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विपक्षी दल सिर्फ हैसियत बचाने के लिए मैदान में हैं

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी का कहना है कि हरियाणा और महाराष्ट्र में विपक्ष खुद से लड़ रहा है। वहां दूसरी पार्टियां सिर्फ अपनी हैसियत बचाने के लिए मैदान में हैं, सरकार बनाने के लिए केवल भाजपा मैदान में है। उन्होंने कहा कि चुनौती को अर्थव्यवस्था में अवसर कैसे बनाया जाता है, यह मोदी सरकार ने दिखाया है और जल्द ही अच्छी तस्वीर सामने आएगी। बातचीत कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

Author Published on: October 20, 2019 1:06 AM
महाराष्ट्र में जो सिंचित भूमि थी, पंद्रह साल के एनसीपी सरकार के कार्यकाल में सिंचित भूमि के क्षेत्र में कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ।

मनोज मिश्र : क्या हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में भाजपा अपना लोकसभा वाला प्रदर्शन दुहरा पाएगी? वहां स्थानीय मुद्दे क्यों नहीं उठ पा रहे हैं?

सुधांशु त्रिवेदी : देखिए, विधानसभा के मुद्दे राज्य के होने चाहिए, पर हमें यह भी समझना चाहिए कि चुनाव तीन तरह के होते हैं- स्थानीय निकायों के, विधानसभा और लोकसभा के। स्थानीय निकायों में मुद्दे पूर्णत: स्थानीय होते हैं, थोड़ा प्रभाव पार्टियों का होता है। लोकसभा में मुद्दे पूरी तरह राष्ट्रीय होते हैं, थोड़ा प्रभाव स्थानीय मुद्दों का होता है। विधानसभा में स्थानीय मुद्दे प्रमुख होते हैं, पर राष्ट्रीय मुद्दों का भी ठीक-ठाक प्रभाव होता है। अभी स्थिति यह है कि हरियाणा में खट्टर जी और महाराष्ट्र में फडणवीस जी की सरकारों ने इतने बेहतर काम किए हैं कि उनसे आमूलचूल परिवर्तन नजर आता है। उदाहरण के लिए हरियाणा में पहली बार ऐसा हुआ है कि सरकारी नौकरी बगैर सिफारिश के मिली है। पहले ऐसा नहीं होता था। और विपक्ष की स्थिति तो ऐसी हो गई है कि हरियाणा में नेता प्रतिपक्ष ही नहीं बना पाए। इससे स्पष्ट पता चलता है कि वे जनता के मुद्दों को कितनी तत्परता से रख सकते हैं। इसलिए जब जनता दोनों चीजों को सामने रख कर देखेगी, तो उसे साफ दिखाई देगा कि किसे चुनना बेहतर है। महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस की सरकार ने जैसे सकारात्मक काम किए हैं, उसकी पिछली सरकारों से तुलना करें, तो कोई तुलना ही नहीं है। विपक्ष अपने भ्रष्टाचारों के बचाव में लगा हुआ है। कांग्रेस की हालत तो यह है कि जितनी मजबूती से उसे भाजपा से लड़ना चाहिए उतनी ही मजबूती से आपस में लड़ रही है। ऐसी स्थिति में जनता को सब समझ आता है कि उसके लिए काम करने लायक कौन पार्टी है। हरियाणा और महाराष्ट्र में दूसरी पार्टियां सिर्फ अपनी हैसियत बचाने के लिए मैदान में हैं, सरकार बनाने के लिए केवल भाजपा मैदान में है।

अनिल बंसल : महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं रुकी नहीं हैं, उस पर आप क्या कहना चाहेंगे?

