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बारादरी: वैकल्पिक राजनीति का ढांचा गढ़ने में सफल रहे

धर्म और जाति का राजनीतिकरण होने के बजाय चिकित्सा और शिक्षा का राजनीतिकरण होने लगे, तो उसमें प्रतियोगिता ज्यादा अच्छी होगी। मैं मानता हूं कि शिक्षा के नाम पर देश में राजनीति हो, स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर राजनीति हो, बिजली-पानी पर राजनीति हो। इन मामलों में विपक्ष पूरी तरह निगाह रखे और हमसे कहीं चूक होती है, तो वे सवाल उठाएं। अगर हम इन क्षेत्रों में अच्छा काम कर रहे हैं, तो उसका प्रचार करेंगे।

Author Updated: August 25, 2019 6:37 AM

आम आदमी पार्टी के नेता और राज्यसभा सांसद संजय सिंह दावा करते हैं कि बिजली, पानी, चिकित्सा, शिक्षा, फ्लाई ओवर, अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने जैसे कामों के कारण अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी 2015 वाला प्रदर्शन दुहराएगी। उन्होंने कहा कि पार्टी को दूसरे राज्यों में अपनी जड़ें जमाने में अभी वक्त लगेगा, लेकिन वैकल्पिक राजनीति का ढांचा खड़ा करने में वह सफल रही है। आगामी चुनावों में गठबंधन को लेकर कहा कि कांग्रेस एक भ्रमित पार्टी है, जिसमें निर्णय लेने की क्षमता नहीं है। बातचीत कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

मनोज मिश्र: लोकसभा चुनाव में दिल्ली के नतीजे आम आदमी पार्टी के अनुकूल नहीं रहे। अगले विधानसभा चुनाव में उसका कितना असर रहेगा?
संजय सिंह: विधानसभा का चुनाव जो हम लोग 2015 में जीते थे, उसका प्रमुख कारण था उनचास दिन की हमारी पहली सरकार का कामकाज। हमने उनचास दिनों में ही बिजली का दाम आधा कर दिया था, पानी मुफ्त किया था, भ्रष्टाचार के बहुत सारे मामले दर्ज किए थे और ऐसा लग रहा था कि नई तरह की राजनीति शुरू हुई है हिंदुस्तान में। इसलिए 2015 में जब हम चुनाव में उतरे, तो वह फेहरिस्त हमारे पास थी। उसके बाद हमने अलग-अलग वर्ग के साथ बातचीत करके उनका मुद्दा अपने घोषणापत्र में शामिल किया था। सत्तर बिंदुओं का हमारा घोषणापत्र था। लगभग पांच वर्षों में हमने उन सत्तर वादों को तो पूरा किया ही, उसके अलावा बहुत सारे उससे अलग हट कर भी काम किए। जैसे महिलाओं के लिए मुफ्त मेट्रो हमारे घोषणापत्र में नहीं था। बुजुर्गों की तीर्थ यात्रा का वादा उसमें नहीं था। बिजली, पानी, चिकित्सा, शिक्षा, फ्लाईओवर, अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने से लेकर जितने भी काम हमने किए हैं, उसे देखते हुए मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि हम 2015 का अपना प्रदर्शन दुहराएंगे। जहां तक लोकसभा चुनाव की बात है, तो सामने लोग मोदीजी को देख रहे थे, उनके खिलाफ राहुल गांधी को देख रहे थे। उसमें लोग देख रहे थे कि हम कोई सरकार बनाने की दौड़ में नहीं हैं, हो सकता है, इसलिए हमें नकार दिया हो।

