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जनसत्ता बारादरी: विपक्ष को संघर्ष की दिशा दे रहा है वाम

सीताराम येचुरी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के महासचिव और पोलित ब्यूरो के नेता हैं, उनका जन्म 12 अगस्त, 1952 को चेन्नई में एक तेलुगुभाषी परिवार में हुआ। दसवीं कक्षा तक हैदराबाद में पढ़ाई, सेंट स्टीफेंस कॉलेज से अर्थशास्त्र में स्नातक और जेएनयू से परास्नातक किया। आपातकाल के दौरान जेल गए, फिर जनवादी आंदालनों के साथ जुड़ते गए। 19 अप्रैल, 2015 को माकपा के महासचिव के रूप में निर्वाचित किए गए। वाम नेताओं में वैसा चेहरा, जो विपक्ष के संघर्ष की राह में सर्वमान्य हैं। खासतौर पर 2014 के बाद देश के बड़े जनांदोलनों में वाम से जुड़े संगठनों की मेहनत देखी जा सकती है। इसकी अगुआई करते येचुरी सफल साबित हो रहे हैं।

येचुरी ने कहा कि देश में हालात आपातकाल से भी बुरे हैं।(फाइल फोटो)

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा का असली मतलब नागरिकों की जिंदगी की भी सुरक्षा होती है। मुफ्त बिजली, पानी और स्कूल लोगों की जिंदगी से जुड़े हैं जिन्हें मुहैया कराना भी राष्ट्रीय सुरक्षा है। उनका कहना है कि वाम संगठन जनांदोलन खड़ा करने में कामयाब हैं और आज के माहौल में वे संघर्ष की दिशा भी दे रहे हैं। बातचीत कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

अजय पांडेय : महाराष्ट्र, झारखंड और दिल्ली के आए परिणामों का आप क्या संकेत मानते हैं?
सीताराम येचुरी : देश में एक बात साफ तौर पर दिख रही है कि लोगों में स्थानीय सरकार और केंद्रीय सरकार को लेकर समझ बढ़ी है। जो हिंदुत्व राष्ट्रवाद का माहौल बन गया था उसे लोगों के रोजमर्रा के सवालों ने पीछे धकेल दिया। अब राज्य के चुनाव में रोजमर्रा की चीजों का महत्त्व और ज्यादा बढ़ जाता है। यह मुख्य कारण है जिसके कारण यह नतीजे आए। आंध्र, तेलंगाना और हरियाणा में जो चुनाव परिणाम आए वह इसके सबूत हैं। अर्थव्यवस्था की हालत सभी जानते हैं, मंदी आ चुकी है। बेरोजगारी बढ़ रही है, किसानों की आत्महत्या बढ़ रही है, कारखाने बंद हो रहे हैं, कंपनियों की बिक्री घट रही है। लोगों की खरीदने की क्षमता भारी तरीके से घटी है। जब तक सरकार खरीदने की क्षमता नहीं बढ़ाएगी तब तक अर्थव्यवस्था सुधरने वाली नहीं है। यह सब सुधार न करके सरकार इसका उल्टा कर रही है। वह अमीरों को छूट, कॉरपोरेट कंपनियों को टैक्स छूट दे रही है। इससे जिसके पास ज्यादा पैसा है उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा अर्थव्यवस्था पर। जिसके पास पैसा नहीं है जब वह खरीदना शुरू करेगा तब कुछ होगा। और इन चुनाव परिणामों में यह सोच सामने आई है।

