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बारादरी: परीक्षा जिंदगी भर चलती है, इसलिए तनावमुक्त रहें

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) में सचिव अनुराग त्रिपाठी ने कहा कि हमारी मूल्यांकन पद्धति 99.95 फीसद ही है। प्रश्नपत्र तैयार करते समय बहुत वैज्ञानिक तरीका अपनाया जाता है, जिसमें अलग-अलग बोर्डों के सुझावों को ध्यान में रखा जाता है। हम कोशिश कर रहे हैं कि प्रश्नपत्र में रचनात्मक और आलोचनात्मक प्रश्न ज्यादा हों। जिन विषयों में आवश्यकता से अधिक पाठ्यक्रम हैं, उन्हें कम करने की कवायद भी चल रही है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि अभी सीबीएसई केवल देश के करीब ढाई फीसद बच्चों को शिक्षित कर पाता है। बातचीत कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

अनुराग त्रिपाठी (सोर्स- आरुष चोपड़ा)

अनुराग त्रिपाठी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर आइआरपीएस अधिकारी अनुराग त्रिपाठी वर्तमान में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के सचिव के रूप में कार्यरत हैं। सचिव के तौर पर वे बोर्ड के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी हैं। सभी प्रशासनिक और संस्थान से संबंधित कार्यों- वैयक्तिक, विधि, वित्त, भर्ती, हिंदी अनुभाग और छात्रवृत्ति- से जुड़े हैं। सचिव के रूप में वे संबद्धता इकाई के प्रमुख भी हैं। सीबीएसई से जुड़ने से पहले भारतीय रेलवे और अन्य संस्थानों में प्रशासनिक और शैक्षिक पदों पर रहे हैं। रेलवे में अपनी 20 सालों की सेवा के दौरान उन्होंने वैयक्तिक, सामान्य प्रशासनिक, औद्योगिकी संबंध प्रबंधन, मानव संसाधन विकास, कॅरिअर प्रबंधन क्षेत्र में अनुभव हासिल किए। परीक्षाओं में सुधार तथा परीक्षाओं और शैक्षिक कार्यों में तकनीक के इस्तेमाल को शुरू कराया। 2017 में सीबीएसई में एकल खिड़की तंत्र और कर्मचारी चार्टर भी विकसित किया।

मनोज मिश्र : तमाम प्रयासों के बावजूद परीक्षाओं में पर्चे लीक हो जा रहे हैं, इसे रोकने का क्या उपाय करेंगे?
अनुराग त्रिपाठी : करीब सत्तर सालों से सीबीएसई दसवीं और बारहवीं के बोर्ड की परीक्षाएं संचालित करता है। यह देश का अग्रणी बोर्ड तो है ही, पूरे विश्व का अग्रणी बोर्ड है। सीबीएसई जो कुछ करता है, कोई बदलाव करता है, तो देश के दूसरे बोर्ड भी उसका अनुसरण करने का प्रयास करते हैं। इस तरह सीबीएसई की साख बहुत ऊंची है। उसी साख को ध्यान में रखते हुए हम लोग लगातार प्रयास करते रहते हैं कि इसकी गुणवत्ता कैसे बनी रहे। कुछ ऐसे मौके आए हैं, जब कुछ असामाजिक तत्त्वों ने सीबीएसई की परीक्षा प्रणाली के साथ छेड़छाड़ करने का प्रयास किया। पिछली बार जब हमारा पर्चा लीक हुआ तो तुरंत हम लोगों ने उस परीक्षा को निरस्त कर दिया। पुलिस ने अपनी विशेष टीम बनाई और चार दिन के भीतर उन लोगों को पकड़ लिया, जो लोग उससे जुड़े थे। जांच में पता चला कि हिमाचल प्रदेश के एक प्रिंसिपल ने, जिसे बोर्ड ने पर्चा लाने के लिए नामांकित किया था, उसने यह गलत काम किया। परीक्षा के पर्चे बहुत सुरक्षित ढंग से रखे जाते हैं। जहां रखे जाते हैं, वहां से परीक्षा केंद्रों के नामांकित प्रिसिंपल जाकर उन पर्चों को लाते हैं। मगर पिछले साल संबंधित प्रिंसिपल ने किसी और व्यक्ति को पर्चा लेने भेजा और उसने उस दिन की परीक्षा का प्रश्नपत्र लेने के साथ-साथ दो दिन बाद होने वाली परीक्षा के प्रश्नपत्र भी चोरी से निकाल कर रख लिए। इससे हमने यह सीख ली कि भविष्य में इस तरह की कमजोरियों को दूर किया जाए। तय किया कि धीरे-धीरे सूचना तकनीक के माध्यमों का उपयोग बढ़ाएं। बेहतर यह होगा कि प्रशनपत्र बैंकों के माध्यम से परीक्षा केंद्रों पर पहुंचाने के बजाय, सूचना तकनीक के माध्यम से परीक्षा शुरू होने से कुछ समय पहले प्रश्नपत्र केंद्रों को मुहैया कराएं। सीबीएसई इस दिशा में प्रयास कर रहा है। इसमें संसाधनों पर ध्यान दिया जा रहा है। अभी हम बड़े शहरों से इसे शुरू करेंगे और फिर ऐसे स्कूलों को केंद्र बनाने का प्रयास करेंगे, जिनमें सूचना तकनीक संबंधी सुविधाएं हों। इसके अलावा हम बैंक अधिकारियों, सुरक्षा तंत्र, पुलिस और प्रिंसिपलों को सावधान कर रहे हैं कि इस तरह की घटनाएं न होने पाएं। इस बार हम सुनिश्चित करेंगे कि वही व्यक्ति प्रश्नपत्र लेने जाए, जिसे अधिकृत किया गया है।