पंकज रोहिला: इन दिनों पार्टी में जैसी बगावत सामने आ रही है, वह कितनी चुनौती पेश करेगी?
’बगावत तो क्या, अब शांति का वातावरण है। जो बगावत करके गए थे, अब एक तरीके से औपचारिक रूप से उनकी विधानसभा की सदस्यता रद्द हो गई है। औपचारिक रूप से उन्होंने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली है। इससे यह भी पता चलता है कि कहीं न कहीं इसके पीछे एक रणनीति भी थी। लगातार खिलाफ बोलने के पीछे या अलग-अलग मुद्दों पर पार्टी या सरकार का विरोध करने के पीछे उनकी मंशा कहीं न कहीं साफ थी, क्योंकि अब वे खुलेआम भाजपा में शामिल हो गए हैं। मैं समझता हूं कि इन बातों से कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि लोग सरकार के प्रदर्शन पर वोट देंगे। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अनुकरणीय काम करके दिखाया है। हमारे मुहल्ला क्लीनिक की चर्चा ‘न्यूयार्क टाइम्स’ में भी हुई है। हमारे मुहल्ला क्लीनिक को देखने बान की मून आए। कोफी अन्नान ने इसकी तारीफ की थी। दुनिया के तमाम देशों में इसकी चर्चा हो रही है। कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि सरकारी स्कूलों में एयर कंडीशंड कमरे बन सकते हैं। हैप्पीनेस क्लासेज की शुरुआत की। इनके परिणामस्वरूप जनता जरूर हमारा साथ देगी।

मृणाल वल्लरी: अभी देश में जिस तरह का माहौल है, उसमें देशभक्ति सबसे ऊपर दिखती है। अरविंद केजरीवाल जी ने भी इसे पाठ्यक्रम में शमिल करने की बात कही। अभी देश के बच्चों में क्या देशभक्ति की कमी है, जो इस तरह के कदम उठाने की बात हो रही है?
’मुझे लगता है कि जो लोग अपने को देशभक्त कह रहे हैं, वे छद्म राष्ट्रवादी और छद्म देशभक्त हैं। इनका देशभक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। देशभक्ति यह नहीं सिखाती कि भारत माता की जय बोल कर किसी निर्दोष व्यक्ति को चौराहे पर पकड़ कर पीटिए। देशभक्ति के नाम पर एक तरह का उन्माद ही फैलाया गया है। हिंदुस्तान विविधता में एकता वाला देश है। मुश्किल यह है कि मुसलिम नेतृत्व भी हर समय रक्षात्मक मुद्रा में है। जबकि उन्हें यह उदाहरण सामने रखना चाहिए कि देश की आजादी में उनका क्या योगदान रहा। हिंदुस्तान की एक बड़ी आबादी धर्मनिरपेक्ष है। इसलिए देशभक्ति के नाम पर उन्माद फैलाने वाले लोगों का भला नहीं होने वाला है।

अजय पांडेय: जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटाने पर आपकी पार्टी ने सरकार का समर्थन किया। इसके पीछे पार्टी की क्या दलील है?
’पहले तो यह समझना होगा कि जब देश में अनुच्छेद तीन सौ सत्तर लागू हुआ तब उस संविधान समिति में श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी सदस्य थे। उन्होंने विरोध नहीं किया। अब भाजपा कहती है कि वे तीन सौ सत्तर के खिलाफ थे, तो यह उचित नहीं है। दूसरी बात कि तीन सौ सत्तर जिस स्वरूप में लागू हुआ था, उसकी लगभग नब्बे प्रतिशत धाराएं, जो पहले लागू नहीं होती थीं कश्मीर के अंदर अब वे लागू होती हैं। कुछ प्रावधान जरूर बचे थे, जैसे संपत्ति और जमीन का मामला। बहुत सारे प्रावधान पिछली सरकारों ने बदला था, लेकिन वहां की विधानसभा की सहमति से बदला था। डॉक्टर लोहिया के जमाने से मांग रही है कि धारा तीन सौ सत्तर को लेकर दोहरा रवैया नहीं होना चाहिए। कुछ प्रावधान ऐसे थे, जो वहां के विकास की राह में रोड़ बन रहे थे। अब सरकार कह रही है कि उन्हें हटा कर वहां विकास की गंगा बहाएगी, तो हमें उन्हें मौका देना पड़ेगा। देखते हैं, क्या करते हैं।