’कृषि एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें बहुत काम करने की आवश्यकता है। बहुत लंबे समय तक आपको काम करने का मौका मिले तभी उसमें परिवर्तन दिखा सकते हैं। महाराष्ट्र में जो सिंचित भूमि थी, पंद्रह साल के एनसीपी सरकार के कार्यकाल में सिंचित भूमि के क्षेत्र में कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ। उसके मुकाबले फडणवीस जी की सरकार के समय में सिंचित भूमि के फीसद में भारी बढ़ोतरी हुई। इसके अलावा, जिन राज्यों में लंबे समय तक हमें काम करने का मौका मिला उनमें हमें कृषि क्षेत्र में परिवर्तन करके दिखाया। यूपीए सरकार के समय में भी। जब कृषि विकास की दर दो से ढाई फीसद थी, सिर्फ भाजपा शासित प्रदेशों में दस फीसद से ऊपर कृषि विकास दर थी। इसी तरह गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ का उदाहरण ले सकते हैं। एमएस स्वामीनाथन ने खुद अपने एक लेख में लिखा कि अगर कृषि के लिए किसी ने ईमानदारी से काम किया तो वह भाजपा शाासित प्रदेशों की सरकारें थीं।

दीपक रस्तोगी : अर्थव्यवस्था के मामले में भाजपा सरकार ठोस बात क्यों नहीं कर पा रही है?

’यह ठीक है कि आपूर्ति मांग के अनुकूल होनी चाहिए, रोजगार का सृजन होना चाहिए। पहली बात तो यह कि जो आधिकारिक आंकड़े होते हैं, जैसे बेरोजगारी का वह कितने वर्ष पुराना होता है? पांच साल पुराना आंकड़ा होता है। तो, जो बेरोजगारी का आंकड़ा आया वह यूपीए सरकार के समय का है। जहां तक आर्थिक मंदी का सवाल है, वैश्विक मंदी है, इसमें दो राय नहीं। पर इस मंदी में भी विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में हम सबसे बेहतर ढंग से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था हैं। मोबाइल फोन उत्पादन के क्षेत्र में आज एक सौ बीस फैक्ट्रियां हैं, हमारी सरकार आने से पहले केवल दो थीं। एशिया की सबसे बड़ी फैक्ट्री भारत में है। अगर एक सौ बीस फैक्ट्रियां बनीं, दोगुनी गति से सड़कें बनीं, दोगुनी गति से रेल लाइनें बिछीं, इतने करोड़ आवास बने, इतने करोड़ शौचालय बने, तो बनाने वाले भी तो कोई रहे होंगे। तो, कुछ न कुछ व्यवसाय भी बना। हालांकि आज की स्थिति निश्चित रूप से संतोषजनक नहीं है, क्योंकि वैश्विक प्रभाव है, पर सरकार इस पर पूरी तरह संवेदनशील है। मोटर वाहन निर्माण के क्षेत्र में कारोबार नीचे जा रहा है, पर चेन्नै में हुंडई की जो फैक्ट्री है, वह दुनिया में हुंडई कार बनाने वाली सबसे बड़ी फैक्ट्री हो गई। इसलिए नहीं कि वहां उत्पादन बढ़ा है, बल्कि इसलिए कि चीन में जो उसकी फैक्ट्री थी, उसका उत्पादन काफी घट गया। कहने का मतलब यह कि वाहन उत्पादन के क्षेत्र में केवल हमारे यहां नहीं, पूरी दुनिया में मंदी है।

सूर्यनाथ सिंह : बहुत सारी परियोजनाएं ऐसी हैं, जो पिछले बीस सालों से चल रही थीं, वे इस सरकार के कार्यकाल में पूरी हुर्इं और सरकार ने उसका भी श्रेय ले लिया। तो, केवल पिछली सरकारों की कमियों की बात क्यों?