अजय पांडेय : यह भी देखने में आया है कि सीबीएसई सौ में सौ नंबर दे रहा है, इसलिए भी होड़ बढ़ी है और नकल की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। इस पर आप क्या कहेंगे?
’मेरा मानना है कि बच्चा अगर काबिल है तो उसके सौ में सौ नंबर किसी भी विषय में आ सकते हैं, साहित्य में भी, समाज विज्ञान अदि में भी। इसलिए मैं इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि अगर हम सौ में अस्सी नंबर देने लगेंगे, तो इस तरह की समस्याएं नहीं होंगी। दरअसल, इस तरह की समस्या वे लोग ज्यादा उत्पन्न करने की कोशिश करते हैं, जिनके लिए पास करना मुश्किल रहता है। जो मेधावी बच्चे हैं, उन्हें नकल की जरूरत नहीं होती। जो बच्चे अपनी कॉपियों के पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन करते हैं, उनके आंकड़ों से भी देखा गया है कि हमारी मूल्यांकन पद्धति 99.95 प्रतिशत सही है। उसमें परीक्षक पर पक्षपात का आरोप नहीं लगा सकते। सिर्फ दशमलव पांच फीसद बच्चों के अंक पुनर्मूल्यांकन में बढ़े हैं। जबकि दुनिया भर में मूल्यांकन में सात प्रतिशत तक त्रुटि स्वीकृत है। इसके बावजूद हम अध्यापकों को प्रशिक्षण के जरिए मूल्यांकन में होने वाली मानवीय त्रुटियों को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं।

