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बदलाव की अंगड़ाई ले रहा है हरियाणा का युवा

दुष्यंत चौटाला 2014 के लोकसभा चुनाव में सबसे कम उम्र के छब्बीस साल में संसद पहुंचने वाले सांसदों में शामिल हैं। उन्होंने हरियाणा जनहित कांग्रेस के कुलदीप बिश्नोई को 31 हजार 847 वोटों से हराया था।

Author Published on: September 29, 2019 3:07 AM
दुष्यंत चौटाला

तीन अप्रैल, 1988 को हरियाणा के हिसार जिले के दारोली में जन्मे दुष्यंत चौटाला 2014 के लोकसभा चुनाव में सबसे कम उम्र के छब्बीस साल में संसद पहुंचने वाले सांसदों में शामिल हैं। उन्होंने हरियाणा जनहित कांग्रेस के कुलदीप बिश्नोई को 31 हजार 847 वोटों से हराया था। ओम प्रकाश चौटाला के पोते और अजय चौटाला के पुत्र दुष्यंत ने 2018 में इंडियन नेशनल लोक दल से बर्खास्त होने के बाद जननायक जनता पार्टी की स्थापना की। पार्टी स्थापना के बाद जिंद में आयोजित रैली में छह लाख लोग इकट्ठा हुए थे, जिसे हरियाणा के इतिहास में 1986 के बाद काफी बड़ी रैली बताया जाता है। कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी से बिजनेस एडमीनिस्ट्रेशन और मैनेजमेंट में बीएससी करने वाले दुष्यंत ने राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय से कानून में स्नातकोत्तर की डिग्री ली है।

जननायक जनता पार्टी के युवा नेता दुष्यंत चौटाला का कहना है कि देश के कई राजनीतिक परिवार दो हिस्सों में बंट गए हैं, मायने यह रखता है कि जनता किसका साथ देती है। लोकसभा चुनाव में देश की सबसे बड़ी क्षेत्रीय पार्टी बन कर उभरने का दावा करते हुए वे कहते हैं कि हरियाणा का युवा बदलाव की अंगड़ाई ले रहा है और प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे चौंकाने वाले होंगे। बातचीत कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

मनोज मिश्र : परिवार में बिखराव और फिर पार्टियों में बढ़ोतरी का इस चुनाव में कितना असर पड़ेगा?
दुष्यंत चौटाला : मैं यह नहीं मानता कि परिवार में बिखराव हुआ है। राजनीतिक सोच बदल गई है। जननायक जनता पार्टी का निर्माण तब हुआ जब अजय सिंह चौटाला, दिग्विजय जी, निशांत जी, मुझको पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया। हमने पार्टी नहीं छोड़ी। न हम उत्तर प्रदेश की तरह निशान की, झंडे की, डंडे की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमने तो एक नई शुरुआत की है और प्रदेश की जनता ने जींद उपचुनाव में जहां हमें इकतीस हजार वोट दिया वहीं आइएनएलडी को चौंतीस सौ वोट दिया। लोकसभा चुनाव में हम इस देश की सबसे बड़ी क्षेत्रीय पार्टी बन कर उभरे हैं। वही आइएनएलडी, जो कभी चौबीस फीसद से कम वोट नहीं लेती थी, वह एक से डेढ़ फीसद पर सिमट गई है। इस तरह जनता ने यह तो स्वीकार कर लिया है कि जो विचारधारा चौधरी देवीलाल की थी, डॉक्टर अजय सिंह चौटाला की थी, वही सही है। जब हम परिवार को देखते हैं, तो आज सिंधिया परिवार दो हिस्सों में है, गांधी परिवार दो हिस्सों में है, बादल साहब का परिवार आज दो हिस्सों में है। हमारे परिवार में भी यह वाकया 1991 में देखने को मिला, जब चौधरी रणदीप सिंह जी ने कांग्रेस की सदस्यता ली थी। फिर चौधरी प्रताप सिंह भाजपा में गए थे। जनता किसका साथ देती है, यह अहमियत रखता है।

