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जनसत्ता बारादरीः नागरिकता कानून पर जनजागरण से दूर करेंगे भ्रम

भारत का संविधान जो कहता है, उसका पहला हिस्सा बिल्कुल ठीक है। नागरिकता के सवाल पर वह धर्म को ऊपर नहीं आने देगा। पर, यहां एक विशेष स्थिति है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी अपने एक प्रस्ताव में कहा था कि सरकार कानून में संशोधन करे और जो लोग ऐतिहासिक कारणों से यहां आए हैं, उन्हें नागरिकता दे।

Author Published on: January 5, 2020 1:49 AM
राज्यसभा के मनोनीत सदस्य राकेश सिन्हा।

राकेश सिन्हाः पांच सितंबर 1964 को बिहार के बेगूसराय में जन्म। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से शिक्षा। दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन के साथ हिंदी और अंग्रेजी भाषा में राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक मुद्दों पर गहन लेखन किया। संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार की जीवनी सहित कई पुस्तकें लिखीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा के प्रचारक के तौर पर पहचान बनी और अभिव्यक्ति के सभी मंचों पर राष्ट्रवादी विचारों के प्रखर प्रवक्ता बन कर उभरे। राज्यसभा के मनोनीत सदस्य के रूप में संसद में भी आवाज उठाने वाले चेहरों के तौर पर पहचान बनाई।

 

राज्यसभा के सांसद और संघ से जुड़े लेखक और विचारक राकेश सिन्हा का कहना है कि नागरिकता संशोधन कानून पर विपक्ष ने जो भ्रम फैलाया है, उसे भाजपा जनजागरण से दूर करेगी। उन्होंने कहा कि भारत के विभाजन के बाद जो समस्याएं पैदा हुर्इं, उन्हें इस कानून के जरिए दूर करने की कोशिश कर मोदी सरकार ने ऐतिहासिक जिम्मेदारी निभाई है। कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

मनोज मिश्र : अनुच्छेद तीन सौ सत्तर और तीन तलाक जैसे विषयों पर वैसा विवाद नहीं हुआ, जैसा कि नागरिकता संशोधन कानून को लेकर दिखाई दे रहा है। इसकी क्या वजह है? क्या इसे लेकर भाजपा की पर्याप्त तैयारी नहीं थी?

राकेश सिन्हा : नागरिकता संशोधन कानून संसद में सभी दलों की सहमति से आया। असहमति स्वाभाविक है। उसके कई पक्षों से असहमति वहां भी जताई गई और गृहमंत्री ने हर चीज का जवाब दिया। मूल प्रश्न यह है कि इस कानून की संवैधानिकता और नैतिकता है या नहीं। इसे इस पर जांचना चाहिए। विरोध क्यों और कैसे हो रहा है, यह अलग प्रश्न है। संवैधानिकता के पक्ष से देखें, तो जनवरी, 1950 में पूर्वी बंगाल यानी जो आज बांग्लादेश है, वहां से शरणार्थियों का बड़ी तादाद में आना शुरू हुआ। इसे लेकर जब दबाव बनना शुरू हुआ तो नेहरू-लियाकत समझौता हुआ। इस तरह यह कानून मूल रूप से कांग्रेस द्वारा बनाया गया था, जिसमें बांग्लादेश के हिंदुओं को आश्वासन दिया गया था कि हम आपके जानमाल और धर्म की रक्षा करेंगे। तब दो मंत्रियों ने इस्तीफा दिया और कई सदस्यों ने उनके इस्तीफे पर सहमति जताई। इसी तरह पाकिस्तान में रह रहे दलितों को वापस लाने पर सहमति बनी थी, जिस पर गांधी जी भी एकमत थे। उस समय से लगातार वहां से आने वाले शरणार्थियों के प्रति सहानुभूति रखी जाती रही। उसी काम को इस सरकार ने थोक रूप में करने के लिए कानून में संशोधन किया है।