पंकज रोहिला : राष्ट्रवाद को लेकर आज विपक्ष कठघरे में क्यों खड़ा है?
’विपक्ष कठघरे में खड़ा नहीं है, लेकिन कोशिश की गई है। आज हमें इसमें ही फर्क करना है कि एक हिंदुत्व राष्ट्रवाद है और एक भारतीय राष्ट्रवाद है। इसलिए जब भारत माता की जय की बात आती है तो उसका कोई विरोध नहीं करता है। जब वे संसद में भारत माता की जय करते हैं तो हम लोग भी हाथ उठाते हैं और जय हिंद कहते हैं। तो जय हिंद भारत का राष्ट्रवाद है। भारत माता की जय के साथ वे हिंदू राष्ट्रवाद जोड़ देते हैं, भले ही कोई विरोध न करे भारत माता की जय का, लेकिन जब ये इससे जुड़ जाता है तो लोगों में फूट डालकर लोगों के बीच नफरत, हिंसा शुरू होती है। आज जो वातावरण में राष्ट्रवाद का दुरुपयोग हुआ है उसका इतिहास भी गवाह है। हिटलर का अपना राष्ट्रवाद रहा, हिंदुत्व का अपना राष्ट्रवाद है, मुसोलिनी का अपना राष्ट्रवाद था। आज राष्ट्रवाद का असल मायने क्या है? वह केवल देश के प्रति न केवल एक कौम के प्रति और उस कौम को देश के साथ जोड़ देना। एक उदाहरण है कि उमर अब्दुला पर पीएसए लगा दिया है, चार्ज लगाया है कि वह आतंकवाद के चरम पर वोट बटोरने की ताकत रखते हैं, अब यह बताइए की जनतंत्र में अगर कोई वोट बटोर रहा है तो यह उसकी जनप्रियता है न, अपराध कैसे हुआ? और महबूबा मुफ्ती के लिए कहते हैं कि उनकी पार्टी का झंडा हरा है और हरा पाकिस्तान का झंडा है। अब कौन बताए कि तिरंगा भी एक तिहाई हरा है। तो यह देश विरोधी कैसे हो सकता है। यह बहाने करके फूट और नफरत का वातावरण बन रहा है और इससे राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश की जा रही है जो सबसे खतरनाक है।

मुकेश भारद्वाज : आरोप लगाया जा रहा है कि दिल्ली की जीत मुफ्तखोरी की जीत है और इससे राष्ट्रवाद पीछे चला गया। इसे आप कैसे देखते हैं?
’राष्ट्रवाद की बात आप राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हैं जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा का असली मतलब लोगों की जिंदगी की भी सुरक्षा हो। बिना लोगों की जिंदगी की सुरक्षा के क्या राष्ट्रीय सुरक्षा हो सकती है। राष्ट्रीय सुरक्षा का मतलब केवल इतना नहीं है कि सिर्फ देश की सरहद ही आप ठीक-ठाक रखें या आंतरिक सुरक्षा का मामला ठीक रखें। लेकिन आपको लोगों की जिंदगी को भी ठीक रखना है। मुफ्त बिजली, पानी और स्कूल लोगों की जिंदगी से जुड़े हैं और इसे आप कैसे राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ घेरेंगे। यह शब्दावली ही अपने आप में एक बड़ा अंतरविरोध है। अगर लोगों के जीवन की सुरक्षा नहीं होगी तो आप जितना चाहे राष्ट्रीय सुरक्षा की बात कर लें। अगर कोई लोगों की जीवन की सुरक्षा की बात करता हो तो वह लुभाने वाला हो गया और जो देश की सरहद की बात करे तो वह राष्ट्रवाद। यह बंटवारा जो कर रहे हैं वह गलत है। राष्ट्रीय सुरक्षा का मतलब ही नागरिकों के जीवन की सुरक्षा से जुड़ा है। आत्मसम्मान और स्वतंत्रता के साथ जीना सबका मौलिक अधिकार है और बिना उसके राष्ट्रीय सुरक्षा का क्या मतलब।