अजय पांडेय : चर्चा थी कि एक बार फिर से इनेलो और जेजेपी को मिलाने की कोशिश हो रही है। यह कहां तक सही है।
’यह राजनीतिक दलों के एक होने की बात है। मुझे नहीं लगता है कि कोई सामाजिक संगठन इस पर निर्णय ले सकता है। मैंने बहुत स्पष्ट कहा था कि हम पारिवारिक स्तर पर अलग नहीं हुए हैं। अगर कोई ऐसा मानता है, तो यह उसकी सोच हो सकती है। जहां तक राजनीतिक स्तर पर अलग होने की बात है, यह निर्णय संगठन का है।

पंकज रोहिला : आप भी युवाओं को सशक्त बनाने की बात कर रहे हैं और दूसरी पार्टियां भी कर रही हैं। आप उनसे खुद को किस तरह अलग साबित करते हैं?
’जब मैं सांसद चुना गया था तो स्किल इंडिया विभाग गठित हुआ था। वह युवाओं को सशक्त बनाने के लिए गठित किया गया था। आज कहां है वह स्किल इंडिया? करोड़ों रुपए उसमें खर्च कर दिए गए, उसके बावजूद देश में बेरोजगारी बढ़ी है। हरियाणा के मुख्यमंत्री ने अभी कहा कि हरियाणा में महज अस्सी हजार युवा बेरोजगार हैं। हैरानी की बात है कि तीन दिन लगातार क्लर्कों के इंटरव्यू चले, चार हजार कुछ पदों के लिए। उसमें पंद्रह लाख बच्चों ने पर्चे दिए। इसका मतलब तो यह हुआ कि जिन लोगों ने फार्म भरे उन पंद्रह लाख लोगों को सरकार बेरोजगार तो मानती है! आज के दिन सत्रह हजार ग्रुप-डी की नौकरियों के लिए अठारह लाख बच्चे फार्म भरते हैं। क्या वे सभी रोजगारशुदा हैं? हकीकत यह है कि इस सरकार ने युवा के लिए कोई कदम नहीं उठाया है। युवा के नाम पर पैसा जरूर बर्बाद किया है। ये कहते रहे कि विदेशी कंपनियां आएंगी, तो रोजगार बढ़ेगा। जबकि पांच सालों में किसी को कोई रोजगार नहीं मिला। बल्कि उलटा यह हुआ है कि मारुति और हीरो होंडा जैसी कंपनियां, जो हजारों युवाओं को रोजगार देती थीं, उन्होंने नौकरियों में कटौती शुरू कर दी है।

मुकेश भारद्वाज : पिछले कुछ चुनावों से हम देख रहे हैं कि एक लहर बन जाती है और उसी को आगे बढ़ाया जाता है, सर्वेक्षण भी उसी दिशा में आते हैं। हरियाणा में भी एक लहर बन चुकी है कि भाजपा की सरकार दुबारा आ रही है, एक सर्वे ऐसा दिखा भी चुका है। आपको कैसे लगता है कि लोग मौजूदा सरकार को नहीं चुनेंगे?
’हरियाणा का इतिहास गवाह है कि 2009 में जब भजनलाल अपनी सीट जीते थे और कांग्रेस नौ जीती थी, उस समय भी सर्वे कांग्रेस को सत्तर से अधिक सीटें दिखा रहे थे। उससे पहले 1984 में जब देश में राजीव गांधी की सरकार बनी थी, तब नब्बे की नब्बे सीटों पर कांग्रेस की जीत का दावा किया जाता था, मगर उस समय चौधरी देवीलाल को लोगों ने पचासी सीटें दी थीं। तो, परिस्थितियां समय के मुताबिक बदलती रहती हैं। आज प्रदेश में अठारह बच्चों की जान सिर्फ इसलिए चली जाती है कि वे दूसरे समुदाय से आते हैं, आगजनी की घटना होती है, अस्सी सरकारी लोगों को गोलियों से मार दिया जाता है, आज युवा रोजगार के लिए तरस रहा है, आज अपराध इतना बढ़ चुका है कि हरियाणा देश का चौथा सबसे बड़ा आपराधिक राज्य बन चुका है। प्रदेश की अर्थव्यवस्था की हालत यह है कि हम एक सौ साठ करोड़ रुपए से ज्यादा के कर्ज में डूबे हैं। ऐसे में हम कैसे राज्य सरकार को दुबारा जिता सकते हैं। इस बार नया इतिहास बनने वाला है कि किस तरह हरियाणा का युवा अंगड़ाई लेकर बदलाव लाएगा।