अब इसमें नैतिकता की जहां तक बात है, उसमें विवाद इस बात को लेकर है छह धर्मों का नाम लिया गया, पर इस्लाम को मानने वालों को क्यों छोड़ दिया गया। पर हमने नागरिकता उन लोगों को दी, जिनके साथ धर्म के आधार पर भेदभाव हुआ। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में एक भी मुसलमान, चाहे वह अहमदिया हो, शिया हो सुन्नी हो, उसके साथ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होता। तीनों देश इस्लामिक हैं। इन देशों में हिंदुओं के प्रति अत्याचार और भेदभाव छिपी बात नहीं है। इन परिस्थितियों में सरकार ने वहां धार्मिक आधार पर भेदभाव के शिकार लोगों को अपने यहां नागरिकता देने की बात कही। इस तरह यह कानून ठीक है। पर कुछ लोग नरेंद्र मोदी को पसंद नहीं करते, इसलिए वे उनके विरोध का मौका तलाशते रहते हैं। इस बार भी वे भ्रम फैला रहे हैं। पर भाजपा जनजागरण के जरिए इस भ्रम को दूर करने का प्रयास कर रही है।

अजय पांडेय: मगर संविधान में नागरिकता के जो पैमाने तय किए गए हैं कि अमुक अमुक आधार पर उन्हें नागरिकता देने से नहीं रोक सकते, तो यह कानून तो सीधे-सीधे यही जाहिर करता है कि धर्म के आधार पर भेद किया गया है?

’नहीं। भारत का संविधान जो कहता है, उसका पहला हिस्सा बिल्कुल ठीक है। नागरिकता के सवाल पर वह धर्म को ऊपर नहीं आने देगा। पर, यहां एक विशेष स्थिति है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी अपने एक प्रस्ताव में कहा था कि सरकार कानून में संशोधन करे और जो लोग ऐतिहासिक कारणों से यहां आए हैं, उन्हें नागरिकता दे। इसलिए यह समझने की जरूरत है कि जिन लोगों को नागरिकता देने के लिए कानून बनाया गया है, उसके पीछे मंशा क्या है। इन छह धर्मों की स्वायत्तता इन तीनों देशों में नहीं है। उन पर अत्याचार वहां का शासन, समाज और धर्म तीनों मिल कर करते हैं। इस तरह भारत के संविधान की मूल भावना को यह कानून बाधित नहीं करता है।

मनोज मिश्र: क्या आपको नहीं लगता कि विरोध एनआरसी को लेकर कम और भाजपा के कुछ बड़े नेताओं के बयानों की वजह से अधिक बढ़ा?
’देखिए, असम में एनआरसी को लेकर कुछ विरोधाभास दिखा उसके कारण एक भय का माहौल देखा गया कि आपकी नागरिकता छीन लेने का प्रयास हो रहा है। इसमें विपक्ष को कुछ हद तक सफलता भी मिली है। इसलिए गृहमंत्री ने जरूर यह कहा कि हम एनआरसी लाएंगे, पर यह नहीं कहा कि कब लाएंगे और कैसे लाएंगे। प्रधानमंत्री ने भी कहा कि अभी एनआरसी लाने की हमारी कोई योजना नहीं है। एनआरसी के कारण जो भ्रम पैदा हुआ है, उसे दूर करने के बाद ही इस पर आगे कदम बढ़ाया जाएगा।

