल वगैरह को तो लोक करते रहे हैं, करते रहेंगे। फिर यह भी कि शास्त्रीय में हम लोक को ठीक से अभिव्यक्त नहीं कर पाते। इसलिए मैंने तय किया कि मैं लोक करूंगी। हालांकि आलोचना भी बहुत हुई। लोगों को लगा कि मैं नीचे आ गई। पर मुझे लगा कि यही असली श्रोता समाज है।

मुकेश भारद्वाज : आज लोक की पहचान बालीवुड बन गया है। ऐसे में आप लोक को उसके वास्तविक रूप में कैसे लोगों तक पहुंचा पाएंगी?

दिक्कत यही है कि जो अधकचरी जानकारी के साथ आ रहा है, उसे काम मिल रहा है, शोहरत मिल रही है। अब लोगों को तालीम की फिक्र नहीं है। लोकगीतों को लेकर फिल्मों में इतना शानदार काम हुआ है अतीत में कि उसे बयान नहीं किया जा सकता। यह इसलिए हुआ कि उस वक्त संगीत देने वाले बेजोड़ लोग थे। उस जमाने में नागिन फिल्म के लिए हेमंत कुमार ने कहा कि बीन के लिए धुन चाहिए, कहां से मिलेगा। हमारे बंगाल में तो होता नहीं। तो उनके सहयोगी मास्टर संपत ने कहा कि हमारे यहां तो संपेरों की पूरी बस्ती है। तो वे ट्रेन से उन्नाव आए और संपेरों की बस्ती में जाकर उनसे दस धुनें लेकर आए। तो, इस तरह उन दिनों संगीतकार पूरी मेहनत करते थे, गुणी लोगों की मदद लेते थे। आप बेगम अख्तर और मदनमोहन जी की खतो-किताबत पढ़ें तो पता चलेगा कि उस समय के संगीतकार कितनी मेहनत करते थे धुनें बनाने में। मदनमोहन जी महीने-महीने के लिए लखनऊ जाया करते थे और वहां बाजा बनाने वालों के साथ बैठ कर चीजें सीखते थे। नौशाद साहब जब तक चलने-फिरने लायक थे, हर साल लखनऊ जाते थे और वहां से लोकधुन लेकर आते थे। इस तरह उनके गानों में पूरा अवध बोलता है। मगर आजकल जो मशीन पर धुनें बन रही हैं, उसमें तरह-तरह की मिलावट होती है। हालांकि तब लोकधुनों पर आधारित गीत इसलिए भी बनते थे कि तब फिल्में भी गांवों पर बनती थीं। नायक भी गांव का होता था। अब मेट्रो शहरों की कथाएं हो गई हैं। पर आज भी जब गांव की पृष्ठभूमि पर फिल्में बनती हैं, तो उसमें लोकधुनों का इस्तेमाल होता है। पर कुछ उदाहरणों को छोड़ कर लोक का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा। बस एक आइटम गाना बनाने की मंशा से जब लोक का इस्तेमाल होगा, तो गड़बड़ होगी ही। आइटम में लोक को बदलना ठीक नहीं है।

दीपक रस्तोगी : पूरब के लोकसंगीत की तुलना में पंजाब और राजस्थान का लोकसंगीत ज्यादा लोकप्रिय है। इसकी क्या वजह है?

’पहली बात तो, मैं इस बात से बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखती। पंजाब का लोकसंगीत तो अब पॉप म्यूजिक के रूप में दिखता है। वहां लोकसंगीत नहीं है। बहुत संकट है वहां पर। अब वहां विशुद्ध लोक गाने वाले रह नहीं गए हैं। सिर्फ राजस्थान एक मिसाल है, जहां का संगीत अपने मूल स्वरूप में विदेश तक गया है। विदेशी पर्यटकों के लिए भारतीय लोकसंगीत का मतलब राजस्थान की मांगंड्यार गायकी है। इसकी बड़ी वजह है कि वहां लोकसंगीत चूंकि खून में है, गुरु-श्ष्यि परंपरा के रूप में आगे बढ़ती है, इसलिए वहां पर कलाकारों का खजाना है। मगर अब हमारे यहां वह परंपरा नहीं रही। गुरु-शिष्य परंपरा खत्म हो गई। अब हमारे यहां रिकॉर्डेड म्यूजिक का चलन बढ़ा है। कैसे भी एक कैसेट या सीडी निकलवा कर कलाकार बन जाते हैं। ऐसे में गुणवत्ता गिरी है। गंभीरता खत्म हुई है। राजस्थानी मांगंड्यार में यह प्रवृत्ति नहीं दिखेगी। इसलिए इस बात का संतोष है कि उन्होंने अपने लोकसंगीत को बचा कर रखा है। उन्हें संरक्षण भी मिला है, होटल वालों का। इस तरह उनकी आमदनी भी हो रही है।