’जब अर्थव्यवस्था की बात आती है, तो हमारी सरकार ने एक बुनियादी बदलाव किया। ज्यादातर सरकारें जब आती हैं, तो कहती हैं कि पिछली सरकार के समय में कमियां थीं। उसने उनको दिया, इनको नहीं वगैरह। हमने कहा कि यह काम समाप्त, अब सबको सुविधाएं देनी हैं। अब संपूर्ण वाला भाव आ गया। आप पिछली परियोजनाओं की बात कर रहे हैं, मैं तो उनकी बात कह रहा हूं, जिनके बारे में पिछली सरकारों ने सोचा ही नहीं। चुनौती को अर्थव्यवस्था में अवसर कैसे बनाना है, यह मोदी सरकार ने दिखाया। उदाहरण के लिए, देश के पश्चिमी हिस्से में पानी की कमी, तेज धूप, सिंचाई सुविधाओं का अभाव। यह एक चुनौती थी। पर वहां सौर ऊर्जा की शुरुआत हुई। केंद्र में भाजपा की सरकार आई तो सौर ऊर्जा पर ध्यान केंद्रित किया। अब अंतरराष्ट्रीय सौर ऊर्जा का केंद्र भारत में है। हम उसमें अगुआ हैं। इसी तरह देश के पूर्वी हिस्से में- बिहार, असम, बंगाल, ओड़ीशा में नदियों के पाट बहुत चौड़े हैं। बहुत पानी गिरता है, बाढ़ की समस्या है। यह भी एक चुनौती है, पर इसे एक अवसर में बदला गया। नदियों की गाद निकाल कर गहरा किया गया, तो उनमें व्यावसायिक परिवहन शुरू किया गया। हल्दिया से वाराणसी तक जलमार्ग शुरू हुआ।

मृणाल वल्लरी : जिस तरह बैंकिंग क्षेत्र में संकट उभरा है, उससे आम आदमी अपने पैसे की सुरक्षा को लेकर आशंकित है। इस माहौल पर आप क्या कहेंगे।

अनिल बंसल : इसी से जुड़ा सवाल है कि आपने डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने की बात कही, दूसरी तरफ बैंकों में रखा पैसा सुरक्षित नहीं है, तो आदमी करे क्या?
’जब डिजिटल लेन-देन शुरू हुआ तो जितनी भी सरकारी योजनाएं थीं, पता चला कि उनमें एक लाख करोड़ रुपया बीच में गायब हो जाता था, वह डिजिटल से रुक गया। बैंकिंग प्रणाली में हुआ यह कि जितने भी दीर्घ अवधि के कर्ज थे, वे पिछली सरकार के समय जारी किए गए थे। अब उस प्रणाली को खत्म कर दिया गया है। बैंकों को आपस में मिलाने से यह हुआ है कि केवल मजबूत बैंक मैदान में होंगे और बीच में जो गड़बड़ियां होती थीं, वे रुक गई हैं।

पंकज रोहिला : महाराष्ट्र में आप पिछड़े ग्रामीण इलाकों में नहीं पहुंच पा रहे हैं, इसकी क्या वजह है?

’नहीं, ऐसा तो नहीं है। बूथ समितियों में आप देखें, तो महाराष्ट्र के हर बूथ तक पहुंचने में हम सफल रहे हैं। एक मजबूत और गतिशील संगठन किस तरह से काम कर सकता है, हम उसके उदाहरण हैं। भाजपा कैडर आधारित पार्टी है, इसलिए हमारे साथ यह समस्या नहीं है। इसीलिए हम हर किसी तक अपनी योजनाओं को पहुंचा पा रहे हैं। संगठन लोगों तक पहुंच कर उन्हें समझा पा रहा है कि यह योजना किसने दी।

सूर्यनाथ सिंह : आपकी सरकार पर आरोप लगता है कि वह हकीकत पर परदा डाल कर अपने बनाए आंकड़े पेश कर अच्छी तस्वीर पेश करने की कोशिश करती रही है। इसका क्या जवाब है कि बड़ी-बड़ी कंपनियां डूब रही हैं। आइएलएफएस की इतनी बड़ी पूंजी डूब गई, इसके पीछे किसका कसूर है?