पंकज रोहिला: क्या आपको नहीं लगता कि भाजपा यह समझा पाने में कहीं न कहीं विफल रही है कि इस कानून का मुसलमानों पर कोई गलत असर नहीं पड़ेगा?
’भारतीय जनता पार्टी ने समझा दिया है और लोग समझ भी रहे हैं। विरोध के कारण धारणा और पूर्वग्रह हैं। देखिए, इस देश में धारणा क्या थी। जब अनुच्छेद 370 हटाया गया, तो उसका क्यों विरोध हुआ। भाजपा जब 370 की बात करती थी, तो उसे सांप्रदायिक क्यों कहा जाता था? 370 और सांप्रदायिकता का क्या संबंध है? सांप्रदायिकता तो वह थी कि बड़े जनसंहार के बाद वहां से हिंदुओं को बाहर निकाल दिया गया। इसी तरह तीन तलाक के मामले को देखें। इनका मुसलिम के साथ भेदभाव का मुद्दा है ही नहीं। आम मुसलमान जानता है कि भाजपा उसकी विरोधी नहीं है।

मृणाल वल्लरी: अब भारत के दूसरे देशों से संबंध खराब दिखने लगे हैं, चाहे वह अमेरिका हो या फिर बांग्लादेश। तो, कूटनीतिक स्तर पर जो विफलता मिल रही है, उसे कैसे देखते हैं?
’किसी भी देश के साथ भारत के संबंध खराब नहीं हुए हैं। भारत भी दूसरे देशों की आंतरिक स्थितियों की रिपोर्ट लेता रहता है। बांग्लादेश ने कभी भारत के खिलाफ कोई विरोध नहीं किया। नरेंद्र मोदी जी के आने के बाद बांग्लादेश से संबंध अच्छे हुए हैं और वे संबंध बने हुए हैं। सरकार ने सभी संप्रभु देशों को बता दिया है कि वास्तविकता क्या है और वे इस बात को समझते हैं। इससे मुझे नहीं लगता है कि देश के भीतर जो भ्रम की स्थिति है, उसका दूसरे देशों के साथ संबंधों पर कोई असर पड़ा है। दरअसल, हिंदुस्तान के बुद्धिजीवियों और अमेरिका, यूरोप के बुद्धिजीवियों के बीच एक गठजोड़ है, जो हिंदुत्व को नहीं समझते हैं। थोड़ी गलती हमारी भी है। जिस अवधारणा को लेकर हम चलते हैं, उसे लेकर नीयत में हम ठीक हैं, पर उस पर जो सैकड़ों पुस्तकें आनी चाहिए, जो बौद्धिक विमर्श होना चाहिए, जिस स्तर पर उसकी व्याख्या होनी चाहिए, वह हम नहीं कर पाए हैं, जिसकी वजह से ऐसा भ्रम फैलता है।

दीपक रस्तोगी: कई नेताओं के बयानों की वजह से हिरासत केंद्रों को लेकर भी भ्रम की स्थिति बनी हुई है। यह स्थिति क्यों बनी?
’हिरासत केंद्र बने यूपीए सरकार के समय में। मेरा यह भी कहना है कि एक तो इसका नाम बदलना चाहिए। ऐसी किसी भी चीज का नाम बदलना चाहिए, जिसका संबंध द्वितीय विश्वयुद्ध से जुड़ा हुआ हो। उससे लोगों में एक आतंक, भय और भ्रम पैदा होता है। इसका एक उदारवादी नाम होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने जो कहा कि कहीं कोई हिरासत केंद्र नहीं बनाया गया है, तो वह इसलिए कहा कि भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद कोई हिरासत केंद्र नहीं बना है। असम से जुड़ी सारी बातें भाजपा के सत्ता में आने से पहले की हैं।

मुकेश भारद्वाज: नाम बदलने की जो बात आप ने कही, यह भी कहीं उसी तरह का तो विचार नहीं है जैसे भाजपा ने कई शहरों, सड़कों, स्थानों के नाम बदल दिए? यह कोई विचारधारा के स्तर पर तो नहीं चल रहा है?