दीपक रस्तोगी: भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर सरकार इन दिनों काफी सक्रिय है। इस पर आपकी क्या टिप्पणी है?
’सीबीआइ या सरकार की जितनी एजंसियां हैं, उनका दुरुपयोग हो रहा है। जब अरविंद केजरीवाल जी के दफ्तर पर छापा पड़ा, तो खूब हल्ला मचा कि राजेंद्र कुमार जैसा एक महाभ्रष्टाचारी पकड़ा गया है। मगर फिर क्या हुआ? कुछ नहीं निकला। इसी तरह सत्येंद्र जैन को परेशान किया गया। मनीष सिसोदिया के घर पर भी छापे पड़े। लेकिन किसी पर कुछ आरोप सिद्ध नहीं हुआ, कोई सबूत हाथ नहीं लगा। इस तरह अगर सरकारी तंत्र किसी व्यक्ति को प्रताड़ित करता है, तो वह कैसे निष्पक्ष कहा जा सकता है।

मनोज मिश्र: पहले भी सरकारें जांच एजंसियों का दुपयोग करती रही हैं। आप लोग इस बात पर बहस क्यों नहीं चलाते कि जांच एजंसियां स्वायत्त हों?
’हमारी एक सीमित संख्या है। दो लोग राज्यसभा में हैं और एक सदस्य लोकसभा में है। मगर जितने भी काले कानून या मनमाना बदलाव इन्होंने किया, सबका हमने विरोध किया। हम लगातार इस बात के समर्थक रहे हैं कि जांच एजंसियों को निष्पक्ष रखा जाए और सरकार के नियंत्रण से मुक्त रखा जाए। आज भी हम उस सिद्धांत पर कायम हैं।

अजय पांडेय: आम आदमी पार्टी ने दूसरे राज्यों में भी पार्टी खड़ी करने की कोशिश की, मगर दिल्ली के अलावा कहीं भी खड़ी नहीं हो पाई। इसकी क्या वजह है?
’मैं ऐसा मानता हूं कि जब दिल्ली की जनता ने हमें जनादेश दिया, अट्ठाईस सीटें दी, उसके बाद जब हमने इस्तीफा दिया तो उसको लोगों ने अच्छे रूप में देखा। हालांकि आलोचना भी खूब हुई। फिर हम लोकसभा की चार सौ से ऊपर सीटों पर चुनाव लड़ गए। उसमें हार का सामना करना पड़ा। कई जगहों पर हमारी जमानत जब्त हो गई। इस तरह जनता ने हमें संकेत दे दिया था कि आप अपने पैर धीरे-धीरे फैलाइए। मैं व्यक्तिगत रूप से मानता हूं कि पार्टी को दूसरे राज्यों में अपनी जड़ें जमाने में अभी वक्त लगेगा। मगर सात सालों में एक पार्टी का एक राज्य में सरकार बना लेना, पंजाब, गोवा आदि में बेहतर प्रदर्शन करना कम बड़ी बात नहीं है। हां, अगले चुनाव के बाद देश के स्तर पर लोगों में एक सकारात्मक सोच बनेगी।

सूर्यनाथ सिंह: आम आदमी पार्टी का उदय एक वैकल्पिक राजनीति देने की उम्मीद के साथ हुआ था। अभी जिस तरह का राजनीतिक माहौल है, उसमें किसी तरह की वैकल्पिक राजनीति की गुंजाइश है?

’बिल्कुल है। जहां तक व्यवस्था की बात है, हमने वैकल्पिक शासन दिया है। मैं ऐसा मानता हूं और हमारी पार्टी ऐसा मानती है कि अगर आम आदमी के जीवन में सुधार करना चाहते हैं, उसकी न्यूनतम जरूरतें पूरी करना चाहते हैं, तो उसे सस्ते दामों पर या मुफ्त पूरी कराई जा सकती हैं। बिजली, पानी, श्क्षिा और चिकित्सा ये चार चीजें इंसान की बुनियादी जरूरत है, जिसे पूरा करने के लिए हम काम कर रहे हैं। वैकल्पिक राजनीति का जो मॉडल है, सरकार के प्रशासन के स्तर पर दिया है। अब जहां तक विचारधारा का मामला है, उसमें मौजूदा भाजपा सरकार है या कांग्रेस है, उसके विकल्प के तौर पर राष्ट्र के स्तर पर हम कैसे विस्तार करेंगे, उसमें हम अभी उतने सफल नहीं हैं, इसे मैं पूरी ईमानदारी से स्वीकार करता हूं। मगर उसकी वजह यह है कि जिन चुनौतियों से हमें पार पाना है, वह इतना आसान नहीं है। जाति और धर्म की राजनीति से पार पाना आसान नहीं है। इसमें देश की जनता की सामूहिक जिम्मेदारी भी बनती कि वैकल्पिक राजनीति का माहौल बनाए।