सूर्यनाथ सिंह : कुछ शिक्षाशास्त्रियों का आरोप है कि आप चूंकि विद्यार्थियों का ज्ञान मापने के लिए प्रश्नपत्र बनाते हैं, उसके बोध का मूल्यांकन नहीं करते, इसलिए उनके अंक अधिक आ रहे हैं।
’पहली बात तो यह कि प्रश्नपत्र बनाते समय बहुत वैज्ञानिक तरीका अपनाया जाता है। पूरे देश के जाने-माने शिक्षाविद इसमें शामिल होते हैं। एनसीईआरटी, सीबीएसई, अलग-अलग बोर्डों के सुझावों को ध्यान में रखा जाता है। उसमें तय किया जाता है कि किस प्रकृति के प्रश्न कितने होंगे। जैसे, साहित्य का प्रश्नपत्र है तो ध्यान रखा जाता है कि उसमें विश्लेषणपरक प्रश्न कितने होंगे, तथ्यात्मक कितने होंगे, सूचनात्मक कितने होंगे और आलोचनात्मक कितने होंगे। इसी तरह अगर गणित का प्रश्नपत्र बनता है तो ध्यान रखा जाता है कि उसमें चिंतन के प्रश्न कितने होंगे, प्रायोगिक कितने होंगे और जिसमें सिद्धांत सीधे प्रयोग होते हैं, वे कितने होंगे, कठिन प्रश्न कितने होंगे, सरल कितने होंगे। हम प्रयास करते हैं कि समाज के हर वर्ग का बच्चा प्रश्नपत्र हल कर सकता है। इसलिए यह कहना कि हम प्रश्नपत्र जानबूझ कर सरल बनाते हैं, ठीक नहीं है। फिर यह भी हम नहीं कर सकते कि जानबूझ कर इसलिए कठिन प्रश्नपत्र बनाया जाए कि बच्चा पचास नंबर से अधिक अंक न ला पाए, तो यह भी उचित नहीं है। पर मैं इस बात से सहमत हूं कि हमारे प्रश्नपत्र में बोध के प्रश्न कम हैं, ज्ञान आधारित प्रश्न अधिक हैं। अब हम धीरे-धीरे प्रयास करेंगे कि प्रश्नपत्र में रचनात्मक सोच के और आलोचनात्मक प्रश्न ज्यादा हों। प्रश्नपत्र के स्वरूप में धीरे-धीरे बदलाव कर रहे हैं, जिससे बच्चों में रटने की प्रवृत्ति के बजाय बोधगम्यता बढ़े।

दीपक रस्तोगी : एक तरफ प्रतियोगी परीक्षाओं और पाठ्यक्रम का दबाव बढ़ रहा है, दूसरी तरफ सीबीएसई प्रश्नपत्रों का स्वरूप बदलने की बात चल रही है, ये दोनों चीजें कैसे संभव होंगी?
’पहले बच्चों के सामने मेडिकल, इंजीनियरिंग और प्रशासनिक सेवाओं में जाने के विल्प हुआ करते थे। पर आज बच्चों के सामने सैकड़ों विकल्प हैं। इनसे जुड़े पाठ्यक्रम भी चल रहे हैं। बच्चे आज हर क्षेत्र में जा रहे हैं। इस तरह अब अभिभावकों और बच्चों पर पहले जैसा दबाव नहीं है। हमें बच्चों को उसकी क्षमता के अनुरूप आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। जहां तक पाठ्यक्रम की बात है, तो इस पर चर्चा चल रही है कि कुछ विषयों में पाठ्यक्रम ज्यादा है, इससे बच्चों पर बोझ बढ़ रहा है। तो, माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और एनसीईआरटी ने भी यह प्रयास किया है कि जिन विषयों में आवश्यकता से अधिक पाठ्यक्रम हैं, उसे कम किया जाए। अब एक बात यह है कि इस पाठ्यक्रम को पूरा करने का तनाव कैसे दूर किया जाए। तो, मेरा मानना है कि फिलहाल जो पाठ्यक्रम है, उसे भी ठीक से पढ़ा और पढ़ाया जाए, तो तनाव नहीं होगा।

प्रियरंजन : क्या सीबीएसई को अपने मान्यताप्राप्त स्कूलों का उनके प्रदर्शन के आधार पर श्रेणीकरण नहीं करना चाहिए?
’ मेरा मानना है कि हमें किसी स्कूल पर यह ठप्पा नहीं लगाना चाहिए कि कौन अच्छा है और कौन बुरा है। इस प्रक्रिया को हमेशा हतोत्साहित करना चाहिए। जैसे जब कक्षा के किसी बच्चे को हम कहते हैं कि तुम्हीं श्रेष्ठ हो, तो बाकी बच्चे हतोत्साहित होते हैं। इसलिए सीबीएसई कभी टॉपर घोषित नहीं करता। इसी तरह स्कूलों की रेटिंग नहीं करना चाहते।

सुशील राघव : किन्हीं कारणों से प्रमाणपत्रों में कुछ बच्चों के नाम वगैरह गलत चले जाते हैं, जिससे उन्हें परेशानी उठानी पड़ती है। इस प्रक्रिया को सीबीएसई और आसान क्यों नहीं बना देता?
’किसी वजह से अगर किसी बच्चे का नाम गलत हो गया है, तो सीबीएसई उसे बिना अदालत में गए सीधे सुधार देता है। जैसे फॉर्म भरते समय कोई गलती रह जाती है और स्कूल उसे प्रमाणित करता है, तो उसे हम ठीक कर देते हैं। मगर जब वे परिवर्तन कराना चाहते हैं, जो कि उनकी पिछली कक्षाओं के रिकार्ड से अलग होता है, तो हम उसे स्वीकार नहीं करते।