’नहीं, यह मैंने इसलिए कहा कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जैसे दुनिया भर में घटनाएं घटीं, पूरा यूरोप उन्हें उसी रूप में देखता है। लोग उन्हें भूल नहीं पाए हैं। ये जो नाम बदले जा रहे हैं, वे इसलिए बदले जा रहे हैं कि जिस नाम से सभ्यता और संस्कृति को प्रेरणा मिलती है, उसका वही नाम होना चाहिए। जैसे औरंगजेब की अपेक्षा हमारी पीढ़ी दाराशिकोह से ज्यादा प्रेरणा लेती है। तो नाम बदल देने में हर्ज नहीं।

सूर्यनाथ सिंह: यह जो पूरे देश में विरोध की लहर है, जिसे उपद्रव बताया जा रहा है, उसके पीछे कहीं ऐसा तो नहीं कि नागरिकता कानून एक बहाना है और उसमें अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, शैक्षणिक संस्थानों पर हमले वगैरह की वजह से उपजी नाराजगी अधिक है?

’शिक्षा संस्थानों पर हमले कहीं नहीं हुए हैं। स्थानीय स्तर पर प्रशासकों से विद्यार्थियों की नाराजगी जरूर रही है। बहुत सारे विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की जगहें खाली हैं। इसलिए जिसे आप विद्रोह कह रहे हैं, वह कोई विद्रोह नहीं है। कुछ सांप्रदायिक पार्टियां इस सरकार को हिंदूवादी सरकार साबित करने में लगी हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी जी जो पहली योजना लेकर आए वह जनधन योजना थी। इसका मकसद था बैंकों से गरीबों को जोड़ना। उसके बाद आईबीसी कोड लेकर आए, जिसके कारण छह लाख करोड़ रुपए बैंकों के पास आए। अब बैंकों को एनपीए का सामना नहीं करना पड़ेगा। इसके अलावा तीन लाख करोड़ रुपए और आने की संभावना है। अब जितने बड़े औद्योगिक घराने हैं, वे अपने घर को संभालने में लगे हुए हैं। कोई भी औद्योगिक घराना ऐसा नहीं है, जिसने गलत तरीके से बैंकों से पैसा न लिया हो। इसलिए वे अपने को सुधार रहे हैं और उनके विस्तार की प्रक्रिया कुछ रुक गई है। इसलिए यह विद्रोह नहीं है, सांप्रदायिक पार्टियों द्वारा हिंदू-मुसलिम ध्रुवीकरण का प्रयास है।

मृणाल वल्लरी: हो यह रहा कि पुलिस अधिकारी आम लोगों को पाकिस्तान भेजने की धमकी देने लग जा रहे हैं, नेताओं की भाषा भी बेचैन करने वाली है। आपको नहीं लगता कि अभी अहंकार की भाषा और संवादहीनता का ज्यादा विरोध हो रहा है।

’किसी को भी पाकिस्तान, अफगानिस्तान भेजने वाली जुबान नहीं बोलनी चाहिए। किसी भी स्थिति में नहीं बोलना चाहिए। किसी को भी आतंकवादी नहीं बोलना चाहिए, जब तक कि वह प्रमाणित नहीं हो जाता। मगर यह बात प्रज्ञा ठाकुर के लिए भी लागू होती है। अभी उन पर अदालत ने फैसला नहीं दिया है। इसलिए प्रज्ञा ठाकुर को या उन जैसे लोगों को आतंकवादी कहना भी ठीक नहीं है। जिस संगठन को पूरा समाज स्वीकार करता है, उसे आतंकवाद से जोड़ देना ठीक नहीं है। मैं मानता हूं कि भारतीय राजनीति को पचास-साठ के दशक की मर्यादित राजनीति की तरफ लौटना है और लौटना चाहिए। यह साझा जिम्मेदारी है।

आर्येंद्र उपाध्याय: अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार भी बनी थी। उस समय इतना विरोध क्यों नहीं हुआ था।