अजय पांडेय : लोकसभा चुनाव में आप लोगों ने एक विपक्षी मोर्चा बनाने का प्रयास किया। क्या विधानसभा चुनावों में भी ऐसा होगा?
’नहीं। अभी तक ऐसा कोई इरादा नहीं है। अकेले चुनाव लड़ेंगे। बाकी राज्यों में भी सारी सीटों पर चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, कुछ-कुछ सीटों पर लड़ रहे हैं।

अरविंद शेष : दिल्ली में शिक्षा को लेकर आपका कहना है कि हम मुद्दा बना रहे हैं और विपक्ष का कहना है कि आप राजनीतिकरण कर रहे हैं। इसमें क्या सही है?

’मैं तो कहता हूं कि इस देश में धर्म और जाति का राजनीतिकरण होने के बजाय चिकित्सा और शिक्षा का राजनीतिकरण होने लगे, तो उसमें प्रतियोगिता ज्यादा अच्छी होगी। मैं मानता हूं कि शिक्षा के नाम पर देश में राजनीति हो, स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर राजनीति हो, बिजली-पानी पर राजनीति हो। इन मामलों में विपक्ष पूरी तरह निगाह रखे और हमसे कहीं चूक होती है, तो वे सवाल उठाएं। अगर हम इन क्षेत्रों में अच्छा काम कर रहे हैं, तो उसका प्रचार करेंगे। उन्हें लगता है कि राजनीतिकरण कर रहे हैं, तो कहते रहें।

मुकेश भारद्वाज : जबसे आप सत्ता में आए, उसी दिन से पार्टी टूटनी शुरू हो गई। यहां तक कि आपके लोकपाल भी आपको छोड़ गए। सबको इकट्ठा क्यों नहीं रखा जा सका? इसके लिए इल्जाम आपके नेता पर ही लगता है।

’आजादी के आंदोलन से ही आप देखेंगे, तो जो कम्युनिस्ट पार्टियों में या सोशलिस्ट पार्टी में नेता गए, वे सब पहले कांग्रेस में थे। मगर समय-समय पर उनमें मतभेद होते गए और अलग होते गए, अपनी विचारधारा पर काम किया और अपनी पार्टी बनाई। हमने भी एक प्रयास किया। आंदोलन की कोख से निकली हमारी पार्टी है। इसमें अलग-अलग संगठनों और विचारधाराओं से लोग आए। फिर हमसे किसी वजह से मतभेद हुआ और वे अलग होते गए। मैं इसे बिल्कुल ठीक नहीं मानता। अच्छा होता कि सब साथ रहते। जब कोई संगठन जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, तो ऐसे अंतर्विरोध पैदा होते हैं और उन्हें हमें झेलना पड़ता है। मगर उन सबसे निकल कर आप काम कैसा कर रहे हैं, वह ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। मैं मानता हूं कि जब हमारे साथ हमसे अलग होते हैं, तो हमारा नुकसान होता है। मगर इस बात का संतोष भी है कि जो जिम्मेदारी हमने अपने कंधों पर ली थी, उसे पूरा किया।

मृणाल वल्लरी : 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार के बहुत सारे आरोप लगे। मगर उसके बाद बहुत से मामलों में माफी मांगी गई और बहुत से मामलों ने अदालत में दम तोड़ दिया। आज की तारीख में क्या कांग्रेस उतनी बुरी नहीं है, जितनी पहले थी?