मुकेश भारद्वाज : आपसे मान्यता प्राप्त ज्यादातर स्कूल निजी हैं। मगर सरकारी और निजी स्कूलों के बीच एक तरह का संघर्ष चलता रहता है। खासकर फीस और आर्थिक रूप से कमजोर तबके के बच्चों के मामले में। क्या आप इसमें एक मध्यस्थ एजंसी के तौर पर कोई भूमिका नहीं निभा सकते? इसका हल क्या है?
’लगभग सोलह हजार निजी स्कूल हमारे पास हैं। 2009 से शिक्षा का अधिकार कानून लागू है। उसी से जुड़ा हुआ है आर्थिक रूप से कमजोर तबके के बच्चों का दाखिला। शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों साथ मिल कर काम करते हैं। सीबीएसई की गाइडलाइन में यह स्पष्ट है कि फीस आदि को लेकर राज्य सरकार नीति बना सकती है। उसे राज्य के सरकारी और निजी दोनों तरह के स्कूलों को मानना होगा। हम फीस के बारे में कोई नीति नहीं बनाते। इसलिए सीबीएसई स्कूल भी संबंधित राज्यों के नियम-कायदों का पालन करते हैं। फिर किसी भी संस्थान को रिकग्निशन और एनओसी राज्य सरकारें देती हैं। कोई भी ऐसा स्कूल नहीं हो सकता जो राज्य सरकार का रिकग्निशन नहीं लगाता। इसलिए फीस के मामले में सीबीएसई स्कूलों को भी राज्य सरकारों के नियमों का पालन करना पड़ता है।

मनोज मिश्र : तमाम प्रयासों के बावजूद बच्चों की खुदकुशी जैसी घटनाओं को रोकने में सफलता नहीं मिल पा रही है। बच्चों में परीक्षा का तनाव दूर करने का क्या पुख्ता इंतजाम हो सकता है?
’अभी कुछ दिनों पहले माननीय प्रधानमंत्री ने परीक्षा पर चर्चा नाम से एक सेशन लिया और पूरे देश के अभिभावकों, बच्चों और अध्यापकों को संबोधित किया। उसमें उन्होंने बहुत स्पष्ट ढंग से सलाह दी और समझाने का प्रयास भी किया कि परीक्षाएं आती-जाती रहती हैं। और एक बार जो नंबर मिल गया, वह जिंदगी में मिलने वाला एकमात्र नंबर नहीं है। अभिभावकों, अध्यापकों और बच्चों को यह मान कर चलना चाहिए कि यह परीक्षण जिंदगी भर चलता रहेगा। इस तरह उन्होंने बहुत अच्छे तरीके से समझाने का प्रयास किया कि हमारे देश की कक्षाएं तनावमुक्त रहें, बच्चे तनावमुक्त रहें। उन्होंने अभिभावकों को भी सलाह दी कि आप अपने बच्चों की उपलब्धियों को अपने विजिटिंग कार्ड की तरह न लेकर घूमें। इस तरह इसमें समाज की भी बड़ी भूमिका है। इसमें बच्चे की भीतरी क्षमता बढ़ाने की जरूरत है। कक्षाएं रोचक हों।