’अर्थव्यवस्था के दो नतीजे हैं- एक दीर्घकालिक और दूसरा अल्पकालिक। बैंकिंग क्षेत्र की सारी समस्याएं दीर्घ अवधि की हैं। आइएलएफएस का मामला यों हुआ कि, सिडबी के एक अधिकारी ने बताया कि एक हजार करोड़ का कर्ज डूब गया। अब एक हजार करोड़ का कर्ज कोई एक दिन में तो दिया नहीं गया होगा, वह लंबे समय से दिया गया होगा। अब देखना है कि जब वह कर्ज दिया गया और वापस नहीं आ पाया, तो उसमें बैंक गारंटी दी गई थी या नहीं। सो, समस्या तो वहां से आई। आज कोई भी सूचना का अधिकार के तहत आंकड़ा निकाल कर देख सकता है कि जो लोग दिवालिया हुए, उन्हें कर्ज किस सरकार के समय में दिया गया था। जहां तक आंकड़ों की बात है, उससे जुड़े सवाल पूछने और उसकी व्याख्या करने पर भी बहुत सारी बातें निर्भर करती हैं। किसी किसान से पूछिए कि नौकरी है? वह कहेगा कि नहीं, नौकरी नहीं है। फिर पूछिए कि रोजी-रोजगार है, तो वह कहेगा कि हां, वह तो है। इस तरह आंकड़ों की व्याख्या से भी बहुत सारी चीजें उलझ जाती हैं।

मनोज मिश्र : अभी रघुराम राजन का बयान आया कि इस समय अर्थव्यवस्था की हालत इसलिए बिगड़ी है कि सरकार में सारे फैसले एक ही व्यक्ति केंद्रित है!

’अगर एक व्यक्ति और प्रशासन की बात करेंगे, तो सबसे अच्छा रेज्यूमे अगर किसी व्यक्ति का था, तो वह डॉ. मनमोहन सिंह का था। मगर उनके प्रधानमंत्रित्वकाल में क्या हुआ! दूसरे नंबर पर अगर किसी प्रधानमंत्री का मजबूत रेज्यूमे था तो जवाहरलाल नेहरू का। मगर सबसे कमजोर रेज्यूमे किसका था? इंदिरा गांधी का। मगर उन्होंने बहुत काम किए। अटल जी का रेज्यूमे क्या था? सामान्य पोस्ट ग्रेजुएट! मोदीजी भी सामान्य पोस्ट ग्रेजुएट। इसलिए उन्होंने जो भी कहा है उसे देखें, तो जो व्यावहारिक राजनीति की दृष्टि से काम करते हैं, उनका काम अलग होता है। रघुराम राजन जो बात आज कह रहे हैं, उन्हें सामने लाना चाहिए। वही बता दें कि उन्होंने क्या कार्रवाई की थी और कितनी बार इन चीजों के लिए लिख कर भेजा था।

मुकेश भारद्वाज : मनमोहन सिंह और रघुराम राजन तो दुनिया के माने हुए अर्थशास्त्री हैं, पर आपका आरोप है कि उनका कार्यकाल सबसे बुरा था। यह कैसे?

’विद्वान होना एक पक्ष है, पर व्यावहारिक राजनीति करना अलग बात है। इसीलिए अर्थतंत्र से ऊपर राजतंत्र होता है। अगर अर्थतंत्र से कहेंगे, तो वह बहुत सारी चीजों के लिए मना करेगा। इसलिए राजनीति हमेशा बहुत जटिल चीज होती है।

मृणाल वल्लरी : आप नौकरी बनाम रोजगार की बात कर रहे हैं। हमारे यहां रोजगार को लोग इसलिए नौकरी नहीं मानते, क्योंकि वहां उन्हें कोई बुनियादी अधिकार नहीं होता। उन्हें हर समय असुरक्षा का भय सताता रहता है। इस तरह आम आदमी कैसे रोजगार ले?