’न्यायालय के किसी निर्णय पर तो हम कोई सवाल उठा नहीं सकते, पर जहां तक कांग्रेस पार्टी का प्रश्न है, भ्रष्टाचार के उनके ऊपर जो आरोप लगे, ऐसा नहीं कि वे निराधार थे। मैं तो यह कहता हूं कि अगर सरकार भ्रष्टाचार को लेकर सचमुच गंभीर है, तो उसे राजनीति में आने से पहले और बाद के उनके धन अर्जन और संपत्ति का आकलन करे और उसे जब्त करे। आज नौ सौ करोड़ रुपए एनपीए है बैंकों का। उन लोगों के खिलाफ क्यों कार्रवाई नहीं होती। इस देश में बड़े-बड़े भ्रष्टाचार हुए हैं, चाहे वह कोयले में हुआ हो या टू-जी में हुआ हो, चाहे राष्ट्रमंडल खेलों में हुआ हो। उसने अदालतों में किसी वजह से दम तोड़ दिया, उस पर मैं कुछ नहीं कह सकता।

दीपक रस्तोगी: ईवीएम को लेकर आप लोग सवाल उठाते रहे हैं। पर कोई ठोस रणनीति क्यों नहीं बनाई जाती?
’इस समय मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस है। उसे आगे आकर इस पर दबाव बनाना होगा, तभी चुनाव आयोग पर कोई असर पड़ सकता है। तेईस पार्टियों के प्रतिनिधि वहां जाते थे, निर्वाचन आयोग हमारी बातें गंभीरता से सुनता था, पर कोई फैसला नहीं किया गया। अगर सभी राजनीतिक दल इस पर एकमत होते, तो शायद दबाव बनता, मगर सभी एक मत नहीं हो सके। बार-बार कहा गया कि ईवीएम में जो चिप लगती है, उसका एक ही बार उपयोग हो सकता है, उसकी रीप्रोग्रामिंग नहीं की जा सकती। मगर सूचना का अधिकार के तहत जानकारी मिली कि वह रीप्रोग्रामेबल है। फिर उसकी विश्वसनीयता कैसे असंदिग्ध है? मेरा सवाल यह है कि जब भी कहीं ईवीएम में गड़बड़ी होती है, वहां फायदा भाजपा को ही क्यों होता है! मतपत्र से चुनाव कराने की जरूरत इसलिए है कि मशीन पर लोगों को शंका है।

मुकेश भारद्वाज : लोकसभा चुनाव में आप कांग्रेस के साथ समझौता करने को तैयार थे। क्या गड़बड़ी हुई कि वह समझौता नहीं हो पाया। क्या विधानसभा में समझौता करेंगे?
’कांग्रेस एक भ्रमित पार्टी है। निर्णय लेने की क्षमता उनमें नहीं है। बहुत देरी से अपने प्रत्याशी मैदान में उतारना, बहुत देरी से समझौते पर विचार करना। हम तो इस पर भी तैयार थे कि एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम देश के सामने रखा जाए। मगर नहीं हो पाया। तब हमारा मकसद भाजपा को रोकना था, क्योंकि उनकी नीतियों और कामकाज से हम सहमत नहीं थे। पर जब हमने कांग्रेस के साथ चार राज्यों में गठबंधन की बात की, तो वे आनाकानी करते रहे और अंत में समझौता नहीं हो पाया। जहां तक विधानसभा चुनावों की बात है, तो यहां राज्य सरकार के कामकाज का मूल्यांकन होगा, इसलिए हम समझौता नहीं करने जा रहे। इस मामले में हम अपने को बहुत आगे मानते हैं।

संजयसिंह
23 मार्च, 1972 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में जन्म। खनन इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया। सुल्तानपुर में 1998 में ‘आजाद सेवा समिति’ नाम की संस्था का गठन कर कमजोर तबकों को शिक्षा दिलाने की मुहिम शुरू की। भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में अण्णा आंदोलन से जुड़े और आम आदमी पार्टी की कोर समिति के सदस्यों में से हैं। जमीन से जुड़े उन चेहरों में गिने जाते हैं, जो वैकल्पिक राजनीति का ढांचा खड़ा करने की जंग लड़ सकते हैं। राज्यसभा में अपने पहले ही भाषण से लोकप्रियता हासिल की। सदन में विपक्ष की उन आवाजों में से हैं, जिन्हें सुनना पसंद किया जाने लगा है।

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