मृणाल वल्लरी : कुछ शिक्षाविद यह भी मानते हैं कि परीक्षा की वजह से बच्चों में सीखने की क्षमता कुंद हो जाती है। इसलिए सतत मूल्यांकन की बात की गई, पर वह जमीन पर नहीं उतर पा रहा। क्यों?
’परीक्षाओं के कारण बच्चे सिर्फ वही पढ़ और समझ रहे हैं, जो परीक्षा में आएगा। इस तरह पुस्तकों से उनका लगाव कम होता जा रहा है। स्कूल पढ़ाने का तरीका अपनाने और बच्चों के मूल्यांकन के लिए स्वतंत्र हैं। नौंवीं तक और फिर ग्यारहवीं में हम कोई राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा आयोजित नहीं करते। स्कूल अपना पाठ्यक्रम बना सकता है, अपने प्रश्नपत्र, अपने अभिनव प्रयोगों के जरिए बच्चों को प्रशिक्षित करता है, उनका मूल्यांकन करता है। हम सिर्फ दसवीं और बारहवीं की परीक्षाएं साल में दो बार लेते हैं। हम यह भी प्रयास कर रहे हैं कि हमारे प्रश्नपत्र इनोवेटिव बनें, जिससे उनकी रचनात्मकता और जीवन के प्रति सकारात्मकता, प्रसन्नता बढ़े। बच्चों का पुस्तकों से लगाव कम होने के पीछे मेरा मानना है कि उसमें स्कूल-समाज दोनों को मिल कर काम करना होगा। राष्ट्रीय श्क्षिा नीति कहती है कि बच्चों को आजादी दी जाए, उन्हें सिर्फ रटने को न उकसाया जाए। वे अपने जीवन से अपने असपास से सीखें। इस दिशा में हम काम कर रहे हैं।

अजय पांडेय : मगर आज जिस तरह ज्यादातर निजी स्कूल दुकान की तरह चल रहे हैं और परीक्षा परिणाम को वे अपनी उपलब्धि बताते हैं, उसमें बच्चों को सीखने का ऐसा माहौल देना कैसे संभव होगा?
’ज्ञान प्राप्त करना जरूरी है। पर वह ज्ञान ग्रहण होना चाहिए, रटा हुआ नहीं होना चाहिए। सीबीएसई स्कूल बहुत रचनात्मक हैं। आपको आश्चर्य होगा कि उनमें से ज्यादातर स्कूल रटने पर नहीं, बल्कि बोधगम्यता पर जोर दे रहे हैं। इसलिए अभिभावकों को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे बच्चों को रटने के बजाय सीखने को प्रेरित करें। पढ़ना और प्रयोग करके सीखना दोनों साथ-साथ चलें, तो बोधगम्यता बढ़ेगी। इसलिए हम आंतरिक मूल्यांकन का प्रावधान रखते हैं, जिसमें स्कूल और अध्यापक बच्चे के सीखने का मूल्यांकन कक्षा और प्रयोगशाला में करता रहता है। यह प्रयास रहता है कि बच्चा प्रयोगशाला में करके सीखे।

आर्येंद्र उपाध्याय : ज्यादातर राज्य शिक्षा बोर्डों की स्थिति कुछ अच्छी नहीं है। इस तरह एक बड़ी आबादी अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा से वंचित रह जाती है। इस विषमता को कैसे दूर किया जा सकता है?
’शिक्षा हमारे देश की प्राथमिकता है। किसी भी देश में विकास की रफ्तार तेज करनी है, तो एक तरीका यह है कि उसमें शिक्षा के स्तर को बढ़ा दिया जाए, सीखने की प्रक्रिया को तेज कर दिया जाए। शिक्षा इसलिए भी दी जाती है कि बच्चे में ज्ञान और मूल्य के साथ-साथ कोई कौशल भी विकसित किया जाए, ताकि वह कुछ कर सके। इन तीन चीजों को ध्यान में रख कर हमारी वर्तमान सरकार आगे बढ़ रही है। सीबीएसई इसमें सहयोग कर रहा है। लाखों बच्चे हमारे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में दाखिला ले रहे हैं। मगर सीबीएसई केवल देश के करीब ढाई प्रतिशत बच्चों को शिक्षित कर पाता है। बाकी बच्चे राज्य शिक्षा बोर्डों पर निर्भर हैं। इसलिए जब हम राज्य शिक्षा बोर्डों के साथ बैठते हैं तो हमारा प्रयास रहता है कि उनके शिक्षा का जो स्तर है, उसे जितना बेहतर हो सके करने का प्रयास करना चाहिए। राज्य सरकारें कर भी रही हैं, पर और करना चाहिए। बहुत सारे राज्यों के बहुत सारे स्कूल भी बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं। फिर भी राज्य सरकारों को शिक्षा को प्राथमिकता में रख कर और बेहतर काम करना चाहिए, और व्यावसायिक पाठ्यक्रम लाने चाहिए।

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