आर्येंद्र उपाध्याय : अगर आप सत्ता में आए, तो लोगों को रोजगार देने की क्या योजनाएं हैं आपके पास?
’आज हर राज्य ने अपने-अपने कानून पारित कर रखे हैं। उत्तराखंड, हिमाचल में सत्तर प्रतिशत स्थानीय लोगों को रोजगार का कानून है। इससे पहले महाराष्ट्र ने निर्णय किया था कि अस्सी फीसद मराठीभाषी बच्चों को रोजगार दिया जाएगा। सबसे बड़ी जरूरत है कि उत्पादन से अधिक खपत बढ़ाई जाए, तभी राजस्व बढ़ेगा। राजनीति में बहुत कम लोग समझते हैं कि राज्य को चलाने के लिए राजस्व की जरूरत है। हरियाणा खपत से सात सौ फीसद अधिक उत्पादन करता है। इसका मतलब है कि हम देश के दूसरे राज्यों को कर चुका रहे हैं। इसी का नतीजा है कि हरियाणा की अर्थव्यवस्था घाटे में चल रही है। आज जरूरत है कि हम हरियाणा के पचहत्तर फीसद बच्चों को नौकरी दें। इस तरह बेरोजगारी की समस्या खत्म हो जाएगी।

अजय पांडेय : कहा जा रहा है कि इस बार का चुनाव जाट और गैर-जाट के बीच होने जा रहा है। गैर-जाट भाजपा के साथ जा रहे हैं!
’मैं तो हैरान हूं कि हरियाणा में आज से पहले ऐसी चर्चा नहीं होती थी। खट्टर साहब का एक एजंडा था कि वे मुख्यमंत्री बनें और प्रदेश में एक चर्चा चलाएं। आप सोचिए कि अगर जाट और गैर-जाट का चुनाव होता तो क्या हमारे धर्मवीर सिंह यादव होकर भी भिवानी से जीत जाते? तो, लोगों के बीच इस तरह का जो प्रचार किया जा रहा है, वह सही नहीं है। जमीनी हकीकत यह है कि लोग बदलाव चाहते हैं।

मृणाल वल्लरी : पिछले कुछ समय से चुनावों में छवि प्रबंधन के आधार पर काम हो रहा है। उसमें भाजपा सबसे आगे है। इससे आप कैसे मुकाबला करेंगे?
’आज भाजपा की हालत यह है कि एक अनार सौ बीमार। अभी उनका टिकट बंटवारा शुरू नहीं हुआ। टिकट बंटने दीजिए, फिर देखिए कि उन्हें छोड़ कर कितने लोग भागते हैं।

दीपक रस्तोगी : पिछले चुनावों में देखा गया कि चुनाव प्रचार प्रबंधन के मामले में भी भाजपा सबसे मजबूत साबित हुई, जिसके चलते विपक्ष के उठाए तमाम बड़े मुद्दे हवा हो गए। इस लिहाज से आपकी क्या तैयारी है?
’लोकसभा से पांच महीने पहले राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव हुए थे। तीनों प्रदेशों में भाजपा हारी। मगर वही कांग्रेस जो वहां सरकार में है, उसके एक सांसद भी जीत कर नहीं आए। राज्य और केंद्र में यह परिवर्तन कोई पहली बार देखने को नहीं मिला। अनेक उदाहरण हैं। तो, लोग हर समीकरण को देखते हुए वोट डालते हैं।

मनोज मिश्र : इस चुनाव में कांग्रेस को कहां पाते हैं?
’पहले तो कांग्रेस अपनी अंदरूनी लड़ाई लड़ ले, बाकी बातें बाद में होंगी। आज स्थिति यह है कि उनके प्रदेश अध्यक्ष में बदलाव आ गया, विपक्ष का नेता बदला गया। आज स्थिति यह है कि वे लोग इनके मंच पर नहीं चढ़ रहे, समांतर कार्यक्रम कर रहे हैं। इससे पता चलता है कि इनके घर की लड़ाई बहुत ज्यादा है।