’आज तो वैश्विक अर्थव्यवस्था है। दुनिया का कोई ऐसा देश नहीं है, घोर कम्युनिस्ट चीन को देख लें, तो उसकी तुलना में हमारे श्रम कानून ज्यादा लचीले और मानवीय हैं। वहां तो एक मिनट में निकाल बाहर करते हैं। अभी हमारी सरकार आने के बाद श्रम स्थितियों में बेहतरी के लिए कानूनों में सुधार किए गए हैं। उसमें उनकी कार्यस्थितियों आदि को बेहतर बनाने का प्रयास होगा। दरअसल, नौकरी का मतलब सरकारी नौकरी मानने की एक मानसिकता है। मगर अब वह मानसिकता पहले से काफी बदली है। अब बहुत सारे बच्चे निजी क्षेत्र में नौकरियां कर रहे हैं। इसी तरह उद्यमिता को लेकर मानसिकता बदल रही है। धीरे-धीरे स्वरोजगार की तरफ लोगों का ध्यान जा रहा है। कुछ सालों में आप देखेंगे कि यह स्थिति बदलेगी और लोग रोजगार को स्वीकार करेंगे। आदमी नौकरी में इसलिए जाता है कि वह स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में सुरक्षा चाहता है। ये दोनों चीजें हमारी सरकार ने दे दी हैं। मेरे विचार से यह स्थिति बदलेगी।

पंकज रोहिला : अभी तक पार्टी अनुच्छेद तीन सौ सत्तर, तीन तलाक आदि को लेकर माहौल बना रही थी, इसका विधानसभा चुनावों में कितना असर पड़ेगा?

’पहली बात कि हम माहौल नहीं बना रहे थे। यह हमारा संकल्प था। समान नागरिक आचार संहिता हमारा संकल्प रहा है। सबको न्याय दिलाना हमारा संकल्प है। और हम अपने संकल्प में कितने दृढ़ हैं, इसका अंदाजा इससे लगाइए कि स्वयंसेवक संघ ने 1966 में यह कह दिया था कि अगर हमें कभी सत्ता में आने का अवसर मिला तो हम परमाणु विस्फोट करेंगे और वह अटल जी की सरकार में किया गया। इसलिए कश्मीर का मुद्दा हमारे लिए चुनाव का मुद्दा नहीं है। विरोधियों ने हल्ला मचा-मचा कर उसे राजनीतिक मुद्दा बना दिया।

पंकज रोहिला : महंगाई पर काबू पाना चुनौती बना हुआ है। ऐसा क्यों?

’आज मंदी के दौर में भी हमारी महंगाई की दर हमारी विकास दर से नीचे है। जब हमारी सरकार आई थी तो विकास की दर चार दशमलव कुछ थी और महंगाई की दर आठ दशमलव कुछ थी। लगभग दोगुनी। इस पूरे आर्थिक दबाव के दौर में भी महंगाई की दर विकास की दर से काफी नीचे है।

मृणाल वल्लरी : हरियाणा में खट्टर सरकार के समय सशस्त्र प्रतिरोध की स्थितियां बनीं। राम रहीम प्रकरण में सौ से ज्यादा लोगों की जान चली गई। स्त्रियों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठे। फिर भी आप उनकी तारीफ कर रहे हैं!

’इसे इस तरह देखिए कि एक तरफ सरकार ऐसी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। राम रहीम वाले मामले में देखिए। यह दर्शाता है कि अदालत के आदेश का पालन कराने या ऐसी किसी भी अव्यवस्था को सरकार सहन करने की स्थिति में नहीं है। दूसरी बात कि ऐसे कितने लोगों ने सवाल उठाया कि गोलियां चलीं तो क्या हुआ! जब रामपाल वाला मामला हुआ तो हमारी सरकार ने एक सबक लिया कि अगर वे बाहर नहीं आएंगे, तो उनको जाकर निकालना पड़ेगा। या तो आप अदालत का आदेश न मानते या फिर सख्ती बरतते। तो राम रहीम के लोग पूरी तैयारी में दंगाई ढंग से सामने आए और पुलिस की सख्ती उन पर हुई।

मृणाल वल्लरी : मगर आपकी पार्टी के नेताओं का सार्वजनिक तौर पर इन डेरों में आना-जाना रहा है। इनके फलने-फूलने की वजह भी तो वे ही हैं।

’अभी तो आप ही ने कहा कि हमने उनके खिलाफ सख्ती बरती। फिर ये लोग हमारी सरकार आने के बाद ही वे थोड़े वहां आए, उससे पहले से थे। हमारे आने के बाद तो वे फलने-फूलने के बजाय मुरझा गए।

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