दीपक रस्तोगी : वाम दलों को लोगों के आंदोलन से जुड़ी पार्टी माना जाता है, लेकिन जिस तरह से पिछले समय में जन आंदोलन से निकली पार्टियों को लोगों का समर्थन मिला उतना समर्थन जन आंदोलन की प्रमुख माने जाने वाली वाम पार्टियों को क्यों नहीं मिल रहा। उनका वोट फीसद क्यों घट रहा है?
’बिल्कुल नहीं। यह अलग बात है कि जन आंदोलन का फायदा किसको मिल रहा है। जन आंदोलन हम करें और इसका फायदा चुनावी तौर पर कोई और ले जा रहा है इससे हम सहमत हैं। लेकिन जन आंदोलन की अहमियत तो है। 2019 से पहले मजदूर संगठन, किसानों की काफी बड़ी रैली हुई। बेरोजगारी और झारखंड के मामले में आंदोलन हुआ और इनके सवाल को कोई राजनीतिक पार्टी नहीं नकार पाई। वाम पार्टियों ने इसे एजंडे में लाने का काम किया लेकिन एजंडे में आने के बाद इसका फायदा किसको मिला। यह सवाल है। आज राजनीति का मतलब ‘आया राम गया राम’ हो गया है। जिसे सीबीआइ से बचना हो वो भाजपा में चला जाए उसका बचाव हो जाएगा। वाम पार्टियों के आंदोलनों का प्रभाव चुनावी प्रभाव में है। लेफ्ट को सिर्फ चुनावी आधार पर नहीं जज कर सकते आपको आंदोलन को भी शामिल करना पड़ेगा। आंदोलन के हिसाब से एजंडा तय करता है लेफ्ट, लेकिन चुनावी हिसाब से उसे फायदा नहीं हो रहा है।

अजय पांडेय : आज जब विपक्ष बिखरा है तो वाम पार्टी बड़ी भूमिका क्यों नहीं निभा पा रहा है जबकि पहले ऐसा नहीं था?
’निभा रही है। आज सुबह ही केजरीवाल जी ने ट्वीट करके हमारा नाम लिखा, जबकि राजनीतिक तौर पर लेफ्ट की दिल्ली में क्या ताकत है। हमारी जितनी भी क्षमता है वो हम कर रहे हैं लोग ये भी मानते हैं कि हम ऐसी फोर्स हैं जिनकी कोई भागीदारी नहीं है और बाकी पार्टियों की तरह हमारे पास कोई शॉपिंग लिस्ट नहीं है कि हम किसके साथ जा रहे हैं और हम कितने पद और कितने मंत्री चाहते हैं। हम उसूलों के आधार पर देश और जनता के हित के आधार पर साथ जाते हैं। पहले भी वाम पार्टी के सुरजीत सिंह विपक्ष के नेता के रूप में उभरे थे, लेकिन वो सूत्रधार थे सबको जोड़ने में। कई बार मजाक और गंभीरता में भी लोग आलोचना करते हैं कि काम आप जोड़ने के लिए करते हैं और पीछे भी हट जाते हैं। तो ये रोल तो रहेगा ही।

मृणाल वल्लरी : ममता और वाम दोनों ही भाजपा के हार का जश्न मना रहे हैं। लेकिन जब आप बंगाल में मुकाबला करेंगे तो भाजपा और तृणमूल दोनों होंगे। क्या दोनों के खिलाफ लड़ने की साझा रणनीति रहेगी।
’पहली बात तो ये है कि राजनीति कोई गणित नहीं है। राजनीति में दो और दो चार की जगह बाइस भी हो सकता है। राजनीति की आंतरिक विशेषताएं हैं। बंगाल में पिछले सात से आठ साल से सामाजिक स्तर पर जो आतंक फैला है उससे लोगों की जिंदगी बर्बाद हो चुकी है। उससे वो मुक्ति चाहते हैं। हमारे 40 हजार कामरेड अपने गांव और घर नहीं जा सकते हैं। दस हजार से ज्यादा कार्यकर्ताओं पर गैर जमानती वारंट है। 2078 लोग मारे जा चुके हैं। कहा गया कि लेफ्ट का वोट तृणमूल के खिलाफ भाजपा को गया, हमारे किसी कार्यकर्ता ने नहीं कहा लेकिन प्रभावित लोगों में यह बात हुई है। वो इससे मुक्ति चाहते हैं और देखेंगे कि कौन हरा सकता है। वहां ममता के खिलाफ एक राय बन चुकी है। कौन हरा सकता है। कौन मुकाबला कर सकता है। यह हुआ है पिछले चुनाव में। कांग्रेस और वामपंथियों के बीच एक विकल्प हैं। लेकिन उनके न आने से यह और बढ़ गया है। अगर गणित के रूप में भाजपा के बगैर सब एकजुट हो जाएं तो वर्तमान सत्ता के खिलाफ बनी राय का असर सब पर पड़ेगा और फायदा होगा जिनको आप हराना चाहते हैं। इस हालात में आज बंगाल की राजनीति है। इसे देखते हुए हमें आज भाजपा और ममता के खिलाफ जाना है और इसके लिए जो रणनीति बनानी है उसके प्रयास चल रहे हैं। अभी एक साल का समय है।