पंकज रोहिला : हरियाणा में आम आदमी पार्टी भी अपनी जमीन तलाश रही है, उनके साथ आपका गठबंधन भी रहा है। इस बार क्या स्थिति है?
’यह सही है कि हमने साथ मिल कर चुनाव लड़ा था, पर उनके नेता का संदेश आया कि इस बार वे गठबंधन नहीं चाहते, अकेले चुनाव लड़ेंगे। इसी तरह बसपा हमारे साथ आई, बड़ी ईमानदारी के साथ हमारा गठबंधन हुआ। हमने सारे जिलों के दौरे कर लिए, सीटों को लेकर कोई मनमुटाव नहीं रहा। पर बाद में उनके प्रभारी का एक ट्वीट आया कि वे इस गठबंधन पर राजी नहीं हैं। तो, यह उनकी अपनी इच्छा है। हम तो ग्यारह महीने बना हुआ संगठन हैं। इस दौरान हमने कई अड़चनें भी देखी हैं। पर उनसे हमने बहुत कुछ सीखा भी है।

मृणाल वल्लरी : इस चुनाव में आपके दादाजी पर सबकी नजर रहेगी। उनका झुकाव किसकी तरफ रहेगा।
’वह तो उनका अपनी पार्टी की तरफ ही रहेगा। पिछले लोकसभा चुनाव में भी आए थे। अगर उसका कोई विपरीत प्रभाव पड़ता, तो क्या हमें इतनी कामयाबी मिलती। क्या जिस पार्टी को कभी पच्चीस फीसद से कम वोट नहीं मिले, वह डेढ़ फीसद पर रह जाती?

अरविंद शेष : आपने नई पार्टी बनाई है। क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों के बारे में आपकी क्या राय है?
’भारत एक ऐसा देश है, जहां द्विदलीय प्रणाली नहीं चल सकती। हम जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं। ऐसे में कोई यह कहे कि दो पार्टियां ही राज करेंगी, तो यह संभव नहीं है। परिवर्तन आता रहता है। आप देख रहे हैं कि कांग्रेस खत्म हो रही है। जनसंघ से जो जनता पार्टी और भारतीय जनता पार्टी बनी, उसका भी यह उच्च शिखर पर पहुंचने का समय है। क्या पता, कोई और संगठन इससे आगे निकल जाए। क्या पता कांग्रेस खत्म हो जाए और कोई तीसरा दल अगुआ बन जाए। हमारे लोकतंत्र में हर नागरिक को यह अधिकार है कि अगर वह सौ लोगों का हलफनामा ले जाकर निर्वाचन आयोग से राजनीतिक दल बनाने की इच्छा जाहिर करे, तो बना सकता है। आज तो हजारों राजनीतिक दल पंजीकृत हैं, पर चुनाव मैदान में कितने लोग सफल हो पाते हैं, महत्त्वपूर्ण बात यह है।

सूर्यनाथ सिंह : जमीनी हकीकत यह भी है कि देश में लोगों का प्रधानमंत्री पर अभी विश्वास बना हुआ है। ऐसे में हरियाणा में आप कैसे खट्टर सरकार को चुनौती दे पाएंगे?
’जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने थे, तब भी हरियाणा में लोगों ने भजनलाल में विश्वास जताया था। 1987 के चुनाव में राजीव गांधी अपनी लोकप्रियता के चरम पर थे, पर हरियाणा में चौधरी देवीलाल को लोगों ने जिताया था। कांग्रेस पांच सीटें जीत पाई थी। आज हरियाणा की जैसी परिस्थिति है, उसमें लोग खट्टर सरकार के घमंड को भुला नहीं सकते।

अजय पांडेय : सतलुज यमुना जोड़ परियोजना पर आज कोई बात नहीं करता, जबकि यह बहुत पुराना मुद्दा है। हरियाणा भी पानी की समस्या से जूझता रहा है। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
’यह इकतालीस साल पुराना मामला है। मेरा मानना है कि केंद्र सरकार की विफलता की वजह से यह मामला आज तक हल नहीं हो पाया। हिंदुस्तान एकमात्र ऐसा देश है, जहां पानी को राज्य की संपत्ति माना जाता है। जबकि तमाम देशों में इसे राष्ट्रीय संपत्ति का दर्जा दिया गया है। राज्य की संपत्ति होने का ही नतीजा है कि अनेक नदियों के जल बंटवारे को लेकर विवाद हैं। इन तमाम झगड़ों को खत्म करने के लिए सरकार को पानी को राष्ट्रीय संपत्ति बनाना पड़ेगा। हालांकि इससे संबंधित एक विधेयक पहले ही लोकसभा में पारित हो चुका है, पर राज्यसभा में अब तक नहीं उसे रखा गया।

 

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