’जब अटल जी की सरकार थी और डांग की घटना हुई थी, तब भी उनका विरोध हुआ था। मुरली मनोहर जोशी ने इतिहास की किताबों में जब थोड़ा-सा परिवर्तन किया था, तब भी विरोध हुआ था। यह विरोध का दूसरा चरण है। अभी भाजपा ने कुछ अपने कोर एजंडे लागू करने शुरू किए हैं। 2014 से 2019 तक किसी भी कोर एजंडे को लागू नहीं किया था। मगर तब लोगों ने पुरस्कार वापसी अभियान चला कर अपनी सारी शक्ति नष्ट कर दी। जब कुछ नहीं मिला तो ईवीएम पर सवाल उठाए। जब आज भाजपा राज्य पर राज्य चुनाव हार रही है, तो ईवीएम पर सवाल नहीं उठ रहे। मुझे लगता है कि हम वैकल्पिक राजनीति की बात करते हैं, वह कांग्रेस की राजनीति नहीं है, इसलिए विरोध हो रहा है। संवाद की प्रक्रिया को रोकने का प्रयास कांग्रेस खुद करती रही है, इसलिए भी वे लोग विरोध कर रहे हैं।

मनोज मिश्र: क्या मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में विरोध इसलिए तो नहीं बढ़ा है कि संघ का एजंडा लागू किया जा रहा है?
’जब सामाजिक सांस्कृतिक संगठन का फैलाव होता है, तो उसकी छाया राजनीति पर आनी स्वाभाविक है। मगर संघ भाजपा से अलग अपनी स्वायत्तता बनाए हुए है। संघ और जनसंघ ने उन मुद्दों को उठाया जो संविधान में जोड़े गए थे, पर स्वार्थवश छोड़ दिए गए। अनुच्छेद 370 को संविधान में रखा गया तो नेहरू ने कहा था कि यह घिस-घिस कर खत्म हो जाएगा, यह एक अस्थायी उपबंध है। पर मनमोहन सिंह सरकार के समय मुख्य वार्ताकार ने कहा कि इसे स्थायी उपबंध बना दिया जाए। तो इस तकनीकी व्याख्या को मोदी सरकार ने सुधारा। इसी तरह महिला सशक्तिकरण को सिर्फ एक वर्ग तक सीमित क्यों रखा जाए, उसमें सभी पक्षों को जोड़ दिया गया।

मृणाल वल्लरी: उत्तर प्रदेश जैसा राज्य जहां भाजपा को सबसे अधिक बहुमत मिला, वहां जनता ही संगठित होकर सरकार के विपक्ष में खड़ी हो गई सी दिखती है। आप इसे कैसे देखते हैं?

’देखिए, जब जनता का विद्रोह कहते हैं, तो उसे थोड़ा इतिहास में जाकर भी देखना चाहिए। 1974 के विद्रोह को याद कीजिए। वह जनता का विद्रोह था। इसलिए वह देशव्यापी रूप ले सका। विद्रोह 1942 में भी हुआ था, 1932 में भी हुआ था। वही आंदोलन सफल होता है, जो संविधान के मूल्यों को लेकर चलता है। ये उपद्रव संवैधानिक तरीके से नहीं हो रहे हैं।

सूर्यनाथ सिंह: आप संघ से जुड़े हैं और कहा जा रहा है कि यह संघ संचालित सरकार है। आप इस पर क्या प्रकाश डालेंगे?

’देखिए, अगर संघ को सरकार चलाना होता, तो वह खुद एक राजनीतिक पार्टी बन गया होता। संघ में 1948 से 1950 तक एक विमर्श चला कि संघ को राजनीतिक पार्टी के रूप में आना चाहिए। पर श्री गुरुजी ने उसे खारिज कर दिया। उनका कहना था कि संघ का काम पार्टी चलाना नहीं है। संघ के तीन दर्जन संगठन हैं और वे अपने-अपने क्षेत्रों में काम करते हैं। हम एक वैचारिक आंदोलन हैं और हमारा प्रयास होता है कि एक विचारधारा के रूप में चीजों को सरकार तक पहुंचाएं। संघ नैतिक संप्रभु है और भाजपा राजनीतिक संप्रभु।

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