सूर्यनाथ सिंह : आज पारंपरिक लोकवाद्य खत्म हो रहे हैं। हर लोकगायक इलेक्ट्रिक की-बोर्ड और गिटार, बैंजो जैसे कर्कश वाद्य यंत्रों पर गाता मिल जाता है। लोकवाद्यों को बचाने की कोई चिंता क्यों नहीं दिखती?

एक वक्त था, जब हम शास्त्रीय गायन में हारमोनियम रखते थे, तो बड़ी अलोचना होती थी। पर आज हर कोई हारमोनियम रख रहा है, तो माना जा रहा है कि वह शास्त्रीय परंपरा का निर्वाह कर रहा है। बहुत समय तक हम भी नहीं सोच पाते थे कि लोक गायन में पाश्चात्य वाद्य यंत्र कैसे इस्तेमाल करेंगे। अब भी बहुत सारे कार्यक्रमों में पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ ही गाते हैं। लेकिन जहां बड़ी भीड़ के सामने गाना होता है, वहां हम ध्यान रखते हैं कि हमें एक अठारह साल के लड़के को भी सुनाना है। क्योंकि हमारा उद्देश्य होता है कि नए लड़कों में भी लोक के प्रति रुचि पैदा करें, बिना विषय-वस्तु के साथ समझौता किए, बिना स्तर को गिराए।

अजय पांडेय : आज लोक बाजार के हाथों में जाकर वीभत्स रूप लेता जा रहा है। क्या कभी आपके मन में ऐसा विचार आया कि कोई ऐसी संस्था बनाएं, जो लोक संगीत को सहेजे?

यह चिंता तो मेरे मन में उसी वक्त आ गई थी, जब मैंने मंचों से सिर्फ लोकगीत गाना शुरू किया। उस समय मंचों पर लोग ऐसे-ऐसे गीत सुना कर जाते थे कि क्या कहें! तब मैंने सोचा था कि इसके लिए आंदोलन, हस्ताक्षर अभियान, प्रेस कान्फ्रेंस आदि करने से ये चीजें नहीं खत्म होंगी। यह सिर्फ बड़ी लकीर खींचने से जाएगी। मैंने अंततोगत्वा यह सिद्ध किया कि मंच पर तीन घंटे तक बिना स्तर गिराए लोगों को बांधे रखा जा सकता है, उन्हें नचाया जा सकता है। मैंने अपनी साफ-सुथरी गायकी से संगीत के मूल स्वरूप को बचाए रखने का प्रयास किया। कलाकार इसे समझते ही नहीं।

मालिनी अवस्थी – उत्तर प्रदेश के कन्नौज में 11 फरवरी, 1967 को जन्म हुआ। लखनऊ के भातखंडे संगीत संस्थान से संगीत और लखनऊ विश्वविद्यालय से संस्कृत की शिक्षा हासिल की। बनारस की मकबूल गायिका गिरिजा देवी की भी शिष्या रहीं। अवधी, बुंदेली, भोजपुरी में लोक गायन को नया मुकाम दिया। कला और संस्कृति के क्षेत्र में महत्त्वूर्ण योगदान के लिए 2016 में वे पद्म श्री से सम्मानित हुर्इं। ठुमरी, कजरी आदि विधाओं में मजबूत दखल रखते हुए मंचीय गायन में एक अलग पहचान बनाई। लोकसंगीत के साथ लोक साहित्य की भी गहरी अध्येता रही हैं और इनका मानना है कि भोजपुरी और अन्य लोकगीतों में बिना अश्लीलता का सहारा लिए श्रोताओं को मंच से बांधे रखा जा सकता है।

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