पंकज रोहिला : नागरिकता कानून को लेकर देश भर में हो रहे हंगामे पर आप क्या सोचते हैं?
’कहा जाता है कि यह कानून संसद में पास कर दिया तो उसका विरोध क्यों। संसद ने तो आपातकाल भी पास किया था जब हम लोग जेल गए थे। तो इसका मतलब यह नहीं है कि संसद ने पास कर दिया तो सही ही है। पहली बार हमारे देश में नागरिकता को धर्म के साथ जोड़ा जा रहा है। यह अभी तक नहीं हुआ था और न ही हमारे संविधान में इसकी कोई गुंजाइश है। यह गैर संवैधानिक नहीं बल्कि संविधान विरोधी है। समय लेकर इसके बारे में चर्चा होनी चाहिए। हमने इसे सेलेक्ट कमिटी में भेजने को कहा लेकिन बात नहीं मानी गई। संसद में वोट बटोरने के अपने तरीके हैं। धमकी देते हैं और जांच करते हैं। जिन्होंने इसके समर्थन में वोट डाले वो अब मुकर गए। नीतीश, जगन मोहन रेड्डी, नवीन पटनायक मुकर गए। ये सब अब समझ में आ रहा है। अगर गंभीरता से बात करनी है उसके संविधान में भी तरीके हैं।
गजेंद्र सिंह : जेएनयू छात्र संगठन को देश विरोधी छात्र संगठन की पहचान बना दी गई है और इसका असर यह हुआ है कि आज जो भी छात्र सरकार के खिलाफ बोल रहा है वह राष्ट्रद्रोही है। ऐसा क्यों हैं?

’इसके पीछे बहुत बड़ी साजिश है। और इसे गंभीरता से बताना जरूरी है। आज उच्च शिक्षा पर यह हमला क्यों हुआ है। यह सिर्फ जेएनयू तक सीमित नहीं बल्कि तमाम उच्च शिक्षण संस्थानों में यह हुआ है। हैदराबाद के साथ अन्य विश्वविद्यालय के छात्र, आइआइएम, टाटा इंस्टीट्यूट, इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ साइंस बंगलुरु जो कभी राजनीति में रुचि नहीं रखते वहां छात्र एकजुट होकर विरोध कर रहे हैं। हर समय जब आप एक किस्म की विचारधारा को थोपना चाहते हैं और उसके खिलाफ उठने वाले सवालों की प्रक्रिया को आप बंद नहीं करेंगे तो आपकी सफलता नहीं हो पाएगी।

सुशील राघव : हिंदी भाषी राज्यों में वाम पार्टियों का भविष्य आप कैसे देखते हैं?
’भविष्य है लेकिन हमारे सामने दिक्कते भी हैं वहां। आंदोलन में जुड़ जाते हैं जो हमारे साथ और जो विश्वास हम पैदा करते हैं लोगों में लाल झंडे के प्रति आंदोलन में उतरने के लिए। लाठी खाएंगे, पुलिस का सामना करेंगे, जेल जाएंगे। लेकिन जब वोट का समय आता है तो यह लाल नहीं, कहीं हरा, कहीं भगवा में बंट जाता है। मुख्य बात ये है कि आप लड़ाई के लिए ठीक हो, जब गठबंधन की बात आती है तो कई पार्टी कहती है हमसे कि आप जमीन पर लड़िए उसका फायदा हमें मिलेगा हम सीट क्यों दें। इस अंतर्विरोध को मिटाना हमारे सामने चुनौती है। यानी आर्थिक सवालों पर लड़ाई करते हुए जो भरोसा हम पैदा करते हैं लोगों में, सामाजिक शोषण के खिलाफ उस तरह का भरोसा हम पैदा नहीं कर पाए। यह अभाव है इसको दूर करने की कोशिश है। उत्तर भारत की राजनीति ज्यादातर जातिवादी आधार पर है। अब ऐसी परिस्थिति में आर्थिक शोषण पर तो लाल झंडे पर विश्वास है लेकिन सामाजिक शोषण पर यह विश्वास नहीं है। तीन साल से हम इसे मिटाने की कोशिश कर रहे हैं। अब तीन साल में ‘लाल सलाम जय भीम’, ‘लाल-नील’ नारा उठने लगा है। हम इसी प्रयास में लगे हुए हैं।

आर्येंद्र उपाध्याय : अर्थव्यवस्था की हालत खराब है और लोग अन्य मुद्दे में उलझे हैं। वामपंथी संगठन इस मुद्दे पर जागरूकता क्यों नहीं बढ़ा पा रहे हैं?
’आ रही है जागरूकता। आठ जनवरी को अखिल भारतीय हड़ताल हुई थी। 25 करोड़ से ज्यादा मजदूर शामिल हुआ। आर्थिक परिस्थिति में हम रास्ता बता रहे हैं। अमीरों को छूट घटाकर वहींं पैसा विकास कार्य में खर्च किया जाए। पिछले दिनों दो लाख 15 हजार करोड़ रुपए कारपोरेट को छूट दी गई, अगर यही पैसा सरकारी निवेश में लगाते, सड़क, नहर और अन्य काम में करते तो उससे नौकरी पैदा होती। अगर नौकरी मिलेगी तो हाथ में पैसा आएगा तो बंद कारखाने खुलेंगे। चाय-बिस्कुट के देश में अगर कंपनियां कहें कि पांच रुपए का पैकेट बिक नहीं रहा तो क्या हालत हो गई देश में। रास्ता साफ नजर आ रहा है, लेकिन सरकार काम तो करे!

अरविंद शेष : आरक्षण पर उत्तराखंड सरकार के रुख के बाद अब उस पर हाल में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है। फिलहाल समूचे तंत्र में वंचित जातियों की जो भागीदारी है, उसमें ताजा फैसले के आलोक में आगे की तस्वीर पर आपकी क्या राय है?

’हमने इसका विरोध किया है और करते हैं। संवैधानिक रूप से यह आदेश है कि आरक्षण मिलना चाहिए। सरकार हर दस साल में यह देखेगी कि आरक्षण की और जरूरत है कि नहीं। जब जरूरत होगी तो आंकड़ों के हिसाब से बढ़ता रहेगा। अभी जो सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया कि हम राज्यों के ऊपर छोड़ देते हैं तो राज्यों के ऊपर छोड़ना भी जरूरी है लेकिन यह सवाल नहीं छोड़ सकते की आरक्षण होगा या नहीं होगा। आरक्षण में किसको कितना मिलेगा यह राज्यों को तय करना है, क्योंकि यह जनसंख्या पर आधारित होगा। जैसे त्रिपुरा और ओड़िशा में आदिवासियों को ज्यादा मिलता है दलितों से क्योंकि वहां उनकी जनसंख्या ज्यादा है। कहीं पर ओबीसी को ज्यादा और कहीं कम मिलता है। तो ये अधिकार है राज्यों का लेकिन आरक्षण होगा कि नहीं यह तय करने का अधिकार नहीं है।
मृणाल वल्लरी : आप विपक्ष के एकमात्र नेता थे जो अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद कश्मीर गए और अदालती लड़ाई लड़ माकपा नेता तारेगामी को इलाज के लिए दिल्ली लाए। लेकिन बाकी विपक्ष ने कश्मीर को अकेला क्यों छोड़ दिया, सरकार की नाकेबंदी पर समर्पण क्यों कर दिया।
’370 के खिलाफ जितना जोर से विरोध पकड़ना चाहिए था वह नहीं हो पाया। मैंने संसद में यही कहा कि जितनी तेजी से चीजें आती हैं तो बाकी चीजें पीछे छूटनी शुरू हो जाती हैं।

प्रस्तुति: मृणाल वल्लरी/ गजेंद्र सिंह

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